इस पूरी कायनात में हर चीज़ की बक़ा का कोई न कोई निज़ाम मुक़र्रर है, इसी तरह इंसान की बक़ा के लिए भी निज़ाम और कोई आईन लाज़िमी और ज़रूरी है। इस की दो ही सूरतें हो सकती हैं।
एक यह कि इंसान अपनी इनफिरादी और इज्तिमाई हयात व बक़ा के लिए कोई क़ानून व आईन ख़ुद ही मुरत्तिब करे और दूसरी सूरत यह है कि कोई ग़ैर-इंसानी ताक़त व हस्ती इंसान की ज़रूरत को पूरा करे।
इंसानी अक़्ल-ओ-शऊर और तारीख़-ओ-तजुर्बात इस बात के शाहिद हैं कि इंसान का ख़ुद-साख़्ता कोई भी निज़ाम मुरत्तिब नहीं हो सका, जिस में तमाम अफ़राद-ओ-तबक़ात का यकसाँ और आदिलाना निज़ाम रख्खा गया हो और इफ़रात-ओ-तफ़रीत से पाक हो और हर दौर में और हर इलाक़े में या हर क़ौम और हर गिरोह में लायक़-ए-अमल और क़ाबिल-ए-क़बूल हो। इस लिए किसी भी दौर के और किसी भी इलाक़े के तमाम अहल-ए-अक़्ल-ओ-शऊर यकजा हो कर भी इंसान की इज्तिमाई और इनफ़िरादी ज़िंदगी के लिए और ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ शो’बों के लिए कोई आईनी निज़ाम मुरत्तिब भी करें तब भी ज़ाहिर है कि वो अपनी मालूमात-ओ-तजुर्बात के पेश-ए-नज़र ही ऐसा कर सकते हैं और यह भी यक़ीनी अम्र है कि इन मालूमात-ओ-तजुर्बात का ताल्लुक़ सिर्फ़ अहद-ए-माज़ी और ज़माना-ए-हाल से ही हो सकता है। मुस्तक़बिल में पेश आने वाली ज़रूरियात और अहवाल-ओ-वक़ाए से बे-ख़बर होंगे और उन का लिहाज़ रखना किसी भी इंसान के ख़ुद-साख़्ता निज़ाम-ए-हयात में मुमकिन नहीं होगा। इलावा अज़ीं हर क़ौम और हर गिरोह के बल्कि हर फ़र्द और हर शख़्स के जज़्बात-ओ-ख़यालात यकसाँ और मो’तदिल नहीं होते, लिहाज़ा निज़ाम-ए-हयात की तर्तीब में यक़ीनन उन लोगों के जज़्बात-ओ-एहसासात और अफ़्कार-ओ-ख़यालात का असर-अंदाज़ होना लाज़िमी अम्र है।
तारीख़ इस बात की गवाह है कि जब भी किसी तबक़े और किसी गिरोह ने कोई निज़ाम-ए-हयात मुरत्तिब किया है तो उस ने अपने मख़्सूस ज़ेहनी रुजहानात को मरकज़ी हैसियत दी है और अपने मुरत्तिब किए हुए निज़ाम-ओ-आईन को अपने ही एहसासात का मज़हर बनाया है।
अहद-ए-माज़ी को छोड़ देने के बाद ज़माना-ए-हाल में मुख़्तलिफ़ अक़वाम और मुख़्तलिफ़ गिरोह ने जितने भी आईन-ए-हुकूमत और क़वानीन-ए-ज़िंदगी तर्तीब दे रख्खे हैं, इन में से कोई आईन भी और कोई क़ानून भी ऐसा नहीं है जिस को आदिलाना और ग़ैर-जानिबदाराना क़रार दिया जा सके ख़्वाह उस का ताल्लुक़, ज़िंदगी के किसी एक या चंद शो’बों से ही क्यों न हो।
यह तारीख़ी और वाक़ियाती शहादत इस फ़ैसले को नाक़ाबिल-ए-तर्दीद और नाक़ाबिल-ए-इनकार बना देती है कि इंसान का अपना बनाया हुआ कोई भी निज़ाम मुकम्मल, जामे’ और मुन्सिफ़ाना-ओ-आदिलाना नहीं हो सकता और इंसान की इस लाज़िमी ज़रूरत की तकमील कोई ऐसी ही ताक़त और हस्ती ही कर सकती है, जिस का इल्म ज़माना-ए-माज़ी-ओ-हाल और मुस्तक़बिल की क़यूद और अहातों से बालातर हो और तमाम इंसानों की ज़रूरियात और तमाम अदवार के हालात-ओ-वाक़िआत पर उस का अम्ल मुहीत हो।
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की औलाद में जो हज़रात पैग़म्बर बनाए गए वो उन्हीं सुहुफ़ों और शरीयत-ए-इब्राहीम के मुबल्लिग़ बना कर मुख़्तलिफ़ क़ौमों की तरफ़ भेजे गए। यहाँ तक कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का दौर आया और बनी-इसराईल की तरफ़ उन को रसूल और पैग़म्बर बना कर भेजा गया और एक लिख्खी-लिखाई किताब तौरैत शरीफ़ उन को अता की गई।
