तआरुफ
आपका इस्मे गिरामी जाफर सादिक और कुन्नियत अबू-मुहम्मद है। आपके मनाकिब व करामात के मुतअल्लिक जो कुछ भी तहरीर किया जाये बहुत कम है। क्योंकि आप उम्मते मुहम्मदी के लिये न सिर्फ बादशाह और हुज्जते नब्वी के लिए रौशन दलील हैं बल्कि सिद्क व तहकीक पर अमल पैरा, औलिया-ए-किराम के बाग का समर, आले अली, सरदारे अंबिया के अज़ीज़ और सही मायनों में वारिसे नबी भी हैं॥ आपकी अज़मत व शान के एतेबार से उन खिताबात को किसी तरह भी गैर मौजूं नहीं कहा जा सकता।
आपका दर्जा सहाब-ए-किराम के बाद ही आता है लेकिन अहले-बैत में शुमूलियत की वजह से न सिर्फ बाबे तरीकत ही में आपसे इरशादात मंकूल हैं। बल्कि बहुत सी रिवायतें भी हैं और उन्हीं कसीर इरशादात में से बाज़ चीजें बतौरे सआदत हम यहाँ ब्यान कर रहे हैं, और जो लोग आपके मसलक पर अमल पैरा हैं वह गोया बारह इमाम के मसलक पर गामज़न हैं क्योंकि आपका मसलक बारह इमाम के मसलक का कायम मकाम है अगर सिर्फ तन्हा आप ही के हालात व मनाकिब ब्यान कर दिये जायें तो वह बारह इमामों के मनाकिब का ज़िक्र तसव्वुर किया जायेगा।
नाम व नसब
आप अलैहिस्सलाम का नाम जाफ़र था और आप हज़रत इमाम बाक़िर के साहबज़ादे थे। आप की वालिदा हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ की पोती उम्मे फ़रवा थीं। आप की कुनियत अबू अब्दुल्लाह और मशहूर लक़ब सादिक़ था, और आप को यह लक़ब इस वजह से मिला कि ज़िंदगी भर आप से किसी ने झूठ नहीं सुना। हालांकि इस मशहूर लक़ब के अलावा आप के और भी कई अल्क़ाब थे जैसे साबिर, फ़ाज़िल और ताहिर, मगर मारूफ़ लक़ब वही सादिक़ ही था जिससे आप ने दुनिया में शोहरत पाई।
विलादत
आप 8 रमज़ानुल मुबारक 80 हिजरी में मदीना मुनव्वरा में पैदा हुए।
हुलिया मुबारक
आप का एतिदाल के साथ दरमियाना क़द था, न बहुत लम्बा और न बहुत छोटा। चेहरा मुबारक सफ़ेद सुर्ख़ी माइल (निहायत ख़ूबसूरत) और चमकदार था। लिखा है कि चेहरा इस हद तक नूरानी और चमकदार था जैसे कोई चिराग़ रोशनी बिखेर रहा हो। सर के बाल सियाह और क़दरे घुँघरियाले थे। नाक बुलंदी माइल थी। पेशानी बालों से बिल्कुल साफ़ थी जिससे चेहरा और ज़्यादा रौशन लगता था। और रुख़सार पर एक सियाह तिल था। यह आप के दौर-ए-शबाब का हुलिया मुबारक है, बढ़ापे में इस पर रौनक़ व वक़ार और जलाल व हैबत का इज़ाफ़ा हो गया था।
लिबास
आप साफ़-सुथरा और उम्दा लिबास पहनते थे, देखने वालों को अच्छी सूरत व हैअत में नज़र आते थे। ख़ुसूसन जब दर्स-ए-हदीस के लिए तशरीफ़ लाते तो निहायत ही ख़ुशनुमा लिबास, और चेहरा, और सर के बाल वग़ैरह सँवार कर आते और फ़रमाते: मैं इस बात को नापसंद करता हूँ कि अल्लाह तआला ने इंसान को कोई नेअमत दे रखी हो और वह उसको ज़ाहिर न करे। फिर फ़रमाते: ख़ूबसूरत लिबास पहना करो, क्योंकि अल्लाह तआला ख़ूबसूरत है और ख़ूबसूरती को पसंद करता है, लेकिन इसका ख़याल रखो कि वह लिबास हलाल माल से हो।
आप इस ग़र्ज़ से भी उम्दा लिबास ज़ेब-ए-तन फ़रमाते थे ताकि हल्का और मोटा झूठा लिबास पहनने की वजह से लोग आप को ज़ाहिद (दुनिया से बे-रग़बत) इंसान न समझें और रियाकारी न हो, गोया अपनी सिफ़त-ए-ज़ुह्द (दुनिया से बे-रग़बती) को रियाकारी से बचाने के लिए आप उम्दा लिबास का इस्तेमाल फ़रमाते थे।
आप अंगूठी भी पहनते थे और अंगूठी पर ये कलिमात नक़्श थे:
मा शा अल्लाह ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह अस्तग़फ़िरुल्लाह
(गोया अल्लाह की ताक़त व क़ुदरत और अपने गुनहगार होने का हर वक़्त ध्यान रहता)।
औलाद
आप के छह साहबज़ादे और एक साहबज़ादी थीं, जिन के नाम दर्ज़-ए-ज़ैल हैं: इस्माईल, मुहम्मद अली, अब्दुल्लाह, इस्हाक़, मूसा काज़िम, और साहबज़ादी का नाम फ़रवा था।
ज़ौक़-ए-इबादत
बहुत सारे उलमा ने आप का तआरुफ़ कराते वक़्त आप को इबादत-गुज़ार आलिम के तौर पर ज़िक्र किया है, जिसका कुछ नमूना ऊपर गुज़रा। हालांकि इमाम मालिक अपना ज़ाती मुशाहिदा बयान करते हुए फ़रमाते हैं: मैं एक अरसा-दराज़ तक इमाम जाफ़र सादिक़ के पास आता-जाता रहा। मैं जब भी उनके पास जाता तो उन्हें इन तीन आमाल में से किसी एक अमल में देखा: या तो वह नमाज़ में मशग़ूल होते, या रोज़े की हालत में होते और या क़ुरआन मजीद की तिलावत में मसरूफ़ होते। और आप बे-मक़सद और बे-फ़ायदा कोई बात नहीं करते थे। बिला-शुबह आप उन उलमा में से थे जिन की ज़िंदगी इबादत से मामूर थी और जिन के दिल ख़ौफ़-ए-इलाही से सरशार थे।
सख़ावत
आप जिस अज़ीम ख़ानदान के फ़र्द थे, वह सख़ावत में मारूफ़ बल्कि ज़र्बुल-मसल था। हज़रत अली को अस्ख़ल-अरब (यानी अरबों का सबसे सखी आदमी) कहा जाता था, और हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन के बारे में मशहूर है कि अहल-ए-मदीना के सौ (100) घरानों की ख़ुफ़िया कफ़ालत उन्होंने अपने ज़िम्मे ले रखी थी। सख़ावत का बिल्कुल यही रंग, बल्कि यही तर्ज़ हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ में था कि वह भी अपने दादा के नक़्श-ए-क़दम पर चलते हुए रात की तारीकी में अपनी पीठ पर बोरी लादते, जिसमें दिरहम और खाने-पीने का सामान होता, और जाकर अहल-ए-मदीना के हाजतमंद लोगों को दे आते, और किसी को पता भी न चलता। जब आप का इंतिक़ाल हुआ और उन हाजतमंद लोगों के पास सामान आना बंद हो गया, तो उस वक़्त आप का यह राज़ लोगों पर ज़ाहिर हुआ।
आप सिर्फ़ मुस्तहिक़्क़ीन को ही नहीं देते थे, बल्कि अपने मुतअल्लिक़ीन को इस बात का हुक्म भी फ़रमाया करते थे कि वे अपनी तरफ़ से माल की अदायगी करके लोगों के बाहमी माली झगड़े ख़त्म कराया करें। और आप का आम दस्तूर यह था कि ख़ुफ़िया तौर पर माल ख़र्च करते थे।
