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हज़रत सय्यदना इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम

On: जनवरी 9, 2026 4:35 पूर्वाह्न
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Story of Imam Jafar As Sadiq

सैयदुल-अरब, शरीफ़ुन्नसब, काबा-ए-मोमिनीन, क़िब्ला-ए-अहले-यक़ीन, सनदुस्साबिरीन, क़ाइदुल-ग़ुर्रुल-मुहज्जलीन, सैयदुस्सादिक़ीन, इमामुल-आलमीन, अस्सादिक़ुस्सिद्दीक़ नज्मुत्तारिक़ हज़रत सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ बिन मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन अली रज़वानुल्लाहि तआला अलैहिम अज्मईन

अज़्माए अहले-बैत में, शरफ़ाए उम्मत में, उलमाए मिल्लत में इस अज़ीमुश्शान हस्ती और पैकर-ए-जलील व जमी़ल का नाम सुनहरे हुरूफ़ से लिखा है। इमाम जाफ़र सादिक़ अहले-बैत के उस बुलंद रौशन मीनार का नाम है जिसे आसमानों की बुलंदियाँ, सितारे रौशनी झुक कर सलाम करती हैं, जिसकी नूरानी ज़ियाओं से चाँद, सूरज, सितारे रौशनी की ख़ैरात माँगते हैं।
मसनद-ए-इमामत हो या नज़ारत हो, पैग़ाम-ए-बशारत हो, तक़वा व तहारत हो, इबादत व रियाज़त हो, तफ़क़्क़ुह फ़िद्दीन हो, इल्म-ए-दीन हो या इल्म-ए-दुनिया—सब हज़रत जाफ़र सादिक़ के मरहून-ए-करम हैं।

इमामत-ए-उम्मत, ख़िलाफ़त-ए-रिसालत की सेज पर, गुलदस्ता-ए-पंजतन में अली व फ़ातिमा से जड़ और तने के साथ इमामत के महकते फूलों में ज़ीनत—मसनद-ए-इमामत—इमाम चहारुम, बीमार-ए-कर्बला हज़रत सैयदना इमाम ज़ैनुल-आबिदीन रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़माना-ए-इमामत की ताबानियों से पूरी काइनात मुनव्वर थी। वहीं पर इमाम पंजुम, हज़रत सैयदना इमाम मुहम्मद बाक़िर रज़ियल्लाहु अन्हु की इमामत की अबदी सआदतों से दुनिया बह्रावर हो रही थी। अफ़राद-ए-उम्मत इन क़ुदसी नुफ़ूस की दहलीज़ पर ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करने और नसीबे जगमगाते—यहाँ तक कि सन 80 हिजरी का निस्फ़ हिस्सा गुज़र चुका था।

17 रबीउन-नूर, सन 80 या 83 हिजरी की नूरी किरनों ने आफ़ाक़-ए-मदीना पर सुनहरी चादर फैलायी भी न थी कि उफ़ुक़-ए-इंसानियत पर ख़ुरशीद-ए-इमामत के मत्लअ-बार होने की ख़बर जानफ़ज़ा सदाए बाज़गश्त कर के फ़ज़ाओं में बिखर गई। अब क्या था—चारों तरफ़ से मुबारकबाद देने वालों का ताँता हज़रत सैयदना इमाम ज़ैनुल-आबिदीन और हज़रत सैयदना इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिमुस्सलाम के सामने लगा रहा।
17 रबीउल-अव्वल, सन 80 या 83 हिजरी में क़ासिम-ए-नेअमत-ए-इमामत हज़रत सैयदना इमाम मुहम्मद बाक़िर रज़ियल्लाहु अन्हु के घर एक सईद-ए-अज़ली की विलादत हुई।

नाम नामी, इस्म-ए-गरामी
जाफ़र रखा गया।

अलक़ाब
सादिक़ जैसे अशहरतरीन लक़ब के अलावा फ़ाज़िल और ताहिर जैसे अलक़ाब से दुनिया याद करती है।

