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ऐलान-ए-विलायत व फ़ज़ाइल-ए-मौला अली

On: जून 5, 2026 12:31 पूर्वाह्न
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ऐलान-ए-विलायत व फ़ज़ाइल-ए-मौला अली

ग़दीरे ख़ुम क्या है

ख़ुम एक ऐसी जगह का नाम है जहाँ बकसरत घने दरख़्त पाए जाते हैं, और यह मक़ाम-ए जु़ह्फ़ह (मक्का मुकर्रमा और मदीना मुनव्वरा के दरमियान एक जगह का नाम है) से तीन मील के फ़ासले पर है। इसी वादी-ए जु़ह्फ़ह के पास मशहूर ग़दीर (तालाब) भी है जिसे इसी ख़ुम्म की तरफ़ मन्सूब किया जाता है।
(मरक़ातुल मफ़ातीह शरह मिश्कातुल मसाबीह, बाब मनाक़िब अली बिन अबी तालिब, अल-फ़स्लुस्सालिस, १०/४७५, तहतुल हदीस: ६१०३)

इसी मक़ाम पर नबी-ए करीम صَلَّی اللّٰہُ تَعَالٰی عَلَیہ وَاٰلہٖ وَسَلَّم ने हज़रत सैय्यदना अली अल-मुर्तज़ा کَرَّمَ اللّٰہُ تَعَالٰی وَجْھَہُ الکَرِیم के लिए مَن کُنتُ مَولاَہُ فَعَلِیٌّ مَولَاہُ यानी जिस का मैं मौला हूँ उसके अली (رَضِیَ اللّٰہُ تَعَالٰی عَنْہ) भी मौला हैं यानी हज़रत मौला अली के मंसब-ए आली विलायत-ए अली का ऐलान फ़रमाया था।

ईद-ए-ग़दीर और ऐलान-ए विलायत-ए अली

तारीख़-ए इस्लाम में ईद-ए ग़दीर बहुत अहम दिन है। यह वही दिन है जिस दिन दीन-ए इस्लाम मुकम्मल हुआ। जो दीन-ए इस्लाम बाबा आदम अलैहिस्सलाम से चलकर आका ﷺ तक पहुँचा था वह ९ हिजरी तक नामुकम्मल था, १० हिजरी में मैदान-ए ग़दीर में जाकर मुकम्मल हुआ।

जैसा कि हज़रत अल्लामा जलालुद्दीन सियूती ने “الدر المنثور في التفسير بالمأثور” (२५९:२) में आयत
اَلۡیَوۡمَ اَکۡمَلۡتُ لَکُمۡ دِیۡنَکُمۡ
आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया﴾ की शान-ए नुज़ूल के हवाले से लिखा है कि जब हुज़ूर नबी-ए अक्रम ﷺ ने ग़दीर ख़ुम के रोज़ ‘من کنت مولاہ فعلی مولاہ’ के अल्फ़ाज़ फ़रमाए तो यह आयत-ए करीमा नाज़िल हुई।
[السیف الجلی علی منکر ولایت علی (اعلان غدیر) ص، ४६]

बयान किया गया है कि जब आका ﷺ आख़िरी हज जिसे हज्जतुल विदा कहा जाता है, उसको अदा करके सवा लाख सहाबा-ए किराम के हमराह मदीना पाक की तरफ़ वापस हो रहे थे। मक्का और मदीना के दरमियान एक सहरा जिसे मैदान-ए ग़दीर ख़ुम कहते हैं, आका ﷺ ने इसी मैदान में क़ियाम किया, फिर जब चलने की तैयारी होने लगी इतने में हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम यह आयत-ए करीमा लेकर नाज़िल हुए:
یٰۤاَیُّهَا الرَّسُوْلُ بَلِّغْ مَاۤ اُنْزِلَ اِلَیْكَ مِنْ رَّبِّكَؕ-وَ اِنْ لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهٗؕ-وَ اللّٰهُ یَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِؕ (سوره مائده)
ऐ मेरे हबीब ﷺ आप इस हुक्म को पहुँचा दें जो आपके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल किया गया। अगर आप ने यह न किया तो गोया उसके पैग़ाम को नहीं पहुँचाया और ख़ुदा आपको लोगों के शर से महफ़ूज़ रखेगा।

इसके बाद हुज़ूर ﷺ ने तमाम सहाबा-ए किराम को इकट्ठा किया। जो रुख़्सत हो गए थे उनको भी बुलवाया। जो पीछे रह गए थे उनका इंतज़ार किया। जब सब लोग इकट्ठा हो गए तो आका ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: ऊँटों के कजावे नीचे ऊपर रखकर मिम्बर बनाए जाएँ। यहाँ तक कि सत्तर (७०) कजावे रखे गए, मिम्बर-ए विलायत तैयार हो गई और आका ﷺ उस मिम्बर के क़रीब तशरीफ़ ले गए। दोपहर का वक़्त था। मैदान-ए ग़दीर में सन्नाटा था, काफ़ी गर्मी थी।