हिल्म व दरगुज़र
बुर्दबारी आप का ख़ास वस्फ़ था। आप लोगों की ज़्यादतियों को बरदाश्त कर जाते और उनकी ज़्यादती का जवाब हुस्न-ए-सुलूक से देते, और फ़रमाते थे: जब तुम्हारा कोई भाई तुम्हारे बारे में ऐसी बात कहे जिससे तुम्हारी दिल-आज़ारी हो तो उसे कुछ न कहना और न ग़मज़दा होना, क्योंकि अगर तुम वाक़ई वैसे ही हो जैसे वह कह रहा है तो तुम्हारी ग़लती की सज़ा यहीं दुनिया में तुम्हें दे दी गई है, और अगर तुम ऐसे नहीं हो तो उसका यह बोल तुम्हारे हक़ में एक नेकी है जो तुम्हारे किए बग़ैर तुम्हारे नाम-ए-अमाल में दर्ज कर दी गई है।
आप नरम-मिज़ाज इंसान थे। अपने मातहतों की ग़लतियों पर उन्हें सज़ा देने के बजाय दरगुज़र से काम लेते और नरमी से समझाते। इस सिलसिले में एक वाक़िआ भी बयान किया गया है कि आप ने अपना ग़ुलाम किसी काम के लिए भेजा, वह वापस आने में बहुत देर कर गया। आप उसे ढूँढने के लिए बाहर निकले तो देखा कि वह एक जगह सो रहा है। आप उसके सिर के पास बैठ गए और उसे पंखा झलने लगे, यहाँ तक कि वह उठ गया। आप ने उसे कोई डाँट-डपट नहीं की, सिर्फ़ इतना कहा: तुम्हारे लिए यह सोना मुनासिब नहीं था, तुम रात को भी सोते हो और दिन को भी। रात को सोया करो और दिन को हमारे काम कर दिया करो।
आप का लोगों से दरगुज़र करना तो इस हद तक था कि अगर आप को पता चलता कि खल्लाल हफ़्स ने आप की पीठ पीछे आप को बुरा-भला कहा है, तो आप उठते, नमाज़ की तैयारी करते, नमाज़ पढ़ते, फिर उसके लिए दुआ करते कि: ऐ अल्लाह! तू इसकी पकड़ न फ़रमाना, मैं ने इसे माफ़ कर दिया है।
अल-ग़रज़ हर एक को माफ़ करना आप का शियोा था, किसी से बदला नहीं लेते थे। बदला लेना तो दरकिनार, आप बदला लेने वाले इंसान को ही कमतर शख़्स समझते थे और फ़रमाते:
“माफ़ करने में कोई ज़िल्लत नहीं और बदला लेने में कोई बढ़ाई नहीं।”
क्योंकि ख़ुद रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया है: सदक़ा व ज़कात से माल कम नहीं होता, माफ़ करने से बंदे की इज़्ज़त ही बढ़ती है, और जो अल्लाह के लिए किसी के आगे झुक जाता है, अकड़ता नहीं, अल्लाह तआला उसे बुलंदियाँ और इज़्ज़तें अता फ़रमाता है।
हैबत व वजाहत
अल्लाह तआला ने आप को कसरत-ए-इबादत, फ़ुज़ूल-गोई से इज्तिनाब, ख़्वाहिशात-ए-नफ़सानिया की मुख़ालफ़त और मसाइब पर सब्र व इस्तिक़लाल के सबब हैबत व जलाल नसीब फ़रमा रखा था। यहाँ तक कि इमाम अबू हनीफ़ा ने जब आप को ख़लीफ़ा मंसूर के साथ बैठा हुआ देखा तो उन्हें देखते ही इमाम अबू हनीफ़ा पर हैबत तारी हो गई। चुनांचे बाद में उस मंज़र का तज़किरा करते हुए आप ने ख़ुद बताया कि: “मंसूर जैसे ताक़तवर बादशाह (जिसकी सल्तनत में सूरज ग़ुरूब नहीं होता) को देखकर मुझ पर वह हैबत तारी नहीं हुई, जो इमाम जाफ़र सादिक़ के चेहरे को देखकर तारी हुई।”
हज़रत इमाम जाफ़र की इराक़ में “इब्नुल-अव्जा” से मुलाक़ात हुई। यह ज़िन्दीक़ों (कट्टरपन्थ नास्तिक) का बहुत बड़ा ख़तीब और मुबल्लिग़ था। आप ने उससे बात करना शुरू की, मगर वह इतना बड़ा ख़तीब होने के बावजूद जवाब में एक लफ़्ज़ तक न बोला। इमाम जाफ़र समेत दीगर हाज़िरीन-ए-मजलिस भी इस पर बड़े हैरान हुए। बिलआख़िर आप ने उससे पूछा कि: किस चीज़ ने तुम्हें बोलने से रोक रखा है? उसने कहा: आप की हैबत और जलाल ने। दरअसल मेरी ज़बान आप के सामने चल ही नहीं रही। मैं मुसलमानों के कई उलमा से मिला हूँ और उनसे मुनाज़रे किए हैं, मगर मुझ पर कभी ऐसी हैबत तारी नहीं हुई जो आप को देखकर हुई है।
हरमाज़ी से रिवायत है कि एक देहाती शख़्स इमाम जाफ़र के पास आया करता था और आप काफ़ी देर तक उसके साथ बैठे रहते। एक दिन वह नहीं आया तो आप ने उसके बारे में दरयाफ़्त किया। वहाँ मौजूद एक शख़्स (जो उसे आप के सामने कम हैसियत इंसान के तौर पर बयान करना चाहता था) ने अर्ज़ की: हज़रत! वह तो बस खेती-बाड़ी करने वाला एक आदमी है।
आप ने फ़रमाया: आदमी की असलियत उसकी अक़्ल है, उसका हसब उसका दीन है और उसकी शराफ़त व इज़्ज़त उसका तक़वा है। और लोग आदमी होने में तो सब बराबर हैं, इसमें किसी को किसी पर कोई फ़ौक़ियत नहीं है। यह सुनकर उस आदमी को अपने जवाब पर नदामत हुई।
उलूम-ए-दीनिया की तहसील व तदरीस और इल्मी मक़ाम
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने आँख ही इल्मी ख़ानदान में खोली और मदीना तय्यिबा की उस मुक़द्दस सरज़मीन पर परवरिश पाई जो इल्म का गहवारा और उलमा-ए-सहाबा व ताबेईन का मसकन थी।
चुनांचे आप ने बचपन में ही क़ुरआन मजीद हिफ़्ज़ कर लिया। इसके बाद हदीस शरीफ़ को हिफ़्ज़ करने और उसे रिवायत करने की जानिब मुतवज्जेह हुए। चूँकि आप का ख़ानदान ही उलमा व मुहद्दिसीन का ख़ानदान था, इसलिए ख़ुद आप के दादा हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन जो वक़्त के इमाम थे, उन्होंने आप की इल्मी तरबियत अपने ज़िम्मे ले ली यहाँ तक कि उनका इंतिक़ाल हो गया। उस वक़्त हज़रत जाफ़र की उम्र चौदह-पंद्रह बरस थी, मगर उस वक़्त तक आप अपने जद्द-ए-अमजद से इल्म का बहुत बड़ा ज़खीरा ले चुके थे। आप ने अपने वालिद-ए-माजिद हज़रत इमाम बाक़िर (जिन की इल्मी शोहरत मुसल्लम थी) से भी भरपूर इस्तिफ़ादा किया और इल्म-ए-हदीस हासिल किया।
और लोग अहादीस के लिए दूर-दराज़ से चल कर आप के पास आने लगे, यहाँ तक कि उस ज़माने के अज़ीमुल-मर्तबत आइम्मा व फ़ुक़हा ने भी आप से अहादीस रिवायत कीं, जैसे इमाम मालिक, इमाम अबू हनीफ़ा, सुफ़यान स़ौरी, सुफ़यान बिन उयैना वग़ैरह। मुहद्दिस होने के साथ-साथ आप एक जलीलुल-क़द्र मुफ़स्सिर भी थे और बाद में आने वाले मुफ़स्सिरीन ने आप की बयान की हुई तफ़ासीर से इस्तिफ़ादा किया।
