१७९३ से लेकर लगातार १७८७ तक बेसरो-सामानी की हालत में एक मुनज़्ज़म हुकूमत-ए-वक़्त के शैतान अंग्रेज़ों से जंग करना मज़ाक़ या खेलवाड़ न था, जबकि अंग्रेज़ों के सामने छोटे बड़े ज़मीनदार, जागीरदार, राजे, महाराजे, नवाब, बादशाह पेंशनख़्वार बनकर अपने घुटने टेक चुके थे, सैयद मजनूँ शाह मदारी के साथ अवाम के अलावा कोई नहीं था, सभी सैयद मजनूँ शाह मदारी के लश्कर के मुख़ालिफ़ व मुआनिद थे, ये तो एक ग़ैबी करिश्मा था कि २५ साल तक मजनूँ शाह मलंग इसी तरह अंग्रेज़ों से जंग लड़ते रहे और बाद में उनके वारिसीन ने उनके मिशन को आगे बढ़ाया, ये तमाम जंगें टीपू सुल्तान मैसूर, हाजी शरीअतुल्लाह वग़ैरह से बहुत पहले लड़ी गई थीं लेकिन अफ़सोस का मक़ाम है कि तारीख़ के औराक़ से इन्हें मस्तूर रखा गया।
हिंदुस्तान में सिलसिला-ए-मदारिया की लाखों की तादाद में ख़ानक़ाहें और तकिए थे सिर्फ़ ज़िला पूर्णिया का ये हाल था कि अंग्रेज़ बुकानन्द १८०९-१८१० के सर्वे में लिखता है कि सिलसिला-ए-मदारिया की यहाँ १९०० ख़ानक़ाहें मरजा-ए-ख़लाइक़ हैं, इन तकियों से बड़े बड़े उलमा फ़ारिग़ होते थे, ख़ुद मकनपुर शरीफ़ में उस वक़्त सबसे बड़ा इदारा ”फ़ैज़ानुल उलूम“ नामी मौजूद था, जिसके अंदर एक क़दीम लाइब्रेरी भी मरजा-ए-ख़वास थी, जो सदियों पुराने ऐसे क़लमी मख़्तूतात से आरास्ता थी, जिनका दूसरा नुस्ख़ा किसी लाइब्रेरी में मौजूद नहीं था, सिलसिला-ए-मदारिया का भी एक बेशबहा क़लमी ख़ज़ाना इस लाइब्रेरी की ज़ीनत था लेकिन १७९३ई. में मजनूँ शाह मलंग मदारी की अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ छेड़ी गई जंग सिलसिला-ए-मदारिया की तबाही व बरबादी का सबब बन गई, और हालात बद से बदतर होते चले गए और तकियों (मदरसों) से फ़ारिग़ होने वाले उलमा-ए-किराम व मुफ़्तियान-ए-इज़ाम को सफ़्हा-ए-हस्ती से मिटाने में अंग्रेज़ हुकूमत कमरबस्ता हो गई, अंग्रेज़ हुकूमत ने सबसे पहले मदारी फ़ुक़रा के मरकज़ मकनपुर शरीफ़ को तहस-नहस करके आग लगा दी, और मदरसा फ़ैज़ानुल उलूम को उजाड़ दिया, जिसमें मौजूद लाइब्रेरी भी आग की ज़द हो गई, इसके साथ मदारी सिलसिले के हज़ारों तकियों, ख़ानक़ाहों, चिल्लों और तकियादारों को बेनाम व निशान कर दिया, इसके अलावा सिलसिला-ए-मदारिया को बदनाम करने में भी कोई कसर बाक़ी न रखी, बुज़ुर्गों की किताबों में तह्रीफ़ करके सिलसिला-ए-मदारिया के बाबत मुग़ल्लिज़ात व वाहियात दरअंदाज़ कर दिए गए, ग़रज़ ये कि अंग्रेज़ हुकूमत ने सिलसिला-ए-मदारिया को तनज़्ज़ुली व पसमानदगी के दहाने पर लाकर खड़ा कर दिया लेकिन इस कमसपरसी के वक़्त भी मुजाहिदीन-ए-सिलसिला-ए-मदारिया ने अपने अज़ाइम बुलंद रखे, अंग्रेज़ों से सुलह नहीं की और वतन-ए-हिंद की आज़ादी के लिए मुस्तैद रहे।
सिलसिला-ए-मदारिया के रोहिला पठान
फ़ुक़राए मदार ये जो मजनूँ शाह मलंग के मिशन को फ़रोग़ दे रहे थे, उनके अलावा मदारी पठानों ने भी १८५७ ईस्वी की जंग में अंग्रेज़ों को भगाने में भरपूर हिस्सा लिया, इन गुमशुदा मदारी पठानों की तारीख़ रक़म करने के क़ाबिल है।
१० मई १८५७ई. को मेरठ में इश्तिआल-अंगेज़ी की ख़बरें क़ुर्ब व जवार में तेज़ी से फैल रही थीं, बरेली, पीलीभीत और शाहजहाँपुर वग़ैरह में लोगों के अंदर इश्तिआल बरपा हो चुका था और लोग जूक़-दर-जूक़ मरने के लिए आमादा हो गए थे, उस वक़्त बरेली के अहमद ख़ान पठान वालिद रहमत ख़ान पठान मदारी सदरुस्सुदूर के ओहदे पर फ़ाइज़ थे, उन्होंने जनरल बख़्त ख़ान पठान रोहैला मदारी के कहने पर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आलम-ए-जिहाद बुलंद किया बहुत से अंग्रेज़ों को इसमें क़त्ल कर दिया गया और शहर के मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर जंग-ए-आज़ादी के मुजाहिदों ने अंग्रेज़ों से सामना किया, ये घमासान कई दिनों तक जारी रही और इसमें बरेली के कई वतनपरस्त मदारी पठानों ने जाम-ए-शहादत नोश किया, जिनके अस्मा दर्ज़ ज़ैल हैं:
(१) रोहैला पठान एजाज़ ख़ान भट्टी मदारी (सन-ए-शहादत : ५ मई १८५८ई.)