ज़ैद बिन अरक़म से मरवी है कि हम लोग रसूलुल्लाह ﷺ के साथ ग़दीर ख़ुम में वारिद हुए। तो मुनादी ने निदा की: الصلوٰۃ جامعہ۔ और रसूलुल्लाह ﷺ के लिए दरख़्तों के नीचे ज़मीन साफ़ की गई। पस रसूलुल्लाह ﷺ ने बाद नमाज़-ए ज़ुहर अली इब्न अबी तालिब का हाथ पकड़कर लोगों से फ़रमाया कि ऐ लोगो! क्या तुम नहीं जानते कि मैं मोमिनीन के लिए उनकी जानों से औला हूँ? सब ने कहा: बेशक। फिर आप ने फ़रमाया कि क्या तुम नहीं जानते हो कि मैं मोमिन के लिए उसके नफ़्स से औला हूँ? सब ने अर्ज़ किया: बेशक हाँ या रसूलल्लाह ﷺ! आप हर मोमिन के लिए उसके नफ़्स से औला हैं। पस आप ने इरशाद फ़रमाया कि जिस का मैं मौला हूँ, अली भी उसके मौला हैं। इलाही! दोस्त रख उसको जो अली को दोस्त रखे और दुश्मन रख उसको जो अली को दुश्मन रखे। इसके बाद हज़रत उमर ने हज़रत अली से मिलकर कहा: मुबारक हो तुम को ऐ अली इब्न तालिब! कि आज तुम मेरे और हर मोमिन और मोमिना के लिए मौला हुए।

रिवायतों में है कि मिम्बर बनने के बाद आका ﷺ ने सबसे पहले अल्लाह तआला की हम्द व सना बयान की, फिर हज़रत मौलाए कायनात को मिम्बर-ए विलायत पर लेकर चढ़ गए और अपने दोनों हाथों पर मौलाए कायनात को उठाकर इतना बुलंद किया कि आप के बग़ल शरीफ़ से रौशनी फूट पड़ी। मौलाए कायनात को उठाकर बुलंद करके दिखाना इस लिए था कि कल कोई यह न कह सके कि हमने तो देखा ही नहीं और सुना ही नहीं। आप की आवाज़ चारों तरफ़ यकसाँ पहुँच रही थी, सभी सहाबा-ए किराम बराबर सुन रहे थे। आप ने इरशाद फ़रमाया कि ऐ लोगो! अब मैं जल्द ही दुनिया से रुख़्सत होने वाला हूँ। अभी तक मैं तुम्हारा वली था मगर अब मेरे बाद तुम्हारे वली अली हैं। उनका दामन पकड़े रहना तो कभी गुमराह नहीं होगे। आप ने यह भी फ़रमाया कि तुम हाज़िरीन को चाहिए कि ग़ाइबीन तक यह ख़बर पहुँचाएँ।

हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास ने फ़रमाया: वल्लाह! यह बात यानी हज़रत अली को अपना वली मानना तमाम क़ौम की गर्दन पर वाजिब हो गई है।
[नसाई। इब्न मरदवियह]

ऐलान-ए मौलायत के बाद हज़रत उमर फ़ारूक़-ए आज़मؓ ने यूँ अर्ज़ किया: मुबारक हो मुबारक हो ऐ अली! आज तुम ने इस हाल में सुबह की कि हमारे और सारे मोमिन व मोमिना के मौला हो गए। फिर हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ؓ ने, हज़रत उस्मान ग़नीؓ ने और दीगर सहाबा-ए किराम ने, फिर यके बाद दीगर उम्महातुल मोमिनीन ने मुबारकबाद दी।

