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हज़रत ओवैस अल-क़रनी अल-मुरादी रज़ियल्लाहु अन्हु

On: फ़रवरी 21, 2026 4:15 अपराह्न
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Hazrat Uwais al-Qarani al-Muradi (Raziyallahu Anhu)

तआरुफ़

आप जलीलुल क़द्र ताबेईन और मुक़्तदाए अरबीन में से हुए हैं। हज़ूर-ए-अकरम ﷺ फ़रमाया करते थे कि ओवैस एहसान व मेहरबानी के एतिबार से बेहतरीन ताबेईन में से है। और जिसकी तौसीफ़ सरकार-ए-दो आलम ﷺ फ़रमा दें, उसकी तारीफ़ दूसरा कोई क्या कर सकता है? बअज़ औक़ात जानिब-ए-यमन रुख़-ए-मुबारक करके हज़ूर ﷺ फ़रमाया करते थे कि मैं यमन की जानिब से रहमत की हवा आती हुई पाता हूँ।


हसब व नसब

उलमा-ए-अन्साब ने आपका सिलसिला-ए-नसब दो तरीक़ों से लिखा है:

ओवैस बिन आमिर बिन जुज़अ बिन मालिक बिन अम्र बिन मसअद बिन अम्र बिन सअद बिन अस्वान बिन क़रन बिन रुमान बिन नाजिया बिन मुराद अल-मुरादी अल-क़रनी।

और दूसरे सूरत में इस तरह कि:
ओवैस बिन आमिर बिन जुज़ बिन मालिक बिन अम्र बिन सअद बिन अस्वान बिन क़रन बिन रुमान बिन नाजिया बिन मुराद बिन मालिक बिन मज़हिज बिन ज़ैद।


विलादत व जाए पैदाइश

आपको दरबार-ए-नबवी से ग़ाइबाना तौर पर ख़ैरुत्ताबेईन का मुअज़्ज़ज़ लक़ब मिला था। आपको सैय्यदुत्ताबेईन भी कहा जाता है। आपके वालिद-ए-गरामी (आमिर) आपकी कमसिनी में ही वफ़ात पा गए थे। आपकी वालिदा माजिदा (बदार) नाबीना और ज़ईफ़ा थीं, जिनकी ख़िदमत में आपकी उम्र का ज़्यादातर हिस्सा गुज़रा। बचपन से ही आपने शुतरबानी का पेशा इख़्तियार किया और उसका मुआवज़ा वालिदा माजिदा पर ख़र्च करते थे। उनसे जो बच जाता वह राह-ए-ख़ुदा में लुटा देते।


जसद व सूरत व हुलिया

आपकी विलादत, नशो-नुमा, बचपन और जवानी के हालात और मशाग़िल पर्दा-ए-इख़्फ़ा में हैं। इनके बारे में लोगों को बहुत कम मालूमात हैं। हज़रत ओवैस क़रनी क़रन नामी बस्ती के रहने वाले थे। क़रन का क़स्बा मुल्क-ए-यमन में वाक़े है। आपका ताल्लुक़ क़बीला मुराद से था और जाए सुकूनत मुल्क-ए-यमन और क़स्बा क़रन में थी। इसलिए आपको ओवैस अल-क़रनी अल-मुरादी और यमनी कहा जाता है।

हरम बिन हय्यान एक साहिबे-दिल ताबेई और हज़रत ओवैस रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की मुलाक़ात का तज़किरा सीरत-ए-सहाबा जिल्द ३ सफ़ा ४९ और तबक़ात इब्न सअद हिस्सा शशम सफ़्हा १८१ उर्दू पर इस तरह किया गया है:

इब्न हय्यान (या हब्बान) कहते हैं कि मैं ओवैस रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ज़ियारत के शौक़ में कूफ़ा गया और तलाश करते करते फ़ुरात के किनारे पहुँचा। देखा एक शख़्स तनहा बैठा निस्फ़ुन्नहार के वक़्त दरिया के किनारे वुज़ू कर रहा है और कपड़े धो रहा है। मैं ओवैस के औसाफ़ सुन चुका था इसलिए फ़ौरन पहचान गया। वह फ़र्बा अंदाम थे। रंग गंदुमगूँ था। बदन पर बाल ज़्यादा थे। सर मुंडा हुआ था। दाढ़ी घनी थी। बदन पर सूफ़ का इज़ार (पायजामा) और सूफ़ की एक चादर थी। चेहरा बहुत बड़ा और महीब था। फ़रमान-ए-नबवी और ताबेई इब्न हब्बान के मुताबिक़ हज़रत ओवैस का हुलिया मुबारक यह था:

० रंग गंदुमगूँ ब-रूएत दीगर ब-सुर्ख़ी माइल
० दोनों कंधों के दरमियान काफ़ी फ़ासला
० आँखें नीलगूँ मगर सुरमगीं
० क़द दरमियाना
० ठोड़ी सीने से लगी हुई
० नज़रें नीची सज्दा-गाह पर जमी हुईं
० दायाँ हाथ बाएँ हाथ पर रखे हुए
० क़ुरआन की तिलावत करता होगा और अपने ऊपर रोता होगा
० लिबास दो कपड़ों पर मुश्तमिल — एक पश्मी पायजामा और एक पश्मी रिदा
० दुनिया में गुमनाम
० आसमान पर मशहूर
० क़सम खाए तो अल्लाह उसको सच कर दे
० बाएँ कंधे तले बरस का सफ़ेद निशान

रोज़-ए-महशर नेक व कारों को जन्नत में जाने का हुक्म होगा, लेकिन हज़रत ओवैस रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को हुक्म होगा कि ठहर जाओ, लोगों की शफ़ाअत करो। फिर अल्लाह रबीआ और मुअज़र क़बीलों के अफ़राद की तादाद के बराबर लोगों के बारे में उनकी शफ़ाअत क़ुबूल करेगा।


ख़ुर्द व तआम

जब तक आपकी वालिदा माजिदा ज़िंदा रहीं, शुतरबानी के मुआवज़े से वालिदा और अपनी गुज़र-औक़ात करते रहे। उन्होंने मुफ़लिसी और ख़स्ता-हाली में ज़िंदगी बसर की। दुनिया से उन्हें नफ़रत थी। सुबह की अज़ान के वक़्त घर से निकल जाते और नमाज़-ए-इशा के वक़्त घर तशरीफ़ लाते। वापसी पर रास्ते से छुवारों की गुठलियाँ चुन कर लाते और उन्हें खा लिया करते। बस यही उनकी ग़िज़ा थी। कभी मामूली क़िस्म के छुहारे मिल जाते तो उनसे इफ़्तार कर लेते। कभी ऐसा भी होता कि गुठलियाँ बेच कर इफ़्तार के लिए छुहारे ख़रीद लेते।

आप कभी-कभी जौ की सूखी रोटी खजूर के शीरे के साथ खा कर गुज़ारा कर लेते थे। पेट के खाने और बदन के कपड़ों के सिवा कुछ पास नहीं रखते थे। फ़रमाते:
“ख़ुदाया, मैं तुझ से भूखे पेट और नंगे बदन की माज़िरत चाहता हूँ। ग़िज़ा जो मेरे पेट में है और लिबास जो मेरे जिस्म पर है, इसके सिवा मेरे पास कुछ नहीं।”

जो कुछ दाना-पानी और कपड़ा बच जाता सब ख़ैरात कर देते थे और बारगाह-ए-इलाही में दुआ फ़रमाते कि:
“या इलाही, अगर कोई भूख से मर जाए तो मुझ से सवाल मत करना।”

तबक़ात इब्न सअद में हरम बिन हब्बान का बयान है कि मैं हज़रत ओवैस रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को मिलने कूफ़ा गया। मैंने कहा: ओवैस! अल्लाह आप पर रहमत नाज़िल करे और आपकी मग़फ़िरत करे, यह आपका क्या हाल है? उनकी ज़ाहिरी ख़स्ता हालत देखकर मेरे आँसू निकल पड़े और मुझे रोता देखकर वह भी रो पड़े।