इसके अलावा आप फ़िक़्ह के भी एक बड़े आलिम थे और “मिसाली फ़क़ीह” जैसे अज़ीमुश्शान लक़ब से आप को नवाज़ा गया। चुनांचे लोगों ने जिस तरह आप से इल्म-ए-हदीस व तफ़सीर हासिल किया, उसी तरह आप से फ़िक़्ह का इल्म भी सीखा। यहाँ तक कि इमाम अबू हनीफ़ा का शुमार भी आप के शागिर्दों में होता है। आप के फ़िक़्ही मक़ाम का अंदाज़ा इससे होता है कि एक दफ़ा किसी शख़्स ने हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा से पूछा: जिन लोगों से आप की मुलाक़ात हुई है, उन में आप के नज़दीक सबसे बड़ा फ़क़ीह कौन है? आप ने जवाब में फ़रमाया: मैं ने जाफ़र बिन मुहम्मद अलैहिस्सलाम से ज़्यादा किसी को फ़क़ीह नहीं पाया। इसी तरह इमाम अबू हनीफ़ा यह भी फ़रमाया करते थे: अगर मेरी ज़िंदगी में वे दो साल न होते जो मैं ने अपने उस्ताद इमाम जाफ़र सादिक़ की सोहबत में, उन से इल्म हासिल करने की ग़र्ज़ से, गुज़ारे थे, तो मैं तबाह व बर्बाद हो जाता।
ग़रज़ कि आप को यह मरतबा मिला कि हर जगह आप की इल्मी शोहरत का डंका बजने लगा, और लोगों ने आप से इतने उलूम हासिल किए जिन्हें ऊँट उठा कर चलते थे। और इस क़दर लोग आप के पास अपनी इल्मी प्यास बुझाने के लिए आए कि जब आप के उन शागिर्दों की तादाद शुमार की गई तो उनका अदद चार हज़ार को पहुँच चुका था।
एक मौक़े पर आप ने अपने शागिर्द इमाम अबू हनीफ़ा से फ़रमाया: मुझे पता चला है कि आप दीन में क़ियास से काम लेते हैं (क़ियास इस्लामी फ़िक़्ह का एक इस्तिलाही लफ़्ज़ है, जिस को इस मक़ाम की मुनासबत से आसान लफ़्ज़ों में यूँ बयान किया जा सकता है कि इसमें ख़ास क़िस्म की सिफ़ात वाला एक बड़ा आलिम-ए-दीन अपनी अक़्ल और समझ के मुताबिक़ शरीअत का मसअला बयान करता है)। इमाम अबू हनीफ़ा ने उन से कहा: मैं तो सिर्फ़ उस मसअले में क़ियास से काम लेता हूँ जो मसअला क़ुरआन व हदीस में मौजूद न हो।
आप ने लोगों से फ़रमाया था कि मेरे दुनिया से चले जाने से पहले-पहले मुझ से दीनी मसाइल मालूम कर लो, कि मेरे बाद तुम्हें इस जैसी हदीसें कोई नहीं सुनाएगा जो मैं सुना रहा हूँ।
इमाम मालिक बयान करते हैं कि मैं इमाम जाफ़र के पास जाया करता था। उनके लबों पर अक्सर मुस्कराहट होती थी, लेकिन जब उनके सामने आप ﷺ का नाम मुबारक लिया जाता तो उनका रंग ज़र्द पड़ जाता।
आप रसूलुल्लाह ﷺ की अहादीस शरीफ़ा का बहुत अदब और एहतराम करते थे, चुनांचे आप ने कभी कोई हदीस बे-वुज़ू बयान नहीं की।
मज़हबी इख़्तिलाफ़ात से नफ़रत :
आप को मुसलमानों के आपस के मज़हबी इख़्तिलाफ़ात से सख़्त नफ़रत थी। इस सिलसिले में आप उन्हें समझाया भी करते थे और फ़रमाते थे: मज़हबी इख़्तिलाफ़ात से बचो, क्योंकि इसका नुक़सान यह है कि इससे दिल हर वक़्त उन्हीं झगड़ों में फँसा रहता है, और इसके अलावा इससे दिलों में मुनाफ़िक़त भी पैदा हो जाती है।
ग़लतफहमी का इज़ाला
हजरत शेख फरीदुद्दीन अत्तार फरमाते हैं कि मुझे उन कम फहम लोगों पर हैरत होती है जिनका अकीदा यह है कि अहले सुन्नत नाऊजू बिल्लाह अहले-बैत से मुआनदत रखते हैं। जबकि सही मायनों में अहले सुन्नत का अहलेबैत से मुहब्बत रखने वालों में शुमार होता है। इसलिये कि उनके अकाइद ही में यह शय दाखिल है कि रसूले खुदा पर ईमान लाने के बाद उनकी औलाद से मुहब्बत करना लाज़मी है।
इमाम शाफई पर इल्ज़ाम
किस कद्र तअस्सुब आमेज़ बात है कि अहले-बैत ही की मुहब्बत की वजह से हज़रत इमाम शाफई को राफ्ज़ी का ख़िताब देकर कैद व बंद की सऊबतों में डाल दिया गया। जिसके मुतअल्लिक इमाम साहब खुद अपने ही एक शेर में इशारा फरमाते हैं कि अगर अहले-बैत से मवद्दत का नाम रफज है तो फिर पूरे आलम को मेरे राफ्ज़ी होने पर गवाह रहना चाहिये। और अगर बिल-फर्ज़ अहल-ए-बैत और सहाब-ए-किराम से मुहब्बत करना अरकाने ईमान में दाखिल न भी हो तब भी उनसे मुहब्बत करने और उनके हालात से बाख़बर रहने में क्या हर्ज वाके होता है। इसलिये हर अहले ईमान के लिये ज़रुरी है कि जिस तरह हुजूर अकरम के मरातिब से आगाही हासिल करता है उसी तरह खुलफा-ए-राशेदीन व दीगर सहाब-ए-किराम और अहलेबैत के मरातिब को भी हस्वे मरातिब अफज़ल तसव्वुर करे।
सुन्नी की तारीफ
सही मायनों में उसी को ‘सुन्नी’ कहा जा सकता है जो हुजूर अकरम से रिश्ता रखने वालों में से किसी की फज़ीलत का भी मुन्किर न हो। एक रिवायत है कि किसी ने हज़रत इमाम अबू-हनीफा से दर्याफ्त किया कि नबी करीम सल्लल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुतअल्लिकीन में सबसे ज़्यादा अफज़ल कौन है? फरमाया कि बूढ़ों में हज़रत सिद्दीक अकबर व हज़रत उमर और जवानों में हज़रत उस्मान व अली और औरतों में हज़रत आइशा सिद्दीका और लड़कियों में हज़रत फातिमा ज़हरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन।
हिकायात
दहरिये (नास्तिक) का इस्लाम क़बूल करना:
एक देहरिया आप के पास आया और कहा: मुझे अल्लाह पर कोई दलील दो। आप ने फ़रमाया: बैठो। साथ ही एक बच्चा खड़ा था जिसके हाथ में अंडा था। आप ने उससे फ़रमाया: बच्चे! यह अंडा ज़रा मुझे देना। और आप ने उससे अंडा लेकर देहरिये से कहा: देखो, यह एक महफ़ूज़ क़िला है। ऊपर से यह एक मोटी तह है। इस मोटी तह के नीचे एक बारिक तह है, और बारिक तह के नीचे एक ज़र्दी है और एक सफ़ेदी। और ये दोनों (ज़र्दी व सफ़ेदी) माए की शक्ल में हैं यानी पानी की तरह बहने वाली अशयाअ हैं, लेकिन ज़र्दी, सफ़ेदी के साथ और सफ़ेदी, ज़र्दी के साथ नहीं मिलती बल्कि माए होने के बावजूद ये दोनों अलग-अलग अपनी हालत पर बरक़रार रहती हैं। न अंदर से बाहर कोई चीज़ जाती है और न बाहर से अंदर कोई शै’ दाख़िल होती है। इन्हीं अशयाअ से इस अंडे में चूज़ा पैदा हो जाता है और वह भी कभी मुज़क्कर और कभी मुअन्नस। फिर यह अंडा फटता है और इसमें से मुख़्तलिफ़ रंगों के चूज़े बाहर निकलते हैं, कभी किसी रंग का और कभी किसी रंग का। अब तुम बताओ कि तुम्हारे ख़याल में इस सारे निज़ाम को ठीक-ठीक और बर-वक़्त चलाने वाला कोई होगा या कोई भी नहीं होगा? यह सुनकर उस देहरिये ने काफ़ी देर तक सर नीचे झुकाए रखा, सोच-विचार के बाद सर ऊपर उठाया और कहा: अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीक लहू व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू, और फिर कहा: मैं इस बात की गवाही देता हूँ कि आप वाक़ई ख़ानदान-ए-नबूवत के फ़र्द हैं, और मैं आप के सामने अपनी गुज़श्ता ज़िंदगी से तौबा करता हूँ।
जाह-व-जलाल:
खलीफा मंसूर ने एक शब अपने वज़ीर को हुक्म दिया कि जाफर सादिक को मेरे रु-ब-रु पेश करो ताकि मैं उनको कत्ल कर दूं। वज़ीर ने अर्ज किया कि दुनिया को खैरबाद कहकर जो शख़्स उजलत नशीन हो गया हो उसको कत्ल करना क़रीने मस्लेहत नहीं। लेकिन खलीफा ने ग़ज़बनाक होकर कहा कि मेरे हुक्म की तामील तुम पर ज़रुरी है। चुनांचे मजबूरन जब वज़ीर जाफर सादिक को लेने चला गया तो मूंसर ने गुलामों को हिदायत कर दी कि जिस वक़्त मैं अपने सर से ताज उतारुं तो तुम सादिक को कत्ल कर देना। लेकिन जब वज़ीर के हमराह आप तश्रीफ लाये तो आपके अज़मत व जलाल ने खलीफा को इस दर्जा मुतअस्सिर किया कि वह इज्तिरारी तौर पर आपके इस्तिकबाल के लिये खड़ा हो गया। और न सिर्फ आपने फरमाया कि मेरी सबसे अहम हाजत व ज़रुरत यह है कि आइंदा फिर कभी मुझे दरबार में तलब न किया जाये कि मेरी इबादत व रियाज़त में खलल वाक़े न हो। चुनांचे मंसूर ने वादा करके इज्जत व एहतराम के साथ आपको रुखसत किया। लेकिन आपके दबदबे का उस पर ऐसा असर हुआ कि लरज़ा बर अंदाम होकर तीन शब व रोज़ बेहोश रहा। लेकिन बाज़ रिवायात में है कि तीन नमाज़ों के क्ज़ा होने की हद तक गुशी तारी रही। बहरहाल खलीफा की यह हालत देखकर वज़ीर व गुलाम हैरतज़दा हो गये। जब खलीफा से उसका हाल दर्याफ्त किया तो उसने बताया कि जिस वक़्त जाफर सादिक मेरे पास तश्रीफ लाये तो उनके साथ एक इतना बड़ा अजदहा था जो अपने जबड़ों के दर्मियान पूरे चबूतरे को घेरे में ले सकता था। और वह अपनी ज़बान में मुझसे कह रहा था कि अगर तूने जरा-सी भी गुस्ताखी की तो तुझको चबूतरे समेत निगल जाऊंगा। चुनांचे उसकी दहशत मुझ पर तारी हो गयी। मैंने आपसे माफी तलब कर ली।
ख़ौफ-ए-इलाही:
एक मर्तबा हज़रत दाऊद ताई ने हाज़िरे खिदमत होकर जाफर सादिक से अर्ज किया कि आप चूंकि अहलेबैत में से हैं इसलिये मुझको कोई नसीहत फरमायें। लेकिन आप खामोश रहे और जब दोबारा दाऊद ताई ने कहा कि अहले-बैत होने के एतेबार से अल्लाह तआला ने आपको जो फजीलत बख़्शी है उस लिहाज से नसीहत करना आप पर फर्ज है। यह सुनकर आपने फरमाया कि मुझे तो यही खौफ लगा हुआ है कि रोज़े महशर कहीं मेरे जद्दे आला हाथ पकड़ कर यह सवाल न कर बैठें कि तूने खुद मेरी इत्तिबा क्यों नहीं की? इसलिये कि नजात का तअल्लुक नसब से नहीं बल्कि आमाले सालिहा पर मौकूफ है। यह सुनकर दाऊद ताई को बहुत इबरत हुई। अल्लाह तआला से अर्ज किया कि जब अहलेबैत पर ख़ौफ़ के गल्बा का यह आलम है तो मैं किस गिनती में आता हूं और किस चीज़ पर फख्र कर सकता हूं।
सफ़र-ए-हज और तअल्लुक़-बिल्लाह:
हज़रत लैस बिन सअद कहते हैं कि मैं 113हिजरी में पैदल हज को गया। जब मैं मक्का मुक़र्रमा पहुँच गया तो अस्र की नमाज़ के वक़्त जबले अबू क़ुबैस पर चढ़ गया, जो सफ़ा पहाड़ी के पास है। वहाँ मैंने एक साहब को बैठे देखा कि वह दुआएँ माँग रहे हैं और “या रब! या रब!” इतनी मर्तबा कहा कि दम घुटने लगा। फिर उन्होंने “या रब्बाह! या रब्बाह!” इसी तरह कहा कि दम निकलने लगा। फिर इसी तरह “या अल्लाह! या अल्लाह!” कहते रहे कि दम घुटने लगा। फिर इसी तरह “या हय्य! या हय्य!” लगातार कहते रहे। फिर इसी तरह “या रहमान! या रहमान!” फिर “या रहीम! या रहीम!” इसी तरह कहा कि दम घुटने लगा। फिर “या अरहमर्-राहिमीन” भी इसी तरह कहा कि सात मर्तबा दम घुटने लगा।
इसके बाद वह कहने लगे: “या अल्लाह! मेरा अंगूरों को जी चाह रहा है, वह अता फ़रमा और मेरी चादरें भी पुरानी हो गई हैं।” लैस कहते हैं: अल्लाह की क़सम! उनकी ज़बान से ये लफ़्ज़ पूरे निकले भी न थे कि मैंने एक टोकरी अंगूरों से भरी हुई रखी देखी, हालाँकि उस वक़्त कहीं अंगूरों का निशान भी न था, और दो चादरें रखी हुई देखीं। उन्होंने अंगूर खाने का इरादा किया तो मैंने कहा कि मैं भी इनमें आपका शरीक हूँ। फ़रमाया: कैसे? मैंने कहा: जब आप दुआ कर रहे थे तो मैं “आमीन, आमीन” कह रहा था। फ़रमाने लगे: आओ खाओ, लेकिन इसमें से कुछ साथ न ले जाना। मैं आगे बढ़ा और उनके साथ ऐसी अजीब चीज़ खाई कि उम्र भर ऐसी चीज़ न खाई थी। वे अजीब क़िस्म के अंगूर थे कि उनमें बीज भी न था। मैंने ख़ूब पेट भर कर खाए मगर उस टोकरी में कुछ कमी न हुई।
फिर उन्होंने फ़रमाया कि उन दोनों चादरों में से जो तुम्हें पसंद हो ले लो। मैंने कहा कि चादर की मुझे ज़रूरत नहीं है। फिर फ़रमाने लगे कि ज़रा सामने से हट जाओ, मैं इन्हें पहन लूँ। मैं एक तरफ़ हो गया। उन्होंने एक चादर लुंगी की तरह बाँध ली, दूसरी ओढ़ ली और जो चादरें पहले से पहने हुए थे उन्हें हाथ में लेकर पहाड़ से नीचे उतरे। मैं पीछे हो लिया। जब वे सफ़ा-ओ-मरवा के दरमियान पहुँचे तो एक साइल ने कहा: “रसूलुल्लाह के साहबज़ादे! ये कपड़ा मुझे दे दीजिए, अल्लाह जल शानहू आपको जन्नत का जोड़ा अता फ़रमाए।” वे दोनों चादरें उसे दे दीं।