कुछ लोगों ने अली को मौला माना और कुछ लोगों ने वहीं इंकार कर दिया जैसे हारिस फ़हरी। और कुछ लोगों ने बाद में इंकार किया, तो उन पर अज़ाब-ए इलाही नाज़िल हुआ।
जैसा कि इमाम मुहम्मद बिन अहमद क़ुर्तबी ने सूरह मआरिज की पहली आयत (سَأَلَ سَائِلٌ بِعَذَابٍ وَاقِعٍ) के हवाले से यह क़ौल भी नक़्ल किया है कि यहाँ साइल हारिस बिन उमान फ़हरी था। इसकी वजह यह बनी कि जब उसे नबी करीम ﷺ का हज़रत अली शेर-ए ख़ुदा के बारे में यह फ़रमान पहुँचा: “مَنْ كُنتُ مولاه فعلی مولاه” वह अपनी ऊँटनी पर सवार हुआ। वह आया यहाँ तक कि उसने अपनी सवारी अबतह में बिठाई, फिर कहा: ऐ मुहम्मद ﷺ! तूने हमें अल्लाह तआला के बारे में हुक्म दिया कि हम “لا الهَ إِلَّا الله” की और “وانك رسول اللہ” की गवाही दें, तो हमने वह बात आप ﷺ से क़बूल की। हम पाँच नमाज़ें पढ़ें, तो हमने वह बात आप ﷺ से क़बूल की। हम अपने अमवाल की ज़कात दें, तो हमने वह बात आप ﷺ से क़बूल की। हर साल हम रमज़ान शरीफ़ के रोज़े रखें, तो हमने वह बात आप ﷺ से क़बूल की। हम हज करें, तो हमने वह बात आप ﷺ से क़बूल की। फिर आप ﷺ इस बात पर भी राज़ी न हुए यहाँ तक कि आप ﷺ ने अपने चचाज़ाद (अली) को हम पर फ़ज़ीलत दी। क्या यह ऐसी बात है जो आप ﷺ ने अपनी जानिब से की है या अल्लाह तआला की जानिब से है? नबी करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: उस ज़ात की क़सम जिसके सिवा कोई माबूद नहीं! यह अल्लाह तआला की जानिब से है। हारिस मुड़ा, वह कह रहा था: ऐ अल्लाह! अगर वह हक़ है जो मुहम्मद ﷺ कहते हैं तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या कोई और दर्दनाक अज़ाब ले आ। अल्लाह की क़सम! वह अपनी ऊँटनी तक नहीं पहुँचा था कि अल्लाह तआला ने उसे एक पत्थर मारा जो उसके दिमाग़ को लगा, तो वह उसकी दुबर से निकल गया, तो उसे क़त्ल कर दिया। तो यह आयत नाज़िल हुई:
(سَأَلَ سَائِلٌ بِعَذَابٍ وَاقِعٍ)
[किताब: तफ़्सीर क़ुर्तबी, जिल्द नहम, स. ५८८]

फिर हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम यह आयत-ए करीमा लेकर नाज़िल हुए:
اَلْیَوْمَ اَكْمَلْتُ لَكُمْ دِیْنَكُمْ وَ اَتْمَمْتُ عَلَیْكُمْ نِعْمَتِیْ وَ رَضِیْتُ لَكُمُ الْاِسْلَامَ دِیْنًاؕ-
ऐ मेरे हबीब! आज मैंने तुम्हारे लिए दीन-ए इस्लाम को मुकम्मल कर दिया और अपनी नेमतों को तमाम कर दिया है, और तुम्हारे लिए दीन-ए इस्लाम को पसंदीदा बना दिया।
(صواعق محرقہ)

हज़रत सैय्यदना अली अल-मुर्तज़ा کَرَّمَ اللّٰہ تَعَالٰی وَجْھَہُ الکَرِیم से रिवायत है: रसूलुल्लाह صَلَّی اللّٰہ تَعَالٰی عَلَیہ وَاٰلہٖ وَسَلَّم ने ग़दीर ख़ुम के दिन मेरे सर पर अमामा बाँधा और उसका शिमला मेरी पुश्त पर लटका दिया।
[سنن الکبری للبیہقی، کتاب السبق والرمی، باب التحریض علی الرمی، ۱۰/ ۲۴، حدیث: ۱۹۷۳۶]

اَلۡیَوۡمَ اَکۡمَلۡتُ لَکُمۡ دِیۡنَکُمۡ.
आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया। के शान-ए-नुज़ूल में मुहद्दिसीन व मुफस्सिरीन ने भी यह हदीस-ए-मुबारका बयान की है:

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि जिस ने १८ ज़िलहिज्ज को रोज़ा रखा उसके लिए साठ (६०) महीनों के रोज़ों का सवाब लिखा जाएगा, और यह ग़दीर ख़ुम का दिन था जब हुज़ूर नबी अकरम ﷺ ने हज़रत अली का हाथ पकड़ कर फ़रमाया: क्या मैं मोमिनीन का वाली नहीं हूँ? उन्होंने कहा: क्यों नहीं, या रसूलल्लाह! आप ﷺ ने फ़रमाया: जिस का मैं मौला हूँ, उस का अली मौला है। इस पर हज़रत उमर बिन ख़त्ताब ﷺ ने फ़रमाया: मुबारक हो! ऐ इब्न-ए-अबी तालिब! आप मेरे और हर मुसलमान के मौला ठहरे। (इस मौक़े पर) अल्लाह तआला ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई:
(الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ)
“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया।”