इश्क़-ए-इलाही

आप इश्क़ व मुहब्बत का वह पैकर-ए-अतम हैं जिन्हें सरकार-ए-दो आलम ﷺ की क़ुर्बत और हुज़ूरी दूर रह कर भी मयस्सर थी। फ़रत-ए-मुहब्बत में जुनून का ग़लबा हुआ तो उनका यह हाल हो गया कि दीवानों की तरह गलियों में नंगे पाँव चलते थे। परेशान और ख़स्ता हाल देखकर लड़के मजनूँ समझते और पत्थर मारते, जिनसे ख़ून बहने लगता। एक रोज़ आप रुक गए और बच्चों से फ़रमाने लगे:

“मुझे बड़े पत्थरों से नहीं बल्कि छोटे पत्थरों से मारा करो।”

उनमें से किसी ने कहा: ओवैस! क्या तेरे दावे-ए-इश्क़ की यही हक़ीक़त है कि बड़े पत्थरों की तकलीफ़ से ख़ौफ़ज़दा हो गए हो?

आप यह सुन कर फ़रमाने लगे:
“मैं बड़े पत्थरों से नहीं डरता बल्कि बात यह है कि उनसे ख़ून बहने लगता है और वुज़ू टूट जाता है, और मैं बे-वुज़ू याद-ए-इलाही नहीं कर सकता।”

आप एक शब क़ियाम में गुज़ारते, दूसरी शब रुकूअ में और तीसरी सज्दा में। अक्सर दिन का वक़्त भी इबादत में गुज़रता। हमेशा रोज़ा रखते। जब इफ़्तार के लिए कुछ मयस्सर न होता तो खजूर की गुठलियाँ चुन कर बेचते और उनकी क़ीमत से चंद लुक़्मों का सामान कर लेते। कूफ़ा में आप एक हल्क़ा-ए-ज़िक्र में शरीक होते थे। असीर बिन जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि उस हल्क़े में हमारे दिलों पर सबसे ज़्यादा हज़रत ओवैस के ज़िक्र का असर होता था।

फ़ज़ाइल

हज़ूर-ए-अकरम ﷺ फ़रमाते हैं कि रोज़-ए-महशर सत्तर (७००००) हज़ार फ़रिश्तों के साथ, जो ओवैस क़रनी के हम-शबीह होंगे, ओवैस को जन्नत में दाख़िल किया जाएगा ताकि मख़लूक़ उनकी पहचान न कर सके, सिवाए उस शख़्स के जिसे अल्लाह उनके दीदार से मुशर्रफ़ करना चाहे। इसलिए कि आपने ख़लवत-नशीं होकर और मख़लूक़ से रूपोशी इख़्तियार कर के महज़ इस लिए इबादत व रियाज़त इख़्तियार की कि दुनिया आपको बरगुज़ीदा तसव्वुर न करे। इसी मसलेहत के पेश-ए-नज़र रोज़-ए-महशर आपकी पर्दादारी क़ायम रखी जाएगी।

हज़ूर-ए-अकरम ﷺ ने फ़रमाया कि मेरी उम्मत में एक ऐसा शख़्स है जिसकी शफ़ाअत से क़बीला रबीआ व मुज़र की भेड़ों के बाल के बराबर गुनाहगारों को बख़्श दिया जाएगा। (रबीआ व मुज़र दो क़बीले, महल्ले हैं जिनमें बकसरत भेड़ें पाई जाती थीं)। और जब सहाबा-ए-किराम ने हज़ूर ﷺ से पूछा कि वह कौन शख़्स है और कहाँ मुक़ीम है? तो आपने फ़रमाया कि अल्लाह का एक बंदा है। फिर सहाबा के इसरार के बाद फ़रमाया कि वह ओवैस क़रनी है।


चश्म-ए-बातिन से ज़ियारत हुई

जब सहाबा ने पूछा कि क्या वह कभी आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुए हैं? आपने फ़रमाया — कभी नहीं। लेकिन चश्म-ए-ज़ाहिरी के बजाय चश्म-ए-बातिनी से उसको मेरे दीदार की सआदत हासिल है। और मुझ तक न पहुँचने की दो वजह हैं:

अव्वल: ग़लबा-ए-हाल
दूम: ताज़ीम-ए-शरीअत

क्योंकि उसकी वालिदा मोमिना भी हैं और ज़ईफ़ व नाबीना भी, और ओवैस शुतरबानी के ज़रिये उनके लिए मआश हासिल करता है। फिर जब सहाबा ने पूछा कि क्या हम उनसे शरफ़-ए-नियाज़ हासिल कर सकते हैं? तो हज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि नहीं। अलबत्ता उमर व अली से उनकी मुलाक़ात होगी। उनकी पहचान यह है कि पूरे जिस्म पर बाल हैं, हथेली के बाएँ पहलू पर एक रोम के मसावी सफ़ेद रंग का दाग़ है लेकिन वह बरस का दाग़ नहीं। लिहाज़ा जब उनसे मुलाक़ात हो तो मेरा सलाम पहुँचाने के बाद मेरी उम्मत के लिए दुआ करने का पैग़ाम भी देना। फिर जब सहाबा ने अर्ज़ किया कि आपके पीराहन का हक़दार कौन है? तो फ़रमाया कि ओवैस क़रनी।


सैय्यदना उमर फ़ारूक़-ए-आज़म ने अपने ज़माना-ए-ख़िलाफ़त में हज के मौक़े पर बाहर से आने वालों के एक मजमे में लोगों को खड़े होने के लिए कहा। इसके बाद आपने फ़रमाया — तमाम के तमाम बैठ जाएँ मगर कूफ़ा के लोग खड़े रहें। फिर आपने कूफ़ा वालों को भी बैठ जाने की इजाज़त दी मगर कूफ़ा वालों में से क़बीला मुराद के लोग खड़े रहे। आपने फ़रमाया — मुराद वाले भी बैठ जाएँ मगर उनमें से सिर्फ़ वह खड़े रहें जो क़रन से आए हैं। सारे लोग बैठ गए मगर एक शख़्स अनीस नामी, जो ओवैस के चाचा थे और क़रन से आए थे, खड़े रहे। अमीरुल-मोमिनीन हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने पूछा — क्या आप ओवैस को पहचानते हैं? अनीस ने कहा — आप उसके मुतअल्लिक़ क्यों दरयाफ़्त करते हैं, वह तो एक ग़रीब दीवाना सा आदमी है। हज़रत उमर रोए और फ़रमाया — मैंने रसूल-ए-ख़ुदा ﷺ से सुना है कि ऐसे ही लोगों की शफ़ाअत से क़यामत के रोज़ लोग जन्नत में दाख़िल होंगे।


हुरुम बिन हय्यान रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि मुझे यह हदीस पहुँची तो मैं कूफ़ा गया। मुझे हज़रत ओवैस क़रनी से मिलने के अलावा कोई काम न था। अचानक एक दिन दोपहर के वक़्त मैं दरियाए फ़ुरात के किनारे जा पहुँचा। मैंने हज़रत ओवैस को देखा कि वह वुज़ू फ़रमा रहे हैं। मैंने आपको पहचान लिया क्योंकि मैंने लोगों से आपका हुलिया पूछ लिया था। मैंने सलाम अर्ज़ किया, मुझे जवाब मिला। मैंने मुसाफ़हा करने की कोशिश की लेकिन हज़रत ओवैस ने हाथ खींच लिया। मैंने कहा:
“ओवैस, यरहमुकल्लाह, ग़फ़रलका, कैफ़ा रहिमकल्लाह।”

यह एक बात कहते ही मैं ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा क्योंकि मुझे आपसे बहुत मुहब्बत हो गई थी। मेरी हालत देखकर हज़रत ओवैस भी रोने लगे। थोड़ी देर के बाद हम ख़ामोश हुए तो हज़रत ओवैस ने फ़रमाया:
“हय्याकल्लाह या हरम बिन हय्यान, मेरे भाई तुम्हारा क्या हाल है? तुम्हें मेरी तरफ़ किसने रहनुमाई की?”

