हम लफ़्ज़ “इन्फ़ाक़” को तो जानते हैं जिसका लुग़वी मानी “माल निकालना या खर्च करना” है, लेकिन क्या हमने कभी ग़ौर किया कि अल्लाह तआला ने हमें साल में एक महीना भूखा क्यों रखा? क्या मेरे रब को (नऊज़ु बिल्लाह) हमारी भूख की हाजत है? क्या वह नहीं देख रहा कि उसका बंदा प्यास से तड़प रहा है?
क़ुरआन कहता है: तुम नेकी की हक़ीक़त को नहीं पा सकते जब तक अपनी महबूब चीज़ खर्च न कर दो। [3.92]
आम तौर पर हम समझते हैं कि महबूब चीज़ सिर्फ “रुपया पैसा” है, लेकिन याद रखिए! इंसान को अपने माल से ज़्यादा अपनी “ज़ात”, अपनी “राहत” और अपनी “अना” महबूब होती है। रोज़ा दरअसल इन्फ़ाक़-ए-नफ़्स का नाम है। यह अपनी महबूब तरीन ज़रूरतों (खाना, पीना और ख़्वाहिश) को अल्लाह के हुज़ूर “इन्फ़ाक़” कर देने का नाम है।
रोज़े की ज्ञानता
आम तौर पर लोग समझते हैं कि रोज़ा सिर्फ सूरज ढलने तक खाने पीने से रुकने का नाम है, लेकिन इस रुक्न की अस्ल मआरिफ़त “इन्फ़ाक़-ए-रग़बत” है। अल्लाह तआला ने आपको हलाल रिज़्क़ से इस लिए रोका ताकि आपको यह एहसास हो कि जब हलाल (पानी और रोटी) पर आपका हक़ होते हुए भी आप उसे अल्लाह के लिए छोड़ सकते हैं, तो फिर हराम रिज़्क़, यतीम का माल और ग़रीब का हक़ छोड़ना कितना ज़रूरी है।
रोज़ा एक “ट्रेनिंग कैंप” की तरह है जहाँ सिपाही को प्यासा रखा जाता है ताकि जंग के मैदान (अमली ज़िंदगी) में वह साबित क़दम रहे। अगर ट्रेनिंग के बाद भी सिपाही बुज़दिल रहे, तो ट्रेनिंग महज़ एक “रस्म” थी। रोज़े की मआरिफ़त यह है कि इफ़्तार के वक़्त दस्तरख़्वान पर बैठ कर आपको अपनी भूख से ज़्यादा उस बेवा की भूख का फ़िक्र हो जिसका चूल्हा नहीं जला।
लोग ज़कात या सदक़ा को एक माली बोझ या टैक्स समझते हैं, जबकि उसकी मआरिफ़त (ज्ञानता) मोहब्बत का इम्तिहान है। एक बुज़ुर्ग से पूछा गया कि “ज़कात कितनी है?” उन्होंने फ़रमाया: “अवाम के लिए चालीसवाँ हिस्सा, और इश्क़ वालों के लिए सब कुछ”।
खर्च करने की मआरिफ़त यह है कि आप माल नहीं दे रहे, बल्कि अपने दिल से “दुनिया की मोहब्बत” निकाल रहे हैं। अल्लाह को आपके पैसों की ज़रूरत नहीं, उसे आपके दिल की वह तड़प चाहिए जो दूसरे का दुख देख कर पैदा होती है।
जब हम वलीमे में सिर्फ अशराफ़िया (अमीरों) को बुलाते हैं, तो हम अल्लाह की नेमत का शुक्र नहीं बल्कि अपनी हैसियत का इज़हार कर रहे होते हैं। मदीना के एक सहाबीؓ ने वलीमा किया और सबसे पहले मोहल्ले के मसाकीन को बिठाया। किसी ने कहा: बड़े लोगों को भी तो बुलाएँ। उन्होंने फ़रमाया: बड़े लोग वह हैं जिन्हें खिलाने पर अल्लाह खुश हो जाए, न कि वह जो मेरा खाना खा कर मुझ पर एहसान करें।
रोज़ेदार अकेला बैठ कर इफ़्तार कर सकता है, उसके पास रिज़्क़ मौजूद है, भूख लगी है, वह उसका हक़दार है, लेकिन वह दूसरे को शरीक करता है। क्यों? क्योंकि उसने दर्द को समझा है। हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि इफ़्तार कराने वाले को भी रोज़ेदार जितना सवाब मिलेगा। यह सवाब महज़ खाने की क़ीमत का नहीं, बल्कि उस “एहसास-ए-शिरकत” का है जो मेज़बान के दिल में पैदा हुआ। उसने अपनी भूख के आईने में दूसरे की प्यास को देखा।
मसलन आप शैतान को कंकड़ियाँ मार रहे हैं! क्यों मार रहे हैं? शैतान ने क्या किया आपका? कौन सा गुनाह किया उसने? यही ना कि उसने हमारे रब के सामने ग़ुरूर व तकब्बुर और अनानियत का मुज़ाहिरा किया था तो हज में “रमी जमार” (शैतान को कंकड़ियाँ मारना) दरअसल शैतान और शैतान के हैरत व तकब्बुर को मारना है। अगर हाजी मक्का से आकर भी ग़रीबों को हक़ीर समझे, तो उसने पत्थर तो मारे मगर अपने अंदर के शैतान को ज़बह नहीं किया, गोया उस इंसान ने वह कंकड़ियाँ खुद को मारी हैं, रमज़ान की तरबियत, हज का इश्क़ और मुहर्रम की क़ुर्बानी मिल कर एक ऐसे इंसान को जन्म देती है जो “ख़ैरुन्नास मन यनफ़उन्नास” (बेहतरीन इंसान वह है जो दूसरों को नफ़ा पहुँचाए) का पैकर होता है।
तारीख़-ए-इंसानियत के हसीन इंसान यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का वाक़िआ दुनिया याद रखिए! जब वह मिस्र के ख़ज़ानों के मालिक थे, तब भी अक्सर भूखे रहते थे। किसी ने पूछा: “ऐ यूसुफ़! आपके पास तो ज़मीन के ख़ज़ाने हैं, फिर आप भूखे क्यों रहते हैं?” आपने वह तारीखी जुमला फ़रमाया जो आज हमारे ज़मीर को झकझोरने के लिए काफ़ी है: “मुझे डर है कि अगर मेरा पेट भर गया तो मैं भूखों का दुख भूल जाऊँगा”। (अहया उलूम)
इसी की एक मिसाल अब्बास अलमदार हैं। कर्बला के मैदान में हज़रत अब्बास अलमदारؓ का दरिया पर जाना और पानी न पीना “इन्फ़ाक़-ए-प्यास” की अज़ीम तरीन मिसाल है। जब आपने चुल्लू में पानी भरा और उसे अपने खुश्क होंटों के क़रीब लाए, तो आपको इमाम हुसैनؑ और छोटे बच्चों की प्यास याद आ गई। आपने वह पानी वापस दरिया में गिरा दिया। यह “मिम्मा तुहिब्बून” की इंतिहा है! प्यास लगी है, पानी हाथ में है, कोई देखने वाला नहीं, मगर “दर्द-ए-ग़ैर” (दूसरों का दुख) अपनी ज़रूरत पर ग़ालिब आ गया।
अब्दुल्लाह बिन मुबारक हज के लिए जा रहे थे कि रास्ते में एक औरत को कूड़ेदान से मरा हुआ परिंदा उठाते देखा। पूछने पर मालूम हुआ कि वह बेवा है और कई दिन से उसके बच्चे फ़ाक़े से हैं। आपने हज के लिए जमा की गई तमाम रकम (जो उनका महबूब माल था) उस औरत को दे दी और खुद घर वापस आ गए। उस साल ग़ैब से नदा आई कि “अब्दुल्लाह बिन मुबारक का हज क़बूल हो गया हालाँकि वह मक्का नहीं पहुँचे”।
एक मरतबा हज़रत जुनैद बग़दादीؒ के पास एक शख़्स आया और अर्ज़ की: “हज़रत! मैं बहुत इबादत करता हूँ, रोज़े रखता हूँ, मगर दिल में वह ‘दर्द’ और ‘रक़्क़त’ पैदा नहीं होती जो होनी चाहिए।” आपने फ़रमाया: “तुमने माल का इन्फ़ाक़ तो किया होगा, कभी अपनी पसंद का इन्फ़ाक़ भी किया? जाओ! और किसी ऐसे शख़्स को खाना खिलाओ जिसे तुम नापसंद करते हो, या अपनी वह चीज़ सदक़ा करो जिसके बिना तुम्हारा गुज़ारा मुश्किल हो।” जब उस शख़्स ने अपनी पसंदीदा पोशाक एक साइल को दे दी, तो उसे सज्दे में वह लज़्ज़त मिली जो हज़ार नफ़्लों में न थी।
हमारा हाल:
आज हमारा अलमिया यह है कि हम मय्यत का खाना तो यह कह कर नहीं खाते कि “ग़रीब का हक़ है”, लेकिन वलीमों और इफ़्तार पार्टियों में वह इसराफ़ करते हैं कि अल्लाह की पनाह! हम भूल जाते हैं कि मेरे नबी ﷺ ने फ़रमाया था: “बदतरीन खाना उस वलीमे का है जिसमें अमीरों को बुलाया जाए और ग़रीबों को छोड़ दिया जाए” अगर रोज़ा रख कर भी हमारे अंदर ग़रीब के लिए जगह पैदा नहीं हुई, तो हमने सिर्फ खुराक का टाइम टेबल बदला है, अपनी तक़दीर और अख़लाक नहीं बदले। दरअसल आज के दौर का सबसे बड़ा अलमिया है। जब इबादत या रस्म से उसकी रूह (मआरिफ़त) निकल जाती है, तो वह महज़ एक मश्क या बोझ बन कर रह जाती है।