कुनियत
अबू अब्दुल्लाह और अबू इस्माईल है।

हुलिया मुबारक
आप निहायत ही हसीन व जमी़ल, ज़ेबा-शकील, गंदुम-गूँ रंग, मौज़ूँ क़द के साथ-साथ सीरत व सूरत, हुस्न व जमाल में आबाए किराम का परतो-ए-ख़ास थे। इस तरेह-ए-इम्तियाज़ के साथ-साथ आप ऐसे सादिक़ थे कि दो मर्तबा हज़रत सिद्दीक़ अकबर के घर पैदा हुए, जैसा कि आप का क़ौल “वलदनी अस्सिद्दीक़ मर्रतैन” है। क्योंकि हुज़ूर इमाम जाफ़र की वालिदा मुक़द्दसा हज़रत उम्मे फ़रवा रज़ियल्लाहु अन्हा, जो दुहतर हैं हज़रत क़ासिम की—नबीरा हज़रत सैयदना सिद्दीक़ अकबर की—और हज़रत क़ासिम रज़ियल्लाहु अन्हा की वालिदा अस्मा हैं जो दुहतर हैं हज़रत अब्दुर्रहमान बिन अबी बक्र रज़ियल्लाहु अन्हुम की। इस इज़्ज़त व शरफ़ से जाफ़र सादिक़ को सादिक़ुस्सिद्दीक़ीन कर दिया गया।

फ़ज़ाइल व कमालात
बात इतने पर ख़त्म नहीं की जा सकती, बल्कि आप बेशुमार फ़ज़ाइल व कमालात के संगम थे। सुल्तान-ए-मिल्लत-ए-नबवी, बुर्हान-ए-दीन-ए-मुस्तफ़वी, नूर-ए-निगाह-ए-अली, पैकर-ए-तहारत-ए-फ़ातिमी, मुक़द्दम-ए-ज़ाहिदाँ, मुकर्रम-ए-आबिदाँ, नाज़िश-ए-कामिलाँ, मूनिस-ए-बेकसाँ, पेश-रव-ए-अहले-ज़ौक़, पेशवाए-अहले-शौक़ और बुज़अत-ए-पंजतन थे।

आदात व सिफ़ात
आदात व सिफ़ात में आप यगाना-ए-अस्र थे। इबादत व मुजाहिदात में मुस्तजाबुद्दआवात—आप का सानी और मुमासिल न था। सैयदुल-अतक़िया-ए-उम्मत होने के साथ-साथ ख़शियत-ए-इलाही इस दर्जा हासिल थी कि हमा-वक़्त ख़ौफ़-ए-ख़ुदा से लरज़ते और काँपते रहते थे।

उस दिन साथियों की हैरत का बंद टूट गया, जब आप ने फ़रमाया कि “साथियो! आज यह अहद व पैमान लें कि कल ब-रोज़-ए-महशर हम में से जो नजात का परवाना पाए, तो वह बाक़ी साथियों की शफ़ाअत करेगा।”
साथियों ने आबदीदा होकर कहा कि “ऐ इब्न-ए-रसूल! आप को हमारी शफ़ाअत की क्या ज़रूरत, जबकि आप शफ़ीउल-उम्मत के बेटे हैं।”
आप ने फ़रमाया कि “मुझे अपने रद्द-ए-अमल को देखकर शर्म आती है कि कल ब-रोज़-ए-महशर नाना जान के सामने कैसे जाऊँ।”
अल्लाह अल्लाह! सैयदुस्सादिक़ीन का यह अज्ज़ व तक़वा और ख़शियत—जिसे देखकर ता-ब-रोज़-ए-जज़ा मलाइका हैरान व शशदर रहेंगे।

