- हुज़ूर मदार-ए-पाक की तारीख़-ए-पैदाइश
- ज़िंदा शाह मदार की तारीख़-ए-पैदाइश
- हज़रत मदार पाक की तारीख़-ए-विलादत
- क़ुत्ब-उल-मदार की पैदाइश की तारीख़
- बदिउद्दीन ज़िंदा शाह मदार की तारीख़-ए-पैदाइश
- मदार-ए-पाक के साल-ए-विलादत पर तहक़ीक़
- ज़िंदा शाह मदार की विलादत 242 हिजरी
आँ हज़रत हलबी क़ुद्दिसा सिर्रुहू का राजेह और सहीह साल-ए-विलादत 242 हिजरी है, यानी आप तीसरी सदी हिजरी में पैदा हुए, आप का माद्दा-ए-तारीख़-ए-विलादत “साहिब-ए-आलम” मशहूर है। बाज़ तज़्किरा-निगारों ने बग़ैर किसी दलील के तसामुहन आप की पैदाइश पाँचवीं और आठवीं सदी हिजरी में तहरीर कर डाली, जबकि ये सरासर तारीख़ी वाक़िआत और तहक़ीक़ी रिवायात के ख़िलाफ़ है। आप क़ुद्दिसा सिर्रुहू तीसरी सदी हिजरी में पैदा होकर परवान चढ़ रहे थे।
इस पर चंद शवाहिद दर्ज़-ए-ज़ैल ज़िक्र किए जाते हैं:
1.
क़दीम मुस्तनद तज़्किरा जात में ये बात वाज़ेह तौर पर तहरीर है कि हज़रत क़ुत्बुल मदार क़ुद्दिसा सिर्रुहू तीसरी सदी हिजरी में तवल्लुद हो चुके थे, हर चंद कि सालों के तक़द्दुम व ताख़्ख़ुर का इख़्तिलाफ़ हुआ, चुनाँचे: मुल्ला लाल बदख़्शी मुतवल्लिद 964 हिजरी अपनी किताब “समरातुल क़ुद्स” में लिखते हैं:
گویند تولد وے در سنه خمسين ومأتين وقيل ثلثمأة بوده و عمر دراز یافته ألخ……
तरजुमा: मनक़ूल है कि हज़रत क़ुत्बुल मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु 250 हिजरी में पैदा हुए, और कहा गया कि 300 हिजरी में पैदा हुए, और लंबी उम्र पाई।
[समरातुल क़ुद्स मिन शजरातिल अन्स, सफ़्हा: 26, मख़तूतह रज़ा लाइब्रेरी रामपुर, सनह-ए-तालीफ़ 1006]
शैख़ अब्दुल बासित कन्नौजी अलैहिर्रहमा लिखते हैं:
وطنش حلب تاریخ تولد غره ماه شوال وقت فجر روز دوشنبه سنه سه صد ہجرة النبوی ، حیاتش پانصد سال۔
तरजुमा: हज़रत क़ुत्बुल मदार का वतन-ए-मादरी हलब है। आप क़ुद्दिसा सिर्रुहू बरोज़ पीर, ब-वक़्त-ए-फ़ज्र, माह-ए-शव्वाल तीसरी सदी हिजरी में पैदा हुए। आप 500 साल बा-हयात रहे।
[मदारुल असरार फ़ी ख़वारिक़ शाह बदीउद्दीन मदार, सफ़्हा 2, मख़तूतह इस्लामिया कॉलेज पेशावर]
शैख़ नजीबुद्दीन नागौरी रहमतुल्लाह अलैह अपनी किताब “मख़ज़नुल अइरास” में लिखते हैं:
بدیع الدین شاہ مدار شب جمعه در سال هشتصد و چهل و تولد در دو صد و بست و یا پنجاہ و یکہ مدت عمر ششصد هشت و چهار سال۔
तरजुमा: हज़रत बदीउद्दीन शाह मदार ने शब-ए-जुमा 840 हिजरी में विसाल फ़रमाया। आप 220 या 250 हिजरी में पैदा हुए और 684 बरस की उम्र पाई।
[मख़ज़नुल अइरास, जिल्द 1, सफ़्हा: 164, मख़तूतह रज़ा लाइब्रेरी रामपुर, सनह-ए-किताबत: 1252 हिजरी]
फ़ुसूल-ए-मसऊदिया में तुफ़हतुल अबरार से नक़्ल है:
تولد وے در سنه خمسين و مأتين وقيل ثلثمأة بود، در موضعے که سه منزل از رود نیل ست زادگاه وی است۔
तरजुमा: आप क़ुद्दिसा सिर्रुहू 300 हिजरी और कहा गया 250 हिजरी में दरिया-ए-नील से 3 कोस दूर एक जगह पर पैदा हुए।
[फ़ुसूल-ए-मसऊदिया, सफ़्हा 180, मत्बूआ असहुल मताबे, आसि लखनऊ, सनह-ए-इशाअत 1331 हिजरी]
इन तमाम दलाइल व बराहीन से साबित होता है कि हज़रत क़ुत्बुल मदार तीसरी सदी हिजरी में इख़्तिलाफ़-ए-अक़वाल 250 हिजरी या 220 हिजरी में पैदा हुए, और लंबी उम्र पाकर 840 हिजरी में विसाल फ़रमाया।
2.