एक बुज़ुर्ग ने हज किया, वापस आए तो किसी ने पूछा: “काबा कैसा था?” उन्होंने रो कर कहा: “मैं तो वहाँ साहिब-ए-काबा को ढूँढ़ने गया था, पत्थरों को देखने नहीं।” हज की मआरिफ़त यह है कि इंसान अपना सब कुछ लुटा कर (इन्फ़ाक़ कर के) अल्लाह का हो जाए। अगर हज के बाद भी इंसान की “अना” नहीं टूटी, तो उसने रुक्न तो अदा किया मगर मआरिफ़त न पाई। इसी तरह रोज़े का हक़ीक़ी पहलू यह था कि इंसान का नफ़्स क़ाबू में आए। वरना अल्लाह को भूखा रखने से क्या मिलेगा? अल्लाह तो बस बेदारी चाहता है। जिसने रोज़े की मआरिफ़त पा ली, उसे ग़रीब के फ़ाक़े पर बुरा लगने लगता है। उसे पता चल जाता है कि मेरा सहरी का लुक़्मा तब तक क़बूल नहीं जब तक मेरा पड़ोसी बेचैन है।
निज़ाम-ए-क़ुदरत व मक़सद-ए-इलाही
रमज़ान: रमज़ान में हमने भूख, प्यास और ख़्वाहिश का इन्फ़ाक़ करना सीखा (तरबियत)।
शव्वाल: ईद के फ़ौरन बाद शव्वाल आता है जो यह देखता है कि क्या वह “दर्दमंदी” ईद के दस्तरख़्वान पर बाक़ी रही या वलीमों की नुमाइश में खो गई? शव्वाल के छः रोज़े इस “तरबियती कोर्स” के तसلسل की अलामत हैं।
ज़िलक़ादा: ज़िलक़ादा ख़ामोशी और तैयारी का महीना है, जहाँ रूह काबे के दीदार के लिए तड़पती है।
ज़िलहिज्जा: हज दरअसल “इन्फ़ाक़-ए-कुल” है। हाजी अपना घर, बार, सिले हुए कपड़े (अना), माल और वक़्त सब कुछ अल्लाह के लिए “खर्च” कर देता है। काबे का तवाफ़ इस बात का एलान है कि अब मेरी ज़िंदगी का मरकज़ सिर्फ तू है।
मुहर्रम: इसार व क़ुर्बानी का अज़ीम दरस। अगर रमज़ान ने “भूख” सिखाई, तो कर्बला ने “प्यास की इंतिहा” में भी हक़ पर डट जाना सिखाया। इमाम हुसैनؑ ने कर्बला के मैदान में वह इन्फ़ाक़ किया जिसकी मिसाल काइनात में नहीं मिलती। आपने सिर्फ माल नहीं, बल्कि अपना भरा पूरा घराना, अपने जवान बेटे, और अपनी जान तक अल्लाह की राह में “इन्फ़ाक़” कर दी। रोज़ेदार तो शाम को इफ़्तार कर लेता है, लेकिन कर्बला के शाहसवारों ने तीन दिन की प्यास के बाद शहादत का जाम पी कर अपना रोज़ा “रब के दीदार” से इफ़्तार किया।
सहरी में हम इस लिए खाते हैं कि दिन भर का रोज़ा निभा सकें (यह तैयारी है)। इसी तरह रमज़ान इस लिए है कि हम बाकी ११ महीने का “इंसानियत का रोज़ा” निभा सकें।
रोज़े का मक़सद हमें दर्दमंद बनाना है। अल्लाह को हमारी भूख से कुछ नहीं मिलेगा, वह तो वह “रक़्क़त” देखना चाहता है जो भूख से पैदा होती है। वह देखना चाहता है कि क्या तपती दोपहर में प्यास की शिद्दत तुम्हें किसी प्यासे की याद दिलाती है? क्या इफ़्तार के वक़्त दस्तरख़्वान की वुसअत तुम्हें किसी खाली हाथ पड़ोसी की फ़िक्र देती है? अगर हमने अपनी अना, तकब्बुर और इसराफ़ का इन्फ़ाक़ न किया, तो हमारा रोज़ा महज़ एक रस्म है।
आइए अहद करें कि हम रोज़े को सिर्फ एक मशक़्क़त नहीं बल्कि “दर्दमंदी की तरबियत गाह” बनाएँगे, ताकि जब हम ईद मनाएँ तो हमारे दिल इस इत्मिनान से भरे हों कि हमने सिर्फ भूख नहीं काटी, बल्कि अल्लाह के बंदों का दर्द बाँटा है।