इसी तरह ख़शियत-ए-इलाही की यह दूसरी मिसाल भी मुलाहिज़ा फ़रमा लें। एक मर्तबा हज़रत दाऊद ताई रज़ियल्लाहु अन्हु हाज़िर-ए-ख़िदमत हुए और अर्ज़ किया: “हुज़ूर! इस सियाह-क़ल्ब के लिए कोई नसीहत फ़रमाएँ।”
तो आप ने फ़रमाया कि “तू ख़ुद मुक़र्रब-ए-इलल्लाह है, तो मेरी नसीहत की क्या ज़रूरत है।”
हज़रत दाऊद ने अर्ज़ किया: “ऐ इब्न-ए-रसूल! आप पर वाजिब है कि अपने नाना की उम्मत को नसीहत करें, उनके ज़ाहिर व बातिन का तज़किया करें।”
आप की आँखें पुरनम हो गईं। फ़रमाया: “ऐ दाऊद! मैं इस बात से ख़ौफ़ज़दा रहता हूँ कि ब-रोज़-ए-हश्र अगर नाना जान ने मेरी फ़र्द-ए-अमल देख ली, तो क्या जवाब दूँगा।”
यह सुनकर हज़रत दाऊद बहुत रोए और अर्ज़ किया: “ऐ अल्लाह! जिसकी सरिश्त के तक़द्दुस के लिए आब-ए-नुबुव्वत लिया गया, जिसकी तबीयत का ख़मीर बुर्हान व हुज्जत से उठाया गया, जिसकी आँखों में ख़शियत-ए-इलाही का समुंदर इस तरह मौजज़न हो, जिसके दिल की हर धड़कन साज़-ए-ख़शियत से पुरसाज़ हो—उसकी ख़शियत और ख़ौफ़ का यह आलम हो, तो अब दाऊद किस पर नाज़ करे।”

हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ का इल्मी मक़ाम
मफ़ातिहुल-उलूम—हज़रत सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के इल्मी वक़ार व मक़ाम का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। अना मदीनतुल-इल्म की सच्चाइयों के वारिस और अली बाब-ए-हा के सच्चे अमीन की विरासत का वर्सा दार हो—उसके इल्म व फ़ज़्ल का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता।
चुनाँचे गहवारा-ए-इल्म में आँख खोलने के बाद हज़रत इमाम सादिक़ ने बचपन में ही क़ुरआन मजीद हिफ़्ज़ कर लिया। बादहू इल्म-ए-हदीस और उसकी रवात के इल्म की तिश्नगी ने तड़पाया, तो अपने दादा-ए-मुहतर्म बीमार-ए-कर्बला हज़रत सैयदना इमाम मुहम्मद बाक़िर रज़ियल्लाहु अन्हु के दामन-ए-शफ़क़त व मुहब्बत से लिपट कर इल्म-ए-हदीस हासिल किया।
अभी चंद साल ही हासिल कर पाए थे कि दादा मुहतर्म का साया-ए-ज़ाहिरी सर से उठ गया। गरचे आप की उम्र-ए-शरीफ़ 13/14 साल की ही हुई होगी, मगर फिर भी ज़ख़ीरा-ए-इल्म को ख़ाना-ए-दिल में जमा कर लिया।
दादा जान की शहादत के बाद आप ने नाना जान हज़रत क़ासिम बिन मुहम्मद से इल्म-ए-हदीस हासिल किया। दादा और नाना—इन दो बुज़ुर्गों के चश्मा-ए-इल्म से ख़ूब-ख़ूब सेराब हुए। इसके बाद इमाम पंजुम हज़रत सैयदना इमाम मुहम्मद बाक़िर रज़ियल्लाहु अन्हु से इल्म-ए-हदीस में मुकम्मल इस्तिफ़ादा किया।
इनके अलावा भी कई शुयूख़ व असातिज़ा अकाबिर मुहद्दिसीन से अहादीस-ए-मुबारका रिवायत कीं, जैसे—अता बिन अबी रबाह, नाफ़े (मौला इब्न उमर) और इमाम ज़ुहरी वग़ैरह से।
हुसूल-ए-इल्म में इस क़दर मेहनत की और ऐसे कमाल के आलिम हुए कि वक़्त के आइम्मा-ए-मुहद्दिसीन, आइम्मा-ए-फ़िक़्ह व तफ़सीर—गरज़ कि हज़रत इमाम मालिक, हज़रत इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा, हज़रत सुफ़यान सौरी बिन उयैना व ग़ैरहुम ने ख़ूब-ख़ूब इस्तिफ़ादा किया।

हज़रत इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा ने तक़रीबन दो साल तक आप की ख़िदमत में रह कर इल्म-ए-दीन हासिल किया, और ये वही दो साल इमाम साहब के हासिल-ए-ज़िंदगी थे। जैसा कि आप ने ख़ुद फ़रमाया है:
“लौला अस्सनतान लहलक अन-नुमान”
यानी मेरी ज़िंदगी के वे दो साल न होते, जिनमें मैंने इमाम जाफ़र से इल्म हासिल किया, तो नुमान हलाक हो जाता।

