कुत्बे पीलीभीत हज़रात सरकार शाह जी मुहम्मद शेर मियाँ का नाम रूहानियत की दुनिया में किसी भी मोमिन के लिए अनजाना नहीं, आपका पूरा जीवन इल्म, रूहानियत, करामात, ताज़ीम-ए-रसूल और इंसानों की राहनुमाई से भरा हुआ है।
परिचय – जन्म और खानदान
हज़रत शाह जी मोहम्मद शेर मियाँ साहब क़िब्ला रहमतुल्लाह अलैह, हज़रत दीवाना बाबा की औलाद में से हैं, जो ख़ुरासान के मशहूर व मारूफ़ बुज़ुर्ग हैं, जिनका मुबारक नाम ख़ुरासान में मिस्ल-ए-सूरज के रौशन है और मजार शरीफ़ उनका बानीर में है,
शाह जी मियाँ साहब रहमतुल्लाह अलैह के दादा साहब ख़ुरासान से मुल्क-ए-हिंदुस्तान में तशरीफ़ लाए और शाहजहाँपुर में क़याम फ़रमाया। शाह जी मियाँ के वालिद का नाम मुहब्बत शेर ख़ान था। उनकी शादी पीलीभीत शरीफ़ में मोहम्मद इसहाक ख़ान साहब रहमतुल्लाह अलैह के यहाँ हुई थी और फिर आप वहीं रहने लगे।
हज़रत शाह जी मियाँ रहमतुल्लाह के तीन या पाँच भाई थे ,अली शेर ख़ान – वली शेर ख़ान – फ़तह शेर ख़ान – मोहम्मद शेर खान यह शाहजी मियाँ का नाम था और आप सबसे छोटे थे और सबसे बुज़ुर्ग भी।
शाह जी मियाँ पैदाइशी वली थे। बचपन में आपके सर पर पन्जाए ग़ैबी रहता था। आप बसा-औक़ात खुदा के जिक्र में मशग़ूल रहते थे। खेल-कूद और से परहेज़ करते थे। खाने-पीने की तरफ़ तवज्ज़ो नहीं फ़रमाते थे। लज़ीज़ खाने पर इल्तिफ़ात न फ़रमाते। अल्लाह अज़्ज़ व जल ने आपको बचपन ही में ख़ुल्क़-ए-मुहम्मदी ﷺ अता फ़रमाया।
आपने अपनी तमाम उम्र माँ बाप की खिदमत में गुजारी, इसी ग़रज़ से आपने अपनी शादी तक नहीं की, ताकि वालिदा माजिदा को किसी क़िस्म की तकलीफ़ न हो।
शाह जी मियाँ अपनी जवानी में कुश्ती का भी शौक़ रखते थे। आप बहुत बड़े पहलवान थे। आपकी गर्दन मुबारक में तीन आदमी लटक रहे होते, लेकिन आप बैठे से खड़े हो जाते। आप मिस्ल-ए-पहलवानों के खाने की तरफ़ रग़्बत न फ़रमाते। बल्कि जब आप कुश्ती का इरादा करते, तो बुध के दिन खाना छोड़ देते और जुमा की शाम को कुश्ती लड़कर खाना खाते थे।
हज़ूर शाह जी मियाँ के 12 मामू थे और ये सब बड़े अज़ीम बुज़ुर्ग थे। इनमें हज़रत नेमत शाह मियाँ क़िद्दसुस सिर्रहुल अज़ीज़ जिनका मजार मुबारक पीलीभीत में दरियाए ख़करा के किनारे पर है, बहुत ही अज़ीम बुज़ुर्ग थे।
आपकी वालिदा का नाम नूरजहाँ बेगम था।
आपकी वालिदा माजिदा निहायत बुज़ुर्ग और औलिया-ए-कामिलीन में से थीं। आप 16-16 फ़ाके करती थीं और ज़िक्र-ए-ख़ुदा में मशग़ूल रहती थीं। खाने की तरफ़ इल्तिफ़ात न फ़रमाती थीं। आख़िर उम्र में आपकी आंखों की रौशनी चली गई, मगर रूहानी ताकत यह थी कि उसकी रौशनी से दूर-दूर की चीज़ें आपको नज़र आती थीं। आप रौशन-ज़मीर थीं। शाह जी मियाँ फ़रमाया करते थे कि “एक चाँद और तारा आपकी आँखों के सामने हर वक़्त रहता था।” अगर कोई मेहमान सफ़र करके आने वाला होता तो आप उसके आने से पहले फ़रमा दिया करती थीं: “खाना तैयार करो, मेहमान आ रहे हैं।”
आपकी वालिदा का मज़ार मुबारक आज भी सरकार शाह जी मियाँ के नूरानी मज़ार के बिल्कुल क़रीब मौजूद है। आपके वालिद का क़ब्र-ए-अनवर भी वहीं है, हालाँकि ऊपर निशान नहीं है।
हुजूर शाहजी मियाँ के ज़माने के बड़े-बड़े आलिम, सूफ़िया और बुज़ुर्ग शाहजी मियाँ की विलायत के क़ायल थे। मशहूर सूफ़ी हज़रत ख़्वाजा हसन निज़ामी रहमतुल्लाह अलैह अपनी किताब “हिज्ब-उल-बहर” में लिखते हैं:
“बीस–पच्चीस साल पहले पीलीभीत में शाह जी मोहम्मद शेर मियाँ नाम के बुज़ुर्ग थे। उस समय पूरे हिंदुस्तान में चार बुज़ुर्ग बेहद मशहूर थे— अल्लामा फ़ज़्ल-ए-हक़ गंज-ए-मुरादाबाद, हाजी वारिस अली शाह देवा शरीफ़, ग़ौस अली शाह पानीपत, शाह जी मोहम्मद शेर मियाँ।”
