इंसान की साख़्त में आब व गुल के सिवा कुछ नहीं मगर क़ुदरत का नूरानी हाथ इस जसद-ए-ख़ाकी को सैक़ल करके ऐसा मुहल्ली बना देता है कि इंसान एक मुहय्यिरुल-उक़ूल तब्दीली हासिल करके एक नए क़ालिब में ढल जाता है और जब उसे तौफ़ीक़-ए-इरफ़ान व बसीरत मिलती है और वह मारिफ़त-ए-बारी तआला के मनाज़िल तय करना चाहता है तो क़ुदरत का हाथ इस ज़र्रा-ए-नाचीज़ को मेहर-ए-दरख़्शाँ बना देता है जिसकी ज़ियाबारियों से सारी कायनात मुनव्वर हो जाती है। ऐसे ही पाकीज़ा सूरत व सीरत इंसान को वली-ए-कामिल, सूफ़ी व साफ़ी और रौशन-दिल बुज़ुर्ग कहा जाता है।
जिसको ऐसा रौशन दिल अता फ़रमाया है उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी अख़लाक़-ए-इलाहिया से मुत्तसिफ़ होना है। यह क़ल्ब-ए-रौशन तजल्लीगाह-ए-इलाही है और ऐसा ही दिल एक मुबारक अमानत है। जिस क़ालिब में यह साकिन हो वही बरकत व अज़मत वाला है।
जिस जगह ऐसों का नक़्श-ए-कफ़-ए-पा होता है
बस वहीं सज्दा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा होता है
मुझे एक ऐसे ही वली-ए-कामिल के चश्म-कुशाँ हालात-ए-ज़िंदगी और करामात व कमालात से चंद सफ़्हात को ज़ेब व ज़ीनत देना है। वह अज़ीमुल-मर्तबत हस्ती, जनाब क़ुत्ब-ए-ज़माँ, ग़ौस-ए-दौराँ, हज़रत अल-हाज मौलाना सैयद कल्ब-ए-अली साहब, ज़ैग़म अबुलवक़ार मदारी रहमतुल्लाहि अलैह, साकिन दारुन-नूर मकनपुर शरीफ़ की है।
मैंने अभी तक जो कुछ लिखा, उनसे ज़्यादा ख़ूबियों के हामिल हैं। आप मेरे वतन मौज़ा रौरा में उस वक़्त से तशरीफ़ लाए थे जब मैं आपकी ज़ात-ए-बाबरकात से मुतआरिफ़ नहीं था। लेकिन यह हक़ीक़त है कि आपके तसर्रुफ़ात-ए-रूहानी ने रौरा को रुए-…… बना दिया।
जब मैं डॉक्टरी के कोर्स से फ़ारिग़ुत-तहसील हुआ, एक रोज़ मेरे चचा क़िब्ला हकीम अब्दुल ग़फ़ूर ख़ाँ साहब मरहूम ने मुझे आपकी ख़िदमत में ले जाकर क़दमों पर डाल दिया। जब मेरी नज़र हज़रत की नज़र से मिली तो मुअादिल की यह कैफ़ियत होकर रह गई।
बिस्मिल न शुद दिल सन अज़ ख़ूबर दी जानाँ
दीरीना साल पीरे बुरदश बह यक निगाहे
आज भी जब वह डिग्री याद आ जाती है तो दिल का आलम अजीब होता है। मेरे मुख़्लिसीन और अक़ीदतमंदान-ए-औलिया का इसरार है कि मैं कुछ चश्मदीद वाक़िआत व करामात जो मेरी नज़र से गुज़रे हैं उन्हें ज़ब्त-ए-तहरीर में लाऊँ, मगर सागर को गागर में बंद करना इस लिए मुश्किल है कि—
“दामान-ए-निगह तंग व गुल-ए-हुस्न तो बिस्यार”