उरूज-ए-बुज़ुर्गी का यह दिलचस्प इत्तेफ़ाक़ मुलाहिज़ा करें
कि हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु अन्हु और इमाम-ए-आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु की तक़रीबन उम्र एक थी, एक ही सन-ए-विलादत भी, मगर जब हज़रत इमाम-ए-आज़म की मुलाक़ात इमाम जाफ़र सादिक़ से हुई तो आप उनके इल्म के आगे टिक न सके और फ़रमाया कि “मा रअयतु अहदन अफ़क़ह मिन जाफ़र बिन मुहम्मद” यानी मैंने इमाम जाफ़र बिन मुहम्मद बाक़िर से ज़्यादा फ़क़ीह किसी को नहीं देखा। और ज़ानू-ए-तल्मुज़ ख़म करके उलूम-ए-नबविया हासिल किए।

मुवफ़्फ़क़ मक्की अल-मनाक़िब में लिखते हैं कि अबू जाफ़र मंसूर ने कहा कि अबू हनीफ़ा! लोग जाफ़र बिन मुहम्मद पर बड़े फ़रीफ़्ता हैं, इनके लिए कुछ मुश्किल मसाइल बना दीजिए। इमाम-ए-आज़म ने उनके लिए चालीस मुश्किल सवाल तैयार किए। इमाम-ए-आज़म फ़रमाते हैं कि जब मैं हीरा के मक़ाम पर मंसूर के दरबार में आया तो वहाँ इमाम जाफ़र उसके दाएँ जानिब जलवा-फ़रमा थे। उनसे इस क़दर मरऊब हुआ कि मंसूर से भी न हुआ था। मैंने सलाम किया, उन्होंने बैठने का इशारा किया, मैं बैठ गया। मंसूर हज़रत जाफ़र सादिक़ से मुख़ातिब होकर बोला: अबू अब्दुल्लाह! यह अबू हनीफ़ा हैं। जाफ़र सादिक़ बोले: अच्छा। फिर मंसूर मेरी तरफ़ मुतवज्जेह हुए और कहा कि अबू अब्दुल्लाह से वे मसाइल पूछिए।
अबू हनीफ़ा फ़रमाते हैं कि मैं पूछता जाता और आप जवाब देते जाते और फ़रमाते जाते कि तुम इराक़ी लोग यूँ कहते हो, अहले-मदीना का यह क़ौल है और हमारा यह ख़याल है। कभी हमारे मुताबिक़ फ़तवा देते और कभी उनके, कभी हमारी मुख़ालफ़त करने लगते, यहाँ तक कि चालीस मसाइल ख़त्म हुए, कोई मसअला बाक़ी न छोड़ा। इस वाक़िए से मालूम हुआ कि इमाम-ए-आज़म ने पहली ही मुलाक़ात में भाँप लिया था कि फ़िक़्ह में इमाम जाफ़र का एक ख़ास मक़ाम है।
(हयात हज़रत अबू हनीफ़ा)

हज़रत अल्लामा अब्दुर्रहमान जामी रहमतुल्लाह अलैह शवाहिद-उन-नुबुव्वत में लिखते हैं कि आप अज़माए-अहले-बैत से हैं और उनमें से तमाम से अअलम हैं, और इस क़दर कि कसरत-ए-उलूम जो उनके क़ल्ब पर नाज़िल हुए, उनका अहाता फ़हम-ओ-इदराक नहीं कर सकते। और भी उलूम आप से रिवायत किए जाते हैं। कहा जाता है कि किताब जफ़्र जो अब्दुल मोमिन के तवस्सुत से मग़रिब में राइज है, वह आप ही का कलाम है। यह किताब जफ़्र के नाम से मशहूर है, जो आपके असरार-ए-उलूम पर मुश्तमिल है, और इसका तज़किरा हज़रत सैयदना इमाम अली इब्न मूसा के मल्फ़ूज़ात में सरीहन पाया जाता है। यही वजह है कि जिस वक़्त मामून रशीद ने आपको अपना वली-अहद मुक़र्रर किया तो आपने फ़रमाया कि जफ़्र और जामिआ दोनों एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हैं। आप इस दावे में सच्चे थे। क्योंकि आप फ़रमाया करते थे कि हमारे इल्म ग़ाबिर व मज़बूर हैं, जिसे हम सीनों में छुपाए रखते हैं और कानों तक पहुँचा देते हैं। फिर हमारे पास जफ़्र-ए-अहमर, जफ़्र-ए-अबीज़, जफ़्र-ए-फ़ातिमा भी है। लेकिन इल्म-ए-जामिआ में वह तमाम चीज़ें पाई जाती हैं जिनसे लोगों को वास्ता रहता है, उनकी तफ़सीर व तशरीह भी लोग हमसे पूछा करते हैं।

