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क्या तरावीह की नमाज़ में क़ुरआन तेज़ पढ़ना ग़लत है?

On: मार्च 5, 2026 1:40 पूर्वाह्न
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हर साल किसी न किसी मौलाना की या किसी न किसी आम आदमी की एक दो चार पाँच वीडियो चलाई जाती हैं और उसमें किसी न किसी अंदाज़ से तरावीह की मुखालफ़त होती है। मक़सद यह होता है कि मुसलमान तरावीह से दूर हो जाएँ क्योंकि २० की ८ तो कुछ लोगों ने वैसी कर रखी। इस्लाम ने हमें २० रकअतें दी थीं, पैग़म्बर इस्लाम अलैहिस्सलाम ने २० रकअत तरावीह हमें अता फ़रमाई। कुछ लोगों ने घटाकर आठ कर दिया और कुछ अब बिलकुल ही ख़त्म कर देना चाहते हैं।

बात यह है कि इस्लाम को जितना ग़ैर मुसलमानों ने दबाया उससे कहीं ज़्यादा इन लोगों ने दबाने की कोशिश की है जो अपने आप को मुसलमान कहते हैं। ऊपर से मुसलमान हैं अंदर से बेईमान हैं। तो ऐसे लोगों से बड़ी परेशानी है।

पहले तो मैं आपको यह बताता हूँ। एक बात चलाई जाती है कि क़ुरआन करीम को तेज़ तेज़ नहीं पढ़ना चाहिए बल्कि बड़े आराम आराम से ठहर ठहर के पूरी तजवीद के साथ पढ़ना चाहिए जैसे लोग पढ़ते हैं ना नमाज़ में पढ़ते हैं:
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन

इस तरीक़े से ठहर ठहर के पढ़ो।

अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद में इरशाद फ़रमाया। अभी आपने वह आयत करीमा सूरह मुज़्जम्मिल शरीफ़ में सुनी, उसका हिस्सा:
औ ज़िद् अलैहि व रत्तिलिल क़ुरआना तरतीला

क़ुरआन करीम को तरतीब के साथ ठहर ठहर कर पढ़ना चाहिए!
क्यों? इसलिए कि क़ुरआन करीम जो हमारे और आपके दरमियान है, जो हमें अता फ़रमाया गया है, उसका एक मक़सद है। और मक़सद क्या है? कि हम यह क़ुरआन करीम पढ़ कर इससे दीन हासिल करें, इससे हिदायत हासिल करें। यह क़ुरआन करीम का मक़सद है। इसलिए क़ुरआन करीम को आराम आराम से पढ़ो, ठहर ठहर के पढ़ो, समझ के पढ़ो। यह अल्लाह तआला का फ़रमान है।

हमारे यहाँ मदरसों में ऐसा होता भी है। हमारे यहाँ जलसों में ऐसा होता भी है। हमारे यहाँ महफ़िलों में, मिलाद शरीफ़ की महफ़िलों में ऐसा होता भी है कि क़ुरआन करीम पढ़ा जाता है और उसको समझाया जाता है। कि एक आयत पढ़ी, उसका मक़सद यह है, उसका मतलब यह है, उसका शान-ए-नुज़ूल यह है, उसका तर्जुमा यह है, इससे यह मसाइल हमें समझ में आते हैं। यह सारी चीज़ें बताई जाती हैं।

लेकिन क़ुरआन करीम के पढ़ने का एक तरीक़ा तो यह है कि क़ुरआन करीम को इसलिए पढ़ा जाए कि इससे तालीम हासिल हो। और क़ुरआन करीम को पढ़ने का एक फ़ायदा यह है कि इससे बरकतें हासिल की जाएँ।

जैसे आप अपने बच्चे को जब मदरसे में भेजते हैं क़ुरआन करीम पढ़ाने के लिए, किस लिए? ताकि क़ुरआन करीम सीखे, उसकी तालीम हासिल करे।