ज़ैद बिन अरक़म रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि जब रसूल-ए-अकरम ﷺ हज्जतुल विदा से वापस तशरीफ़ लाए तो ग़दीर ख़ुम पर क़ियाम फ़रमाया। आप ﷺ ने सायबान लगाने का हुक्म दिया और वह लगा दिए गए। फिर फ़रमाया: “मुझे लगता है कि अन्क़रीब मुझे (विसाल का) बुलावा आने को है, जिसे मैं क़बूल कर लूँगा। तहक़ीक़ मैं तुम्हारे दरमियान दो अहम चीज़ें छोड़ कर जा रहा हूँ, जो एक दूसरे से बढ़ कर अहमियत की हामिल हैं: एक अल्लाह की किताब और दूसरी मेरी आल। अब देखना यह है कि मेरे बाद तुम इन दोनों के साथ क्या सुलूक करते हो, और वह एक दूसरे से जुदा न होंगी, यहाँ तक कि हौज़-ए (कौसर) पर मेरे सामने आएँगी।”
फिर फ़रमाया: “बेशक अल्लाह मेरा मौला है और मैं हर मोमिन का मौला हूँ।” फिर हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु का हाथ पकड़ कर फ़रमाया: “जिस का मैं मौला हूँ, उस का यह वली है। ऐ अल्लाह! जो इसे (अली को) दोस्त रखे उसे तू दोस्त रख और जो इस से अदावत रखे उस से तू अदावत रख।”
[نسائي، السنن الکبري، 5 : 45، 130، رقم : 8148، 8464]

तारिक़ बिन शिहाब से रिवायत है, वह कहते हैं कि एक यहूदी सैय्यदना उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के पास आया और उसने कहा: ऐ अमीरुल मोमिनीन! तुम अपनी किताब में एक ऐसी आयत पढ़ते हो कि अगर वह हम यहूदियों पर नाज़िल हुई होती तो हम ने (तअज़ीम करते हुए) उस दिन को ईद बना लेना था। उन्होंने कहा: वह कौन सी आयत है? उस ने कहा: अल्लाह तआला का यह फ़रमान कि
{الْیَوْمَ أَ کْمَلْتُ لَکُمْ دِینَکُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَیْکُمْ نِعْمَتِی}
आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया है और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी है।
सैय्यदना उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: अल्लाह की क़सम! मैं वह दिन जानता हूँ, जिस में यह आयत रसूलुल्लाह ﷺ पर नाज़िल हुई थी, बल्कि उस घड़ी का भी इल्म है जिस में यह नाज़िल हुई थी। जुमुआ का दिन था और अरफ़ा की शाम थी।
[الفتح الربانی/تفسير من سورة النساء إلى سورة الأعراف/حدیث: 8578]

अहमद ने अबू तुफैल से रिवायत की है कि एक बार हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने एक वसीअ मक़ाम पर लोगों को जमा करके फ़रमाया कि मैं तुम से क़सम देकर पूछता हूँ कि बताओ, रसूलुल्लाह ﷺ ने यौम-ए-ग़दीर ख़ुम के मौक़े पर मेरी निस्बत क्या इरशाद फ़रमाया था। इस मज्मअ से तीस (३०) आदमी खड़े हुए और उन्होंने कहा कि हम गवाही देते हैं कि हमारे सामने हज़रत रिसालत-मआब ﷺ ने इरशाद फ़रमाया था: “मैं जिस का मौला हूँ, अली भी उस के मौला हैं। इलाही! अली से जो मुहब्बत रखे उस से तू भी मुहब्बत फ़रमा और जो अली से बुग़्ज़ रखे उस से तू भी दुश्मनी रखना।”
(تاریخ الخلفاء)

फ़ज़ाइल-ए मौला अली कर्रमल्लाहु वज्हहू

बाब-ए विलायत में शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि अलैहि के अल्फ़ाज़ मुलाहज़ा हों:

و فاتحِ اوّل ازین اُمت مرحومہ حضرت علی مرتضی است کرم اللہ تعالیٰ وجھہ۔ و سرِ حضرت امیر کرم اللہ وجھہ در اولادِ کرام ایشان رضی اللہ عنہم سرایت کرد۔چنانکہ کسی از اولیاء امت نیست الا بخاندانِ حضرت مرتضیٰ رضی اللہ عنہ مرتبط است بوجہی از وجوہ۔

“इस उम्मत-ए मरहूमा में (फ़ातेह-ए अव्वल) विलायत का दरवाज़ा सबसे पहले खोलने वाले फ़र्द हज़रत अली अल-मुर्तज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं। हज़रत अमीर रज़ियल्लाहु अन्हु का राज़-ए विलायत आप की औलाद-ए किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम में सरायत कर गया। चुनाँचे औलिया-ए उम्मत में से एक भी ऐसा नहीं है जो किसी न किसी तौर पर हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु के ख़ानदान-ए इमामत से (इकतिसाब-ए विलायत के लिए) वाबस्ता न हो।”

