सिलसिला-ए-आलिया मदारिया की ताबनाक तारीख़ में जिन बुज़ुर्गों ने अपने ज़ुह्द व तक़वा, फ़ैज़-ए-बातिन और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ के ज़रिए नमायाँ मक़ाम हासिल किया, उन में हज़रत शेख सैफ़ुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह का नाम निहायत एहतराम के साथ लिया जाता है। आप एक ऐसे बुज़ुर्ग थे जिन की शख्सियत इल्म, अमल, फ़क़्र और सख़ावत का हसीन इम्तिज़ाज थी।
हज़ूर मदार-ए-पाक रज़ियल्लाहु अन्हु के सिलसिले से निसबत
हज़रत सैयदुल-मुवह्हिदीन, उम्दतुल-अत्हार, सैयद बदिउद्दीन कुत्बुल मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु (मआरूफ़ बह मदार-ए-पाक) सिलसिला-ए-मदारिया के बानी और बर्रे-सग़ीर में तौहीद, मुजाहदा और तर्क-ए-दुनिया की अज़ीम मिसाल हैं। आप का फ़ैज़ ऐसा हमागीर था कि आप के खुलफ़ा और सज्जादा-नशीनों के ज़रिए यह सिलसिला दूर-दूर तक फैला और हज़ारों नुफ़ूस को राह-ए-हक़ नसीब हुई।
हज़रत ख़्वाजा सैयद अबू मुहम्मद, मुहम्मद अरग़ून रज़ियल्लाहु अन्हु, मदार-ए-पाक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के अव्वल सज्जादा-नशीन थे। आप ने अपने शैख़ के फ़ैज़ को निहायत अमानत व दियानत के साथ आगे मुन्तक़िल किया और सिलसिला-ए-तबक़ातिया मदारिया को मज़बूत बुनियादें फ़राहम कीं। आप की ख़ानक़ाह रश्द व हिदायत का मरकज़ थी जहाँ तश्नगान-ए-मआरिफ़त सैराब होते थे। हज़रत शेख सैफ़ुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह भी आप ही के ख़लीफ़ा थे।
बैअत व सुलूक का सफ़र
हज़रत शेख सैफ़ुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह ने अपने रूहानी सफ़र का आग़ाज़ सिलसिला-ए-चिश्तिया से किया। आप ने हज़रत शेख शम्सुद्दीन ताहिर रहमतुल्लाह अलैह के दस्त-ए-मुबारक पर बैअत की और कुछ अरसा उन की सोहबत-ए-फ़ैज़ से मुस्तफ़ीद होते रहे।
बाद अज़ाँ, अपने मुर्शिद हज़रत शेख शम्सुद्दीन ताहिर रहमतुल्लाह अलैह ही के हुक्म और इजाज़त से आप हज़रत सैयद अबू मुहम्मद ख़्वाजा अरग़ून कुद्दस अल्लाह सिर्रहुल अज़ीज़ की ख़िदमत-ए-अक़दस में हाज़िर हुए। यहाँ आप ने सिलसिला-ए-तबक़ातिया मदारिया में बैअत की, और मुजाहदा, इताअत और ख़िदमत के मराहिल तय करते हुए तकमील-ए-सुलूक को पहुँचे।
यह इस बात की रोशन दलील है कि हज़रत शेख सैफ़ुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह में इख़्लास, इताअत-ए-मुर्शिद और तलब-ए-हक़ बदर्जा-ए-अतम मौजूद थी।
ग़िना, सख़ावत और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़
अल्लाह तआला ने हज़रत शेख सैफ़ुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह को ग़िना-ए-ज़ाहिरी व बातिनी की ऐसी दौलत अता फ़रमाई थी कि आप की ख़ानक़ाह से कभी कोई साइल या हाजतमंद खाली हाथ वापस नहीं गया।
आप का दिल फ़क़्र के नूर से मामूर और हाथ सख़ावत के दरिया थे। मुहताजों की ख़बरगीरी, मुसाफ़िरों की मेहमाननवाज़ी और अहल-ए-दिल की दिलजोई आप का ख़ास वस्फ़ थी। यही वजह है कि आप अवाम व ख़व्वास सब में यकसाँ मक़बूल थे।
विसाल
यह मर्द-ए-हक़ बिलआख़िर अपने रब से जा मिला।
आप का विसाल 924h में माह-ए-रमज़ानुल मुबारक की 27वीं शब को हुआ, जो बरकतों और रहमतों की रात है। यूँ आप की पूरी ज़िंदगी इबादत, मुजाहदा और ख़िदमत-ए-दीन में गुज़री और इख़्तिताम भी रहमत की घड़ी में हुआ।
खुलासा
हज़रत शेख सैफ़ुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह की सवानिह हमें यह सबक़ देती है कि सच्ची नसबत, कामिल इताअत-ए-मुर्शिद और मख़लूक़-ए-ख़ुदा की बे-लौस ख़िदमत इंसान को रूहानी बुलंदियों तक पहुँचा देती है। आप सिलसिला-ए-आलिया मदारिया के उन रोशन चराग़ों में से हैं जिन की रौशनी आज भी अहल-ए-दिल के लिए मशअल-ए-राह है।
क़तअ-ए-तारीख़-ए-वफ़ात
सैफ़ मस्लूल ख़ुदा सैफ़ुद्दीन
गश्त आज़िम चूँ सूए ख़ुल्द-ए-बरीन
साल-ए-ओ गुफ़्त सुरोश-ए-ग़ैबी
जलवा गर शुद बजनाँ सैफ़ुद्दीन
किताब :-
सैरुल मदार – ज़हीर अहमद सहसवानी बदायूनी
सफ़्हा – 141