लेकिन जब आपके घर में किसी का इंतिक़ाल होता है, आप क़ुरआन करीम पढ़ते हैं, मदरसे के बच्चों को बुला कर क़ुरआन करीम पढ़वाते हैं, मोहल्ले के लोग मिलकर क़ुरआन करीम पढ़ते हैं, घर में ख़वातीन क़ुरआन करीम पढ़ती हैं। अब क्या वह तालीम के लिए पढ़ती हैं? क्या वह क़ुरआन करीम सीखने के लिए पढ़ती हैं? नहीं! बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ बरकत हासिल करने के लिए पढ़ा जाता है, सवाब हासिल करने के लिए पढ़ा जाता है।

इस वक़्त मक़सद यह नहीं होता कि क़ुरआन करीम इसलिए पढ़ा जाए कि साहब इससे हम दीन सीखें। नहीं। इस पर बरकत हासिल करना होता है।

तो क़ुरआन करीम पढ़ने के दो अंदाज़ हैं और दो ज़ाविये हैं और दो नज़रिये हैं और दो फ़ायदे हैं। एक तालीम हासिल करना और दूसरा इससे बरकत हासिल करना।

जो मदरसे में और मजलिसों में क़ुरआन करीम पढ़ा जाता है वह इसलिए कि उससे तालीम हासिल की जाए। और जो तरावीह में क़ुरआन करीम पढ़ा जाता है वह इसलिए कि उससे बरकतें हासिल की जाएँ।

अब तेज़ पढ़ने में कोई परेशानी की बात नहीं है इसलिए कि आप सब लोग अरबी दाँ तो हैं नहीं। अगर आपको क़ुरआन करीम वैसे ही लंबी क़िराअत करके भी अगर सुनाया जाए आपको कुछ हासिल होगा इससे नहीं जब तक उसका तर्जुमा न सुनाया जाए, जब तक उसका मानी न बताया जाए।

तो तरावीह में जो क़ुरआन करीम पढ़ा जाता है या घर में वैसे ही ख़वातीन पढ़ती हैं या हम और आप वैसे ही क़ुरआन करीम की तिलावत करते हैं वह सिर्फ़ और सिर्फ़ क़ुरआन करीम की बरकतें हासिल करने के लिए पढ़ते हैं।

चुनांचे सय्यदना हुज़ूर ग़रीब नवाज़ मोइनुद्दीन अजमेरी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु तक़रीबन चौबीस साल आपने इशा के वुज़ू से फ़ज्र की नमाज़ अदा फ़रमाई और हर रात एक क़ुरआन करीम तिलावत फ़रमाया करते थे। हर रात एक क़ुरआन करीम मुकम्मल करते थे। कौन? सरकार ग़रीब नवाज़।

और आगे बढ़ जाओ।
सय्यदना ग़ौस-ए-आज़म पीर पीराँ मीर मीराँ शेख अब्दुल क़ादिर मुहियुद्दीन जिलानी बग़दादी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु तक़रीबन बत्तीस साल आपने इशा के वुज़ू से फ़ज्र की नमाज़ अदा फ़रमाई और हर रात एक क़ुरआन करीम मुकम्मल फ़रमाया।

और आगे बढ़ जाओ।
हम जिनके मस्लक पर चलते हैं, हम जिनके मस्लक को मानते हैं। कौन? सय्यदना इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा नुमान बिन साबित रज़ियल्लाहु तआला अन्हु। चालीस साल इशा के वुज़ू से फ़ज्र की नमाज़ अदा फ़रमाई और हर रात एक क़ुरआन करीम मुकम्मल फ़रमाया।

अब ज़रा मुझे कोई वह मौलवी बताए, वह कौन सी तजवीद से पढ़ते थे इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा? वह कौन सी क़िराअत में पढ़ते थे सरकार ग़रीब नवाज़ व सरकार ग़ौस-ए-आज़म? जो एक रात में क़ुरआन करीम मुकम्मल होता था।

अगर ऐसे पढ़ते हैं कि:

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन

तो पंद्रह रातों में भी पूरा न होगा।

ज़ाहिर सी बात है वह भी ऐसे पढ़ते होंगे:

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन (1) अर्रहमानिर्रहीम (2) मालिकि यौमिद्दीन (3) इय्याक नअबुदु व इय्याक नस्तईन (4) इहदिनस्सिरातल मुस्तक़ीम (5) सिरातल्लज़ीन अनअमता अलैहिम ग़ैरिल मग़दूबि अलैहिम व लद्दाल्लीन (7)