फिर इसी नस्ल में और अंबियाए-किराम आते रहे जो तौरैत ही के मुबल्लिग़ थे। इस के बाद हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को बनी-इसराईल की तरफ़ मब’ऊस किया गया और अल्लाह ने अपनी तरफ़ से उन को एक किताब इंजील-ए-मुक़द्दस अता की और सब से आख़िर में नबी-ए-आख़िर-उज़-ज़माँ ख़ातम-उन-नबिय्यीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सिलसिला-ए-अंबिया-ओ-रुसुल का सर-ख़ैल और तमाम साबिक़ा बुनियादी तालीमात-ए-ख़ुदावंदी और हिदायत-ए-इलाही का जामे’ बना कर मब’ऊस फ़रमाया और आप को ऐसी ही जामे’ किताब मुक़द्दस किताब क़ुरआन-ए-करीम अता फ़रमाई।
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ही सिर्फ़ वो पैग़म्बर हैं जो तमाम इंसानों के लिए अल्लाह के रसूल बना कर भेजे गए। इस तरह क़ुरआन-ए-करीम जो अल्लाह की आख़िरी किताब है तमाम इंसानों और तमाम अदवार के लिए एक अमली और जामे’ किताब-ए-इलाही है जो इंसानों के हर गिरोह, हर क़ौम और हर तबक़े के लिए आदिलाना निज़ाम-ए-हयात पेश करती है।
यूँ तो आसमानी किताबों के नुज़ूल के लिए किसी ख़ास ज़माना की और ख़ास महीने की ब-ज़ाहिर कोई क़ैद नहीं है जज़्बात-ओ-एहसासात से पाक और बालातर हो।
इन्ही वजूहात की बिना पर ख़ालिक़-ए-कायनात ने इंसान की इस बुनियादी ज़रूरत की तकमील ख़ुद अपने ज़िम्मे ली और नस्ल-ए-इंसान के आग़ाज़ ही से उस को अपनी तरफ़ से तक़ाज़ा-ए-अहवाल के मुताबिक़ कोई न कोई निज़ाम-ए-हयात अता फ़रमाया। हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से इस सिलसिला की इब्तिदा हुई और तारीख़ी तौर पर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर इस का इख़तिताम हुआ।
नुज़ूल-ए-सहाइफ़ की तारीख़
सब से पहले हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को आसमानी और ख़ुदावंदी हिदायात दी गईं। इस के बाद आने वाले मुख़्तलिफ़ और बहुत से रसूलों और पैग़म्बरों को मिन जानिबिल्लाह सहाइफ़ अता किए जाते रहे यहाँ तक कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को मा-बाद के अदवार के लिए एक मरकज़ी रसूल बनाया गया और उन को भी सहाइफ़ अता किए गए जो साबिक़ा सहाइफ़ से ज़्यादा जामे’ और मुकम्मल थे।
ताहम माह-ए-रमज़ान-उल-मुबारक को आसमानी किताबों के नुज़ूल से ख़ास निस्बत हासिल है और मशहूर आसमानी किताबें और सहाइफ़ इसी महीने में अता किए गए। चुनाँचे अल्लामा मुहम्मद बिन जरीर तबरी ने अपनी तफ़सीर में हज़रत क़तादा रहमतुल्लाहि अलैहि से एक रिवायत नक़्ल की है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर रमज़ान-उल-मुबारक की पहली रात में सहाइफ़ नाज़िल किए गए।
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर रमज़ान की 6 तारीख़ को तौरैत नाज़िल हुई और कोह-ए-तूर पर उन को अता की गई।
हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम पर 12 रमज़ान-उश-शरीफ़ को ज़बूर नाज़िल हुई, 18 रमज़ान-उल-मुबारक को इंजील और रमज़ान-उल-मुबारक में 24 वीं रात को क़ुरआन नाज़िल किया गया।