फिर भी जो कुछ मुमकिन होगा ज़रूर सुपुर्द-ए-क़लम करूँगा ताकि दुश्मनान-ए-औलिया के लिए बाइस-ए-इबरत हो और मेरे लिए ज़रिया-ए-तहसील-ए-सवाब बने।
क़ुत्ब-ए-आलम हज़रत मौलाना सैयद अबुलवक़ार रहमतुल्लाहि अलैह की ज़ात-ए-बाबरकात मुहताज-ए-तआरुफ़ नहीं। जिन हज़रात को शरफ़-ए-ज़ियारत और फ़ैज़ान-ए-सुहबत हासिल हुआ है, वह ख़ूब जानते हैं कि हुज़ूर की हर जुंबिश ज़िंदा करामत थी और हर क़दम इत्तिबा-ए-सुन्नत-ए-रसूल ﷺ का हामिल था। आज भी उनके कमालात-ए-रूहानी ज़बान-ज़द-ए-ख़लाइक़ हैं—
“दर हाजत-ए-मश्शाता नीस्त रू-ए-दिल आराम रा”
आप हज़रत सैयद बदीउद्दीन ज़िंदा शाह मदार रज़ियल्लाहु अन्हु के हक़ीक़ी भाई की औलाद से हैं, हसबन व नसबन सादात-ए-हसनी हुसैनी में हैं। आप को सिलसिला-ए-आलिया मदारिया में ख़िलाफ़त व इजाज़त हासिल है। लाखों मुरीदीन हैं और हज़ारों ख़ुलफ़ा। ख़ुलफ़ा में ऐसी-ऐसी हस्तियाँ हैं जो वली ही नहीं, वली-गर भी हैं। तमाम ख़ुलफ़ा ज़ी-होश, ज़ी-शऊर और पाबंद-ए-शरीअत मिलते हैं। आप ने और आप के ख़ुलफ़ा ने इस तरह तबलीग़-ए-इस्लाम फ़रमाई है कि लाखों इंसान बंदा-ए-बे-दाम हो गए और न जाने कितने कुफ़्फ़ार व मुशरिकीन हक़्क़ानियत-ए-इस्लाम को तस्लीम करके आप की निगाह-ए-कीमिया-असर से वली-सिफ़त बन गए।
मैं पढ़ा करता था—
गर तू संग-ए-सख़रा व मरमर शवी
चूँ बह साहिब-दिल री गोहर शवी
मगर यह सब कुछ मैंने ऐनुल-यक़ीन और हक़्क़ुल-यक़ीन की शक्ल में पा लिया जिसके लाफ़ानी नक़ूश नाक़ाबिल-ए-फ़रामोश हैं। आज भी आप के आस्ताना-ए-मुबारका पर ही नहीं, आप के हर गली-कूचे पर अनवार-ए-तजल्लीयात की हमा-वक़्त बारिश होती रहती है।
वली होने के लिये कश्फ़ व कमाल की शर्त नहीं है। जिसका क़ौल व फ़ेल किताब व सुन्नत के मुताबिक़ हो, जिससे अहकाम-ए-इलाही की ज़िन्दगी के किसी शोबे और गोशे में ख़िलाफ़वर्ज़ी न होती हो, यही विलायत और क़ुत्बियत है। फिर भी वह तसर्रुफ़ात व करामात जिनका तअल्लुक़ मेरी ज़ात से है अगर पेश न करूँ तो कुफ़्रान-ए-नेमत है। आप के औसाफ़-ए-आलिया पर मैं ईमान तो बहुत पहले ला चुका था और दिल में ठान ली थी कि आप ही के दस्त-ए-हक़-परस्त पर बैअत करूँगा, लेकिन आज-कल के चक्कर में पड़ा रहा और साहिब-ए-मौसूफ़ का इंतिक़ाल हो गया। मैंने पुख़्ता अज़्म कर लिया था कि मेरे हज़रत चालीस रोज़ के अंदर आलम-ए-रूया में जिस के लिये इरशाद फ़रमाएँगे मैं उन्हीं से बैअत हो जाऊँगा। मैं ज़माने के मक्र व फ़रेब से काफ़ी आशना हो चुका था और समझता था—
