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शबे बराअत फ़ज़ीलत, और मग़फ़िरत की मुबारक रात

On: फ़रवरी 5, 2026 5:14 अपराह्न
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Shab-e-Bara’at

शाबानुल मुअज़्ज़म का महीना बहुत ही बाबरकत महीना है रसूल करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वा आलिही वसल्लम ने फरमाया है कि रजबुल मुरज्जब अल्लाह तआला का महीना है और शाबान मेरा महीना है और रमज़ानुल मुबारक मेरी उम्मत का महीना है। इसी महीने में एक रात ऐसी आती है जिसे शबे बराअत कहते हैं।

शाबान की पंद्रहवीं रात को “शबे बराअत” कहते हैं, यानी यानी वह रात जिसमें अल्लाह तआला के फ़ज़्ल व करम से मुसलमानों को गुनाहों के अज़ाब से बरी कर दिया जाता है।
तक़रीबन दस सहाबा किराम रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम से इस रात से मुतअल्लिक हदीसें मर्वी हैं। यहाँ हम कुछ अहादीसे मुबारका का तर्जुमा उम्मते मुस्लिम के लिये पेश करते हैं।

1- हज़रत आइशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु तआला अन्हा फरमाती हैं कि “शाबान की पंद्रहवीं शब में मैंने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम को अपनी आरामगाह पर मौजूद न पाया तो तलाश में निकल पड़ी, देखा कि आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वा आलिही वसल्लम ‘जन्नतुल बक़ी क़ब्रिस्तान’ में हैं। जब मैं वहाँ पहुँची तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझसे फरमाया कि आज शाबान की पंद्रहवीं रात है, इस रात में अल्लाह तआला आसमान-ए-दुनिया पर अपनी शायाने-शान नुज़ूल फरमाता है और क़बीला बनी कल्ब की बकरियों के बालों की तादाद से भी ज़्यादा गुनाहगारों की बख़्शिश फरमाता है।”

2- दूसरी हदीस में है: “इस रात में इस साल पैदा होने वाले हर बच्चे का नाम लिख दिया जाता है, इस रात में इस साल मरने वाले हर आदमी का नाम लिख लिया जाता है, इस रात में तुम्हारे आमाल उठाए जाते हैं, और तुम्हारा रिज़्क उतारा जाता है।”

3- एक रिवायत में है कि “इस रात में तमाम मख़्लूक़ की मग़फ़िरत कर दी जाती है सिवाय सात लोगों के, वह यह हैं:
1, मुशरिक
2, वालिदैन का नाफरमान
3, कीना परवर
4, शराबी
5, क़ातिल
6, शलवार को टखनों से नीचे लटकाने वाला
7, और चुगलखोर
इन सात अफ़राद की इस अज़ीम रात में भी मग़फ़िरत नहीं होती अल्ला यह कि यह अपने जराइम से तौबा कर लें।

4- हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से एक रिवायत में मनक़ूल है कि इस रात में इबादत किया करो और दिन में रोज़ा रखा करो, इस रात सूरज ग़ुरूब होते ही अल्लाह तआला अपने बंदों की तरफ ख़ुसूसी तवज्जोह फरमाता है और ऐलान करता है: “कौन है जो गुनाहों की बख़्शिश करवाए? कौन है जो रिज़्क में वुसअत तलब करे? कौन मुसीबतज़दा है जो मुसीबतों से छुटकारा हासिल कर ले?”

इन अहादीसे करीमा और सहाबा किराम रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम और बुज़ुर्गाने दीन रहिमहुमुल्लाह तआला के अमल से इस रात में तीन काम करना साबित है:

1- क़ब्रिस्तान जाकर मर्दों के लिये इसाले सवाब और मग़फ़िरत की दुआ करना साबित है लेकिन याद रहे कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से आपकी हयाते मुबारका में शबे बराअत में जन्नतुल बक़ी जाना साबित है।
इस लिये अगर कोई शख्स ज़िंदगी में एक मर्तबा भी इत्तेबाए सुन्नत की नियत से चला जाए तो अज्र व सवाब का बाइस है, क़ब्रों की सफ़ाई करके ताज़ा फूल चढ़ाना जायज़ है लेकिन मोमबत्ती और अगरबत्ती क़ब्रों पर जलाना बिल्कुल नाजायज़ है, इस को शबे बराअत के अरकान में दाख़िल करना ठीक नहीं है। जो चीज़ नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम से जिस दर्जे में साबित है उसको उसी दर्जे में रखना चाहिए, इसका नाम इत्तेबाए सुन्नत और दीन है।

2- इस रात में नवाफ़िल पढ़ना, तिलावत क़ुरआन मजीद करना, ज़िक्र व अज़कार का एहतेमाम करना जायज़ और मामूलाते अहले सुन्नत वल जमाअत में से है।
इस बारे में यह वाज़ेह रहे कि नफ़्ल एक ऐसी इबादत है जिसमें तनहाई मतलूब है, यह ख़लवत की इबादत है, इसके ज़रिये इंसान अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करता है, लिहाज़ा नवाफ़िल वगैरह तनहाई में अपने घर में अदा करके इस मौक़े को ग़नीमत जानें।
यह फ़ज़ीलत वाली रातें शोर व ग़ुल और हंगामों के लिये नहीं हैं बल्कि गोशाए तनहाई में बैठ कर अल्लाह से ताल्लुक़ात इस्तेवार करने के क़ीमती लम्हात हैं, इन को ज़ाए होने से बचाएँ।

