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मौला की आज आखरी रात

On: मार्च 11, 2026 1:14 पूर्वाह्न
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मौला की आज आखरी रात

मदीना तैयबा की पुर कैफ फ़ज़ाओं से मुस्तफ़ीज़ दरे अक़दस पर नवीद-ए-सुब्ह और नसीम-ए-सहर के ठंडे झोंके चलने ही वाले थे कि हस्बे आदत आज भी उस मोअज़्ज़िन-ए-रसूल ﷺ ने नमाज़-ए-सुब्ह के लिये लोगों को जगाने के लिये रहमत कदा और महीत-ए-अनवार-ए-इलाहिया से क़दम-ए-नाज़नीन बाहर निकाले ही थे कि वालिहाना मुहब्बत में बतखों का एक ग़ोल आगे आया और जान-ए-जानाँ के आगे पीछे (हल्क़ा में लेकर) अपने अपने पंख फैलाकर कूँ कूँ की आवाज़ों से रोकना चाहा और नौहा शुरू कर दिया। लोगों ने बतखों को हटाना चाहा
पर उस दाना व बीना मौला ने फ़रमाया कि इन्हें मत रोको, इन्हें आज नौहा करने दो।

हस्बे आदते शरीफ़ा नमाज़-ए-फ़ज्र के लिये सब को उठाते, बेदार करते हुए जब वहाँ पर पहुँचे जहाँ पर बजाय इसके कि ग़ैज़ व ग़ज़ब की तलवार अपने क़ातिल को देखकर बेनियाम हो जाती, वहाँ तहम्मुल और ज़ब्ते खुद ज़ब्त व तहम्मुल की ख़ैरात माँग रहे थे। तमाम मुसलमानों को जगाने के बाद अपने क़ातिल को भी जगाया — “अस्सलातु अस्सलातु” “उठो नमाज़ का वक़्त हो रहा है।”
हज़ारों रहमतें हों उस अमीर-ए-काइनात पर जिसने नमाज़ के लिये अपने क़ातिल को भी जगा दिया, जबकि मौला के अलावा किसी को नहीं पता था कि जिसको नमाज़ के लिये जगाया जा रहा है आज यही एक महीने से ज़हर में बुझी हुई तलवार से हमला कर देगा, हालाँकि मौला अली अपने क़ातिल को जानते थे।

शवाहिद-उन-नुबूवत में अल्लामा जामी अलैहिर्रहमा ने तहरीर किया है, मुलख़्सन पेश कर रहा हूँ।
एक मर्तबा इब्ने मुलजिम मलऊन कूफ़ा की मस्जिद में टहल रहा था। जैसे ही अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम लईन पर मौला-ए-काइनात अलैहिस्सलाम की नज़र पड़ी, आप अमीर अलैहिस्सलाम ने खुद को मुख़ातिब करके फ़िलबदीह फ़रमाया:

अशद्दु वहीयाज़ दय्यमीक लिल मौत लदक़ीक वला तज्रअ इलल मौत इज़ा अज्ल बवादीक

सबसे ज़्यादा बुरी ख़बर मौत की है जो तुझे मिलने वाली है। जब यह तुझ पर रोशन हो जाये तो उसकी तरफ़ जरअह-नौश न हो।

बादहू आप ने उसे तलब फ़रमाकर उससे फ़रमाया:
ऐ इब्ने मुलजिम! ज़माना-ए-जाहिलियत में या ज़माना-ए-सबा में तेरे दिल में कौन सा ख़याल आया था? उसने कहा मुझे तो उसके बारे में कुछ इल्म नहीं।
मौला-ए-काइनात ने फ़रमाया: ऐ बदबख़्त! सालेह अलैहिस्सलाम की ऊँटनी की कूँचें काटने वाले, क्या तेरी कोई यहूदी दायी थी?
उसने कहा: हाँ। इस पर हज़रत अली ख़ामोश हो गये।

मुहतरम क़ारिईन!
आपने देख लिया मेरे मौला की पहली नज़र ने क़ातिल को पहचान लिया। न केवल आपने क़ातिल को पहचान लिया बल्कि शहादत का वक़्त भी बज़रिया-ए-ख़्वाब पहचान लिया।
एक मर्तबा मौला अली ने सरकार-ए-रिसालत मुआब ﷺ को ख़्वाब में देखा, अर्ज़ किया: या रसूलल्लाह! आपके उम्मतियों ने सारी मुश्किलें मेरे लिये खड़ी कर दी हैं, बहुत सताया है।
आपने फ़रमाया कि दुआ करो कि अल्लाह पाक अच्छे लोगों में बुला ले। चुनाँचे आपने दुआ की, क़ुबूल हुई। आप उसे जगा के मस्जिद की तरफ़ बढ़ गये और वह वक़्त क़रीब आ रहा था जिसकी पेशनगोई मेरे आका ने फ़रमाई थी।