(२) रोहैला पठान काले ख़ान भट्टी मदारी (सन-ए-शहादत: ५ मई १८५८ई.)
(३) रोहैला पठान तलो ख़ान मदारी (सन-ए-शहादत : ५ मई १८५८ई.)
(४) रोहैला पठान अंदर ख़ान भट्टी मदारी (सन-ए-शहादत : ४ मई १८५८ ई.)
(५) रोहैला पठान अज़ीज़ अहमद ख़ान भट्टी मदारी (सन-ए-शहादत : १८५८ई.)
(६) रोहैला पठान क़ासिम ख़ान भट्टी मदारी (सन-ए-शहादत : ४ मई
१८५८ई.)
(७) रोहैला पठान शाकिर दाऊद ख़ान मदारी (सन-ए-शहादत ४ म : मई
१८५८ई.)
(८) रोहैला पठान अशरफ़ ख़ान मदारी (सन-ए-शहादत : ४ मई
१८५८ई.)
(९) रोहैला पठान मिहरब ख़ान भट्टी मदारी।
मिहरब ख़ान मदारी शदीद ज़ख़्मी हो गए थे और कुछ दिनों बाद ज़ख़्मों की ताब न लाकर वफ़ात पाई, जिस मक़ाम पर ये ज़ख़्मी हुए थे और जहाँ उनका ख़ून गिरा था, उनके इंतिक़ाल के बाद उनकी क़ब्र वसीयत के मुताबिक़ वहीं पर बनाई गई।
११ मई १८५७ई. की जंग में अहमद ख़ान उर्फ़ बहादुर ख़ान पठान मदारी ने अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा दिए थे, बरेली, शाहजहानपुर, बदायूँ, और पीलीभीत से उन्हें भगा दिया गया था, मगर बेशर्म अंग्रेज़ों की फिर कुमुक आ जाती और फिर यकजुट होकर जमा हो जाते, इंक़िलाबी मदारिया बटालियन ने फ़रवरी १८५८ई. तक दोबारा अंग्रेज़ों के पंजे इस इलाक़े में जमने नहीं दिए। ये पठान मदारिया सिलसिले में बैअत थे और अपने नाम के आगे पीछे मदारी लिखते थे ये लोग भाटिया छत्री व खत्री से मुसलमान हुए और यही छत्री भाईया पठान थे जिस तरह शेर शाह सूरी शौर्य वंती पठान था।
1857 की जंग-ए-आज़ादी और फ़ुक़राए मदारिया
साबिक़ में तफ़सील से गुज़रा कि मजनूँ शाह मलंग मदारी के ख़ुलफ़ा व मुरीदीन और मदारी पठान बराबर शरीक रहे और जाम-ए-शहादत भी नोश किया लेकिन आज़ादी-ए-वतन के लिए हमावक़्त मुस्तैद रहे जब १८५७ई. की जंग शुरू हुई तो मुग़ल बादशाह सिराजुद्दीन बहादुर शाह ज़फ़र ने उनकी बहादुरी को देखते हुए उन्हें मलंग फ़ुक़रा और हिंदू सन्यासियों से जंग-ए-अज़ीम १८५७ में भरपूर हिस्सा लेने की इस्तिदा की मुग़ल शाही फ़रमान में तहरीर है।
”चूँकि अहल-ए-यूरोप हिंदूमत और इस्लाम दोनों के दुश्मन हैं और इस वक़्त अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ मज़हब की बिना पर जंग जारी है, इसलिए पंडितों और फ़ुक़रा पर लाज़िम है कि वो १८५७ई. की मुक़द्दस जंग में हिस्सा लें, क्योंकि पंडित और फ़ुक़रा हिंदूमत और इस्लाम के मुहाफ़िज़ हैं।“
इस तरह फ़ुक़रा व सन्यासियों का एक बड़ा गिरोह जंग-ए-आज़ादी १८५७ई. में भी शरीक रहा बस तारीख़ के सफ़हात पर सिलसिला-ए-मदारिया की उन जलीलुलक़द्र शख़्सियात को जगह देने की अशद ज़रूरत है और उन पर रिसर्च की जानी चाहिए ताकि इन मुजाहिदीन के नाम सफ़्हा-ए-हस्ती पर बाक़ी रहें।
हवाला जात:
(१) सफ़ीना अलऔलिया : मुसन्निफ़ा दारा शिकोह क़ादरी, स: ३२२ मतबूआ मदरसा आगर १८५३। Bagar the Beritenta, 186
(२) और बंगाली क़दीम मतबूआत।
(३) शाही फ़रमान यकुम मुहर्रमुल हराम १२४४ ख़त शिकस्ता फ़ारसी। Gosh(J.m):sanyasi and Fari
(४) Raidersh और बंगाली की क़दीम मतबूआत
नोट: मज़मून में ज़िक्र की गई रिपोर्टें और फ़रमानी शाही ख़ुदा बख़्श लाइब्रेरी पटना, और ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी कलकत्ता में मौजूद हैं, जिनकी ज़ेरॉक्स ख़ानक़ाह मदारिया और तकियादारों के पास भी हैं, मज़मून में मौजूद इन्हीं से नक़्ल किया गया है।
☆☆☆
हज़रत मौलाना मुफ़्ती हाशिम अली बदीई मिस्बाही
[माख़ूज़ : सहमाही रिसाला रहबर-ए-नूर अगस्त २०२१]