3- दिन में रोज़ा रखना भी मुस्तहब है, एक तो इस बारे में हज़रत सैयदना अमीरुल मोमिनीन अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की रिवायत है और दूसरा यह कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर माह में अय्यामे बीज़ यानी 13/14/15 के रोज़ों का एहतेमाम फरमाते थे, लिहाज़ा इस नियत से रोज़ा रखा जाए तो मोजिबे अज्र व सवाब होगा।

बाक़ी इस रात में पटाखे बजाना, आतिशबाज़ी करना और पूरी रात मटरगश्ती करना यह सब ख़ुराफ़ात और इसराफ़ में शामिल हैं, शैतान इन फ़ुज़ूलियात में इंसान को मशग़ूल करके अल्लाह तआला की मग़फ़िरत और इबादत से मुसलमानों को महरूम कर देना चाहता है और यही शैतान का असल मक़सद है।

हलवा पर फ़ातिहा

हमारे हुज़ूर नबी करीम रऊफ़ व रहीम आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि वा आलिही वसल्लम को अपनी उम्मत की बख़्शिश व निजात और मग़फ़िरत हर चीज़ से ज़्यादा अज़ीज़ है रिवायत अहादीस में है कि आप जब पैदा हुए तो और विसाल फरमाया तो

“रब हब ली उम्मती रब्बि हब ली उम्मती

की सदा लगाई यानी ऐ मेरे रब तू मेरी उम्मत को बख़्श दे और जब हश्र होगा तो पुल सिरात पर भी यही सदा लगाएंगे” रब हब ली उम्मती, रब हब ली उम्मती” ऐ मेरे पालनहार ऐ मेरे परवरदिगार तू मेरी उम्मत को बख़्श दे और आज की लै़लतुल मुबारका भी मग़फ़िरत और बख़्शिश की ख़ास रात है आज की रात जन्नतुल बक़ी जाया करते थे और दुआए मग़फ़िरत फरमाया करते थे तो आज की रात नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वा आलिही वसल्लम के लिये भी ख़ास रात है और उम्मते मुस्तफ़वी के लिये भी ख़ास मग़फ़िरत व निजात की रात है
और हमारे हुज़ूर आकाए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वा आलिही वसल्लम हलवा बहुत पसंद फरमाया करते थे चुनांचे तिर्मिज़ी शरीफ़ और दीगर अहादीस की किताबों में उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु तआला अन्हा से रिवायत है

“कान रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम युहिब्बुल असल वल हलवा”

यानी रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वा आलिही वसल्लम शहद और हलवा बहुत पसंद फरमाते थे इसलिये हुज़ूर पाक साहिबे लोलाक सल्लल्लाहु तआला अलैहि वा आलिही वसल्लम की इस ख़ुसूसी पसंद को इस ख़ुसूसी निजात व बख़्शिश की रात में नज़र व नियाज़ देकर पेशे ख़िदमत किया जाता है और हुज़ूर सैय्यदना अल करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम की ख़ुशनूदी व रज़ा तलब की जाती है और आपकी उम्मत की मग़फ़िरत, बख़्शिश और निजात के लिये दुआएँ की जाती हैं इसलिये इस नियाते महमूदा की बुनियाद पर हलवा शरीफ़ और अतय्यबुत तआम व अफ़ज़लुल मशरूबात पर फ़ातिहा ख़्वानी व नज़र व नियाज़ पेश करना जायज़ व मुस्तहब क़रार दिया जाता है।

हमारे असलाफ की यह सुन्नत सदियों से राइज है अल्लाह तआला इसे क़बूलियत का शरफ़ अता फरमाए और आज की रात में हमारी, हमारे वालिदैन की हमारे मशाइख़े इज़ाम और मुरशिदाने किराम की, हमारे बच्चों की हमारे जुमला मुरीदीन व मुतवस्सिलीन व मुतअक़िदीन व शागिर्दान व असातिज़ा और हमारे जुमला अहबाब व अइज़्ज़ा व अकारिब और कुल उम्मते मुस्तफ़ा जाने आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वा आलिही वसल्लम की मग़फ़िरत और बख़्शिश फरमाए और उन्हें हर क़िस्म के अज़ाब से निजात फरमाए और हमारी सरबलंदी और सरख़रूई का हमारे लिये सामान व ज़मानत अता फरमाए और आज की इस मुबारक रात में मेरा रब हमारा पालनहार हमारा करीम रब हमारा रहीम रब, और हमारा हफ़ीज़ रब हमारी और जुमला मुसलमानाने आलम की हिफ़ाज़त फरमाए ख़ास तौर से फ़िलस्तीन के मज़लूम मुसलमानों की ख़ुसूसी फ़तह व नुसरत अता फरमाए आमीन या रब्बुल आलमीन बजाह सैय्यदुल मुरसलीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वा आलिही वसल्लम

अज़ क़लम
अबुल हम्माद मुहम्मद इसराफ़ील हैदरी अल मदारी
दारुन नूर आस्ताना आलिया ज़िंदा शाह मदार मकनपुर शरीफ़ कानपुर 9793347086

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