जुमला तज़्किरा-निगारों ने हज़रत क़ुत्बुल मदार की हयात में इस पहलू को बिल-इत्तिफ़ाक़ लिखा है कि आप की दीनी तालीम व तरबियत हज़रत सदीदुद्दीन हुज़ैफ़ा बिन क़त्तादा मरअशी शामी क़ुद्दिसा सिर्रुहू के ज़रिए हुई। हम यहाँ फ़क़त एक दलील पर इक्तिफ़ा करते हैं, बाक़िया तफ़सील (किताब: तज़्किरा मशाइख़-ए-मदारिया की जिल्द अव्वल) बाब सोम में मुलाहिज़ा करें। चुनाँचे “बाक़ियात-ए-सालिहात” में अहद-ए-अकबरी की किताब नफ़हतुल अज़हार से मनक़ूल है:
واز زیارت مزار مرتضوی فیضیاب شده عازم هندوستان شد اثنای راه در صحرای گزر شد، در آں جا دو نفر ابدال آمدند و وی را در کوه برده در بستان رسانید، بردرش پیر مردے بشکل نورانی دید، نامش معلوم شد که طیفور شامی است، این را دیده بگفت، بدیع الدین! السلام علیک ، خواجه بانتظار تست، بدیع الدین از شنیدن نام خود متعجب شد، فرمود: جای تعجب نیست ہر کہ ترا باینجا رسانیده است، آں نیز مرا از نامش آگاہی داده است، و عنقریب تو نیز بایں مرتبه خواہی رسید، و دست بدیع الدین گرفته اندر بستان آورد دید که در کوشک پر تکلیف بر تخت خواجه بایزید بسطامی جلوه افروز اند و قریب تخت مع دوات و قلم خواجه حذیفہ شامی غرق بانوار الہی سر افگنده نشسته اند، حضرت خواجه بایزید بسطامی با حذیفه شامی فرمود که تو نیز بدیع الدین را چیز بده، خواجہ حذیفہ شامی از دوات و قلم دعای بشمخ مع عزیمت تحریر کرده با بدیع الدین بخشید ، ازاں بعد خواجه با یزید بسطامی از بدیع الدین فرمود که بر و خدا حافظ عازم هندوستان شو۔
तरजुमा: हज़रत बदीउद्दीन क़ुत्बुल मदार क़ुद्दिसा सिर्रुहू ने मज़ार-ए-मुर्तज़वी की ज़ियारत से फ़ैज़याब होकर हिंदुस्तान की तरफ़ सफ़र इख़्तियार किया। अस्ना-ए-राह एक जंगल से गुज़र हुआ। उसमें 2 अब्दाल आए और उनको कोह-ए-बरदा के एक बाग़ में पहुँचा दिया। उनके दर पर एक नूरानी शक्ल वाले बुज़ुर्ग दिखाई दिए। उनका नाम मालूम हुआ कि तयफ़ूर शामी हैं। बदीउद्दीन को देखकर उन्होंने कहा: “बदीउद्दीन! अस्सलामु अलैक, ख़्वाजा तुम्हारे इंतज़ार में हैं।” बदीउद्दीन अपना नाम सुनकर हैरत में पड़ गए। फ़रमाया: “तअज्जुब न करें, जिसने आपको यहाँ पहुँचाया है, उसी ने मुझे आपका नाम बताया और अनक़रीब तुम्हें