हज-व-ज़ियारत
जब आप हज के लिए गए तो पूरे सफ़र में न आपने और न आपके साथियों ने खाना पकाया। हर दिन कोई अजनबी आकर खाना दे जाता यह नबी-ए-पाक की तरफ़ से करम की एक झलक थी, जब आप मदीना पहुँचे तो आपने खाना-पीना छोड़ दिया ये कहकर कि इस पाक शहर में ’क़ज़ा-ए-हाजत’ अदब के ख़िलाफ़ है।
आप पान खाते थे, लेकिन मदीना में पान की तलब होने पर भी खुद को रोकते रहे, आख़िरकार एक दिन करम-ए-मुस्तफ़वी ﷺ का जलवा हुआ, हुजूरﷺ की मुबारक जाली में से एक हाथ निकला और आपको पान का बीड़ा अता किया। सुफ़िया इसे आपकी बुलन्द रूहानियत और रसूलुल्लाह ﷺ की आप पर मेहरबानी का खुला सुबूत व करिश्मा बताते हैं।
करामत
- – हाजियों को बचाने की करामात
एक क़ाफ़िला हज के लिए समुद्री जहाज़ से जा रहा था, रास्ते में भयानक तूफ़ान ने जहाज़ को घेर लिया, कप्तान ने ऐलान कर दिया जहाज़ डूबने वाला है, जहाज़ में आपके मुरिद भी सवार थे, वे रो-रोकर आपको पुकारने लगे, एक मुरीद को ग़ुनूदगी हुई और उसने ख़्वाब में देखा शाह जी मियाँ तहबंद बाँधे, हाथ में लाठी लिए जहाज़ पर पहुँच गए उन्होंने फ़रमाया, “मेरे मुरीद! डर मत। अल्लाह बहुत बड़ा हाफिज़ है” आपने ज़ोर से “अल्लाह” को पुकारा, और अपने कंधे से जहाज़ को सहारा देकर उसे तूफ़ान से निकाल दिया! जब क़ाफ़िला वापस आया और मुरिद ने पूरी घटना बयान की तो सब हैरत में पड़ गए, क्योंकि: उसी वक़्त पीलीभीत में आप नाई से बाल बनवा रहे थे, अचानक उठे, हुजरे में गए, और देर बाद बाहर आए तो तहबंद भीगा हुआ और कंधे पर खून के निशान थे।
लोगों ने कारण पूछा पर आपने कुछ न बताया, बाद में जब मुरीद ने वही तारीख़ और समय बताया, तो लोगों को मालूम हुआ कि जहाज़ को कंधा देने से ही आपका कंधा जख़्मी हुआ था। - – इल्म के खज़ाना
कुछ लोग नादानी में कहते थे कि “शाह जी मियाँ बिना पढ़े हुए थे।” लेकिन हक़ीक़त यह है कि आपने अपने ज़माने के बड़े-बड़े उलमा और सूफ़िया को इल्म दिया, एक बार कुछ लोग आपका ‘इम्तिहान’ लेने आए, उन्होंने अरबी हदीस को “क़ुरान की आयत” कहकर आपसे उसका मतलब पूछा, आपको ग़ैरत-ए-ईमानी आई और फ़रमाया: “तुम्हें शर्म नहीं आती? हदीस को आयत कह रहे हो!” बस इतना सुनना था कि उनकी अक्ल ठिकाने आ गई और वो शर्मिंदा होकर लौट गए। - – अल्लाह-हू मियाँ की हाज़िरी
रूहानियत के आसमान के सितारे, सरकार अल्लाह-हू मियाँ भी आपके मुरीद हुए, उन्हें ख़्वाब में नबी-ए-पाक ﷺ ने फ़रमाया:
“पीलीभीत जाओ और मोहम्मद शेर के हाथ पर मुरीद हो जाओ, आपको भी उसी वक़्त इशारा मिला कि “हमारा शहज़ादा आ रहा है उसे मुरीद कर लेना।
जब वो आए, तो आपने फ़रमाया: “जिसने आपको भेजा है, उसी ने मुझे आपको मुरीद करने का हुक्म दिया है।”
अल्लाह-हू मियाँ अरबी दर्सी किताबों पर हाशिए लिखने वाले बड़े आलिम थे और ऐसे आलिम का शाहजी मियाँ के हाथ पर मुरीद होना शाहजी मियाँ के इल्मी मर्तबे की सबसे बड़ी दलील है।
- – एक मरतबा सरकार अल्लाह-हू मियाँ बारगाहे हुज़ूर शाह जी मियाँ में हाज़िर थे उस वक्त मोहर्रम के महीने के दिन थे, पीलीभीत शरीफ़ में हमेशा से ताज़ियों की धूम रही है और ताज़िया-दारी बड़ी शान व शौकत के साथ होती आई है सरकार शाह जी मियाँ ने सरकार अल्लाह-हू मियाँ को हुक्म फ़रमाया:
“मौलवी साहब! जाइए और ताज़ियों की ज़ियारत कर आइए।” सरकार अल्लाह-हू मियाँ हुक्म की तामील में ताज़ियों की ज़ियारत के लिए रवाना हुए।
आप वहाँ पहुँचे तो ज़ियारत में मशग़ूल हो गए और काफ़ी देर तक वहीं रहे जब आप वापस हाज़िर हुए तो सरकार शाह जी मियाँ ने फ़रमाया:
” मौलवी साहब! हमने आपको सिर्फ़ ताज़ियों की ज़ियारत के लिए भेजा था।