मैंने उस साइल के क़रीब जाकर उससे पूछा कि ये कौन हैं? उसने कहा कि हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ हैं। मैं फिर उनके पास वापस आया कि उनसे कुछ नसीहतें वग़ैरह सुनूँ, मगर उनका कहीं पता न चला।
हक़ बयानी:
जब आप तारिके दुनिया हो गये तो हज़रत अबू-सुफ्यान सूरी ने हाज़िरे खिदमत होकर फरमाया मखलूक आपके तारिकुद्दुनिया होने से आपके फुयूज़े आलिया से महरूम हो गयी है। आपने उसके जवाब में शेर पढ़ा। तर्जमा यह है: किसी जाने वाले इंसान की तरह वफा भी चली गई, और लोग अपने ख्यालात में डूबे रह गए। अगरचे दिखावटी लोगों से प्यार और वफा का इजहार करते हैं लेकिन उनके दिलों में बिच्छू भरे पड़े हैं।
सादगी:
एक दफा आपको बेश बहा लिबास में देखकर किसी ने एतेराज़ किया कि ऐसा कीमती लिबास अहले-बैत के लिये मुनासिब नहीं। तो आपने उसका हाथ पकड़कर जब अपनी आस्तीन पर फेरा तो उसको आपका लिबास टाट से भी ज़्यादा खुरदरा महसूस हुआ। उस वक़्त आपने फरमाया मखलूक की निगाहों में तो यह उम्दा लिबास है लेकिन हक के लिये यही खुरदरा है।
दानिशमंदी की तारीफ:
एक मर्तबा आपने इमाम अबू-हनीफा से सवाल किया कि दानिशमंदी की क्या तारीफ है? इमाम साहब ने जवाब दिया कि जो भलाई और बुराई में इम्तियाज़ (फर्क) कर सके। आपने कहा कि यह इम्तियाज़ (फर्क) तो जानवर भी कर लेते हैं। क्योंकि जो उनकी खिदमत करता है उनको ईजा (हानि, नुक्सान) नहीं पहुंचाते और जो तकलीफ देता है उसको काट खाते हैं। इमाम अबू-हनीफा ने पूछा कि फिर आपके नज़दीक दानिशमंदी की क्या अलामत (पहचान) है? जवाब दिया कि जो दो भलाईयों में से बेहतर भलाई को इख़्तेयार करे और दो बुराइयों में से मस्लेहतन कम बुराई पर अमल करे।
पड़ोसी को नसीहत:
एक आदमी ने आप से अपने पड़ोसी की शिकायत की। आप ने फ़रमाया: सब्र से काम लो और कोई जवाबी कार्रवाई न करो। उसने कहा: इस तरह वह मुझे छोटा और ज़लील शख़्स समझेगा। आप ने फ़रमाया: “ज़लील तो वह शख़्स होता है जो ज़ुल्म करता है, बिला शुबह ज़ालिम ही दर-हक़ीक़त ज़िल्लत का सामना करने वाला है।”
ताजिर को नसीहत:
एक ताजिर आप के पास अक्सर आता-जाता रहता था। एक दफ़ा वह कुछ मुद्दत गुज़रने के बाद आया, और बहुत परेशान था। उसके माली हालात यकसर बदल गए थे। उसने अपनी इस ज़बूँहाली और तंगदस्ती की शिकायत की तो आप ने उसे दो अशआर में ख़ूबसूरत नसीहत की जो आब-ए-ज़र से लिखने के क़ाबिल है, जिसका तर्जुमा यह है: घबराओ नहीं, अगर आज तुम ग़रीब हो गए हो तो एक अरसा-दराज़ तक अमीर भी रहे हो। और अल्लाह की रहमत से मायूसी में न पड़ो, क्योंकि उसकी रहमत से नाउम्मीदी कुफ़्र है। क्या बईद है कि अल्लाह तआला अनक़रीब ही फिर तुम्हें मालदार कर दे।
ख़लीफ़ा और इमामे सादिक़ की नसीहत आमेज़ गुफ़्तगू :
एक दिन मंसूर ने इमाम जाफ़र की तरफ़ पैग़ाम कहलवा भेजा कि: तुम हमारे पास क्यों नहीं आते जिस तरह बाक़ी लोग हमारे पास आते हैं?
आप ने जवाब में फ़रमाया: हमारे पास कोई ऐसी चीज़ तो है नहीं जिस पर हमें तुम्हारा डर हो, न तुम्हारे पास आख़िरत की कोई ऐसी चीज़ है जिस के हम तुम से उम्मीदवार हों, न तुम किसी ऐसी नेअमत में हो कि जिस पर हम तुम्हें मुबारकबाद दें, और न हम इसे कोई मुसिबत समझते हैं कि इस पर हम तुम्हारी ताज़ियत करें, तो फिर किस वजह से हम तुम्हारे पास आया करें? मंसूर ने इसके जवाब में कहा: तुम हमारे पास आया करो ताकि हमें कोई नसीहत कर दिया करो।
इस पर आप ने फ़रमाया: जो दुनिया का तालिब है वह तुम्हें नसीहत नहीं करेगा, और जो आख़िरत का तालिब है वह तुम्हारे साथ रहेगा नहीं।
निस्बते रसूल:
ख़लीफ़ा मंसूर ने इमाम जाफ़र सादिक़ से एक मर्तबा कहा: रसूलुल्लाह ﷺ के मामले में हम और तुम बराबर हैं (कि हम दोनों उनकी उम्मत में हैं और वह हम सब के नबी हैं), तुम्हें कौन-सी कोई फ़ज़ीलत हासिल है? आप ने फ़रमाया: अगर रसूलुल्लाह ﷺ तुम में से किसी को निकाह का पैग़ाम भेजें और उससे शादी करना चाहें तो आप ﷺ के लिए यह जायज़ है, जबकि हम में से किसी के साथ निकाह करना आप ﷺ के लिए जायज़ नहीं है। यह इस बात की वाज़ेह दलील है कि हम हुज़ूर ﷺ से हैं और हुज़ूर ﷺ हम में से हैं।
किब्रयाई पर फख्र:
किसी ने आपसे अर्ज किया कि जाहिरी व बातिनी फज़्ल व कमाल के बावजूद आप में तकब्बुर पाया जाता है। आपने फरमाया कि मैं मुतकब्बिर तो नहीं हूं अलबत्ता जब मैंने किब्र को तर्क कर दिया तो मेरे रब की किब्रयाई ने मेरा इहाता कर लिया। इसलिये मैं अपने किब्र पर नाज़ां नहीं हूं बल्कि मैं तो अपने रब की किब्रयाई पर फख्र करता हूं।
इल्ज़ाम तराशी पर नदामत:
किसी शख़्स की दीनार की थैली खो गयी तो उसने आप पर इल्ज़ाम आयद करते हुए कहा कि मेरी थैली तुम ही ने चुराई हैं। हज़रत जाफर ने उससे सवाल किया कि उसमें कितनी रकम थी? उसने कहा- दो हज़ार दीनार। चुनांचे घर ले जाकर आपने उसको दो हजार दीनार दे दिये। और बाद में जब उसकी खोई हुई थैली किसी दूसरी जगह से मिल गयी तो उसने पूरा वाकिआ बयान करके माफी चाहते हुए आपसे रकम वापस लेने की दरख्वास्त की। लेकिन आपने फरमाया कि हम किसी को दे कर वापस नहीं लेते। फिर जब लोगों से उसको आप का इस्मे गिरामी (नाम) मालूम हुआ तो उसने बेहद नदामत का इज़हार किया।
लिबास-ए-गैबी:
एक मर्तबा आप तन्हा अल्लाह-अल्लाह का विर्द करते हुए कहीं जा रहे थे कि रास्ते में एक और शख़्स भी अल्लाह-अल्लाह का विर्द करता हुआ आपके साथ हो गया। उस वक़्त आपकी ज़बान से निकला कि अल्लाह! इस वक़्त मेरे पास कोई बेहतर लिबास नहीं है। चुनांचे यह कहते ही गैब से एक बहुत कीमती लिबास नमूदार हुआ। आपने जेब-ए-तन कर लिया। लेकिन उस शख्स ने जो आपके साथ लगा हुआ था अर्ज किया कि मैं भी अल्लाह-अल्लाह का विर्द करने में आपका शरीक था लिहाज़ा आप अपना पुराना लिबास मुझे इनायत फरमा दें। आपने अपना लिबास उतार कर उसके हवाले कर दिया।
मअरिफत-ए-इलाही:
किसी ने आपसे अर्ज किया कि मुझको अल्लाह तआला का दीदार करवा दीजिये। आपने फरमाया कि क्या तुझको मालूम नहीं है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से फरमाया गया था कि तू मुझे हरगिज़ नहीं देख सकता। उसने अर्ज किया कि यह तो मुझे भी इल्म है। लेकिन यह तो उम्मते मुहम्मदी है जिसमें एक तो यह कहता है कि मेरे कल्ब ने अपने परवर्दिगार को देखा और दूसरा यह कहता है कि मैं ऐसे रब की इबादत नहीं करता जो मुझको नज़र नहीं आता। यह सुनकर आपने हुक्म दिया कि उस शख्स के हाथ पांव बांध कर दरिया-ए-दजला में डाल दो। चुनांचे जब उसको पानी में डाल दिया गया और पानी ने उसको ऊपर फेंका तो उसने हज़रत से बहुत फयाद की। लेकिन आपने पानी को हुक्म दिया कि इसको खूब अच्छी तरह ऊपर नीचे गौते दे। और जब कई मर्तबा पानी ने गौते दिये और वह लबे मर्ग हो गया तो अल्लाह तआला से इआनत का तालिब हुआ। उस वक़्त हज़रत ने उसको पानी से बाहर निकलवाया और हवास दुरुस्त होने के बाद दर्याप्त फरमाया कि अब तो अल्लाह तआला को देख लिया। उसने अर्ज किया कि जब तक मैं दूसरों से इआनत का तलबगार रहा उस वक़्त तक तू मेरे सामने एक हिजाब-सा था। लेकिन जब अल्लाह तआला से इआनत का तालिब हुआ तो मेरे कल्ब में एक सुराख नमूदार हुआ और पहला-सा इज्तिराब ख़त्म हो गया। जैसा कि बारी तआला का कौल है कि कौन है जो हाजतमंद के पुकारने पर उसका जवाब दे। आप ने फरमाया कि जब तक तूने सादिक को आवाज़ दी उस वक़्त तक तू झूठा था और अब क्ल्बी सुराख की हिफाजत करना।
इमाम सादिक़ और
इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा का मुक़ालमा
तारीख़ की किताबों में दर्ज है कि हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में अक्सर हज़रत अबू हनीफ़ा नुमान बिन साबित हाज़िर हुआ करते थे और यह होता रहता था कि आप उनका इम्तिहान लेकर उन्हें फ़ायदा पहुँचा दिया करते थे।
एक दफ़ा का ज़िक्र है कि जनाब अबू हनीफ़ा हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर हुए तो आप ने पूछा कि ऐ अबू हनीफ़ा, मैंने सुना है कि तुम मसाइल-ए-दीनिया में क़ियास से काम लिया करते हो। अर्ज़ की, जी हाँ, तो ऐसा ही। आप ने फ़रमाया, ऐसा न किया करो, क्योंकि दीन में क़ियास करना इब्लीस का काम है और उसी ने क़ियास की पहल की है।
एक मर्तबा हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ ने पूछा कि ऐ अबू हनीफ़ा, यह बताओ ख़ुदावंद-ए-आलम ने आँखों में नमकीनी, कानों में तल्ख़ी, नाक के नथुनों में रुतूबत और लबों में शीरिनी क्यों पैदा की? उन्होंने बहुत ग़ौर-ओ-हौज़ के बाद कहा, या हज़रत, इसका मुझे इल्म नहीं। आप ने फ़रमाया, अच्छा मुझ से सुनो—आँखें चरबी का ढीला हैं, अगर उनमें शोरेत और नमकीनी न होती तो पिघल जातीं। कानों में तल्ख़ी इसलिए है कि कीड़े-मकोड़े न घुस जाएँ। नाक में रुतूबत इसलिए है कि साँस की आमद-ओ-रफ़्त में सहूलत हो और ख़ुशबू और बदबू महसूस हो। लबों में शीरिनी इसलिए है कि खाने-पीने में लज़्ज़त आए।
फिर आप ने पूछा, वह कौन सा कलिमा है जिसका पहला हिस्सा कुफ़्र और दूसरा ईमान है? उन्होंने अर्ज़ की, मुझे इल्म नहीं। इमाम जाफ़र सादिक़ ने फ़रमाया कि वह वही कलिमा है जो तुम रात-दिन पढ़ा करते हो। सुनो—“ला इलाहा” कुफ़्र और “इल्लल्लाह” ईमान है।
फिर आप ने पूछा, औरत कमज़ोर है या मर्द? तो इमाम-ए-आज़म ने फ़रमाया कि औरत कमज़ोर है। इमाम जाफ़र सादिक़ ने फ़रमाया, अच्छा, अगर औरत कमज़ोर है तो क्या वजह है कि मीरास में उसको एक हिस्सा और मर्द को दो हिस्से दिए जाते हैं? उन्होंने जवाब दिया, मुझे मालूम नहीं। आप ने फ़रमाया कि औरत का नफ़क़ा मर्द पर है और हुसूल-ए-आज़ूक़ा उसी के ज़िम्मे है, इसलिए उसे दहरा दिया गया।
फिर आप ने पूछा, हालत-ए-हमल में औरत को ख़ून-ए-हैज़ क्यों नहीं आता? इमाम-ए-आज़म ने फ़रमाया, यह नहीं मालूम कि उसे आलम-ए-हमल में हैज़ क्यों नहीं आता। इमाम जाफ़र सादिक़ ने फ़रमाया, औरत को आलम-ए-हमल में ख़ून-ए-हैज़ इसलिए नहीं आता कि वह बच्चे के पेट में दाख़िल होकर ग़िज़ा बन जाता है।
फिर इमाम जाफ़र सादिक़ ने पूछा कि यह बताओ, अक़्लमंद कौन है? उन्होंने अर्ज़ की, जो अच्छे-बुरे की पहचान करे और दोस्त-ओ-दुश्मन में तमीज़ कर सके। आप ने फ़रमाया कि यह सिफ़त और तमीज़ तो जानवरों में भी होती है, वे भी प्यार करते और मारते हैं, यानी अच्छे-बुरे को जानते हैं। उन्होंने कहा, फिर आप ही फ़रमाइए। इमाम जाफ़र सादिक़ ने इरशाद फ़रमाया, अक़्लमंद वह है जो दो नेकियों और दो बुराइयों में यह इम्तियाज़ कर सके कि कौन-सी नेकी तरजीह देने के क़ाबिल है और दो बुराइयों में कौन-सी बुराई कम और कौन ज़्यादा है।
सवालात
सवाल?
किसी ने आपसे सवाल किया कि सब्र करने वाले दरवेश और शुक्र करने वाले मालदार में आपके नज़दीक कौन अफज़ल है? आपने फरमाया कि सब्र करने वाले दरवेश को इसलिये फज़ीलत हासिल है कि मालदार को हमा औकात अपने माल का तसव्वुर रहता है और दरवेश को सिर्फ अल्लाह तआला का ख्याल। जैसा कि अल्लाह तआला का कौल है कि तौबा करने वाले ही इबादत गुज़ार हैं।
सवाल?