ऐ बसा इब्लीस आदम-रूए हस्त
बस नयायद दाद दर हर दस्त दस्त
आख़िरकार आलम-ए-ख़्वाब में एक रोज़ आप ने अपने दस्त-ए-मुबारक में मेरा हाथ लेकर अपने बड़े साहिबज़ादे सुल्तानुल-आरिफ़ीन सैय्यिदुल-उलमा जनाब हज़रत मौलवी अल-हाज सैयद ज़ुल्फ़िकार अली साहब क़मर (अबुल-अनवार) ख़तीब जामे मस्जिद मकनपुर शरीफ़ के दस्त-ए-शफ़क़त में दे दिया। सुबह को मैं अपने हाथ में ऐसी अजीब व ग़रीब ख़ुशबू महसूस कर रहा था कि बायद व शायद, और फिर बहुत जल्द इस ख़्वाब की ताबीर भी आलम-ए-ज़ाहिर में रूनुमा हो गई। कैसे कह दूँ कि आप मेरी साँसों और दिल की धड़कनों में हमा-वक़्त रहे और जमे हुए नहीं हैं। यक़ीनन आप के कमालात ज़िन्दा व जावेद हैं। आप की नेकियाँ ज़िन्दा हैं, आप की ख़ूबियाँ ज़िन्दा हैं।
ज़िन्दगी में इंक़िलाबात आते ही रहते हैं। कुछ दिनों बाद मुझे फ़िशारुद्दम, ब्लड प्रेशर और इख़्तिलाज-ए-क़ल्ब के अमराज़ हो गए। निहायत आला पैमाना का इलाज कराया लेकिन यह ऐसे ज़िद्दी मेहमान थे कि उन्होंने हटने का नाम न लिया। सितम बाला-ए-सितम यह कि उन्होंने मोतियाबिंद को भी दावत देकर बुला लिया। इसी के साथ यह हुआ कि दिमाग़ी तनाव बढ़कर दिमाग़ की रग फटने से आँखों पर फ़ालिज गिर गया और आँखों की निचली सतह में नाकारा रतूबत व फ़ज़लात-ए-नज़लिया मुंजमिद हो के रह गए। नतीजा यह हुआ कि आँखों की रौशनी ने मेरा साथ छोड़ दिया। घर में अहलिया को फेफड़ों का दक़ हो गया। इकलौता लड़का टाइफ़ॉइड की ज़द में आ गया। यगाने बेगाने हो गए और क्यों न होते।
बे-वक़्त-ए-तंगदस्ती आशना बेगाना मी गर्दद
सुराही चूँ शवद ख़ाली जुदा पैमाना मी गर्दद
कह नहीं सकता यह मेरे गुनाहों की सज़ा थी कि आज़माइश? ख़ुदा का शुक्र है कि फिर भी न अपना सागर-ए-ज़ब्त छलका और न हाथों से दामन-ए-सब्र ही छूटा। ग़रज़ीकेह इन नासाज़गार हालात ने एक-एक करके क़रीब-क़रीब सारे मयारी अस्पतालों की ख़ाक छनवा दी, मगर जद्द-ओ-जहद-ए-सई लाहासिल साबित हुई। अरसला, हेलट, ख़ैराबाद, सीतापुर, लखनऊ, इलाहाबाद, गांधी नेत्र चिकित्सालय, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलीगढ़, जवाहर लाल रोहतगी आई अस्पताल, अग्रवाल आई इंस्टीट्यूट दिल्ली वग़ैरह-वग़ैरह। सब के सब मेरे लिये नाकाम साबित हुए। बिलआख़िर मायूस होकर बड़े-बड़े डॉक्टरों ने यह मुत्तफ़िक़ा फ़ैसला सुना दिया कि आप के कुल्ली अमराज़ लाइलाज हैं।