लेकिन आप कितनी देर बाद लौटे हैं क्या बात है?”
इस पर सरकार अल्लाह-हू मियाँ ने अदब से अर्ज़ किया: “हज़ूर! आपने ताज़ियों की ज़ियारत का हुक्म फ़रमाया था, लेकिन जब मैं वहाँ पहुँचा तो देखा कि वहाँ
हज़रत इमाम हसन और इमाम हुसैन (अलैहिमस्सलाम) तशरीफ फरमा हैं और अब आपके वसीले से मुझे उनकी ज़ियारत भी नसीब हो गई।”
- – एक मरतबा सैयद बदीउद्दीन शाह मदार साहब मकनपुरी रहमतुल्लाह अ़लैह के मजार शरीफ़ पर हज़ूर सरकार शाहजी मियाँ हाज़िर हुए। उस वक़्त उर्स का माहौल था। शाहजी मियाँ ने देखा कि उर्स में बहुत से फ़क़ीर रिंदाना मिज़ाज के जमा होते हैं।
इसी दौरान शाहजी मियाँ ने एक फ़क़ीर को देखा जो दरवाज़े पर रोज़ा मुबारक की चादर बिछाए बैठा था और उसके पास बहुत से पैसे रखे थे। वह बहुत कोशिश और ज़ोर देकर माँग रहा था। यह देखकर शाहजी मियाँ के दिल में ख़याल गुज़रा कि शाह मदार साहब के यहाँ फ़क़ीर रिंदाना मिज़ाज के होते हैं, कोई रोज़ा-नमाज़ का पाबंद नज़र नहीं आता।
इस वाक़ये को देखने के बाद जब हज़रत शाहजी मियाँ रात को बिस्तर-ए-इस्तिराहत पर पहुँचे, तो नींद में क्या देखते हैं कि वही रिंदाना फ़क़ीर साहब एक मिम्बर पर वाज़(भाषण) बयान फ़रमा रहे हैं और उनके पास बहुत सी मख़लूक़ जमा है। उनके चेहरे पर नूर है, बहुत खुशनुमा लिबास पहने हुए हैं और चारों तरफ़ हसीन माहौल है।
यह मंज़र देखकर शाहजी मियाँ की आँख खुल गई। ख़्वाब के ज़रिये शायद शाह मदार ने यह सबक़ दिया कि “ऐ शाहजी! किसी फ़क़ीर के रंग-ढंग, हालत या मिज़ाज को देख कर उसे कमतर मत जानो। मेरे यहाँ के फ़क़ीर रोज़-ए-क़ियामत ऐसा मरतबा पाएँगे।”
बैअत व खिलाफत
हज़ूर शाह जी मियाँ तमाम सिलसिलों की ख़िलाफ़त व बैअत रखते थे — क़ादरिया, चिश्तिया, सुहरवर्दिया, मदारिया। ये तमाम सिलसिले आपको अपने पीर ओ मुर्शिद हज़रत अहमद अली शाह साहिब रहमतुल्लाह अलैह से हासिल हुए। आपके सलासिल-ए-बैअत कुछ इस तरह हैं:
सिलसिला-ए-क़ादिरया
हज़रत रसूले मक़बूल मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम
हज़रत मौला अली करमल्लाहु वज्हुल करीम
हज़रत ख़्वाजा हसन बसरी अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा हबीब अजमी अलैहिर्रहमा
हज़रत दाऊद ताई अलैहिर्रहमा
हज़रत मारूफ़ करखी अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा सिर्री सक़ती अलैहिर्रहमा
हज़रत जुनैद बग़दादी अलैहिर्रहमा
हज़रत अबू बकर शिब्ली अलैहिर्रहमा
हज़रत शेख अब्दुल अज़ीज़ तमीमी अलैहिर्रहमा
हज़रत अब्दुल वाहिद तमीमी अलैहिर्रहमा
हज़रत अबुल फ़रज मोहम्मद तर्तूसी अलैहिर्रहमा
हज़रत शेख अबुल हसन हंक़ारी अलैहिर्रहमा
हज़रत अबू सईद मकख़ज़ूमी अलैहिर्रहमा
हज़रत शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद अब्दुर्रज़ाक़ अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद शरीफ़ुद्दीन क़त्ताल अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद अब्दुल वहाब अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद शाह बहाउद्दीन अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद शाह अकील अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद शम्सुद्दीन सहराई अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद शाह ग़दा रहमान अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद शाह शम्सुद्दीन आरिफ़ अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद शाह ग़दा रहमान सानी अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद शाह फ़ुज़ैल अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद शाह कमाल केथली अलैहिर्रहमा
हज़रत सय्यद शाह सिकंदर अलैहिर्रहमा
हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ि सानी सरहंदी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत मोहम्मद मअसूम रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद नक़्शबंद रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद ज़ुबैर रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत हाफ़िज़ जमालुल्लाह शाह रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शाह दरगाही रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत सय्यद अहमद अली शाह रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत पीर रोशन-ज़मीर शाह जी मोहम्मद शेर मियाँ रहमतुल्लाह अलैह
सिलसिला-ए-चिश्तिया
हज़रत रसूले मक़बूल मोहम्मद मुस्तफ़ा अलैहिस्सलातो वस्सलाम
हज़रत अली मुर्तज़ा करमल्लाहु वज्हुल करीम
हज़रत ख़्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत अब्दुलवाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत इब्राहीम बिन अदहम रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत हुज़ैफ़ा मरअशी शामी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ममशाद अली दिनूरी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत अबू इसहाक शामी चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा अबू अहमद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा अबू मोहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा अबू यूसुफ़ चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा मौदूद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत हाजी शरीफ़ ज़िंदानी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा क़ुत्बुद्दीन बख्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत बाबा फ़रीदुद्दीन गंजे-शक्कर रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत जलालुद्दीन मखदूम जहानियाँ जहांगश्त रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत सय्यद अजमल बह्राइची रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत पीर बुड्ढन बह्राइची रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत दरवेश मोहम्मद बिन क़ासिम अवधी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शेख अब्दुलक़ुद्दूस गंगोही रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शेख रुक्नुद्दीन गंगोही रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शेख अब्दुल अहद फ़ारूकी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ि सानी सरहंदी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत मोहम्मद मअसूम रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद नक़्शबंद रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद ज़ुबैर रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत हाफ़िज़ जमालुल्लाह शाह रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शाह दरगाही रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत सय्यद अहमद अली शाह रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत पीर रोशन-ज़मीर शाह जी मोहम्मद शेर मियाँ रहमतुल्लाह अलैह
सिलसिला-ए-नक़शबन्दिया
हज़रत रसूले मक़बूल मोहम्मद मुस्तफ़ा अलैहिस्सलातो वस्सलाम
हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु
हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु
हज़रत क़ासिम बिन मोहम्मद बिन अबी बकर रज़ियल्लाहु अन्हु
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम
हज़रत बायज़ीद बुस्तामी अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा अबुल हसन ख़र्कानी अलैहिर्रहमा
हज़रत अबू अली फ़ारमदी अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा यूसुफ़ हमदानी अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा अब्दुलख़ालिक़ अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा आरिफ़ अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा महमूद अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा अज़ीज़ान अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा बाबा समासी अलैहिर्रहमा
हज़रत अमीर कुलाल अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा बहाउद्दीन अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा अलाउद्दीन अत्तार अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा याक़ूब अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा उबैदुल्लाह अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद ज़ाहिद वली अलैहिर्रहमा
हज़रत दरवेश मोहम्मद अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद अलैहिर्रहमा
हज़रत ख़्वाजा अब्दुलबाक़ी अलैहिर्रहमा
हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ि सानी सरहंदी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत मोहम्मद मअसूम रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद नक़्शबंद रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद ज़ुबैर रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत हाफ़िज़ जमालुल्लाह शाह रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शाह दरगाही रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत सय्यद अहमद अली शाह रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत पीर रोशन-ज़मीर शाह जी मोहम्मद शेर मियाँ रहमतुल्लाह अलैह
सिलसिला-ए-मदारिया
हज़रत रसूले मक़बूल मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम
हज़रत मौला अली करमल्लाहु वज्हुल करीम
हज़रत ख़्वाजा हसन बसरी रज़ियल्लाहु अन्हु
हज़रत ख़्वाजा हबीब अजमी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु
हज़रत बायज़ीद बुस्तामी रज़ियल्लाहु अन्हु
हज़रत सय्यद बदीउद्दीन क़ुतुबुल-मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्ह
हज़रत सय्यद अजमल बह्राइची रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत पीर बुड्ढन बह्राइची रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत दरवेश मोहम्मद बिन क़ासिम अवधी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शेख अब्दुल क़ुद्दूस गंगोही रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शेख रुक्नुद्दीन गंगोही रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शेख अब्दुल अहद फ़ारूकी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ि सानी सरहंदी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत मोहम्मद मअसूम रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद नक़्शबंद रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद ज़ुबैर रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत हाफ़िज़ जमालुल्लाह शाह रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शाह दरगाही रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत सय्यद अहमद अली शाह रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत पीर रोशन-ज़मीर शाह जी मोहम्मद शेर मियाँ रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शाह