एक मर्तबा मौला अली करमल्लाहु वजहहुल करीम की तबीयत सख़्त नासाज़ हुई। हुज़ूर ﷺ अयादत के लिये तशरीफ़ ले गये। अर्ज़ किया: हुज़ूर शायद मेरे विसाल का वक़्त क़रीब है।
आपने फ़रमाया: ऐ अली! अभी नहीं, जब तक तुम्हारी दाढ़ी ख़ून से लाल न हो जाये।
और जब आप पर क़ातिलाना हमला हुआ तो आपकी दाढ़ी मुबारक ख़ून से लाल हो गयी।

आपने फ़रमाया कि उसे (इब्ने मुलजिम) को पकड़ लो। जब उस लईन को पकड़ कर लाया गया तो आपने फ़रमाया:
इन्नहू असीर फ़अह्सिनू नुज़ुलहू व अक़रिमू मस्वाहू, फ़इन बक़ीतु क़तल्तु औ अफ़ौत, फ़इन मित्तु फ़क़तलूहू क़त्लती वला तअतदू इन्नल्लाह ला युहिब्बुल मुअतदीन

इस वक़्त इसकी हैसियत एक क़ैदी की है, लिहाज़ा तुम्हें हुक्म देता हूँ कि इसे खाना खिलाओ, इसके लिये रहाइश का इंतज़ाम करो। अगर मैं ज़िन्दा रहा तो मेरी मर्ज़ी — चाहूँ तो इसे क़त्ल कर दूँ या माफ़ कर दूँ।
अगर मेरा इंतिक़ाल हो जाये तो मेरे क़त्ल की तरह इसे क़त्ल कर देना और इस क़त्ल में आगे न बढ़ना, यानी नाक कान न काटना, कि अल्लाह तआला हद से बढ़ने वालों को पसंद नहीं करता।
उस वक़्त उस लईन ने कहा था कि अब अली नहीं बचेंगे, इसलिये कि जिस तलवार से मैंने उन पर हमला किया है उस तलवार को एक महीना ज़हर में बुझाया था।

मुअर्रिख़ीन ने तहरीर किया है कि
मौला-ए-काइनात हज़रत अली अलैहिस्सलाम 19वीं रमज़ान की शब अपनी बेटी हज़रत उम्मे कुल्सूम के यहाँ मेहमान थे और यह रात निहायत अजीब और आपके हालात ग़ैर-आदी थे। उनकी बेटी ऐसे हालात का मुशाहिदा करके निहायत हैरान और परेशान थीं।
आप इस क़दर परेशान थे कि कई बार बेदार होते थे और कई बार कमरे से बाहर आकर आसमान की तरफ़ देखकर फ़रमाते थे:

“ख़ुदा की क़सम! मैं झूठ नहीं कहता और न ही मुझे झूठ कहा गया है, यही वह रात है जिसमें मुझे शहादत का वादा दिया गया है।”

हज़रत अली अलैहिस्सलाम सन 40 हिजरी में मस्जिद कूफ़ा में क़ातिलाना हमले से शदीद ज़ख़्मी हुए। अब्दुर्रहमान बिन मुलजिम मुरादी ख़वारिज, जिसने मक्का मुकर्रमा में क़सम खा कर अहद किया था कि इमाम अली बिन अबी तालिब को क़त्ल कर डालेंगे।

अपने मंसूबे के मुताबिक अपनी जगह की तरफ़ रवाना हुआ और इस तरह अब्दुर्रहमान बिन मुलजिम मुरादी कूफ़ा आ गया और 20 शाबान सन 40 हिजरी को शहर कूफ़ा में दाख़िल हुआ।

वह शबीब बिन बजरा अशजई, जो कि उसके हमफ़िक्रों में से था, और दोनों को “क़ताब बिन्त अलक़मा” ने उकसाया और ललचाया था।
और इस तरह 19वीं रमज़ान सन 40 हिजरी की सहर को कूफ़ा की जामे मस्जिद में कमीन में बैठ कर अमीरुल मोमिनीन अली मुरतज़ा के आने का इंतज़ार कर रहा था।
दूसरी तरफ़ क़ताम ने “वर्दान बिन मिजालिद” नामी शख़्स के साथ उसके क़बीले के दो आदमी उसकी मदद के लिये रवाना किये थे।