و از اُمتِ آنحضرت ﷺ اوّل کسیکہ فاتحِ بابِ جذب شدہ است، و دراں جا قدم نہادہ است حضرت امیر المؤمنین علی کرم اللہ وجھہ، و لہٰذا سلاسلِ طُرُق بداں جانب راجع میشوند۔

“हुज़ूर ﷺ की उम्मत में पहला फ़र्द जो विलायत के (सब से आला व अक़वा तरीक़) बाब-ए जज़्ब का फ़ातेह बना और जिसने इस मक़ाम-ए बुलंद पर (पहला) क़दम रखा, वह अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की ज़ात-ए गरामी है। इसी वजह से रूहानियत व विलायत के मुख़्तलिफ़ तरीक़ों के सलासिल आप ही की तरफ़ रुजू करते हैं।”

यही वजह है कि शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि अलैहि लिखते हैं:
“अब उम्मत में जिसे भी बारगाह-ए रिसालत ﷺ से फ़ैज़-ए विलायत नसीब होता है वह या तो निस्बत-ए अली मुर्तज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु से नसीब होता है या निस्बत-ए ग़ौसुल आज़म जीलानी रज़ियल्लाहु अन्हु से, इसके बग़ैर कोई शख़्स मर्तबा-ए विलायत पर फ़ाइज़ नहीं हो सकता।”
[السیف الجلی علی منکر ولایت علی (اعلان غدیر) ص، ۱۰]

हज़रत अल्लामा जलालुद्दीन सियूती की किताब
“تاریخ الخلفاء” से मौला अली के चंद फ़ज़ाइल:

इमाम अहमद फ़रमाते हैं कि जितनी अहादीस हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की फ़ज़ीलत में वारिद हैं, किसी और सहाबी की फ़ज़ीलत में वारिद नहीं हुई हैं।

बुख़ारी और मुस्लिम में हज़रत सअद इब्न वक़्क़ास से मरवी है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने ग़ज़वा-ए तबूक में जब आप को मदीना मुनव्वरा में रहने का हुक्म दिया और दीगर मुजाहिदीन के साथ नहीं लिया, तो आप ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह ﷺ! आप मुझे यहाँ बच्चों और औरतों पर अपना ख़लीफ़ा बनाकर छोड़े जाते हैं।” हुज़ूर ﷺ ने जवाबन इरशाद फ़रमाया: “क्या तुम इस बात से राज़ी नहीं हो कि मैं तुम्हें इस तरह छोड़े जाता हूँ जिस तरह मूसा अलैहिस्सलाम हज़रत हारून अलैहिस्सलाम को छोड़ गए थे, बस फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि मेरे बाद कोई नबी नहीं होगा।”

बुख़ारी और मुस्लिम ने सहल बिन सअद से रिवायत की है कि जंग-ए ख़ैबर के ज़माने में एक रोज़ रसूल-ए अकरम ﷺ ने फ़रमाया: “मैं कल परचम-ए इस्लामी उस शख़्स के हवाले करूँगा जिस के हाथ से इंशाअल्लाह ख़ैबर फ़तह हो जाएगा। वह शख़्स अल्लाह और उसके रसूल को दोस्त रखता है और अल्लाह और उसका रसूल भी उससे राज़ी है।” रात को लोग बहुत देर तक इस बात पर ग़ौर व ख़ौज़ करते रहे कि देखिए कल सुबह किस को अलम इनायत हो। सुबह हुई तो हर शख़्स रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुआ। हर एक के दिल में ख़्वाहिश मौजज़न थी कि शायद यह फ़ख़्र मुझे हासिल हो जाए। जब तमाम सहाबा-ए किराम जमा हो गए तो रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “अली कहाँ हैं?” सहाबा ने अर्ज़ किया कि वह आशोब-ए चश्म में मुब्तला हैं, इस वजह से हाज़िर-ए ख़िदमत नहीं हुए हैं। हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: “उन्हें फ़ौरन बुला लो।” जिस वक़्त आप तशरीफ़ लाए तो हुज़ूर ﷺ ने आप की आँखों पर अपना लुआब-ए दहन (शरीफ़) लगा दिया, जिस से आप की आँखें फ़ौरन अच्छी हो गईं (और फिर ताज़ीस्त दुखने नहीं आईं)। इसके बाद हुज़ूर ﷺ ने अलम-ए लश्कर आप ही को मरहमत फ़रमाया और हम सब ग़ौर व ख़ौज़ करते ही रह गए।