जी मियाँ के तमाम पीरो मुर्शिद भी आला मक़ाम रखते थे। उन्हीं में एक हाफ़िज़ शाह जमालुल्लाह जो कि हज़ूर ग़ौसुस्सक़लैन महबूबे सु्ब्हानी शैख़ अब्दुलक़ादिर जीलानी के ख़ास पोते हैं और हज़रत हाफ़िज़ शाह जमालुल्लाह साहिब हज़ूर ग़ौस पाक के ही हुक्म से हिन्दुस्तान आए। हज़रत हाफ़िज़ शाह जमालुल्लाह की इबतदाई हालत यह है जिनके बारे में खुद शाह जी मियाँ फ़रमाते हैं कि हाफ़िज़ शाह जमालुल्लाह पैदाइशी वली थे और इबतदा ही से ज़िक्र व शुग़्ल व मुराक़बे में वक्त बसर करते थे। मख़लूक़ से अलैहिदगी पसन्द फ़रमाते थे और अक्सर जंगल में रहा करते थे और जिंदगी के शुरुआती हाल में मदारिया ख़ानदान से हाफ़िज़ शाह जमालुल्लाह को फ़ैज़ हासिल था।
हज़ूर शाह जी मियाँ का हज़रत अहमद अली शाह अलैहिर्रहमा से मुरीद होने का वाक़िआ कुछ इस तरह है कि हज़रत अहमद अली शाह भटपुरा से पीलीभीत तशरीफ़ लाए। हज़रत शाह जी मियाँ आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुए। मुलाक़ात होते ही हज़रत अहमद अली शाह साहिब अलैहिर्रहमा ने आपको शाह जी मियाँ का लक़ब अता किया और फ़रमाया आइए शाह जी मियाँ बैअत हासिल कीजिए। हज़ूर शाह जी मियाँ हाज़िर हुए। अहमद अली शाह साहिब अलैहिर्रहमा ने अपनी जेब से एक रुपया निकाल कर ख़ादिम को दिया और फ़रमाया इसके बताशे ले आओ। ग़र्ज़ यह कि हज़रत शाह जी मियाँ रहमतुल्लाह अलैह को बैअत से मुमताज़ फ़रमा कर ख़िलाफ़त दी और अपना तहबंद उसी वक़्त हज़रत शाह जी मियाँ को अता फ़रमाया और फ़रमाया इसको बाँध लो। आपने उसी वक़्त वह तहबंद ले लिया और अपने आप बाँध लिया। हज़रत शाह जी मियाँ अलैहिर्रहमा अपनी ज़बान मुबारक से फ़रमाते थे कि मुझ को यह मालूम दिया कि किसी ने बड़ा पहाड़ मेरे जिस्म पर रख दिया और उसकी गिरानी और बोझ की वजह से उठा बैठा नहीं जाता और मैं बेहोश हो गया, मारिफ़त के समन्दर में ग़र्क़ हो गया। सुब्हान अल्लाह! क्या शान है औलिया अल्लाह की, जिस को चाहते हैं एक लम्हे में ज़मीन से फ़लक पर और फ़लक से अर्शे मुअल्ला तक पहुँचा देते हैं और ताजदार ए मदीना का जलवा दिखा कर अल्लाह से मिलाते हैं।
पीलीभीत की ख़ुशक़िस्मती
पीलीभीत का शायद ही कोई घर हो जो आपके फ़ैज़ से महरूम हो। आज भी आपकी ख़ानक़ाह से इल्म, तालीम और रूहानियत का नूर बंट रहा है।
विसाल शरीफ़
आपने पूरी ज़िंदगी इल्म, मुहब्बत और फ़ैज़ बाँटा, 5 ज़िलहिज्जा 1324 हिजरी को आप इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हुए।
आपका मज़ार मुबारक मुहल्ला शेर मोहम्मद, पीलीभीत में स्थित है।
अधिक जानकारी के लिए आप हज़रत इन किताबों का अध्ययन करें —
“मसालिकुस्सालिकीन”, “बशहू़द ए ग़यू़ब”, “सीरत ए मशाइख़ क़ादरिया कदीरिया”, और “सवानिह उमरी हज़ूर शाह जी मियाँ”।
अल्लाह तआला हम सबको औलिया अल्लाह की ज़िन्दगी पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। हमारे दिलों में इल्म, मोहब्बत, अदब और ख़लूस भर दे। हमारी ज़िंदगी में बरकत, राहत, रहमत और नूर पैदा फरमाए। और हम सबको दीन-ए-हक़ की ख़िदमत की क़ुबूलियत बख्श दे। आमीन।॥
मदारी मीडिया एक भरोसेमंद और रूहानी इस्लामी ज्ञान का प्लेटफ़ॉर्म है, जहाँ सूफ़ी इतिहास, तसव्वुफ़, औलिया अल्लाह के हालात, मदारीया सिलसिले की जानकारी, नात-मनक़़बत, और रूह को सकून देने वाले लेख साफ़ और असरदार भाषा में पेश किए जाते हैं।
हमारी कोशिश है कि असल सूफ़ियाना तालीमात हर इंसान के दिल तक पहुँचे और उसकी ज़िंदगी में नूर भर दे।
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अल्लाह तआला आपकी मोहब्बत, सद्भाव और खिदमत को क़ुबूल फरमाए।
जज़ाकुमुल्लाह ख़ैर।