इधर कुछ अल्लाह के बंदे मुझ पर आवाज़े कस रहे थे, जो मेरी दिलआज़ारी का बाइस बने हुए थे कि “मंज़ूर अपने आमाल भोग रहा है।” उनका यह तंज़ और मुज़ाहिक़ाख़ेज़ी तीर व नश्तर का काम कर रहे थे। यह ऐं-हमह कोई ग़ैबी ताक़त ऐसी थी जो मुझे ज़िन्दा रहने पर मजबूर कर रही थी और जिसकी हयात-ए-अफ़सुर्दा सदाएँ मेरे कानों में आ रही थीं कि—
एक दिन तुझ को बहारों से गुज़रना है ज़रूर
आज राहों में तेरी ख़ार-ए-मुग़ीलाँ ही सही
आख़िरकार खाना-पीना छूट गया। सिर्फ़ ग़म के आँसू पीता था और अपने ख़ुदा से दुआएँ करता था। मगर शायद इस ख़ताशिआर की दुआओँ में भी कोई असर न था। ख़ुदकुशी कर लेता अगर यह न जानता होता कि ख़ुदकुशी गुनाह-ए-अज़ीम है, किसी तरह निजात न होगी। कोई ग़ैबी ताक़त थी जो मेरे और मेरे ख़यालात-ए-फ़ासिदा के दरमियान हाइल होकर मुझे मग़लूब कर रही थी।
इन मराहिल से गुज़रने के बाद मेरे करमफ़रमा दोस्त ने मेरी रूदाद-ए-ग़म सुनकर मशवरा दिया— “मंज़ूर! तुम को तो अपने सब्र व ज़ब्त पर बड़ा नाज़ था, आज तुम को क्या हो गया है? तुम तो अकसर कहा करते थे—
औलिया रा हस्त क़ुदरत अज़ाला
तीर जस्ता बाज़ गर्दाँद ज़ राह
निगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से तो तक़दीरें बदल जाया करती हैं। अगर अल्लाह तआला तुम्हारी बराहे-रास्त नहीं सुनता तो तुम अपने सिलसिला-ए-मदारिया के बुज़ुर्गों और वलियों के तवस्सुल से उसके दरबार में अज्ज़ व इन्किसार के साथ गिड़गिड़ाकर रहमत-ए-ख़ुदावन्दी को जोश में लाने की कोशिश क्यों नहीं करते? अल्लाह का रहम व करम अपनी रहमत और तुम्हारी मुसीबत के दरमियान किसी रूहानी वसीले को ढूँढ रहा है।
‘रहमत-ए-हक़ बहाना मी जोयद।’
मुझे मौसूफ़ के इस मशवरे से काफ़ी तसल्ली हुई और यका-यक मेरे पज़मुर्दा होंठों पर मुस्कराहट की एक लहर दौड़ गई। मैंने अहद कर लिया कि अपने दोस्त के मशवरे पर अमल करूँगा। रात के सन्नाटे में बिस्तर-ए-ख़ाक पर मैं आजिज़ी के साथ मस्रूफ़-ए-दुआ था और मेरे तसव्वुर में उस वक़्त बज़ुज़ अपने मूरिस-ए-आला सरकार-ए-सरकाराँ हज़रत सैयद बदीउद्दीन ज़िन्दा शाह मदार रज़ियल्लाहु अन्हु और अपने दादा पीर हज़रत मौलाना अल-हाज अबुलवक़ार सैयद कल्ब-ए-अली रहमतुल्लाहि अलैह, नीज़ अपने पीर-ओ-मुर्शिद के कोई न था। इन्हीं बुज़ुर्गों को वसीला बनाकर उस बेनियाज़ से सब कुछ तलब कर रहा था और ऐसा महसूस हो रहा था कि यह सब हज़रात मेरे सामने हैं और मैं उनसे कुछ अर्ज़ कर रहा हूँ। इसी आलम-ए-बेख़ुदी में आँख लग गई।