न मैंने सरकार ग़रीब नवाज़ को देखा पढ़ते हुए, न मैंने सरकार इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा को देखा पढ़ते हुए। मैंने नहीं देखा उन्हें पढ़ते हुए। मैंने अपने वालिद गरामी हुज़ूर मुजद्दिद मुराद आबादी इमाम सय्यद मोहम्मद इंतिसाब हुसैन क़ादिरी अशरफ़ी मदारी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को पढ़ते हुए देखा।

वह दिल्ली से ट्रेन में बैठते थे सूरत के लिए, बॉम्बे के लिए, हैदराबाद के लिए। अब रास्ता कितने घंटे का है? दस घंटे का है, बारह घंटे का है, चौदह घंटे का है। और रास्ते में कम से कम एक क़ुरआन करीम ज़रूर मुकम्मल फ़रमाया करते थे। सफ़र में एक क़ुरआन करीम मुकम्मल हो जाता था।

तो यह बुज़ुर्गों का तरीक़ा है कि उन्होंने क़ुरआन करीम को तालीम के लिए भी पढ़ा और पढ़वाया है और बरकतें हासिल करने के लिए ख़ुद भी पढ़ा है और पढ़वाया भी है।

लिहाज़ा यह कहना कि साहब क़ुरआन करीम को ठहर ठहर के पढ़ो, समझ समझ के पढ़ो। अच्छा यह बातें वह मौलवी करते हैं जो ख़ुद हाफ़िज़ नहीं हैं। एक तो ९९ फ़ीसद मौलवी हाफ़िज़ नहीं होते। और ख़ास तौर पर जो मुक़र्रिर होते हैं ना मौलवी स्टेज वाले, यह तो वाक़ई में हाफ़िज़ नहीं होते। और जो अगर घर में माँ-बाप ने मार पीट के अगर किसी को हाफ़िज़ बना भी दिया तो फिर याद नहीं रहता, पढ़ते नहीं।

अब इन्हें तो मालूम नहीं कि हाफ़िज़ का दर्द क्या होता है। इन्हें तो पता नहीं कि हाफ़िज़ की मेहनतें क्या होती हैं। यह तो बस रमज़ान के दो दिन पहले खड़े हुए और हाफ़िज़ों के ख़िलाफ़ फ़ालतू बातें करना शुरू करते हैं। हाफ़िज़ ऐसा पढ़ते हैं, हाफ़िज़ वैसा पढ़ते हैं, हाफ़िज़ नज़राना लेते हैं।

अच्छा यह मौलवी तो बिना नज़राने के तक़रीरें कर रहे हैं ना? जैसे अमाँ हिंदुस्तान में एक एक मुक़र्रिर एक एक तक़रीर के एक एक लाख रुपये ले रहा है। एक एक लाख! और कुछ नहीं गप्पे सुनाते हैं, गप्पे, झूठी रिवायतें सुनाते हैं। और एक तक़रीर के कितने? एक लाख! यह हालत हो गई है।

तो इन लोगों को यह तो पता नहीं है कि हाफ़िज़ों की क्या अहमियत है, हाफ़िज़ों की क्या परेशानियाँ हैं, हाफ़िज़ों के साथ कैसी दुश्वारियाँ हैं। इन्हें तो यह भी पता नहीं है। बस खड़े हो गए, टटन टटन शुरू हो गए हाफ़िज़ों के ख़िलाफ़।

बिलकुल नहीं। जहाँ छः दिन में क़ुरआन करीम होता है सही है, जहाँ दस दिन क़ुरआन करीम होता है सही है, जो तेज़ पढ़ते हैं कोई परेशानी की बात नहीं है। इसलिए कि उनका मतलब क़ुरआन करीम को आपको समझाना नहीं है, इससे आपको तालीम देना नहीं है बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ बरकतें और रहमतें हासिल करना है।

हाँ अगर इसका शौक़ है तो क़ुरआन करीम को तिलावत के साथ पढ़ा जाए और तिलावत के साथ पढ़ कर समझ समझ कर पढ़ा जाए। एक एक आयत का मतलब, मानी, मफ़हूम और उसका शान-ए-नुज़ूल सब कुछ समझा जाए।