सहीह मुस्लिम में सअद बिन वक़्क़ास से रिवायत है कि जिस वक़्त यह आयत (मुबाहला) नाज़िल हुई:
فدع ابناءنا وا بناءکم
तो रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत अलीؑ, हज़रत फ़ातिमा ज़हराؐ, हज़रत हसनؑ और हुसैनؑ को बुलाकर दुआ की कि: “इलाही! यह मेरे कुनबा के लोग हैं।”

हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से मुहब्बत का हुक्म

तिर्मिज़ी और हाकिम ने बुरैदा के हवाले से बयान किया है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने मुझे चार आदमियों से मुहब्बत रखने का हुक्म दिया है और मुझे यह भी ख़बर दी गई है कि अल्लाह तआला भी उनसे मुहब्बत रखता है। लोगों ने कहा: या रसूलल्लाह! हमें उनके नाम बता दीजिए। आप ने इरशाद फ़रमाया: उनमें से एक अली हैं। बाक़ी तीन हज़रात के सिलसिले में कहा जाता है कि वह तीन हज़रात ये हैं: हज़रत अबूज़र, हज़रत मिक़दाद और हज़रत सलमान फ़ारसी (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम)।

तिर्मिज़ी ने अबू सुरैहा और ज़ैद बिन अरक़म रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत की है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि जिस का मैं साहिब (मौला) हूँ, अली भी उसके साहिब (मौला) हैं। बाज़ रावियों का कहना है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने यह भी फ़रमाया कि इलाही! जो शख़्स अली से मुहब्बत करता है तू भी उससे मुहब्बत रख और जो अली रज़ियल्लाहु अन्हु से बुग़्ज़ रखे तू भी उससे अदावत रख।

रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया है कि: “अली मुझ से हैं और मैं अली से हूँ।”

जब रसूलुल्लाह ﷺ ने सहाबा-ए किराम के माबैन रिश्ता-ए मुआख़ात क़ायम कराया, तो हज़रत अली ब-चश्म-ए गिरयाँ रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुए और कहा: “या रसूलल्लाह! आप ने तमाम सहाबा के दरमियान रिश्ता-ए मुआख़ात क़ायम फ़रमाया (एक को दूसरे का भाई बनाया), मगर मैं यूँ ही रह गया (आप ने मुझे किसी का भाई नहीं बनाया)।” रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: “तुम दुनिया और आख़िरत में मेरे भाई हो।” मोमिन और मुनाफ़िक़ की पहचान मुस्लिम ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की ज़बानी लिखा है कि आप ने फ़रमाया: “मुझे उस ज़ात की क़सम जिसने दाना उगाया और जान पैदा की कि मुझ से रसूल-ए ख़ुदा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि मोमिन तुम से मुहब्बत रखेगा और मुनाफ़िक़ बुग़्ज़ रखेगा।”

तिर्मिज़ी ने अबू सईद से रिवायत की है कि: “हम मुनाफ़िक़ को हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के बुग़्ज़ से पहचान लिया करते थे।” रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि “मैं इल्म का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा हैं।” (यह हदीस हसन है और जिन्होंने इस हदीस को मौज़ू कहा है उन्होंने ग़लती की है।)

हाकिम हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने मुझे यमन की जानिब (क़ाज़ी बनाकर भेजना चाहा) तो मैंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मैं तो अभी अल्हड़ जवान हूँ, नातजुर्बाकार हूँ, जो मामलात तय करना नहीं जानता और आप मुझे यमन भेजते हैं।” यह सुन कर आप ﷺ ने मेरे सीने पर हाथ मारा और फिर फ़रमाया: “इलाही! इसके क़ल्ब को रौशन फ़रमा दे। इसकी ज़बान को तासीर अता फ़रमा दे।” क़सम है उस ख़ुदा की जिसके हुक्म से बीजों से दरख़्त पैदा होते हैं कि इस दुआ के बाद से फिर कभी मुझे किसी मुक़द्दमे के तस्फ़िये में कोई दग़दगा और तरद्दुद पैदा नहीं हुआ। बग़ैर शक व शुबहा के मैंने हर मुक़द्दमे में दुरुस्त फ़ैसला दिया।

अक़वाल-ए सहाबा-ए किराम

इब्न सअद हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि मुझ से लोगों ने दरियाफ़्त किया कि इसका क्या सबब है कि आप ज़्यादा अहादीस रिवायत करते हैं? मैंने उनको जवाब दिया कि इसका सबब यह है कि जब कभी मैं हुज़ूर ﷺ से कुछ दरियाफ़्त करता था तो आप मुझे ख़ूब अच्छी तरह समझाया करते थे और जब मैं चुप रहता था (ख़ुद कुछ नहीं पूछता था) तो आप ख़ुद ही बतलाया करते थे।