ख़्वाब में देखा कि मेरी आँखों में बीनाई आ गई और शायद मेरा हाल-ए-ज़ार देखकर मेरे पीर-ओ-मुर्शिद की आँखों में नमी थी, मगर मेरे करमफ़रमा मुस्करा रहे थे और शायद यह मुस्कराहट इस लिये थी कि वह मुझे मौसम-ए-ख़िज़ाँ में मुझ्दा-ए-बहार पेश फ़रमा रहे थे। मैंने फ़र्त-ए-मसर्रत से क़दम पकड़ लिये। आप ने अपना दस्त-ए-शफ़क़त मेरे सर पर रखा और फ़रमाया— “मंज़ूर हसन! ग़म न करो, तुम्हें दरबार-ए-क़ुत्बुल-मदार में मक़बूलियत का शरफ़ हासिल हो गया है। सरकार ने तुम को अपनी ग़ुलामी में क़ुबूल फ़रमा लिया है।”
मेरे लिये यह ख़ुशख़बरी कितनी मसर्रत-अफ़ज़ा थी, जिसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता।
उसके फ़ौरन बाद देखा कि मेरी आँखों पर यके बाद दीगर किसी ने एक नूरानी, नर्म व नाज़ुक हाथ रख दिया है, जिससे निहायत ठंडी और नूरानी किरनें फूट रही हैं। इसके बाद देखा जैसे सरकार-ए-मदार रज़ियल्लाहु अन्हु के गुम्बद-ए-आली के सुनहरे कलस से नूरानी शुआएँ निकलकर मेरी आँखों पर पड़ रही हैं, जिससे आँखों का दर्द फ़ौरन उसी वक़्त कम हो गया मगर अभी रौशनी नाबूद थी। सुबह को जब उठा तो मेरी बेचैनी व बेक़रारी काफ़ूर हो चुकी थी। सोचा, ख़्वाब व ख़याल की बातें हैं; इंसान जो सोचता है वही ख़्वाब में देखता है। मगर आगे चलकर मालूम हुआ कि यह महज़ ख़्वाब ही नहीं था बल्कि सरापा हक़ीक़त ही हक़ीक़त थी। जिन डॉक्टरों ने मेरे अमराज़ को लाइलाज बताकर मुझको मायूस कर दिया था, मैंने उनकी ख़िदमत में जाकर अर्ज़ किया कि अब आप मेरा इलाज कीजिए और मैं आपको कामिल यक़ीन दिलाता हूँ कि मुझे यक़ीनन शिफ़ा होगी। वह यह समझे कि मसाइब व आलाम में यह शख़्स अपना दिमाग़ी तवाज़ुन खो बैठा है। मैंने उन्हें बार-बार यक़ीन दिलाया कि मेरे हवास दुरुस्त हैं। यह सुनकर सब डॉक्टर कहने लगे कि, “मंज़र साहब! तीन माह से तुम्हारा इलाज हो रहा है मगर अमराज़ में कोई कमी नहीं। आज रात भर में तुम कैसे ऑपरेशन के क़ाबिल हो गए? जब तक ज़ियाबीटस, ब्लड प्रेशर वग़ैरह नार्मल न हो जाएँ, आँखों में अमल-ए-जर्राही के लिये हाथ लगाना डॉक्टरी उसूल के सरासर मुनाफ़ी है।”