हरम ने पूछा — आपको मेरा और मेरे बाप का नाम किसने बताया? ओवैस ने फ़रमाया — मुझे भी अल्लाह तआला ने बताया था। इसके बाद बहुत सी बातें हुईं, लेकिन आख़िरी बार जो नसीहत की उसमें फ़रमाने लगे — हज़ूर का विसाल हो गया, हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रुख़्सत हो गए, मेरे भाई हज़रत उमर का इंतिक़ाल हो गया। मैंने कहा — हज़रत उमर तो अभी ज़िंदा हैं। फ़रमाया — नहीं, मुझे अभी-अभी इत्तिला मिली है कि हज़रत उमर शहीद हो गए हैं। फिर इस क़िस्म की बातें करते रहे और दुआए ख़ैर करके मुझे इजाज़त दी और साथ ही कहा:
“अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह, मैं आज के बाद आपको न मिल सकूँगा।”

यह कहते हुए रवाना हो गए। मेरी ख़्वाहिश थी कि कुछ क़दम आपके साथ चलूँ, लेकिन आपने इजाज़त न दी और दौड़ना शुरू कर दिया। मैं आपके पीछे रोता और दौड़ता रहा, यहाँ तक कि कूफ़ा की गलियों में आ गए, लेकिन बहुत तलाश के बावजूद मैं उन्हें न पा सका।


हज़रत मौला अली रज़ि॰ व उमर रज़ि॰ की हज़रत ओवैस क़रनी रज़ि॰ से मुलाक़ात

दौर-ए-ख़िलाफ़त-ए-राशिदा में जब हज़रत उमर रज़ि॰ और हज़रत अली रज़ि॰ कूफ़ा पहुँचे और अहल-ए-यमन से उनका पता मालूम किया तो किसी ने कहा कि मैं उन्हें पूरी तरह तो वाक़िफ़ नहीं, अलबत्ता एक दीवाना आबादी से दूर अरफ़ा की वादी में ऊँट चराया करता है। सूखी रोटी उसकी ग़िज़ा है। लोगों को हँसता हुआ देखकर खुद रोता है और रोते हुए लोगों को देखकर खुद हँसता है। चुनाँचे हज़रत उमर रज़ि॰ और हज़रत अली रज़ि॰ जब वहाँ पहुँचे तो देखा कि हज़रत ओवैस नमाज़ में मशग़ूल हैं और मलाइका (फ़रिश्ते) उनके ऊँट चरा रहे हैं।

नमाज़ से फ़ारिग़ होने के बाद जब हज़रत उमर रज़ि॰ ने उनका नाम पूछा तो जवाब दिया — अब्दुल्लाह, यानी “अल्लाह का बंदा”। हज़रत उमर रज़ि॰ ने फ़रमाया — अल्लाह के बंदे तो हम भी हैं, आप अपना असली नाम बताइए। आपने जवाब दिया — ओवैस है। फिर हज़रत उमर रज़ि॰ ने फ़रमाया — अपना हाथ दिखाइए। उन्होंने जब हाथ दिखाया तो हज़ूर ﷺ की बताई हुई निशानियों को देखकर हज़रत उमर रज़ि॰ ने उनके हाथों को चूमा और हज़ूर ﷺ का लिबास-ए-मुबारक पेश करते हुए सलाम पहुँचाया और उम्मत-ए-मुहम्मदिया के हक़ में दुआ करने का पैग़ाम भी दिया।

यह सुनकर ओवैस क़रनी रज़ि॰ ने अर्ज़ किया कि आप अच्छी तरह देख लें, शायद वह कोई दूसरा फ़र्द हो जिसके मुतअल्लिक़ हज़ूर ﷺ ने निशानदेही फ़रमाई है। हज़रत उमर रज़ि॰ ने फ़रमाया कि जिस निशानी की हज़ूर ﷺ ने हमें निशानदेही फ़रमाई है वह आप में मौजूद है। यह सुनकर ओवैस क़रनी रज़ि॰ ने अर्ज़ किया — ऐ उमर! तुम्हारी दुआ मुझसे ज़्यादा कारगर साबित हो सकती है। आपने फ़रमाया — मैं तो दुआ करता ही रहता हूँ, अलबत्ता आपको हज़ूर ﷺ की वसीयत पूरी करनी चाहिए।