आपने फ़रमाया कि ग़ाबिर वह इल्म है जिसकी रौशनी में मुस्तक़बिल के तमाम हालात से आगाही हासिल होती है। और मज़बूर वह इल्म है जिसकी रौशनी से गुज़श्ता वाक़िआत का इल्म होता है। और वह इल्म जो दिल में पोशीदा होता है उसका नाम इल्हाम है। और वह जो लोगों के कानों तक पहुँचता है, वह मलाइका की बातें हैं, जिनको हमारे कान ही सुन सकते हैं और कोई उन शख़्सियतों को नहीं देख सकता। लेकिन जफ़्र-ए-अहमर हुज़ूर अलैहिस्सलाम का एक क़िस्म का असलिहा है, जो हम अहले-बैत कभी भी ज़ाहिर नहीं करते जब तक कि अहले-बैत से अमन और बरकत हासिल करना मक़सूद न हो। लेकिन जफ़्र-ए-अबीज़ से मुराद यह है कि तौरात, इंजील, ज़बूर और क़ुरआन-ए-पाक के तमाम उलूम हासिल किए जाएँ।
(शवाहिद-उन-नुबुव्वत)

(नोट: जफ़्र-ए-अबीज़ हज़रत सरकार सैयद नामदार-उल-आलमीन रज़ियल्लाहु अन्हु को बतौर विरासत हासिल हुआ, फिर आपसे दो-चंद मख़्सूस ख़ुलफ़ा को भी मुंतरशिह हुआ।)

आगे तहरीर फ़रमाते हैं कि मुस्हफ़-ए-फ़ातिमा से मुराद यह है कि उसमें वह तमाम वाक़िआत व अस्मा मौजूद हैं जो क़ियामत तक ज़ाहिर होने वाले हैं। जामिआ एक ऐसी किताब है जो सत्तर गज़ लंबी है, उसकी इबारत हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तरतीब दी है। उसको हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपने हाथ से लिखा। क़ियामत तक इंसानों की ज़रूरत की हर चीज़ उसमें मौजूद है, यहाँ तक कि दियत से लेकर कोड़े और आधे कोड़े की सज़ा भी है।
(शवाहिद-उन-नुबुव्वत)
हज़रत इमाम सादिक़ के इल्म का अंदाज़ा लगाना मुहाल है।

ख़वारिक़ व करामात
नरम-मिज़ाजी, आज़िज़ी और इन्किसारी जिस तरह आदत व फ़ितरत में दाख़िल थी, उसी तरह करामत भी रब ने ख़ूब-ख़ूब अता की थीं, बल्कि आप सरापा करामत थे। मुहक़्क़िक़ीन ने आपकी बहुत-सी करामात तहरीर फ़रमाई हैं। यहाँ बजह-ए-इख़्तिसार चंद करामात का तज़किरा कर रहा हूँ।