एक मर्तबा किसी ने आप से पूछा कि सूद को हराम क़रार देने की क्या हिकमत है? आप ने फ़रमाया : ताकि लोग एक दूसरे के साथ एहसान और तआवुन करने से रुक न जाएँ। (क्योंकि अगर सूद हलाल होता तो लोग आपस में हमदर्दी व तआवुन की बुनियाद पर क़र्ज़ा देने के बजाय, वह रक़म सूद पर उधार देते।
सवाल?
किसी ने आप से पूछा: क्या वजह है कि हम दुआ करते हैं मगर हमारी दुआ क़बूल नहीं होती? फ़रमाया: क्योंकि जिससे तुम दुआ करते हो, उसे तुम पहचानते ही नहीं।
सवाल?
एक दफ़ा ख़लीफ़ा मंसूर पर मक्खी आकर बैठ गई, उसने उसे हटा दिया। वह दोबारा आकर बैठ गई, उसने फिर हटा दिया, यहाँ तक कि मक्खी ने उसे तंग कर दिया। इतने में इमाम जाफ़र उसके पास तशरीफ़ ले आए। मंसूर ने आप से कहा: ऐ अबू अब्दुल्लाह! अल्लाह तआला ने मक्खी को क्यों पैदा किया है? आप ने बिना किसी ख़ौफ़ व झिझक के फ़रमाया: ज़ालिमों को ज़लील करने के लिए। यह सुनकर मंसूर चुप हो कर रह गया।
इरशादात व नसीहत
आप के अक़वाल व फ़रमूदात एक ऐसा क़ीमती ज़ख़ीरा हैं जिसमें हर क़िस्म की नसीहतें मिलती हैं। उनमें कहीं तहज़ीब-ए-अख़लाक़ का तज़किरा है तो कहीं उसूल-ए-ज़िंदगी का बयान, कहीं इल्म-ओ-हिकमत की तरग़ीब है तो कहीं ज़ुह्द-ओ-तक़वा की दावत, कहीं रिज़्क़-ए-हलाल पर उभार है तो कहीं अदा-ए-हुक़ूक़ पर रोशनी डाली गई है। अल-ग़रज़ नसीहतों का एक ख़ूबसूरत गुलदस्ता है, जिसके चंद फूलों का नमूना पेश-ए-ख़िदमत है:
फ़रमाया:
चार चीज़ें ऐसी हैं जिनका थोड़ा भी ज़्यादा होता है: आग, दुश्मनी, फ़क़्र-ओ-फ़ाक़ा, और बीमारी।
फ़रमाया:
अल्लाह तआला छह को छह की वजह से हलाक करता है: हुक्मरानों को ज़ुल्म की वजह से, अरबों को असबियत की वजह से, ज़मींदारों को तकब्बुर की वजह से, ताजिरों को ख़यानत की वजह से, देहात वालों को दीन से नावाक़िफ़ियत की वजह से और उलमा को हसद की वजह से।
फ़रमाया:
बेटियाँ नेकी हैं और बेटे नेमत। और ज़ाब्ता यह है कि नेकियों पर अज्र-ओ-इनाम दिया जाएगा, जबकि नेमतों के बारे में पूछ-गछ होगी।
फ़रमाया:
बातिन (यानी इंसान का अंदर) जब दुरुस्त हो जाता है तो ज़ाहिर ताक़तवर हो जाता है।
फ़रमाया:
बे-अमल दाई की मिसाल उस तीर-अंदाज़ की सी है जो बग़ैर कमान के तीर फेंकना चाहता हो (ज़ाहिर है कि उस तीर में क़ुव्वत नहीं होगी और मुअस्सिर साबित नहीं होगा)।
फ़रमाया:
जब तुम ख़ैर के किसी काम का इरादा करो तो उसमें देर न करो, क्योंकि बाज़ घड़ियाँ ऐसी होती हैं कि उनमें अल्लाह तआला अपने बंदे को ख़ैर के काम में मशग़ूल देखता है तो ख़ुश होकर फ़रमाता है: ऐ बंदे! मेरी इज़्ज़त और मेरे जलाल की क़सम, मैं तुझे हरगिज़ अज़ाब नहीं दूँगा। और जब तुम बुराई के किसी काम का इरादा करो तो उसके क़रीब तक न जाओ, क्योंकि बाज़ घड़ियाँ ऐसी होती हैं कि उनमें अल्लाह तआला अपने बंदे को बुराई के किसी काम में देखता है तो नाराज़ होकर फ़रमाता है कि ऐ बंदे! मेरी इज़्ज़त और मेरे जलाल की क़सम! मैं तुझे कभी नहीं बख़्शूँगा।
फ़रमाया:
नेकी तीन चीज़ों से पूरी होती है: उसे जल्दी करने से, छोटा समझने से और छुपाने से।
फ़रमाया:
ज़्यादा हँसी-मज़ाक़ से बचो, कि इससे चेहरे की रौनक जाती रहती है।
फ़रमाया:
किसी को माफ़ करके पछताना मुझे इससे ज़्यादा पसंदीदा है कि मैं किसी को सज़ा देकर पछताऊँ।
फ़रमाया:
जो शख़्स बग़ैर ख़ानदानी जत्थे के क़ुव्वत-ओ-इज़्ज़त और बग़ैर बादशाहत के रौब-ओ-हैबत चाहता हो, उसे चाहिए कि वह नाफ़रमानी की ज़िल्लत-भरी ज़िंदगी छोड़कर फ़रमाबरदारी की पुर-इज़्ज़त ज़िंदगी शुरू कर दे।
फ़रमाया:
जो बड़े आदमी के साथ उठता-बैठता है वह ख़ुद भी बुराई में मुबतला हो जाता है, जो बुरी जगहों पर आता-जाता है वह लोगों में मुत्तहम (बदनाम) हो जाता है, और जो अपनी ज़बान पर क़ाबू नहीं पाता वह शर्मिंदगी का सामना करता है।
फ़रमाया:
उलमा अमानत-ए-अंबिया के हामिलीन हैं। जब तुम देखो कि उलमा बादशाहों की तरफ़ माइल हो रहे हैं तो उन उलमा को मुतहम्म समझो।
फ़रमाया:
जब तुम अपने किसी दोस्त के घर जाओ तो उसकी तरफ़ से हमह-क़िस्मी इकराम क़बूल कर लेना, मगर उसकी ख़ास नशिस्तगाह पर न बैठना।
फ़रमाया:
मोमिन की शान यह है कि जब उसे ग़ुस्सा आता है तो उसका ग़ुस्सा उसे हक़ बात से बाहर नहीं निकालता, जब वह ख़ुश होता है तो उसकी ख़ुशी उसे किसी नाजायज़ काम पर नहीं डालती, और जब किसी चीज़ पर उसे इख़्तियार हासिल हो जाते हैं तो वह अपने हक़ से ज़्यादा उसमें से नहीं लेता।
फ़रमाया:
जिस आदमी को अपनी ग़लती छोटी नज़र आती है, उसको दूसरों की ग़लतियाँ बड़ी नज़र आती हैं, और जिसको अपनी ग़लती बड़ी नज़र आती है, उसको दूसरों की ग़लतियाँ छोटी नज़र आती हैं।
फ़रमाया:
बुरे लोगों के साथ दोस्ती लगाने से बचना, क्योंकि उन लोगों की मिसाल उस पत्थर की है जिससे पानी न बहता हो, उस दरख़्त की है जिसके पत्ते मुरझा चुके हों, और उस ज़मीन की है जो बंजर हो चुकी हो।
फ़रमाया:
तक़वा से अफ़ज़ल कोई तोशा नहीं, ख़ामोशी से बेहतर कोई हीला नहीं, जहालत से ज़्यादा नुकसानदेह कोई दुश्मन नहीं, और झूठ से बड़ी कोई बीमारी नहीं।
फरमाया:
जो शख्स यह कहता है कि अल्लाह तआला किसी खास शय पर मौजूद है या किसी शय से कायम है वह काफिर है।
फरमायाः