मैंने अर्ज़ किया, “आप जाँच कर लीजिए, मसारिफ़ का मैं ज़िम्मेदार हूँ।” वह तो कहिए कि मेरे शैख़ की तवज्जोह के असर और मेरी ख़िदमात से तमाम डॉक्टर मुझसे मानूस हो गए थे, वरना वह लोग मुझ पर ज़रूर बरस पड़ते, क्योंकि मैं उसूल और दस्तूर की ख़िलाफ़वर्ज़ी कर रहा था। आख़िरकार जाँच हुई और मुतअद्दिद बार हुई, और जब मेरे अमराज़ तबई हालात में निकले तो सब के सब निहायत संजीदा और हैरतज़दा थे। यह तो अजीब मुअम्मा है—कल तक जो लाइलाज था, वह आज क़ाबिल-ए-इलाज कैसे हो गया? मैं तमाम डॉक्टरों की निगाहों का मरकज़ बना हुआ था। बार-बार इसरार करने पर मुझे उन माहिरीन-ए-अमराज़-ए-चश्म को मजबूरन सब कुछ बताना पड़ा, हत्ता कि वह माद्दियत-परस्त रूहानियत के क़ाइल हो गए। अब तो ऐसा लगता था कि वह मेरे शागिर्द थे और मैं उनका उस्ताद; वह सब मेरे मुरीद थे और मैं उनका पीर; इस लिये कि रूहानी इलाज व शिफ़ा के सामने उनकी डॉक्टरी साइंस ने अपना दम तोड़ दिया था। इसके बाद जो भी ऑपरेशन हुआ वह कामयाब हुआ, और यह है कि रूहानी ऑपरेशन तो पहले ही हो चुका था, बाद में जो कुछ हुआ वह महज़ ख़ानापूरी थी।
आज इस कुफ़्र व इल्हाद के दौर में ऐसे भी लोग मिल्लत-ए-इस्लामिया में नज़र आ रहे हैं जिनकी गुमराही इस क़दर नक़्शा-ए-उरूज पर पहुँच चुकी है कि वह तसर्रुफ़ात-ए-बातिनी के क़ाइल ही नहीं हैं। ऐसे लोग औलिया-ए-किराम व सूफ़िया-ए-इज़ाम से क्या मुस्तफ़ीज़ व मुस्तफ़ीद हो सकते हैं।
तही-दस्ताँ क़िस्मत रा चह सूद अज़ रहबर-ए-कामिल
कि ख़िज़्र अज़ आब-ए-हैवाँ तिश्ना मी आरद सिकंदर रा
मुझे तो इसी दहलीज़ से बीनाई व दानाई और आगही हासिल हुई है।
बदीउद्दीन से निस्बत हो गई है
मकनपुर से मुहब्बत हो गई है
मिलें हज़रत से आँखें जब से मंज़र
हर इक बातिल से नफ़रत हो गई है
क्या कहूँ कल्ब-ए-अली की पाक ज़ात
जिनको जाने और माने कायनात
उनसे फैला हर जगह दीन-ए-मुबीन
उनके हर ज़र्रे पे रौशन सिफ़ात
उनकी ताक़त मुझसे ऐ मंज़र न पूछ
यह बदल सकते हैं नज़्म-ए-कायनात
आप आज भी क़ुलूब व अरवाह की बिना पर अब्र-ए-नौबहार बनकर बरस रहे हैं। आपका आस्ताना आज भी तसव्वुफ़-ए-इस्लाम की जान, अख़लाक़ व रूहानियत का मरकज़, इश्क़ व मुहब्बत-ए-इलाही का मनबअ, हिदायत व सआदत का सरचश्मा, और हक़ाइक़ व मआरिफ़ का बहता हुआ दरिया है।
बिया कि बज़्म-ए-तरबख़ेज़ जाँ-फ़ज़ा इंजास्त
बिया कि जाबजा अनवार-ए-मुस्तफ़ा इंजास्त
जनाब हज़रत अक़दस हुज़ूर कल्ब-ए-अली
बिया कि दर्द-ए-दिल हर कसे शिफ़ा इंजास्त
☆☆☆☆☆☆
डॉक्टर मंज़ूर अहमद ख़ाँ साहब “मंज़र”
[स्रोत – “सह-माही रहबरे नूर मकनपुर शरीफ़” 2022]