ये रुत्बा हासिल होगा।” फिर बदीउद्दीन का हाथ पकड़कर बाग़ में ले आए। देखा कि आलीशान शक्ल में एक तख़्त पर ख़्वाजा बायज़ीद बिस्तामी जल्वा-अफ़रोज़ हैं और तख़्त के क़रीब ख़्वाजा हुज़ैफ़ा शामी दवात व क़लम के साथ अनवार-ए-इलाहिया में ग़र्क़ सर झुकाए हुए बैठे हैं। हज़रत ख़्वाजा बायज़ीद बिस्तामी ने हुज़ैफ़ा शामी से फ़रमाया कि तुम भी बदीउद्दीन को कुछ अता करो। हज़रत ख़्वाजा हुज़ैफ़ा शामी ने दवात व क़लम से दुआ-ए-बशमख़ लिखकर बदीउद्दीन को दी। इसके बाद ख़्वाजा बायज़ीद बिस्तामी ने हज़रत बदीउद्दीन क़ुत्बुल मदार से फ़रमाया: “तुम्हारा ख़ुदा हाफ़िज़ है, हिंदुस्तान की तरफ़ सफ़र करो।”
[बाक़ियात-ए-सालिहात मअ तबक़ातुल औलिया, सफ़्हा 20, ममलूका अनवार समदानी, सनह-ए-किताबत 1330 हिजरी]
नफ़हतुल अज़हार के इस इक़्तिबास से वाज़ेह होता है कि हज़रत क़ुत्बुल मदार के उस्ताद-ए-गिरामी हज़रत हुज़ैफ़ा शामी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु हैं, जबकि हज़रत हुज़ैफ़ा शामी का सनह-ए-विसाल 252 हिजरी है, जैसा कि शैख़ अल्लाह दिया बिन अब्दुर्रहीम चिश्ती मुतवफ़्फ़ा 1036 हिजरी सैरुल अक़ताब में लिखते हैं:
نقل است که آں حضرت بست و چهارم شوال سنه اثنی و خمسين و مأتین به رحمت حق پیوست چنانکه این دعا گوی درویشان تاریخش “قطب زمان بودہ” است۔
तरजुमा: मनक़ूल है कि आँ हज़रत हुज़ैफ़ा शामी 24 शव्वालुल मुकर्रम 252 हिजरी में रहमत-ए-हक़ से जा मिले। चुनाँचे दरवेशों के इस नियाज़कीश ने आँ हज़रत की तारीख़-ए-वफ़ात “क़ुत्ब ज़मान बूदह” पाई है।
[सैरुल अक़ताब, सफ़्हा 50, बा-तसहीह व मुक़द्दिमा: डॉक्टर अकरम मुहम्मद सरवर मौलाई, मत्बूआ मरकज़-ए-तहक़ीक़ात-ए-फ़ारसी, तेहरान 1386 हिजरी]
इन तमाम तफ़सीलात के बाद ये कहना बजा होगा कि हज़रत क़ुत्बुल मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु 252 हिजरी से क़ब्ल, ब-क़ौल-ए-राजेह 242 हिजरी में सरज़मीन-ए-हलब पर पैदा हुए। इससे ये अम्र भी वाज़ेह होता है कि आप का सनह-ए-विलादत 300 हिजरी या 250 हिजरी दुरुस्त नहीं, चूँकि फ़क़त 2 साल की उम्र में हज़रत क़ुत्बुल मदार का हज़रत हुज़ैफ़ा मरअशी शामी से तहसील-ए-इल्म करना ग़ैर-मुतसव्विर अम्र है।
3.