कि जिस मअसियत से कब्ल इंसान में ख़ौफ पैदा हो वह अगर तौबा कर ले तो उसको अल्लाह तआला का कुर्ब हासिल होता है और जिस इबादत की इब्तिदा मामून रहना और आख़िर में खुदबीनी पैदा होना शुरु हो तो उसका नतीजा बौदे इलाही की शक्ल में नमूदार होता है। जो शख्स इबादत पर फख्र करे, वह गुनाहगार रहे। जो मासीयत पर इज़हारे नदामत करे, वह फरमाँबर्दार है।
फरमायाः
कि ज़िक्रे इलाही की तारीफ यह है कि जिसमें मशगूलियत के बाद दुनिया की हर शय को भूल जाये। क्योंकि अल्लाह तआला की जात हर शय का नेमुलबदल है।
फरमायाः
कि अल्लाह तआला जिसको चाहता है अपनी रहमत से खास कर लेता है। यानी तमाम असबाब व वसाइल खत्म कर दिये जाते हैं ताकि यह बात वाज़ेह हो जाये कि अताए इलाही बिलावास्ता है न कि बिलवास्ता।
फरमायाः
कि मोमिन की तारीफ यह है कि नफ़्स की सरकशी का मुकाबला करता रहे और आरिफ की तारीफ यह है कि जो अपने मौला की इताअत में हमातन मशगूल रहे।
फरमायाः
कि साहबे करामत वह है जो अपनी जात के लिये नफ़्स की सरकशी से आमादा बजंग रहे। क्योंकि नफ्स से जंग करना अल्लाह तआला तक रसाई का मोजिब होता है।
फरमायाः
कि औसाफे मकबूलियत में से एक वस्फे इल्हाम भी है। जो लोग दलाइल से इल्हाम (खुदा की तरफ से दिल में आई हुई बात) को बे-बुनियाद करार देते हैं, वह बददीन हैं।
फरमायाः
कि अल्लाह तआला अपने बंदे में उससे भी ज़्यादा पोशीदा (छुपा) है जितना कि रात की तारीकी में सियाह पत्थर पर चींटी रेंगती है।
फरमायाः
कि मुझ पर रुमूजे हकीकत उस वक़्त खुले जब मैं खुद दीवाना हो गया।
फरमायाः
नेक बख़्ती की अलामत यह भी है कि अक्लमन्द दुश्मन से वास्ता पड़ जाये।
फरमायाः
कि पांच लोगों की सोहबत से इज्तिनाब (परहेज़) करना चाहिये। अव्वल, झूठे से। क्योंकि उसकी मईय्यत (साथ) फरेब में मुब्तला कर देती है। दोम, बेवकूफ से। क्योंकि जिस कद्र वह तुम्हारी मनफ़अत (नफा) चाहेगा उसी कद्र नुक्सान पहुंचेगा। सोम, कंजूस से क्योंकि उसकी सोहबत से बेहतरीन वक़्त राएंगा (बेकार) हो जाता है। चहारुम बुजदिल से। क्योंकि यह वक़्त पड़ने पर साथ छोड़ देता है। पंजुम, फासिक से। क्योंकि एक निवाले की तमम् (लालच) में किनारा कश होकर मुसीबत में मुब्तला कर देता है।
फरमायाः
कि अल्लाह तआला ने दुनिया ही में फिदौस व जहन्नम का नमूना पेश कर दिया है। क्योंकि आसाइशें जन्नत हैं और तकलीफें जहन्नम। और जन्नत का सिर्फ वही हकदार है जो अपने तमाम उमूर (काम) अल्लाह तआला को सौंप दे। और दौज़ख उसका मुकद्दर है जो अपने उमूर (काम) सरकश नफ़्स के हवाले कर दे।
फरमायाः
कि अगर मुआनिदीन (दुश्मनों) की सोहबत से औलिया-ए-किराम को ज़र (नुक्सान) पहुंच सकता तो फिरऔन से आसिया को पहुंचता। और अगर औलिया की सोहबत दुश्मन के नाफे (नफा देने वाली) होती तो सबसे पहले हज़रत नूह और हज़रत लूत की अज़दवाज को फायदा पहुंचता। लेकिन कब्ज़ और बस्त के सिवा और कुछ भी नहीं है।
आख़री वक़्त
मंसूर अब्बासी जब आपकी रूहानियत से आज़िज़ आ गया और किसी मर्तबा क़त्ल करने में कामयाबी न हासिल कर सका, तो उसने सौ ऐसे अफ़राद तलाश किए जो कुछ जानते और पहचानते ही न थे। बिल्कुल अनपढ़ और कंधे न तराश थे। मंसूर ने माल-ओ-दौलत देकर इस अम्र पर राज़ी किया कि जब इमाम जाफ़र सादिक़ की तरफ़ इशारा किया जाए तो वे उन्हें क़त्ल कर दें।
प्रोग्राम मुरत्तब होने के बाद रात के वक़्त हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को बुलाया गया। आप तशरीफ़ लाए। हुक्म था कि बिल्कुल तनहा तशरीफ़ लाएँ। आप अकेले आए। जब आप दरबार में दाख़िल हुए और उन लोगों की नज़रें आप पर पड़ीं जो तलवारें सोन्ते हुए खड़े थे, तो वे सब के सब तलवारें फेंक कर आपके क़दमों पर गिर पड़े।
यह हाल देखकर मंसूर ने कहा, इब्ने रसूलुल्लाह! आप रात के वक़्त क्यों तशरीफ़ लाए हैं? आपने फ़रमाया कि तूने मुझे गिरफ़्तार करा के मंगवाया है, अब कहता है क्यों आए हो? उसने कहा, मआज़ल्लाह! कहीं यह भी हो सकता है कि आप तशरीफ़ ले जाएँ और क़यामगाह में आराम फ़रमाएँ। आप वापस चले गए, वहाँ से मदीना तशरीफ़ ले गए।
इमाम अलैहिस्सलाम के चले जाने के बाद उन लोगों से पूछा गया कि तुमने ख़िलाफ़वर्ज़ी क्यों की और उन्हें क़त्ल क्यों नहीं किया? उन्होंने जवाब दिया कि यह तो वही इमाम-ए-ज़माना है जो हमारी शब-ओ-रोज़ ख़बरगीरी करता है और हमेशा हमारी अपने बच्चों की तरह परवरिश करता है।
यह सुनकर मंसूर डर गया और उसे ख़याल हुआ कि कहीं ये लोग मुझ से उसका बदला न लेने लगें। इसी लिए उन्हें रात ही में रवाना कर दिया गया। रिवायतों से मालूम होता है कि आपको कई मर्तबा ज़हर दिया गया। बिलआख़िर आप उस आख़िरी ज़हर से शहीद हो गए जो अंगूर के ज़रिये दिया गया था।
वफ़ात :
आप ने अड़सठ (68) साल की उम्र पाई, और मदीना तय्यिबा में 15 रजब, बरोज़ पीर 148 हिजरी में इंतिक़ाल फ़रमाया। (बाज़ हज़रात ने लिखा है कि आप का इंतिक़ाल भी ज़हर से हुआ था और बादशाह अबू जाफ़र मंसूर ने यह ज़हर दिलवाया था)। आप को आप के वालिद हज़रत बाक़िर, दादा हज़रत ज़ैनुल आबिदीन और उनके चाचा हज़रत हसन के पहलू में जन्नतुल-बक़ीअ में दफ़न किया गया
किताब: गुलदस्ता-ए-अहले-बैत, शवाहिद-उन्-नबुव्वत, अहले-बैत रोशन सितारे, मनाक़िब-ए-अबू हनीफ़ा, तज़्किरतुल-ख़वास, तज़्किरतुल-औलिया
पेशकश : ग़ुलाम फरीद हैदरी मदारी
