चुनाँचे हज़रत ओवैस रज़ि॰ हज़ूर ﷺ का लिबास-ए-मुबारक कुछ फ़ासले पर ले जाकर अल्लाह तआला से दुआ करने लगे:
“या रब! जब तक तू मेरी सिफ़ारिश पर उम्मत-ए-मुहम्मदिया की मग़फ़िरत न कर देगा, मैं सरकार-ए-दो आलम ﷺ का लिबास हरगिज़ न पहनूँगा, क्योंकि तेरे नबी ﷺ ने अपनी उम्मत को मेरे हवाले किया है।”

चुनाँचे निदा-ए-ग़ैबी आई कि हमने तेरी सिफ़ारिश पर कुछ लोगों की मग़फ़िरत कर दी। लेकिन आपने फिर अर्ज़ किया कि पूरी उम्मत की मग़फ़िरत फ़रमा दे। जवाब मिला कि हमने एक हज़ार लोगों की बख़्शिश कर दी। इसी तरह आप मशग़ूल-ए-दुआ थे कि हज़रत उमर रज़ि॰ और हज़रत अली रज़ि॰ आपके सामने पहुँच गए, और जब आपने सवाल किया कि आप दोनों हज़रत क्यों आ गए? मैं तो जब तक पूरी उम्मत की मग़फ़िरत न करवा लेता उस वक़्त तक यह लिबास कभी न पहनता।

मक़ाम-ए-विलायत ख़िलाफ़त से बेहतर है

हज़रत उमर रज़ि॰ ने आपको ऐसे कंबल के लिबास में देखा जिसके नीचे तुंगरी के हज़ारों आलम पोशीदा थे। यह देखकर आपके क़ल्ब में ख़िलाफ़त से दस्तबरदारी की ख़्वाहिश बेदार हुई और फ़रमाया कि क्या कोई ऐसा शख़्स है जो रोटी के एक टुकड़े के बदले में मुझसे ख़िलाफ़त ख़रीद ले? यह सुनकर हज़रत ओवैस रज़ि॰ ने कहा कि कोई बेवक़ूफ़ शख़्स ही ख़रीद सकता है। आपको तो फ़रोख़्त करने के बजाय उठा कर फेंक देना चाहिए, फिर जिसका जी चाहे उठा लेगा। यह कहकर आपने हज़ूर-ए-अकरम ﷺ का लिबास पहन लिया और फ़रमाया कि मेरी सिफ़ारिश पर बनू रबीआ और बनू मुज़र की भेड़ों के बालों के बराबर अल्लाह तआला ने लोगों की मग़फ़िरत फ़रमा दी।

जब हज़रत उमर रज़ि॰ ने आपसे हज़ूर-ए-अकरम ﷺ की ज़ियारत न करने के मुतअल्लिक़ सवाल किया तो आपने उनसे पूछा कि अगर आप दीदार-ए-नबी ﷺ से मुशर्रफ़ हुए तो बताइए कि हज़ूर ﷺ की भौंहें कुशादा थीं या घनी? लेकिन दोनों सहाबी जवाब न दे सके।


नबी ﷺ की पैरवी में दंदान-ए-मुबारक का तोड़ना

हज़रत ओवैस क़रनी रज़ि॰ ने कहा कि अगर आप नबी ﷺ से मुहब्बत करने वालों में से हैं तो यह बताइए कि जंग-ए-उहुद में हज़ूर ﷺ का कौन सा दंदान-ए-मुबारक शहीद हुआ था? और आपने नबी ﷺ की पैरवी में अपने तमाम दाँत क्यों न तोड़ डाले?