मुर्दा गाय ज़िंदा हो गई:
रावी का बयान है कि मैं हज़रत इमाम जाफ़र की मअय्यत में मक्का-ए-मुअज़्ज़मा की एक गली से गुज़र रहा था। अचानक एक औरत पर नज़र पड़ी जो अपने बच्चों के साथ एक मुर्दा गाय के सामने गिरया-ओ-ज़ारी में मशग़ूल थी। ऐसा लगता था कि जैसे सरमाया-ए-हयात की तमाम तर लज़्ज़तें और करवटें उस गाय की ज़िंदगी से वाबस्ता हों। गिरया-ओ-ज़ारी के साथ आशुफ़्ता-हाली की दास्तान उसकी भीगी पलकों से ज़ाहिर थीं। ग़ुरबत-ओ-इफ़्लास में एक ही सहारा था, जिसे वह खोकर कैसे चुप बैठती। मगर उसे क्या मालूम कि किसी के क़दम-ए-नाज़ उसकी ख़ज़ाँ-बार ज़िंदगी को रश्क-ए-बहार बना देंगे।
हज़रत जाफ़र सादिक़ को उसके हाल पर तरस आया। फ़रमाया कि क्या तुम यह चाहती हो कि गाय को दोबारा ज़िंदगी अता कर दी जाए? परेशान औरत ने अजीब नज़रों से देखा और पूछा: क्या हुज़ूर आप इस ग़ुरबत-ज़दा से मज़ाक़ नहीं कर रहे हैं?
आपने फ़रमाया: नहीं, यह अल्लाह की क़ुदरत का करिश्मा देखो। फिर आपने दुआ के लिए हाथ उठा दिए। फिर आपने उसके सर और पाँव को छूकर उसे आवाज़ दी, तो वह ज़िंदा होकर उठी और आपके क़दमों का बोसा देने लगी।

ख़ज़ाँ-रसीदा बाग़ पर जान-ए-बहार का तसर्रुफ़
ख़ज़ाँ की ज़द में आए उजड़े हुए बाग़ से फल तो क्या कोई साए की भी उम्मीद नहीं रख सकता। मगर इमाम जाफ़र सादिक़ पत्थर निचोड़ कर पानी निकाल सकते हैं, सूखे दरख़्तों से फल क्या मआनी।
रावी का बयान है कि हम हज़रत जाफ़र सादिक़ के हमराह अर्कान-ए-हज अदा करने जा रहे थे। आराम की ग़र्ज़ से खजूर के एक सूखे बाग़ में ठहरे। भूख का भी एहसास था। मैंने देखा कि हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ के लब्हाए मुबारका जुम्बिश में हैं। आप क्या पढ़ रहे थे, मेरी समझ में नहीं आया। फिर आप सूखे दरख़्तों से यूँ मुख़ातिब हुए कि अल्लाह तआला ने तुम में जो हमारे लिए रिज़्क़ वदीअत किया है, वह हमें पहुँचा कर हमारी ज़ियाफ़त करो। आपका यह फ़रमान क़ुदसी ज़बान-ए-शीरीं बयान जैसे ही खजूर के दरख़्तों ने सुना, एक दम सब के सब ख़ुशों से लद गए और लटकते हुए तर ख़ुशों के साथ एक-एक दरख़्त झुक गया। आपने फ़रमाया कि आओ और बिस्मिल्लाह पढ़ कर खाओ। मैंने आपके हुक्म की तामील में खजूरें खाईं और ऐसी मीठी खजूरें मैंने कभी खाईं भी न थीं।
उस जगह एक अराबी भी था। उसने कहा कि आज तक मैंने ऐसा जादू नहीं देखा था। आपने फ़रमाया कि ऐ अराबी! मैं इब्न-ए-रसूल हूँ, कोई साहिर और काहिन नहीं। मुझ से करामतों का सुदूर होता है, न कि जादू का। अगर तू मुझे आज़माना चाहता है तो मैं तेरी सूरत को कुत्ते की शक्ल में मुन्तक़िल कर देता हूँ। उसने कहा कि अगर वाक़ई साहिब-ए-करामत हो तो कर के दिखाओ। तो आपने उस अराबी को कुत्ता बना दिया। वह वहाँ से भागा। इमाम जाफ़र ने फ़रमाया कि तुम इसके साथ-साथ जाओ। चुनाँचे मैं इसके साथ-साथ गया। देखा कि वह अपने घर में दाख़िल हुआ और अपनी बीवी-बच्चों के सामने दुम हिलाने लगा, तो घर के लोगों ने डंडा मार-मार कर भगा दिया। वापस आकर मैंने सारी दास्तान इमाम साहब को सुना दी। इतने में वह कुत्ता भी आ गया और जाफ़र सादिक़ के सामने ज़मीन पर लोटने लगा, अश्कबार आँखों से इल्तिजाई हालत में रहम की भीख माँग रहा था। तो इमाम जाफ़र ने उसके हाल-ए-ज़ार पर तरस खाया और दुआ फ़रमाई तो अल्लाह ने उसकी अस्ली सूरत लौटा दी।

