जीवनी मशाइख-ए-मदारिया सामाजिक धार्मिक इस्लामी विधिशास्त्र

हज़रत सैयद शाह अताउल्लाह मदारी रहमतुल्लाह अलैह

On: अप्रैल 21, 2026 2:38 अपराह्न
Follow Us:

यह बुज़ुर्ग एक जलीलुलक़द्र आलिम-ए-बाअमल और फ़ाज़िल-ए-बेदल थे। आप का तअल्लुक़ सिलसिला-ए-आलिया मदरिया से था और आप इस अज़ीम रूहानी सिलसिले के मुमताज़ ख़लीफ़ा व जानशीन थे। आप अपने वालिद-ए-माजिद हज़रत मुहम्मद शरीफ़ रहमतुल्लाह अलैह के फ़ैज़याफ़्ता थे, जबकि आप का रूहानी व ख़ानदानी तअल्लुक़ शैख़-उत-तरीक़त बुरहानुल हक़ीक़त क़ाज़ी महमूद गरग दानिशमंदान तेग़ बरहना किन्तूरी रहमतुल्लाह अलैह से मुनसलिक था, जो तरीक़त व हक़ीक़त के बुलंद मरतबा बुज़ुर्ग शुमार किए जाते हैं।

किताब “बहरेज़ख़्ख़ार” में एक दिलचस्प वाक़िया मज़कूर है कि आप ने एक मरतबा रूहानी फ़वायद के हुसूल के लिए एक बुज़ुर्ग की तरफ़ रुजू किया। उन बुज़ुर्ग के दिल में यह ख़याल पैदा हुआ कि वह आप को सिलसिला-ए-मदारिया से हटा कर अपने सिलसिले में शामिल कर लें। इसी ख़याल के दौरान उन्होंने ख़्वाब में देखा कि बेशुमार मलंग (औलिया-ए-किराम) निहायत ग़ज़ब और जलाल के साथ उन्हें मलामत कर रहे हैं और कह रहे हैं कि “क्या तू हमारे साहबज़ादे को अपने सिलसिले में लेना चाहता है?”।

जब वह बुज़ुर्ग बेदार हुए तो फ़ौरन आप की ख़िदमत में हाज़िर हो कर सारा वाक़िया बयान किया और एतराफ़ किया कि वह सिलसिला-ए-मदारिया के फ़ुक़रा का मुक़ाबला नहीं कर सकते। चुनाँचे उन्होंने तहरीरी तौर पर भी इज़हार-ए-माज़िरत किया और आप को इज़्ज़त व एहतिराम के साथ रुख़्सत कर दिया। इस वाक़िये से आप के रूहानी मक़ाम और सिलसिला-ए-मदारिया की अज़मत वाज़ेह होती है।

एक और वाक़िया आप की करामत को ज़ाहिर करता है। एक मरतबा आप के साहबज़ादे ग़ुलाम बदीउद्दीन अल-मआरूफ़ शाह मियाँ ने आप से अर्ज़ किया कि एक ही वक़्त में किसी शख़्स का मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर मौजूद होना अकल में नहीं आता। आप ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला अपने औलिया को ऐसी कुदरत अता फ़रमाता है, इस में तअज्जुब की कोई बात नहीं।

फिर आप ने एक संगरेज़ा उठा कर अपनी उँगलियों पर रखा और फ़रमाया: “देखो”। जब देखा गया तो आप के दस्त-ए-मुबारक की हर उँगली पर वैसा ही एक-एक संगरेज़ा मौजूद था। इस करामत को देख कर आप के साहबज़ादे की हैरत दूर हो गई और उन के दिल में इश्क़-ए-इलाही का एक नया जोश पैदा हो गया।

आप की वफ़ात 22 ज़िलक़अदा 1100 हिजरी में हुई। आप का मज़ार मुबारक कंतूर शरीफ़ में वाक़े है, जहाँ आज भी अकीदतमंद हाज़िरी दे कर फ़यूज़ व बरकात हासिल करते हैं।

क़ता-ए-तारीख़-ए-वफ़ात
सालिक-ए-राह-ए-ख़ुदा आन शह-ए-सैयद अता
रफ़्त अज़ दारुलफ़ना चूँ सूए दारुलबक़ा
हातिफ़ी तारीख़ ओ गुफ़्त बगूशम ख़िरद
आह ज़ आफ़ाक़ रफ़्त ज़ुह्दा-ए-अह्ल-ए-सफ़ा

माख़ज़: किताब सीरुल मदार, मुसन्निफ़ ज़हीर अहमद सहसवानी, सफ़्हा 138।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment