सैयदना काजी क़िदवतुद्दीन अली हलबी रज़ियल्लाहु तआला अन्ह की विलादत 17 रजब 219 हिजरी को मदीना मुनव्वरा में हुई। आप खानदाने फातिमी के चश्मो चिराग, वली-ए-कामिल और अजीम बुजुर्गी के मालिक थे। जुहद-ओ-तकवा, परहेजगारी, नेकी और शराफत, अदल-ओ-इंसाफ में यकता-ए-जमाना थे।
आपके वालिद का नाम हजरत सैयद बहाउद्दीन रज़ियल्लाहु अन्ह है, और आपका शजरा-ए-नसब हजरत सैयदना इमाम अली अलैहिस्सलाम से कुछ इस तरह मिलता है:
सय्यद काज़ी किदवतुद्दीन अली रज़ियल्लाहु अन्ह
बिन सैयद बहाउद्दीन रज़ियल्लाहु अन्ह
बिन सैयद ज़हीरुद्दीन अहमद रज़ियल्लाहु अन्ह
बिन सैयद इस्माईल सानी रज़ियल्लाहु अन्ह
बिन सैयद मुहम्मद मक्तूम रज़ियल्लाहु अन्ह
बिन सैयद इस्माईल रज़ियल्लाहु अन्ह
बिन इमाम जाफर सादिक़ रज़ियल्लाहु अन्ह
बिन सैयद इमाम मुहम्मद अल-बाक़िर अलैहिस्सलाम
बिन सैयदे सज्जाद इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम
बिन सैयदुश्शुहदा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम
बिन मौला-ए-काइनात मौला अली मुरतज़ा अलैहिस्सलाम
अल्लाह तबारक व ताला ने आपके हिस्से में आलमे विलायत की वो हस्तियां रखीं कि जिनके दम कदम से पूरे आलम को करीना-ए-जिंदगी अता हुई। यानी सैयद मकसूददीन अल मारूफ शाह बदरुद्दीन व सैयद मतलूबुद्दीन अल मारूफ काजी हमीदुद्दीन व सैयद निजामुद्दीन अल मारूफ ख्वाजा बक्ताश वली और हजरत सैयद बदीउद्दीन अल मारूफ अहमद शाह जिंदान सौफ रज़ियल्लाहु ताला अन्ह, मजकूरा यह चारों बुलंद पाए के बुजुर्ग और आलमी दाइयान-ए-इस्लाम आपके ही दिल के टुकड़े यानी आपके शहजादे हैं। जब हजरत सैयद बदीउद्दीन ज़िन्दा शाह मदार की विलादत हुई थी तो अल्लाह के नबी हजरत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने काज़ी किदवतुद्दीन अली हलवी को मदारे पाक की विलादत की मुबारकबाद दी थी।
हज़रत काजी क़िदवतुद्दीन अली हलबी रज़ियल्लाहु ताला अन्ह खुदा दाद ज़हन रखते थे और सिर्फ 13 बरस की उम्र में तमाम उलूम-ए-ज़ाहिरी व बातिनी में दस्तरस हासिल कर लिए थे। और अपने वक्त में काजी-ए-हलब कहलाते थे और आपकी ज़ौजा मोहतरमा हज़रत सय्यदतिना हाजरा तबरेज़िया रज़िअल्लाहु ताला अन्हुमा हैं। आपका शजरा ए नसब सिर्फ दसवीं पुश्त पर हज़ूर मुहम्मदुर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम से मिल जाता है।
क़ाज़ी साहब ने जिस ज़माने में विलादत पाई, जिंदगी को गुजारा, वफात पाई, वो ज़माना फितनों और जुल्मों-तशद्दुद से खाली नहीं था। जहां एक तरफ दुश्मनाने इस्लाम व मुसलमानों को मिटाने की साजिशें रच रहे थे, वहीं सल्तनत-ए-अब्बासिया के खलीफा खल्क-ए-कुरान के मसले में पड़कर मुसलमानों पर बेवजह जुल्म-ओ-सितम ढाकर सूलीयां चढ़ा रहे थे।
एक घड़ी हम यह तो कह सकते हैं कि खलीफा वासिफ़ बिल्लाह के दौर-ए-इक़्तेदार में, यानी 227 हिजरी से 232 हिजरी तक मुसलमानों को राहत और चैन कुछ नसीब हुआ और इसी के दौर में क़ाज़ी क़िदवतुद्दीन अली हलबी के इल्म का शोहरा सुनकर बहुत कोशिश के बाद आपको दरबार में बुलाया गया और क़ाज़ी-ए-हलब बनाया गया। लेकिन खलीफा वासिफ़ बिल्लाह के बाद जब उसका भाई मुतवक्किल अलल्लाह तख्ते खिलाफत पर बैठा और जो उसने जुल्म-व-सितम ढाया, जैसे: हुसैन पाक के मजार को गिराने और उस पर खेती करने का हुक्म देना और अलवियों का सख्त दुश्मन हो जाना, अलावा इसके बहुत जुल्म सितम उसने किए। अल गरज जब उसकी दुश्मनी का रुख हलब की तरफ हुआ तो काजी किगवतुद्दीन अली को अपना शहर छोड़ना पड़ा और आपने क़रिया चुनार में जाकर एक यहूदी अबू इसहाक के घर में पनाह ली।
काज़ी क़िदवतुद्दीन अली हलबी रज़ियल्लाहु तआला अन्ह जिस क़दर जुल्म व सितम से निढाल हुए, वहीं अपनी जिंदगी में भी आप रंजो गम और सदमों से बाहर नहीं आ सके, आपने अपनी जिंदगी में ही अपने चार बेटों में से एक को छोड़कर तीनों को वफ़ात पाते देखा। यानी सिर्फ 33 साल की उम्र में आपके बेटे सैयद निजामुद्दीन ने वफ़ात पाई (आप ख्वाजा बक्ताश वली के नाम से मशहूर हैं और आपका मजारे मुबारक कुस्तुनतुनिया में है) और इसी तरह सिर्फ 50 साल की उम्र में आपने अपने बेटे सैयद मतलूबुद्दीन को (जिनका मजार मुबारक मुल्के शाम में है इन को) भी वफात पाते देखा और इसी तरह 311 हिजरी में आपने अपने बेटे सैयद मकसूदउद्दीन को (जिनका मजार हिसार में है, इन सबको) अपनी ही जिंदगी में वफात पाते देखा।
इससे पता चलता है कि आपके दिल ने किस कदर दुख व आलाम व बेटों की जुदाई से आपको तड़पाया है कि काजी क़िदवतुद्दीन अली हलबी रज़ियल्लाहु ताला अन्ह के तीन साहबजादे ऐसे थे जिनको खुद काजी साहब जी भर के ना देख सके। लेकिन उन्हीं में आपका एक शहजादा ऐसा था कि जिसने अपनी जिंदगी में अपनी कई पुश्ते देख डालीं। यानी अल्लाह तबारक व तआला ने काजी क़िदवतुद्दीन अली हलबी के चौथे साहबजादे हजरत सैयद बदीउद्दीन जिंदा शाह मदार मदारे पाक को 596 साल की उम्र अता कर दी।
हज़रत सय्यदना क़ाज़ी क़िदवतुद्दीन अली हलबी रज़ियल्लाहु ताला अन्ह की वफात भी एक सदमे से हुई जिसका खुलासा यह है कि 318 हिजरी में करामिता का सरदार अबू ताहिर करमती फौज लेकर मक्का मुकर्रमा गया। यह हज का जमाना था, इसने वहां पहुंचते ही हाजियों को कत्ल करना शुरू कर दिया। सबका माल-व-असबाब लूट लिया, खाना-ए-काबा के अंदर भी लोगों को कत्ल करने से बाज़ ना रहा और मक्तूलों की लाशों को ज़म ज़म के कुएं में डलवा दिया और हजर-ए-असवद को गुर्ज मार कर काबा की दीवार से अलग कर दिया और 11 रोज तक हजर-ए-असवद यूं ही पड़ा रहा।
अबू ताहिर ने 11 रोज़ तक मक्का के बाशिंदों को खूब लूटा और हजर-ए-असवद को ऊँट पर लाद कर अपनी दारुलसल्तनत बहरीन की जानिब ले कर चला। ख़ुदा की कुदरत देखिए कि मक्का से बहरीन तक जिस जिस ऊँट पर हजर-ए-असवद को रखा जाता वह हलाक हो जाता। इस तरह पूरे रास्ते में 40 ऊँट हलाक हुए लेकिन इन वाक़ियात से भी अबू ताहिर को इबरत हासिल नहीं हुई। और 20 साल तक हजर-ए-असवद करामता के कब्जे में रहा। (यह तहकीक मौलाना अकबर शाह खान नजीब आबादी की है।)
इस भयानक और पुर खतर हादसे की खबर जब काजी किदवतउद्दीन अली हलबी को हुई, तो रो-रो कर आप गम से निढाल होकर सदमे में आ गए और इसी गम व बेचैनी में दिल का दौरा पड़ने से आपकी वफात हो गई। आपकी वफात के बाद सरकार-ए-मदार ने अपने भतीजों के साथ हज्रे असवद को पाने की बहुत कोशिश की, मगर नतीजा सिफर रहा। लेकिन आप अपने भतीजों व मुहिब्बों के साथ हजर-ए-असवद को वापस लाने की जद्दोजिहद करते रहे। और एक दिन वह आया कि सरकारे मदार और आपके अज़ीज़ों को अल्लाह तबारक व तआला ने पुरमसर्रत दिन दिखाया कि 336 हिजरी के करीब और तारीख इस्लाम के हवाले से 339 हिजरी में करामतह के सरदार अबू ताहिर से एक मुआहिदा हुआ जिसमें यह तय पाया गया कि जो शख्स अब्दुल्ला बिन मैमून जो अंधा हो गया था, उसकी आंखें ठीक कर दे, हज्र-ए-असवद उसको दे दिया जाएगा। सरकारे मदार ने हज्र-ए-असवद को गुस्ल देकर उसका पानी उसकी आंखों पर मलवा दिया और अब्दुल्ला की बीनाई वापस आ गई।
साहिबे जदीद मदारे आजम ने तारीखे तेहरान के हवाले से लिखा है कि हजरे अस्वद का चोरी होने के बाद बेशतर हिस्सा टूट गया था। और सरकारे मदार और आपके साथियों ने हज्र-ए-असवद को खाना-ए-काबा में उसको दोबारा उसी मकाम पर नसब करवाया जहां नबी ने अपने हाथ से रखा था।