यह कहकर अपने तमाम टूटे हुए दाँत दिखाकर कहा कि जब दंदान-ए-मुबारक शहीद हुआ तो मैंने अपना एक दाँत तोड़ डाला, फिर ख़याल आया कि शायद कोई दूसरा दाँत शहीद हुआ हो, इसी तरह एक-एक करके जब तमाम दाँत तोड़ डाले तो उस वक़्त मुझे सुकून नसीब हुआ। यह देखकर दोनों सहाबा पर रक़्क़त तारी हो गई और यह अंदाज़ा हो गया कि पास-ए-अदब का हक़ यही होता है। जो हज़रत ओवैस क़रनी रज़ि॰ दीदार-ए-नबी ﷺ से मुशर्रफ़ न हो सके, लेकिन इत्तिबा-ए-रिसालत का मुकम्मल हक़ अदा करके दुनिया को दरस-ए-अदब देते हुए रुख़्सत हो गए।


मोमिन के लिए ईमान की सलामती ज़रूरी है

जब हज़रत उमर रज़ि॰ ने अपने लिए दुआ की दरख़्वास्त की तो आपने कहा कि नमाज़ में तशह्हुद के बाद मैं यह दुआ किया करता हूँ:

“ऐ अल्लाह! तमाम मोमिनीन व मोमिनात की मग़फ़िरत फ़रमा।”

अगर तुम ईमान के साथ दुनिया से रुख़्सत हुए तो तुम्हें मसर्रत व ख़ुशी हासिल होगी, वरना मेरी दुआ बे-सूद होकर रह जाएगी।


वसीयत

हज़रत उमर रज़ि॰ ने जब वसीयत करने के लिए फ़रमाया तो आपने कहा: ऐ उमर! अगर तुम ख़ुदा-शनास हो तो इससे ज़्यादा अफ़ज़ल कोई वसीयत नहीं कि तुम ख़ुदा के सिवा किसी दूसरे को न पहचानो। फिर पूछा: ऐ उमर! क्या अल्लाह तआला तुमको पहचानता है? आपने फ़रमाया: हाँ। हज़रत ओवैस क़रनी रज़ि॰ ने कहा: बस ख़ुदा के अलावा तुम्हें कोई न पहचाने, यही तुम्हारे लिए अफ़ज़ल है।


इस्तिग़्ना

हज़रत उमर रज़ि॰ ने ख़्वाहिश की कि आप कुछ देर उसी जगह क़ियाम फ़रमाएँ, मैं आपके लिए कुछ लेकर आता हूँ। तो आपने जेब से दो दिरहम निकाल कर दिखाते हुए कहा कि यह ऊँट चराने का मुआवज़ा है। अगर आप यह ज़मानत दें कि यह दिरहम ख़र्च होने से पहले मेरी मौत नहीं आएगी तो यक़ीनन आप जो जी चाहे इनायत फ़रमा दें, वरना यह दो दिरहम मेरे लिए बहुत काफ़ी हैं।

फिर फ़रमाया कि यहाँ तक पहुँचने में आप हज़रत को जो तकलीफ़ हुई उसके लिए मैं माफ़ी चाहता हूँ। अब आप दोनों वापस हो जाएँ क्योंकि क़यामत का दिन क़रीब है, मैं ज़ाद-ए-आख़िरत की फ़िक्र में लगा हूँ। फिर उन दोनों सहाबा की वापसी के बाद जब लोगों के क़ुलूब में हज़रत ओवैस रज़ि॰ की अज़मत पैदा हुई और मजमा लगने लगा, तो आप घबरा कर कूफ़ा में सकूनत-पज़ीर हो गए।


शहादत

आपकी शहादत जंग-ए-सिफ़्फ़ीन में हुई। हज़रत मौला अली मुर्तज़ा रज़ि॰ की हिमायत में जिहाद के लिए निकले और लड़ते हुए शहादत हासिल फ़रमाई।


हवाला किताबें

तज़किरतुल औलिया — फ़रीदुद्दीन अत्तार
सीरत-ए-हज़रत ओवैस क़रनी — प्रो॰ तुफ़ैल चौधरी

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