क़ासिम-ए-जन्नत जाफ़र सादिक़
ताजदार-ए-ख़ल्क़त मालिक-ए-जन्नत हज़रत जाफ़र सादिक़ की बख़्शिश व अता का क्या कहना। जब सख़ावत का दरिया जोश में हो तो दुनिया की नाज़-ओ-नअम क्या, जन्नत के महल बाँटते हैं। जैसा कि तारीख़ बतलाती है कि आप मसनद-ए-इमामत पर मुतमक्किन थे। एक शख़्स हाज़िर-ए-दरबार हुआ। दस हज़ार दिरहम देकर कहा कि हुज़ूर! ये दिरहम रख लें, मैं हज को जा रहा हूँ। इससे आप मेरे लिए एक बेहतरीन सराय ख़रीद लें, ताकि वापसी के बाद अपने बीवी-बच्चों को लेकर उसी सराय में मुतवत्तिन हो सकूँ। यह कह कर वह हज के लिए चला गया।
हज करके जब वापस हुआ तो सबसे पहले आपकी ख़िदमत-ए-आलिया में हाज़िर हुआ और पूछा कि हुज़ूर! आपने मेरे लिए सराय ख़रीद ली? आपने फ़रमाया कि जन्नत में मैंने तुम्हारे लिए सराय ख़रीद ली है। और यही सराय है जिसकी पहली हद सरवर-ए-कौनेन ﷺ पर, दूसरी मौला अली पर, तीसरी इमाम हसन पर, चौथी इमाम हुसैन पर ख़त्म होती है। यह बता कर आपने एक रक़आ यानी अथॉरिटी लेटर लिखा। वह बहुत ख़ुश हुआ और उस परवाने को लेकर अपने घर आ गया। कुछ दिनों के बाद वह बीमार हो गया तो उसने वसीयत की कि जब मैं मर जाऊँ तो इस रक़आ-ए-नजात को मेरी क़ब्र में रख देना। चुनाँचे उसकी मौत के बाद लवाहिक़ीन ने ऐसा ही किया, क़ब्र में रख कर चले आए। जब दूसरे दिन देखा गया तो वही परवाना उसकी क़ब्र पर पड़ा था, जिसके पीछे लिखा था कि “जाफ़र ने जो वादा किया, वह ईफ़ा किया गया।”
(मुलख़्ख़सन् शवाहिद-उन-नुबुव्वत)

शहादत
हज़रत सैयदना जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की जब उम्र-ए-शरीफ़ अड़सठ (68) साल की हुई तो ख़ास्सा-ए-ख़ानदान-ए-अहले-बैत के तौक़ ने गर्दन सजाने की पूरी तैयारी कर ली। शहादत का एक जाम था जो लब्हाए इमाम से लग कर मुशर्रफ़ होना चाहता था। एक मौत थी जो अबदी ज़िंदगी तक पहुँच चुकी थी। चुनाँचे वह वक़्त क़रीब आया जिसमें बादशाह अबू जाफ़र मंसूर ने आपको ज़हर दिलवा दिया। इस तरह पंद्रह रजब बروز पीर 148 हिजरी में आपकी शहादत हुई।

मज़ार-ए-पर्नोवार
आपके वालिद-ए-गिरामी हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर और दादा हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन और उनके बड़े बाप हज़रत सैयदना इमाम हसन मुज्तबा रज़वानुल्लाहि अलैहिम अज्मईन के पहलू में जन्नतुल-बक़ीअ में दफ़न किया गया।

इरशादात व फ़रमूदात
आपके ज़रीं अक़वाल का शुमार नामुमकिन है। जिस तरह आपकी हयात-ए-तय्यिबा को समझना आसान नहीं है, उसी तरह आपकी ज़बान-ए-सिद्क़ से निकले फ़रमूदात व नसीहतें भी अहले-इल्म-ओ-फ़न की समझ से बालातर हैं। यह एक ऐसा गंज़ीना-ए-बेबहा है जिसमें हर क़िस्म की नसीहतों का बह्र-ए-ज़ख़ार छुपा है।

☆ आप फ़रमाते हैं: बे-अमल दाई की मिसाल उस तीर-अंदाज़ की सी है जो बग़ैर कमान के तीर फेंकना चाहता हो।