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि हज़रत उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने फ़रमाया: “अली रज़ियल्लाहु अन्हु ही सबसे ज़्यादा बेहतर फ़ैसला करने वाले (क़ाज़ी) हैं।”

हज़रत इब्न मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि हम लोग आपस में कहा करते थे कि: “अली हम अहल-ए मदीना में सबसे ज़्यादा मामला-फ़हम हैं।”

इब्न सअद हज़रत इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि जब भी हमने अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से किसी मसअले को दरियाफ़्त किया तो हमेशा दुरुस्त जवाब उनसे पाया।

सईद बिन मुसय्यिब से मरवी है कि हज़रत उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के पास जब कोई मुश्किल क़ज़िया आता और हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु मौजूद न होते तो हज़रत उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु अल्लाह तआला से पनाह माँगा करते थे (तअव्वुज़ पढ़ा करते थे) कि कहीं क़ज़िया ग़लत तय न हो जाए।

सईद बिन मुसय्यिब यह भी कहते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ के अस्हाब-ए किराम में सिवाए हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु के और कोई यह कहने वाला नहीं था कि: “जो कुछ पूछना हो मुझ से पूछ लो!”

इब्न असाकिर हज़रत इब्न अब्बास के हवाले से बयान करते हैं कि मदीना मुनव्वरा में फ़स्ल-ए क़ज़ाया (मुक़द्दमात के फ़ैसले करने) और इल्म-ए फ़राइज़ में अली इब्न अबी तालिब से ज़्यादा इल्म रखने वाला कोई और नहीं था।

हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा से मरवी है कि जब उनके सामने हज़रत अली का ज़िक्र हुआ तो आप ने फ़रमाया: “अली रज़ियल्लाहु अन्हु से ज़्यादा इल्म-ए सुन्नत का जानने वाला कोई और नहीं है।”

मसरूक़ कहते हैं कि अस्हाब-ए रसूल-ए अकरम ﷺ का इल्म अब हज़रत अली, हज़रत उमर, हज़रत इब्न मसऊद और अब्दुल्लाह बिन उमर (रिज़वानुल्लाहि तआला अलैहिम अजमईन) तक महदूद रह गया है।

अब्दुल्लाह बिन अय्याश बिन अबी रबीअह का बयान है कि हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु में इल्म की क़ुव्वत, इरादे की पुख़्तगी, मज़बूती और इस्तिक़लाल मौजूद था। ख़ानदान भर में आप की बहादुरी मशहूर थी। आप पहले इस्लाम लाए। आप रसूलुल्लाह ﷺ के दामाद थे। अहकाम-ए फ़िक़्ह व सुन्नत में माहिर थे। जंगी शुजाअत और माल व दौलत की बख़्शिश में सबसे मुम्ताज़ थे।

जाबिर बिन अब्दुल्लाह कहते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “तमाम लोग मुख़्तलिफ़ दरख़्तों की शाख़ें हैं, मैं और अली एक ही दरख़्त से हैं।”

तबरानी और इब्न हातिम हज़रत इब्न अब्बास से रिवायत करते हैं कि जिस जगह क़ुरआन शरीफ़ में “یاایها الذین اٰمنو” है वहाँ समझना चाहिए कि हज़रत अली उनके अमीर व शरीफ़ हैं। अल्लाह तबारक व तआला ने क़ुरआन मजीद में चंद मक़ामात पर सहाबा-ए किराम पर इताब फ़रमाया है, मगर हज़रत अली का ज़िक्र हर जगह ख़ैर के साथ है।

इब्न असाकिर हज़रत इब्न अब्बास से रिवायत करते हैं कि क़ुरआन शरीफ़ में जो कुछ हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की शान में नाज़िल हुआ, वह किसी की शान में नाज़िल नहीं हुआ। इब्न असाकिर ने हज़रत इब्न अब्बास ही से इस को भी रिवायत किया है कि आप की शान में तीन सौ आयतें नाज़िल हुई हैं।

अल-बज़्ज़ार ने सअद से रिवायत की है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से फ़रमाया कि इस मस्जिद में सिवाए मेरे और तुम्हारे किसी के लिए जुनुब होना हलाल नहीं है। (जुनुब होने की सूरत में इस मस्जिद में दाख़िल होना मेरे और तुम्हारे सिवा किसी के लिए हलाल नहीं है।)

तबरानी, उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा से मरवी है कि जब सरवर-ए कायनात ﷺ ग़ुस्से की हालत में होते थे तो सिवाए हज़रत अली कर्रमल्लाहु वज्हहू के किसी की मजाल नहीं थी कि आप से गुफ़्तगू कर सके।