तो ईद के बाद बैठो ना। रोज़ाना एक सफ़्हा पढ़ा करेंगे और रोज़ाना एक सफ़्हा आप सुना कीजिए।

लेकिन जहाँ तरावीह का मामला है तो यह बरकतें हासिल करने के लिए होती है।
लिहाज़ा ऐसे किसी बहकावे में आप न आएँ कि आप लोग ऐसे ऐसे पढ़ते हैं, तेज़ पढ़ते हैं, यूँ करते हैं। जिस पर बीतती है वही जानता है। तेज़ पढ़ना बड़ा मुश्किल काम है।

मैं आपको एक मिसाल दूँ। अगर आप चालीस और पचास की स्पीड पर गाड़ी चला रहे हैं तो क्या होता है? इधर भी देख लिया, हाँ भाई क्या हो रहा भाई, पीछे वाले से बातें कर लें, सब कुछ होता रहता है। बीच में मोबाइल भी निकाल लिया, सामने भी नज़र, मोबाइल भी चला लिया।

अगर चालीस पचास साठ की स्पीड पर कार चला रहे हो। और अगर एक सौ चालीस पर चल रही हो तो अब पूछोगे पीछे वाला ने क्या खा रहा? फिर तो यूँ रहता है आदमी, ज़रा सी नज़र न चूक जाए वरना तीजा पक्का।

अल्हम्दुलिल्लाह मैंने आज तक जहाँ जहाँ भी तरावीह देखी, मैं रमज़ान शरीफ़ में बहुत जगह घूमा हूँ। मुरादाबाद शरीफ़ तो क्या, महाराष्ट्र, गुजरात, हैदराबाद, दिल्ली। कहाँ कहाँ मैं घूमा रमज़ान शरीफ़ में। मैंने देखा पूरे हिंदुस्तान में जितने सुकून के साथ तरावीह तख़्त वाली मस्जिद में होती है कहीं नहीं होती।

आप बाहर नहीं जाते, आप शहर में देखो। शहर की किसी मस्जिद में चले जाएँ। पचास परसेंट, पच्चीस परसेंट, दस परसेंट ऐसे ज़रूर मिलेंगे जो हाफ़िज़ के साथ नियत नहीं बाँधते हैं। बैठे हैं अपने आप। हाफ़िज़ साहब शुरू हो गए। जब रुकू का नंबर आएगा तो अल्लाहु अकबर कह के रुकू में पहुँच जाएँगे।

लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह यह तख़्त वाली मस्जिद ऐसी है कि यहाँ पर हर नमाज़ी हाफ़िज़ साहब के साथ नियत बाँधता है। कोई एक दो हों उनकी गिनती नहीं है। एक दो की कोई गिनती नहीं होती। अल्हम्दुलिल्लाह सारे नमाज़ी इमाम के साथ नियत बाँधते हैं और खड़े हो के सुनते हैं। अल्हम्दुलिल्लाह।

तो इन मौलवियों को यह चाहिए कि अवाम को बताएँ कि तरावीह में खेल कूद नहीं करना चाहिए बल्कि तरावीह सही तरीक़े में पढ़नी चाहिए। बताने के बजाय यह चाहते हैं कि बिलकुल यह ख़त्म हो जाए क्योंकि ख़ुद तो पढ़नी नहीं है।

मैंने देखा बड़े बड़े मौलवी स्टेटस लगाएंगे। अभी हम बंगलोर एयरपोर्ट से निकल रहे हैं। अभी हम कलकत्ता एयरपोर्ट पर पहुँच चुके हैं।
बड़े बड़े मौलवी लगाएंगे। आज तक मैंने किसी मौलवी को यह स्टेटस लगाते नहीं देखा कि मैं फलाँ मस्जिद में तरावीह पढ़ रहा हूँ। कोई नहीं लगाता।

क्यों? पढ़ते ही नहीं।
अगर पूछ भी लिया हज़रत तरावीह?
अल्हम्दुलिल्लाह मैं अपने घर में अदा कर लेता हूँ।
अच्छा तरावीह घर में होगी तो मौलवियों को चाहिए कि तरावीह भी पढ़ें और हाफ़िज़ों का दर्द भी समझें।

बहरहाल यह एक मसला था बयान कर दिया।

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