अशअस बिन क़ैस किंदी जो कि इमाम अली अलैहिस्सलाम के नाराज़ सिपाहियों और अपने ज़माने का ज़बरदस्त चापलूस और मुनाफ़िक आदमी था, इसने इमाम अली अलैहिस्सलाम को क़त्ल करने की साज़िश में उनकी रहनुमाई की और उनका हौसला बढ़ाता रहा। बहर हाल नमाज़-ए-सुब्ह के लिये आनहज़रत कूफ़ा की जामे मस्जिद में दाख़िल हुए और सोए हुए अफ़राद को नमाज़ के लिये बेदार किया, मिन जुमला खुद अब्दुर्रहमान बिन मुलजिम मुरादी को जो कि पेट के बल सोया था को बेदार किया और उसे नमाज़ पढ़ने को कहा।

जब आप मेहराब में दाख़िल हुए और नमाज़ शुरू की, पहले सज्दे से अभी सर उठा ही रहे थे कि शब्स बिन बजरा ने शमशीर से हमला किया मगर वह मेहराब की ताक़ को जा लगी और उसके बाद अब्दुर्रहमान बिन मुलजिम मुरादी ने नारा दिया:
“लिल्लाहिल हुक्म या अली, ला लक व ला लि अस्हाबिक!”
और अपनी शमशीर से हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सर मुबारक पर हमला किया और आनहज़रत का सर सज्दे की जगह (माथे) तक शिगाफ़ हुआ। हज़रत अली अलैहिस्सलाम मेहराब में गिर पड़े।

सज्दे में शेर-ए-हक़ का दो पारा हुआ जो सर
एक बार काँपने लगे मस्जिद के बाम व दर
अबला लहू कि हो गई मेहराब ख़ूँ में तर
एक ज़लज़ला सा बस हुआ नाज़िल ज़मीन पर
गिर्दूँ पे जिबराईल पुकारे ग़ज़ब हुआ
सज्दे में क़त्ल आज अमीर-ए-अरब हुआ

اللهم العن قتلة امیر المؤمنین علی ابن ابی طالب علیہ السلام

दीवार काबा बैठ गई अर्श गिर पड़ा

इसी हालत में फ़रमाया:
बिस्मिल्लाहि व बिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह, फ़ुज़्तु व रब्बिल काबा
ख़ुदाए काबा की क़सम, मैं कामयाब हो गया।

कुछ नमाज़ गुज़ार शब्स और इब्ने मुलजिम को पकड़ने के लिये बाहर की तरफ़ दौड़ पड़े और कुछ हज़रत अली अलैहिस्सलाम की तरफ़ बढ़े और कुछ सर व सूरत पीटते मातम करने लगे।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम जिनके सर मुबारक से ख़ून जारी था फ़रमाया:
हाज़ा वअदनल्लाह व रसूलुह
यह वही वादा है जो ख़ुदा और उसके रसूल ने मेरे साथ किया था।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम चूँकि इस हालत में नमाज़ पढ़ाने की क़ुव्वत नहीं रखते थे इस लिये अपने फ़र्ज़ंद इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम से नमाज़-ए-जमाअत को जारी रखने को कहा और खुद बैठ कर नमाज़ अदा की।
जब अब्दुर्रहमान बिन मुलजिम लईन ने सर मुबारक पर शमशीर मारी ज़मीन लरज़ गई, दरिया की मौजें थम गईं, आसमान मुतज़लज़ल हुआ, कूफ़ा की मस्जिद के दरवाज़े आपस में टकराए, आसमानी फ़रिश्तों की सदाएँ बुलंद हुईं, काली घटाएँ इस तरह छा गईं कि ज़मीन तीरह व तार हो गई और जिब्रील अमीन ने सदा दी और हर किसी ने इस आवाज़ को सुना, वह कह रहे थे:

تهدمت والله أركان الهدى وانطمست أعلام التقى وانفصمت العروة الوثقى
قتل ابن عم المصطفى قتل الوصي المجتبى قتل علي المرتضى قتله أشقى الأشقياء

ख़ुदा की क़सम हिदायत के रुक्न को तोड़ा गया, इल्म-ए-नुबूवत के चमकते सितारे को ख़ामोश किया गया और परहेज़गारी की अलामत को मिटाया गया और उरवतुल वुस्का को काटा गया क्योंकि रसूल-ए-ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम के इब्ने-ए-अम्म को शहीद किया गया। सैय्यद-उल-अव्सिया अली मुर्तज़ा को शहीद किया गया, उसे शक़ी तरीन शक़ी (इब्ने मुलजिम) ने शहीद किया।

दीवार काबा बैठ गई अर्श गिर पड़ा

अली पेशवाओं के पेशवा, आदिल इमाम, हक़ तलब ख़लीफ़ा, यतीम नवाज़ हमदर्द हाकिम, कामिल तरीन इंसान, ख़ुदा के वली, मुहम्मद मुस्तफ़ा के वसी, जानशीन-ए-नबी को रुए ज़मीन पर सबसे शक़ी इंसान ने क़त्ल कर डाला और वह लिक़ा-ए-अल्लाह हो गए, पैग़म्बरों और रसूल-ए-ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम के साथ हमनशीन हो गए, उम्मत को अपने वजूद-ए-बाबरकत से महरूम कर गए।

