नाज़रीने किराम अस्सलामु अलैकुम!
आज मैं अपनी गुफ़्तगू का आग़ाज़ इस शेर से कर रहा हूँ कि
दिल के फफोले जल उठे सीने के दाग़ से
इस घर को आग लग गई घर के चराग़ से
बड़े ही अफ़सोस के साथ मैं यह लोगों को खुशखबरी दे रहा हूँ कि आज (2 जुलाई 2026) ब-रोज़ जुमेरात बाद नमाज़-ए-इशा, सरज़मीन दीवरी, ज़िला पीलीभीत में ब-मौक़ा उर्स हुज़ूर नन्हे मियाँ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु, ज़िक्र-ए-शुहदाए कर्बला कॉन्फ्रेंस का इनइक़ाद किया जा रहा है, जिसमें कुछ मशाइखे मकनपुर भी तशरीफ़ ला रहे हैं।
दीवरी व नवाह-ए-दीवरी को हुज़ूर नन्हे मियाँ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने जिस फ़ाक़ा-कशी, एक-एक गेहूँ का दाना इकट्ठा करके, आटे की चुटकियाँ इकट्ठा करके, जिस मक़सद के तहत अपने ख़ून-पसीने से सींचा, उसकी मिसाल ता-क़यामत ज़िंदा व जावेद रहेगी।
लफ़्ज़ों में आपकी कुर्बानियों को बयान नहीं किया जा सकता, क्योंकि आपकी ज़िंदगी की हर-हर अदा में सीरत-ए-मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का किरदार नुमायाँ तौर पर नज़र आता था। आपकी ज़िंदगी में जो दीवरी की नुमायाँ क़द्र थी, आज वह मफ़क़ूद होती हुई नज़र आ रही है। क्योंकि आपके मिशन को मिटाने के लिए आज दीवरी में सरमाया-ए-सिलसिला नासिबियत, बाग़ियान-ए-मदारियत, मुख़ालिफ़ीन-ए-हनफ़ियत, आशिक़ान-ए-नज्दी व वहाबियत की एक बड़ी और बड़ी टोली दीवरी में तशरीफ़ ला रही है और दीवरी वालों ने आज मजमा इकट्ठा करने के लिए क़ौम को लॉलीपॉप दिया है कि आज हरी पत्ती की खूबसूरत और लज़ीज़ मुरादाबादी बिरयानी का हमने एहतेमाम किया है, जिसे आप हज़रात खाकर के नसबियत और राफ़ज़ियत का तबर्रुक अपने पेटों में भर करके ले जाएँ, क्योंकि यहाँ से आज अहल-ए-सुन्नत वल जमाअत का कोई पैग़ाम मिलने वाला नहीं।
जहाँ ऐसे सिलसिले के लोग पीलीभीत की ऐसी ख़ानक़ाह कि जिस ख़ानक़ाह पर उलमा-ए-मदारिया पहुँचे तो वहाँ के चीफ़ ने सारे उलमा-ए-मदारिया को यह कहकर कट कर दिया, “अलहम्दुलिल्लाह हमारे सिलसिले में बड़े-बड़े ख़ुतबा और शुअरा मौजूद हैं, हमें किसी भी सिलसिले के ख़तीबों की ज़रूरत नहीं,” उसी ख़ानक़ाह का ऐसे शायर जो मुसलमानों की आबरू के साथ खिलवाड़ करे, सरताज बनाकर के आप हज़रात अपने स्टेज पर बुला रहे हैं। कौन से स्टेज पर? जिस स्टेज को उर्स हुज़ूर नन्हे मियाँ का टाइटल दिया है आपने। यह नन्हे मियाँ हुज़ूर का टाइटल देकर आप क़ौम को गुमराह कर रहे हैं। क्या ख़ानदान-ए-मदारिया में ख़ुतबा और शुअरा खत्म हो गए? क्या शहज़ादगान-ए-हुज़ूर नन्हे मियाँ सब इस लायक नहीं थे कि उर्स हुज़ूर नन्हे मियाँ में शरीक होते या शहीद-ए-आज़म कॉन्फ्रेंस में आकर मौजूद होते?
अगर वाक़ई यह जलसा, यह कॉन्फ्रेंस अहल-ए-सुन्नत वल जमाअत की है तो मैं अपने कुछ दावे पेश कर रहा हूँ कि मुकम्मल तौर पर, मुकम्मल तौर पर इस कॉन्फ्रेंस से आप एलान करवाइए कि
जो इस्माईल देहलवी को काफ़िर नहीं मानेगा या उसके कुफ्र में शक करेगा, वह काफ़िर है।
दूसरा मेरा दावा है, आप एलान करवाइए अगर वाक़ई यह सुन्नियत का जलसा है कि ताज़ियादारी को हराम कहने वाला नसबी व राफ़ज़ी है।
आप एलान करवाइए कि मस्लक-ए-इमाम-ए-आज़म या चारों मस्लक के अलावा पाँचवें मस्लक को मानने वाला या नारा लगाने वाला बिदअती और जहन्नमी है।
आप यहाँ से एलान करवाइए कि सरकार मदारुल आलमीन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के सिलसिले को जारी व सारी न मानने वाला गुमराह है, सवाद-ए-आज़म से हटा हुआ है, अहल-ए-सुन्नत वल जमाअत से ख़ारिज है।
अगर इन दावों को आप पेश कर देते हैं, इन दावों पर आप अपने इस प्रोग्राम को लाएह-ए-अमल पहनाते हैं तो अलहम्दुलिल्लाह मेरा सर आपकी अज़मतों के आगे झुका रहेगा और आपकी मोहब्बतों और अज़मतों को तह-ए-दिल से मैं सलाम पेश करूँगा।
अलबत्ता आखिर में मैं कहना चाहता हूँ, मेरी इस कमेंट से अगर किसी की दिल-आज़ारी हुई हो, दिल को तकलीफ़ हुई हो, यह एक थोड़ी सी दिल की आवाज़ थी जो मैंने आप तक पहुँचाई है तो मैं हाथ जोड़ करके माफ़ी चाहता हूँ। आप अपने मुझे छोटा भाई समझकर के, मुख़लिस समझकर के माफ़ करें, वर्ना सच्चाई यह है कि आप अपनी रविश से हट रहे हैं और सिर्फ अपनी वाह-वाह के ख़ातिर, सबक सीखो उन लोगों से और सबक सीखो उन लोगों से भी जो नासिबी व ख़ारिजी हैं, कम से कम मुहर्रम शरीफ़ के महीने में इन नसबी व ख़ारिजी मौलवियों से दूर रहते हैं। अल्लाह तआला हम सब को सवाद-ए-आज़म पर चलने की तौफ़ीक़-ए-रफ़ीक़ अता फ़रमाए, आमीन।