☆ आपने हज़रत सुफ़यान स़ौरी से फ़रमाया कि नेकी तीन चीज़ों से पूरी होती है:
(1) उसको जल्दी करने से
(2) छोटा समझने से
(3) और छुपाने से।

☆ जब दुनिया किसी इंसान के पास आती है तो उसे ग़ैरों की ख़ूबियाँ दे देती है, और जब उससे मुँह फेर लेती है तो उसकी ज़ाती ख़ूबियाँ भी उससे छीन लेती है।

☆ जब तुझे अपने भाई से ऐसी चीज़ पहुँचे जो तू नापसंद करता है तो उसके लिए एक उज़्र से सत्तर उज़्र तलाश कर। अगर तुझे उसके लिए कोई उज़्र न मिले तो यूँ कहे कि शायद उसके लिए कोई उज़्र हो, मुझे मालूम नहीं।

☆ चार चीज़ें हैं जिनसे शरीफ़ इंसान को आर न चाहिए:
वालिद की ताज़ीम के लिए खड़ा हो जाना,
अपने मेहमान की ख़िदमत करना,
अपने चौपाए की ख़बर लेना, ख़्वाह उसके सौ ग़ुलाम हों,
अपने उस्ताद की ख़िदमत करना।

☆ ज़्यादा हँसी-मज़ाक़ से बचो कि इससे चेहरे की रौनक़ जाती रहती है।

☆ जो शख़्स बग़ैर ख़ानदानी जत्थे की क़ुव्वत व इज़्ज़त और बग़ैर बादशाहत के रौब व हैबत चाहता है, उसे चाहिए कि नाफ़रमानी की ज़िल्लत-भरी ज़िंदगी छोड़ कर फ़रमाबरदारी की पुर-इज़्ज़त ज़िंदगी शुरू करे।

☆ किसी को माफ़ करके पछताना मुझे इससे ज़्यादा पसंद है कि किसी को सज़ा देकर पछताऊँ।

☆ उलमा अमानत-ए-अंबिया के हामिलीन हैं। जब तुम देखो कि उलमा बादशाहों की तरफ़ माइल हो रहे हैं तो उन उलमा को मुतहम्म समझो।

☆ जब तुम अपने दोस्त के घर जाओ तो उसकी तरफ़ से हमह-क़िस्मी इकराम क़बूल कर लेना, मगर उसकी ख़ास नशिस्तगाह पर न बैठना।

☆ तक़वा से अफ़ज़ल कोई तोशा नहीं, ख़ामोशी से बेहतर कोई शै नहीं, जहालत से ज़्यादा नुक़सानदेह कोई दुश्मन नहीं, और झूठ से बड़ी कोई बीमारी नहीं।

औलाद-ए-अमजाद
आपकी औलाद-ए-अमजाद में कुल छह शहज़ादे और एक शहज़ादी थीं।
शहज़ादों के इस्माए-गरामी: हज़रत इस्माईल, हज़रत मुहम्मद, हज़रत अली, हज़रत अब्दुल्लाह, हज़रत इस्हाक़, हज़रत मूसा काज़िम।
साहिबज़ादी: हज़रत उम्मे फ़रवा, जिनको इब्नुल-अख़ज़र ने फ़ातिमा लिखा है।

ख़ुलफ़ा-ए-किराम
आपकी दीनी ख़िदमात की तारीख़ पढ़ी जाए तो बख़ूबी वाक़िफ़ियत होगी कि आपके फ़ैज़-ए-रूहानी से मुस्तफ़ीद होने वाले कैसे-कैसे अफ़राद हैं। बाज़-बाज़ तो आलमगीर जमाअत की हैसियत रखते हैं, जैसे हज़रत इस्माईल, हज़रत मूसा काज़िम, हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा, हज़रत सुल्तानुल-औलिया बायज़ीद बिस्तामी रज़ियल्लाहु अन्हुम।

नोट: हज़रत इमाम इस्माईल रज़ियल्लाहु अन्हु आपके बड़े साहबज़ादे हैं। सरकार क़ुत्बुल-मदार हलब़ी मकनपुरी का शजरा-ए-नसब आपसे होता हुआ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तक पहुँचता है।

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अमीरुल-क़लम: मौलाना सैयद अज़बर अली जाफ़री मदारी

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