तबरानी ने हज़रत इब्न मसऊद से रिवायत की है कि नबी अकरम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि: “हज़रत अली की तरफ़ देखना भी एक क़िस्म की इबादत है।”

तबरानी ने अपनी औसत में हज़रत इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत की है कि हज़रत अली में ऐसी अठारह (१८) सिफ़ात हैं जो और किसी सहाबी में नहीं हैं।

हज़रत उमर बिन ख़त्ताब ने इरशाद फ़रमाया कि हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को तीन फ़ज़ीलतें ऐसी मिली हैं कि अगर मुझे उनमें से एक भी मिल जाती तो मेरे नज़दीक वह तमाम दुनिया से ज़्यादा महबूब होती।

लोगों ने दरियाफ़्त किया, वह फ़ज़ाइल क्या हैं? तो आप ने फ़रमाया: अव्वल, हुज़ूर ﷺ ने उनसे अपनी साहिबज़ादी (हज़रत) फ़ातिमा का निकाह किया। द्वितीय, आप ने उन दोनों को मस्जिद में रखा और जो कुछ उनको वहाँ हलाल है, मुझे हलाल नहीं है। तृतीय, जंग-ए ख़ैबर में अलम उनको अता फ़रमाया।

अबू यअला हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत करते हैं कि उस दिन से जबकि रसूलुल्लाह ﷺ ने मेरी आँखों में लुआब-ए दहन-ए मुबारक लगाया था और मुझे अलम मरहमत फ़रमाया था, न मेरी आँखें दुखने आईं और न मेरे सर में दर्द हुआ।

अबू यअला और अल-बज़्ज़ार ने सअद इब्न वक़्क़ास से रिवायत की है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: “जिस ने अली को अज़ीयत दी, उस ने ख़ुद मुझे अज़ीयत दी।”

तबरानी ने हज़रत उम्मे सलमा से रिवायत की है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: “जिस ने अली को महबूब रखा, उस ने मुझे महबूब रखा, उस ने गोया अल्लाह तआला को महबूब रखा। और जिस ने अली से दुश्मनी रखी, गोया उस ने मुझ से दुश्मनी रखी, उस ने गोया अल्लाह से दुश्मनी रखी।”

अहमद उम्मे सलमा से रिवायत करते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को फ़रमाते सुना कि: “जिस ने अली रज़ियल्लाहु अन्हु को बुरा कहा, उस ने मुझे बुरा कहा।”

अल-बज़्ज़ार, हाकिम और अबू यअला ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत की है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने मुझे तलब फ़रमाकर इरशाद फ़रमाया: “तुम्हारी मिसाल हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम जैसी है कि यहूदियों ने उनसे यहाँ तक बुग़्ज़ व अदावत की कि उनकी (मासूमा) माँ पर बुहतान लगाया और नसारा ने उनसे मुहब्बत की तो इतनी की जिस के वह लायक़ न थे। याद रखो! दो चीज़ें इंसान को तबाह व बर्बाद कर देती हैं। एक तो इतनी मुहब्बत कि वह महबूब में वह बातें समझने लगे जो हक़ीक़त में उसमें मौजूद न हों। दूसरे, इस क़दर शदीद बुग़्ज़ व अदावत कि बुरा कहते, तुहमत लगाने से भी न चूके।”

तबरानी ने औसत और सगीर में उम्मे सलमा से रिवायत की है कि मैंने रसूल-ए ख़ुदा ﷺ का यह इरशाद ख़ुद सुना है कि: “अली क़ुरआन के साथ हैं और क़ुरआन अली के साथ है। यह दोनों मुझ से जुदा होने के बाद मुझ से कौसर पर फिर मिल जाएँगे।”

अहमद और हाकिम ने बसनद-ए सहीह अम्मार बिन यासिर से रिवायत की है कि नबी अकरम ﷺ ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से फ़रमाया: “दो शख़्स सबसे ज़्यादा शक़ी हैं। एक तो आल-ए समूद, जिन्होंने सालेह पैग़म्बर की ऊँटनी की कूँचें काट दी थीं, दूसरे वह शख़्स जो तुम्हारे सर पर तलवार मारेगा और तुम्हारी दाढ़ी ख़ून में तरबतर हो जाएगी।”

हाकिम ने अबू सईद ख़ुदरी के हवाले से बयान किया है कि चंद लोगों ने हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर होकर हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की कुछ शिकायत पेश की, तो आप ने फ़ौरन एक ख़ुत्बा फ़रमाया और कहा: “लोगो! अली की शिकायत हरगिज़ न करना। वह ख़ुदावंद-ए तआला के रास्ते में और उसके मामलात में बहुत ही सख़्तगीर हैं।”
[کتاب: تاریخ الخلفاء ص، ۲۵۵ – ۲۶۰]

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