आपको लोग उठा कर घर लाए। ज़र्बत-ए-मौला का यह वाक़िआ 19 रमज़ान बरोज़ जुमआ बवक़्त सुबह सादिक़ 40 हिजरी में पेश आया। दो दिन तक आप बिस्तर-ए-तकलीफ़ पर निहायत बेचैन रहे फिर शिद्दत-ए-ज़ख़्म की ताब न लाते हुए 21 रमज़ानुल मुबारक को शहादत का जाम नोश फ़रमाया।

आप शहीद क्या हुए पूरे शहर में सफ़-ए-मातम बिछ गई।
शहादत के बाद फ़ौरन तजहीज़ व तकफ़ीन की तैयारियाँ शुरू होने लगीं। आप अलैहिस्सलाम के साहबज़ादे इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिमस्सलाम, भतीजे अब्दुल्लाह बिन जाफ़र तय्यार रज़ियल्लाहु अन्हु ने ग़ुस्ल और कफ़न दिया।

अल्लामा अब्दुर्रहमान जामी अलैहिर्रहमा ने शवाहिदुन्नुबूवत में तहरीर फ़रमाया:
हज़रत अमीरुल मोमिनीन हुसैन अलैहिस्सलाम से रिवायत करते हैं कि जब हज़रत अमीर करमल्लाहु वजहहू ने वफ़ात पाई तो मैंने एक कहने वाले को कहते हुए सुना कि बाहर चले जाओ इस बंदा-ए-ख़ुदा को हमारे पास छोड़ दो। मैं घर से बाहर निकल आया। अंदर से आवाज़ आई: हुज़ूर ﷺ के तशरीफ़ ले जाने के बाद वसी-ए-रसूल भी शहीद हो गए जो दीन की निगहबानी करते थे, हुज़ूर की सीरत पर अमल पैरा होते थे और उनकी इत्बा करते थे।
जब यह आवाज़ आना बंद हुई तो हम अंदर आ गए। हमने देखा कि हज़रत अली की तग़सील हो चुकी है। चुनाँचे हमने आपकी नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की और दफ़्न कर दिया।

तजहीज़ व तकफ़ीन के बाद आपके बड़े साहबज़ादे व जानशीन हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम (ख़ातिम ख़िलाफ़त-ए-राशिदा) ने नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाई फिर वही निशस्तगाह-ए-मौला ही फ़ख़्र बाग़-ए-इरम बनी।

मुराद किस ने लहू से दीन को सींचा
यह बात हश्र में खोलेगी जानमाज़े अली

आज उसकी शहादत है जिसे इस्लाम में अव्वलियत हासिल है।
आज उसकी शहादत है जिसे आलम-ए-इस्लाम नूर-ए-रसूल, ज़ौज-ए-बतूल, वसी-ए-रसूल, गुलज़ार-ए-अख़लाक़ के नफ़ीस फूल, नबी का चैन, अबुल हसनैन, ग़ाज़ी-ए-बदर व हुनैन, दरिया-ए-मआरिफ़त के शनावर, विलायत के मसदर, फ़ातेह-ए-ख़ैबर, शाह सफ़दर, जानशीन-ए-पैम्बर, अबू तुराब व हैदर, नायब-ए-अहमद मुख़्तार, नूर-ए-उयून अख़ियार, शाह मर्दाँ, शेर-ए-यज़्दाँ, क़ुव्वत-ए-परवरदिगार, हैदर कर्रार, शुजाअत के शहसवार, इमाम-उल-अौलिया, वल-अत्क़िया, इमाम-उस्सक़लैन, काबा-ए-दारैन, क़ाइद-ए-गुर्र-उल-मुहज्जलिन, दीवान-ए-सख़ावत के सद्र-नशीन, सैय्यद-उल-मुत्तक़ीन, यअसूब-उद-दीन, अमीरुल मोमिनीन, इमामुल मुस्लिमीन, मौला-ए-काइनात, अबू तुराब, असदुल्लाह, शेर-ए-ख़ुदा, ताजदार हल अता, कासिर-ए-असनाम-ए-काबा, सैय्यदना अली अलमुर्तज़ा जैसे मुक़द्दस नाम व अलक़ाब से याद करती है।

अल्लाह तबारक व तआला लाखों लाख रहमतें नाज़िल फ़रमाए मरक़द-ए-मौला पर।

समझा ही नहीं कोई कि क्या शान अली है
बस सरवर-ए-कौनैन को इरफ़ान अली

ख़ाकपाए
मुर्तज़ा व हैदर
सैय्यद अज़बर अली मदारी

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