ख़ुद क़ुरआन-ए-करीम में जो बात फ़रमाई गई है वो यह कि क़ुरआन-ए-करीम रमज़ान-उश-शरीफ़ में शब-ए-क़द्र में नाज़िल किया गया मगर इस के नुज़ूल से मुराद बाज़ रिवायात के पेश-ए-नज़र वो नुज़ूल है जो लौह-ए-महफ़ूज़ से आसमानी दुनिया पर नाज़िल किया गया था। वरना क़ुरआन-ए-करीम का नुज़ूल यकबारगी नहीं हुआ है। ब-ख़िलाफ़ साबिक़ा आसमानी किताबों और सहाइफ़ के उन का नुज़ूल मज्मूई तौर पर यकबारगी हुआ है।
क़ुरआन-ए-हकीम के नुज़ूल में हक़ तआला ने यह तर्ज़ इख़तियार फ़रमाया कि थोड़ा थोड़ा हस्ब-ए-ज़रूरत, हस्ब-ए-हालात और हस्ब-ए-मवाक़ि नाज़िल किया गया। ब-ज़ाहिर इस में एक हिकमत यह मालूम होती है कि क़ुरआन-ए-करीम चूँकि अल्लाह की आख़िरी किताब है जिस के तहफ़्फ़ुज़ और जिस की तशरीह-ओ-बयान, जिस के मुतालिबा की ज़रूरी वज़ाहत हक़ तआला ने अपनी ज़िम्मेदारियों को भी बयान फ़रमाया, नीज़ यह कि हस्ब-ए-मौक़ा हिदायात-ए-ख़ुदावंदी और आयात-ए-इलाही ज़हन-नशीं भी ज़्यादा होती थीं। फिर जिस तरह कुतुब-ए-इलाहिया और सुहुफ़-ए-समाविया का अता किया जाना रसूलों की ख़ुसूसियत है, इसी तरह तशरीह-ए-वही-ए-ख़ुदावंदी की आमद भी ख़ुसूसियात-ए-अंबिया में से है।
साबिक़ा कुतुब और सहाइफ़ की हैसियत चूँकि वक़्ती, इलाक़ाई या मख़्सूस नस्लों के लिए हिदायात ही की थी, इस लिए उन के तहफ़्फ़ुज़ का एहतिमाम मिन जानिबिल्लाह नहीं किया गया। लेकिन चूँकि क़ुरआन-ए-हकीम साबिक़ा सहाइफ़ की तरह महदूद ख़ुदावंदी हिदायत-नामा नहीं है बल्कि पूरी नौ-ए-इंसानी और तमाम अदवार के लिए रहनुमा किताब-ए-इलाही है, इस लिए इस के नुज़ूल में भी ऐसा तरीक़ा इख़तियार किया गया जो अमली तौर पर सहल भी हो और वाक़िआत की तस्वीर के साथ ज़हन-नशीं भी ख़ूब अच्छी तरह हो सके। नीज़ साबिक़ा कुतुब-ए-इलाहिया, सुहुफ़-ए-समाविया और क़ुरआन-ए-करीम के नुज़ूल में एक फ़र्क़ यह भी रहा कि साबिक़ा किताबें लिखी हुई मज्मूई तौर पर एक दफ़ा में मुताल्लिक़ा पैग़म्बरों को अता कर दी गईं और क़ुरआन-ए-करीम को पूरा का पूरा वही के ज़रिए नाज़िल किया गया जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास अल्लाह तआला की तरफ़ से हज़रत जिब्रील अमीन अलैहिस्सलाम ले कर आए थे।
लिहाज़ा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर जो अल्लाह की तरफ़ से वही आईं वो दो तरह की थीं। एक वो जो नुज़ूल-ए-क़ुरआन से मुताल्लिक़ थीं और जिन के ज़रिए क़ुरआन-ए-हकीम नाज़िल किया जाता था और दूसरी वही जो मौक़ा-ब-मौक़ा और हस्ब-ए-ज़रूरत पेश आने वाले वाक़िआत से मुताल्लिक़ थीं।
पस क़ुरआन-ए-करीम अल्लाह तआला का एक जामे’ हिदायत-नामा और इंसान के लिए एक मुकम्मल ज़ाबिता-ए-हयात है जो इंसान की हर मौक़ा पर और हर दौर में और हर नस्ल की रहनुमाई करता है और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़ुरआन-ए-हकीम का एक अमली पैकर थे और आप की पूरी ज़िंदगी, आप का हर क़ौल और हर अमल वही-ए-इलाही की रहनुमाई में क़ुरआन-ए-करीम की तशरीह-ओ-तफ़सीर थी, गोया इस्तिलाही तौर पर वही की दो क़िस्में हैं:
एक वही-ए-मुत्लू (तिलावत की जाने वाली वही)
दूसरी वही-ए-ग़ैर-मुत्लू (न तिलावत करने वाली वही)
वही-ए-ग़ैर-मुत्लू के ज़रिए वही-ए-मुत्लू की तशरीह-ओ-तफ़सीर की गई है जिस को हदीस कहा जाता है।
माख़ूज़ : रिसाला रहबर-ए-नूर 2022
तहरीर : मौलाना एहतिशाम-उल-हक़