जुम्हूर तज़्किरा-निगारों ने इस बात को तस्लीम किया है कि हज़रत क़ुत्बुल मदार क़ुद्दिसा सिर्रुहू, सुल्तानुल आरिफ़ीन हज़रत बायज़ीद बिस्तामी उर्फ़ तयफ़ूर शामी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के मुरीद और ख़िर्क़ा-याफ़्ता हैं। इस पर आपके क़िल्लत-ए-वसाइत पर मुश्तमिल शजरात भी दलालत करते हैं। इस बाबत ज़ैल में चंद दलाइल ज़िक्र किए जाते हैं, मज़ीद तफ़सील (किताब: तज़्किरा मशाइख़-ए-मदारिया की जिल्द अव्वल) बाब सोम में देखें।
चुनाँचे अबुल फ़ज़्ल अल्लामी अपनी किताब आईन-ए-अकबरी में लिखता है:
شاہ مدار لقب بدیع الدین کہ و مہ ہندی بوم بدو گرد والا پایگی اور برگزارد، گویند مرید شیخ محمد طیفوری بسطامی است۔
तरजुमा: शाह मदार आपका लक़ब बदीउद्दीन है। हिंदुस्तान का हर ख़ुर्द व बुज़ुर्ग आपका मो’तक़िद है और आपके मरातिब बयान करता है। कहते हैं कि आप मुरीद व ख़लीफ़ा शैख़ मुहम्मद तयफ़ूरी बिस्तामी के हैं।
[आईन-ए-अकबरी, सफ़्हा 219, मत्बूआ एशियाटिक सोसाइटी बंगाल]
दारा शिकोह क़ादरी सफ़ीनतुल औलिया में लिखता है:
حضرت سید بدیع الدین قدس سرہ لقب ایشاں شاہ مدار است و مرید شیخ محمد طیفور شامی۔
तरजुमा: हज़रत सैयद बदीउद्दीन क़ुद्दिसा सिर्रुहू का लक़ब शाह मदार है। आप मुरीद व ख़लीफ़ा शैख़ मुहम्मद तयफ़ूर शामी के हैं।
[सफ़ीनतुल औलिया, सफ़्हा: 321, मत्बा मदरसा आगरा 1853 ईस्वी]
हज़रत शैख़ अज़ीज़ुल्लाह कन्नौरी तुफ़हतुल अबरार में लिखते हैं:
قطب المدار با وجود نسبت اویسیت بروح پر فتوح سرور کائنات خلاصۂ موجودات محمد مصطفی صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم در عالم ناسوت خلافت و ارادت از شیخ محمد طیفوری و از شیخ عبداللہ شامی که از علما شام بود۔
तरजुमा: हज़रत क़ुत्बुल मदार, हुज़ूर सरवर-ए-काइनात, ख़ुलासा-ए-मौजूदात, मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की रूह-ए-पुर-फ़ुतूह से निस्बत-ए-उवैसिय्यत पाने के साथ-साथ आलम-ए-ज़ाहिरी में हज़रत शैख़ मुहम्मद तयफ़ूरी और हज़रत शैख़ अब्दुल्लाह शामी के मुरीद व ख़लीफ़ा थे, जो शाम के उलमा में से थे।
[तुफ़हतुल अबरार फ़ी मनाक़िब क़ुत्बुल मदार, सफ़्हा 31, मख़तूतह मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी अलीगढ़, सनह-ए-किताबत: 1025 हिजरी]
हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी अपने एक मकतूब बनाम बाबा उस्मान कश्मीरी में हज़रत क़ुत्बुल मदार का शजरा-ए-तरीक़त लिखते हुए रक़मतराज़ हैं:
हज़रत शाह बदीउद्दीन मदार ने ख़िर्क़ा हासिल किया शैख़ तयफ़ूर शामी से, उन्होंने हासिल किया यमीनुद्दीन शामी से, उन्होंने हासिल किया शैख़ अब्दुल्लाह हामिल-ए-रायातिन-नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से, उन्होंने हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से और उन्होंने हुज़ूर सरकार-ए-दो-आलम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से।
[नादिर मकतूबात हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी, जिल्द 2, सफ़्हा 189, मकतूब नंबर: 89, तहक़ीक़ व तरजुमा मुफ़्ती नसीम अहमद फ़रीदी अमरोहवी, मत्बा भारत ऑफ़सेट दिल्ली 1998 ईस्वी]
हज़रत मख़दूम अशरफ़ जहाँगीर समनानी ख़ानवादा-ए-तयफ़ूरिया के बारे में फ़रमाते हैं:
طیفوریان چہار تن بودند، شیخ مسعود و شیخ محمود و شیخ ابراہیم و شیخ احمد و شیخ مسعود طیفوری خرقہ شکر پارہ کہ آنرا تماچہ ہم گویند در بر کرد و شیخ محمود طیفوری با ہزار ریشه سیاه کہ آنرا خرقہ ہزار میخی گویند در بر کرد و شیخ ابراہیم خرقہ خشت پاره مربع در بر کرد و شیخ احمد طیفوری خرقہ صوف در بر کرد۔
तरजुमा: सुल्तानुल आरिफ़ीन तयफ़ूर (बायज़ीद बिस्तामी) के 4 ख़ुलफ़ा थे: शैख़ मसऊद, शैख़ महमूद, शैख़ इब्राहीम और शैख़ अहमद (बदीउद्दीन मदार)। शैख़ मसऊद तयफ़ूरी ने ख़िर्क़ा शकर-पारा, जिसे तमाचा भी कहते हैं, पहना और शैख़ महमूद तयफ़ूरी ने हज़ार रेशा सियाह का ख़िर्क़ा पहना। इस ख़िर्क़े को ख़िर्क़ा हज़ार-मीखी भी कहते हैं। शैख़ इब्राहीम तयफ़ूरी ने ख़िर्क़ा ख़िश्त-पारा मुरब्बा ज़ेब-ए-तन किया और शैख़ अहमद तयफ़ूरी को ख़िर्क़ा-ए-सूफ़ शैख़ ने अता फ़रमाया।
[लताइफ़-ए-अशरफ़ी, जिल्द 1, सफ़्हा 349, लतीफ़ा चहारदहुम दर ज़िक्र ख़ानवादा-हा-ए-मशाइख़, मत्बूआ नुसरतुल मताबे दिल्ली]
इन तमाम हवाला जात से वाज़ेह होता है कि हज़रत क़ुत्बुल मदार, हज़रत बायज़ीद बिस्तामी तयफ़ूर शामी के मुरीद व ख़लीफ़ा थे और हज़रत बायज़ीद बिस्तामी ने 261 हिजरी में विसाल फ़रमाया। जैसा कि हज़रत शैख़ अब्दुल ग़नी नाबुलसी अलैहिर्रहमा अपने सफ़रनामा “अल-हक़ीक़त वल-मजाज़” में लिखते हैं:
“و البسطامي بفتح الباء الموحدة وقيل بكسرها نسبة إلى بلد بطريق نيسابور ذكره السيوطي في لب اللباب و اسمه طيفور بن عيسى بن آدم بن عيسى بن علي أحد مشايخ الصوفية وكان جده مجوسيا فأسلم و كان لأبي يزيد إخوان صالحان عابدان وهو أجلهم، قال ابن خلکان و له مقامات و مجاهدات مشهورة و كرامات ظاهرة، توفي سنة إحدى و ستین و مأتين۔”
तरजुमा: बिस्तामी बा-ए-मुवह्हदा के फ़त्हा के साथ, ब-क़ौल-ए-बाज़ उसके कस्र के साथ, एक शहर की तरफ़ निस्बत है, जो नीशापुर के रास्ते पर पड़ता है। इमाम सियूती ने लुब्बुल लुबाब में ऐसा ही ज़िक्र किया है। अबू यज़ीद बिस्तामी का नाम तयफ़ूर बिन ईसा बिन आदम बिन ईसा बिन अली है। आप सूफ़ी मशाइख़ में से हैं। आपके जद्द-ए-बुज़ुर्गवार मजूसी थे, बाद में इस्लाम लाए। हज़रत अबू यज़ीद के 2 इबादतगुज़ार और नेक भाई थे, जिनमें आप सबसे ज़्यादा साहिब-ए-जलालत थे। इब्न ख़ल्लिकान कहते हैं कि हज़रत तयफ़ूर बिस्तामी मशहूर मक़ामात व मुजाहिदात और बुलंद करामात के मालिक थे। आँ हज़रत ने 261 हिजरी में विसाल फ़रमाया।
[अल-हक़ीक़त वल-मजाज़ फ़िर-रिहलति इला बिलादिश शाम व मिस्र वल-हिजाज़, सफ़्हा: 43, अल-हयअतुल मिस्रिय्यतुल आममतु लिल-किताब, 1986 ईस्वी]
इन तमाम तफ़सीलात की रोशनी में नतीजा ये मुस्तफ़ाद होता है कि हज़रत क़ुत्बुल मदार क़ुद्दिसा सिर्रुहू का सनह-ए-विलादत 242 हिजरी ही दुरुस्त है, चूँकि आपको हज़रत बायज़ीद बिस्तामी से शरफ़-ए-बैअत हासिल है और हज़रत सुल्तानुल आरिफ़ीन का सनह-ए-विसाल 261 हिजरी है। लिहाज़ा आप क़ुद्दिसा सिर्रुहू का तीसरी सदी हिजरी में पैदा होना ही राजेह और मुहक़्क़क़ क़ौल है।
4.
मुआसिरीन में हज़रत क़ुत्बुल मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की जिन उलू अल-अज़्म हस्तियों से मुलाक़ात साबित है, उनमें हज़रत शैख़ अबुल अब्बास अहमद बिन मसरूक़, हज़रत महमूद ग़ज़नवी, हज़रत साहू सालार ग़ाज़ी, हज़रत सालार मसऊद ग़ाज़ी, हज़रत सिकंदर दीवाना, हज़रत ग़ौस-ए-आज़म जीलानी, हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ अजमेरी और हज़रत इमादुद्दीन शामी बिलगरामी जैसी अज़ीम तरीन हस्तियाँ शामिल हैं। इन हज़रात में अव्वल बुज़ुर्ग तीसरी सदी हिजरी और बाक़ी चौथी, पाँचवीं और छठी सदी हिजरी की शख़्सियात हैं। इन हज़रात से हज़रत क़ुत्बुल मदार की मुलाक़ात साबित होना इस बात पर सरीह दलालत है कि आप क़ुद्दिसा सिर्रुहू तीसरी सदी हिजरी में पैदा होकर पाँच सदियों तक बा-हयात रहे। मज़कूरुस्सद्र शख़्सियात की हज़रत क़ुत्बुल मदार से मुलाक़ात का तफ़सीली तज़्किरा (किताब: तज़्किरा मशाइख़ मदारिया की जिल्द अव्वल) बाब पंजुम में मुलाहज़ा करें।
5.
हज़रत क़ुत्बुल मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के दो भाई, ब-रिवायत-ए-दीगर तीन भाई थे, जिनमें एक भाई का नाम हज़रत मुहम्मद था, जिनकी शोहरत “अख़ू मुहसिन और शरीफ़ आबिद” से हुई।
इब्न असाकिर (विलादत: 499 हिजरी, वफ़ात: 571 हिजरी) उनके बारे में तारीख़ मदीना दमिश्क़ में लिखते हैं:
محمد بن علي بن الحسين بن أحمد بن إسماعيل بن محمد بن إسماعيل بن جعفر بن محمد بن علي بن الحسين بن علي بن أبي طالب أبو الحسين العلوي المعروف بأخي محسن و يعرف بالشريف العابد كان زاهدا منقطعا في بيته و له تصانیف و مات الشريف محمد أخو محسن العلوي و هو الصغير وكان لازما للبيت متعبدا صالحا في يوم الثلاثاء لثلاث و عشرين ليلة خلت من جمادى الأولى سنة ثمان و تسعين و ثلاثماة و صلي عليه في المصلى وكان له مشهد عظيم۔
तर्जुमा: मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन अहमद बिन इस्माईल बिन मुहम्मद बिन इस्माईल बिन जाफ़र बिन मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन अली बिन अबी तालिब, अबू हुसैन अलवी, जो अख़ू मुहसिन और शरीफ़ आबिद के नाम से मशहूर हैं। हज़रत अख़ू हसन तक़वी शिआर और घर में उज़लत-नशीन बुज़ुर्ग थे। उनकी चंद तसानीफ़ हैं। हज़रत शरीफ़ मुहम्मद अख़ू मुहसिन अलवी भाइयों में छोटे, गोशा-नशीन, इबादतगुज़ार और सालेह बुज़ुर्ग थे, जो बरोज़ सह-शंबा 23 जमादियुल अव्वल 398 हिजरी ब-क़ज़ा-ए-इलाही विसाल फ़रमा गए। ईदगाह में उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की गई। उनका एक अज़ीम मज़ार है।
[तारीख़ मदीना दमिश्क़, जिल्द: 54, सफ़्हा: 307, दारुल फ़िक्र, बैरूत, 1418 हिजरी]
इस इक़्तिबास से मालूम होता है कि हज़रत क़ुत्बुल मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के बिरादर-ए-सग़ीर हज़रत अख़ू मुहसिन ने चौथी सदी हिजरी में विसाल फ़रमाया। यह वाज़ेह क़रीना है कि हज़रत क़ुत्बुल मदार क़ुद्दिसा सिर्रुहू तीसरी सदी हिजरी के बुज़ुर्ग हैं और आपका सन-ए-विलादत 242 ही दुरुस्त और मुहक़्क़क़ है।
चंद मरजू़ह अक़वाल का तहक़ीक़ी जायज़ा
साबिक़ा गुफ़्तगू से वाज़ेह हो गया कि दीगर तज़्किरा-निगारों के तहरीर-कर्दा सनवात-ए-विलादत, मसलन 590 हिजरी और 716 हिजरी वग़ैरह, ज़ोफ़ और सक़्म से ख़ाली नहीं और मरजू़ह अक़वाल में शामिल हैं। ज़ैल में उनकी मज़ीद वज़ाहत की जाती है।
चुनाँचे हज़रत शैख़ अब्दुर्रहमान चिश्ती [1005/1094 हिजरी] मिरआत-ए-मदारी में आपका सन-ए-विलादत बयान करते हुए लिखते हैं:
تولد آں حضرت در سنہ خمس و عشر و سبع مأۃ بولایت شام کہ بہشت روے زمین است واقع شده بود و یک صد و بست و پنج سال عمر داشت۔
तर्जुमा: आं हज़रत की पैदाइश 715 हिजरी, मुल्क-ए-शाम जो इस ज़मीन की जन्नत है, में हुई। आपकी उम्र 125 साल हुई।
[मिरआत-ए-मदारी, सफ़्हा 141, मख़्तूता ख़ुदाबख़्श लाइब्रेरी, पटना, सन-ए-किताबत: 1304 हिजरी]
इसी तरह साहिब-ए-मुख़बिरुल वासिलीन फ़ाज़िल तिरमिज़ी अकबराबादी [वफ़ात: 1103 हिजरी] नज़्महा लिखते हैं:
عمر آں شاہ مطلع الانوار
یک صد و بست و چار سال شمار
شده سال طلوع آن بیقین
شمس دنیا و دين بديع الدين
तर्जुमा: हज़रत शाह मत्लअुल अनवार की उम्र 124 साल शुमार कर। हज़रत का साल-ए-आमद शम्स-ए-दुनिया व दीन बदीउद्दीन (816) यक़ीन के साथ बरामद हुआ।
इन दो हवाले पेश करने के बाद अर्ज़ है कि इस सन-ए-विलादत का तअय्युन ख़ुद इन्हीं की तहरीरात के ख़िलाफ़ है। चुनाँचे मुसन्निफ़ मिरआत-ए-मदारी, शैख़ अब्दुर्रहमान चिश्ती अपनी दूसरी तसनीफ़ गुलिस्तान-ए-मसऊदिया में रिसाला क़ुत्बिया के हवाले से लिखते हैं:
अल-ग़रज़ पाँचों पीर (ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की मुलाक़ात के बाद) हज़रत बख़्तियार काकी की मुईयत में बहराइच शरीफ़ पहुँच गए। इसी अस्ना में क़ुत्बुल मदार सय्यद बदीउद्दीन ज़िंदा शाह मदार से शरफ़-ए-मुलाक़ात हासिल हुआ। ज़िंदा शाह मदार ने पाँचों पीर को देखते ही फ़रमाया, “बहुत दिन बाद सिद्दीक़ीन की ख़ुशबू दिमाग़ में पहुँची है।” चंद दिनों पाँचों पीर (हज़रत सय्यद असलम ग़ाज़ी, हज़रत सय्यद अकरम ग़ाज़ी, हज़रत सय्यद सूफ़ी ग़ाज़ी, हज़रत सय्यद मलिक ग़ौस ग़ाज़ी, हज़रत सय्यद मुहम्मद ग़ाज़ी) ख़िदमत-ए-अक़दस में रहकर राह-ए-सुलूक के मदारिज तय करते रहे। ख़िर्क़ा-ए-ख़िलाफ़त हासिल करने के बाद क़दम-बोसी की। हुक्म के मुताबिक़ मक़ामात-ए-मुक़द्दसा की ज़ियारत के लिए तशरीफ़ ले गए।
[गुलिस्तान-ए-मसऊदिया (मुतर्जम), सफ़्हा: 16–17, नाशिर मुहम्मद सलीम ग़ाज़ी, मुहम्मद हफ़ीज़ ग़ाज़ी, अल-जामिअतुल ग़ाज़िया, कोइलसा बाज़ार, ज़िला आज़मगढ़]
इसी तरह साहिब-ए-मुख़बिरुल वासिलीन हज़रत क़ुत्बुल मदार के ज़ाहिरी पीर-ओ-मुर्शिद हज़रत तैयफ़ूर शामी को क़रार देते हुए लिखते हैं:
آنکہ قطب مدار عالم بود
پادشاہ ممالک دین بود
شاہباز رواق علیین
نامدار جہاں بدیع الدین
یمنی ست شامی و حلبی
پیشوائی رہ خدا طلبی
آن شہنشہ کہ مطلع نور ست
از مریدان شاه طیفور است
لیک ویسی ست آن ستودہ سپر
یافت عرفان ز روح پیغمبر
तर्जुमा: यह क़ुत्बुल मदार-ए-आलम हैं, दीन-ओ-दुनिया के बादशाह हैं, सबसे बुलंद आसमान के शाहीन हैं, यानी आली-नसब हैं। इस्म-ए-गिरामी बदीउद्दीन है। यमनी, शामी और हलबी हैं। ख़ुदा-तलबी की राहों के पेशवा हैं। यह शहंशाह जो नूर की आमाजगाह है, हज़रत शाह तैयफ़ूर के मुरीदों में से हैं। ताहम यह ज़ात-ए-सितूदा सिफ़ात ओवैसी भी है कि आपने रूह-ए-पैग़म्बर ﷺ से फ़ैज़ पाया है।
[मुख़बिरुल वासिलीन, सफ़्हा: 63, मत्बा मुस्तफ़ाई, लाहौर]
इस तफ़सील के बाद वाज़ेह हो कि पाँचों पीर की मुलाक़ात हज़रत क़ुत्बुल मदार से 620 हिजरी से क़ब्ल हुई। चुनाँचे इस वाक़िए के चंद सतरों बाद मरक़ूम है:
620 हिजरी में जब हज़रत सय्यद असलम ग़ाज़ी को मालूम हुआ कि बहराइच शरीफ़ में कुफ़्फ़ार आमादा-ए-जंग हैं, फ़ौरन उनकी सरकूबी के लिए दरिया के पार पहुँचकर लड़ाई शुरू हुई और बहुत ही सख़्त मआरका हुआ।
[गुलिस्तान-ए-मसऊदिया, सफ़्हा 17, नाशिर अल-जामिअतुल ग़ाज़िया, आज़मगढ़]
अलावा अज़ीं हज़रत शाह तैयफ़ूर से मुराद हज़रत बायज़ीद बस्तामी तैयफ़ूर शामी हैं और उनका सन-ए-विसाल 261 हिजरी है, जैसा कि साबिक़ में तफ़सील से गुज़र चुका।
लिहाज़ा यह अम्र मुश्किल नहीं, बल्कि ग़ैर-मुमकिन है कि 716 हिजरी में पैदा होने वाला बुज़ुर्ग हज़रत बायज़ीद बस्तामी, हज़रत हुज़ैफ़ा शामी और क़ुत्बुद्दीन बख़्तियार काकी रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम से भी ज़ाहिरी तौर पर मुलाक़ात कर चुका हो। और यह साबित हुआ कि मिरआत-ए-मदारी और मुख़बिरुल वासिलीन का तअय्युन-कर्दा सन-ए-विलादत ग़लत और ग़ैर-तहक़ीक़ी है।
किसी ने आपका सन-ए-विलादत माह-ए-आलमताब समझकर तारीख़-ए-विलादत 590 हिजरी लिख डाली, तो किसी ने शाह-ए-कौनैन को आपका सन-ए-विलादत समझा और सन-ए-विलादत 442 हिजरी लिख दिया, जबकि कोई माह-ए-कौनैन समझकर आपका सन-ए-विलादत 177 हिजरी मानने पर आमादा हुआ। हालाँकि राजेह यही है कि ये सब हज़रत क़ुत्बुल मदार के अलक़ाब महज़ हैं। इनसे सन-ए-विलादत अख़्ज़ करना ऐसा ही है, जैसा कि आं हज़रत के दूसरे अलक़ाब से साल-ए-विलादत निकालना।
यह मज़मून मुफ़्ती मुहम्मद हाशिम अली मिस्बाही की किताब “तज़्किरा मशाइख़ मदारिया” जिल्द अव्वल के बाब अव्वल से सफ़्हा 171 पर हुज़ूर मदार पाक के “सन-ए-विलादत पर तहक़ीक़ी तब्सिरा” से पेश किया गया है।












