मदारे पाक रजियल्लाहु तआला अन्हु की इस पाकीज़ा सरज़मीन मकनपुर शरीफ़ की तारीख़ी हैसियत हर दौर के साथ एक इंक़िलाबी तारीख़ रही है। जब 1597 ईस्वी में अकबर ने दीन-ए-इलाही नाम के नए मज़हब की बुनियाद रखी और हिंदुस्तान में एक नया मज़हब क़ायम करने की नाकाम कोशिश की, तो सबसे पहले हुज़ूर मदार-उल-आलमीन रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु की ख़ानक़ाह-ए-आलिया से फ़तवा जारी किया गया, जिसमें मज़हब दीन-ए-इलाही के मानने वालों को मुरतद्द क़रार देते हुए इस नए दीन को गुमराही, कुफ़्र और इर्तिदाद पर मुश्तमिल बताया गया। वह नायाब व नादिर फ़तवा 1857 की जंग-ए-आज़ादी तक ख़ानक़ाह-ए-आलिया में मौजूद रहा। आज भी तारीख़ की किताबों में उस फ़तवे का भरपूर ज़िक्र मिलता है। अगरचे मज़हब दीन-ए-इलाही 1605 तक ही क़ायम रह सका और सिर्फ़ 19 अशख़ास ने इस मज़हब को माना, मगर हुज़ूर मदार पाक की ख़ानक़ाह से इस मज़हब की सख़्त मज़म्मत की गई। आज भी किताबों में एक वाक़िआ मिलता है कि इस बातिल मज़हब के पैग़ामात लेकर जब अकबर बादशाह का सिपाही मदार पाक की ख़ानक़ाह शरीफ़ मकनपुर शरीफ़ पहुँचा, तो उस वक़्त के अज़ीम बुज़ुर्ग, वली-ए-कामिल, आरिफ़-बिल्लाह हुज़ूर सैयद शाह अब्दुर्रहीम अलैहिर्रहमा व रज़वान ने अकबर-ए-आज़म के उस फ़रमान पर थूक दिया था।
इस वाक़िए को तारीख़ में जो मक़ाम हासिल होना चाहिए था, वह न मिल सका, मगर हमेशा से हक़ व दियानत के साथ सच्ची और हक़ीक़ी इस्लामी तालीमात की मुल्क भर में रहनुमाई करने वाली ख़ानक़ाह मदार-उल-आलमीन ने दुनिया वालों को एक सबक़-आमोज़ पैग़ाम दिया है। चूँकि हिंदुस्तान के हर ख़त्ता-ए-अरज़ी पर हुज़ूर मदार-उल-आलमीन की इस्लामी ख़िदमात की बहारें क़ायम हैं, इसलिए मुल्क भर का कोई भी मसअला सामने आया तो इस अज़ीम ख़ानक़ाह ने अपने मुल्क की तरफ़दारी, बक़ा और उसके वक़ार व अज़मत के लिए आवाज़ बुलंद की है।
ब्रिटानवी इक़्तिदार के तसल्त और ब्रिटिश हुकूमत के ज़ुल्म व तशद्दुद के ख़िलाफ़ भी ख़ानक़ाह मदार पाक से ऐसी इंक़िलाबी तहरीरें सामने आई थीं जिन्होंने वक़्त के धारों का नक़्शा बदल दिया था। जब हम हिंदुस्तान की आज़ादी की तारीख़ पर नज़र करते हैं, तो हमें मिलता है कि मुल्क की पहली जंग-ए-आज़ादी 1857 का सारा ख़ूनी सैलाब जिनके सिरों से गुज़रा था, उनमें मकनपुर शरीफ़ के वे जानबाज़ मुजाहिद भी थे जिन्होंने मुल्क को ग़ैर-मुल्की ताक़तों से आज़ाद कराने के लिए हँसते हुए सीनों पर गोलियाँ खाईं और मुस्कराते हुए फाँसी के फंदे को चूम लिया था। इन मुजाहिदीन-ए-आज़ादी ने अपनी क़ुर्बानियाँ देकर हिंदुस्तान के अवाम को जो इंक़िलाबी पैग़ाम दिया, उस पैग़ाम को गले लगाकर पूरा मुल्क आज़ादी की जंग में कूद पड़ा था। अगरचे पहली जंग-ए-आज़ादी 1857, जिसे हम ग़दर भी कहते हैं, नाकामी का शिकार हो गई थी, मगर नब्बे साल के बाद अंग्रेज़ हुकूमत को हिंदुस्तान छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था।
इसी पहली जंग-ए-आज़ादी 1857 से एक अज़ीम मुजाहिद-ए-आज़ादी हुज़ूर सैयद खाने आलम मियाँ जाफ़री मदारिया की क़ुर्बानी की एक तारीख़ वाबस्ता है, जिसके बिना हिंदुस्तान की आज़ादी की तारीख़ मुकम्मल नहीं हो सकती। शहीद सैयद खाने आलम अरग़ूनी मदारिया रहमतुल्लाह अलैह का शुमार उस दौर के उन बुज़ुर्गों में होता था जो शरीअत व तरीक़त के रुमूज़ व नुक़ात पर हद दर्जा कमाल रखते थे, तसव्वुफ़ व तरीक़त के रास्तों पर गामज़न और रहबरी व रहनुमाई की मंज़िलों पर फ़ाइज़ थे। आपका एक बहुत बड़ा हल्क़ा-ए-इरादत मेवात, राजस्थान और पंजाब का इलाक़ा था। उस वक़्त आपके मुरीदीन की तादाद हज़ारों में थी। आप सिलसिला-ए-आलिया मदारिया की तरवीज व इशाअत के ऐसे मुबल्लिग़ थे जिनकी ख़िदमात की निशानियाँ आज भी मेवात के इलाक़े में मौजूद हैं। ख़ानक़ाह-ए-आलिया मदार-उल-आलमीन रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु के मशाइख़-ए-इज़ाम में भी उस वक़्त सैयद ख़ान आलम मियाँ रहमतुल्लाह अलैह को एक ख़ास मक़ाम हासिल था। वाबस्तगान-ए-सिलसिला-ए-आलिया मदारिया आपको निहायत इज़्ज़त व एहतराम की नज़र से देखते थे और आपकी तब्लीगी सरगर्मियों से पूरा सिलसिला बेहद मुतअस्सिर था।
दरअसल शहीद सैयद खाने आलम मियाँ अरग़ूनी मदारिया रहमतुल्लाह अलैह उस समय मकनपुर शरीफ़ के सबसे बड़े पूँजीपतियों में से थे और क़ुरब-ओ-जवार ही नहीं बल्कि बहुत दूर-दूर तक उनकी दौलत, नाम और शौहरत के चर्चे थे। वे एक बहुत बड़ी हवेली के मालिक थे। उस हवेली में एक बहुत विशाल पुस्तकालय था। तज़्किरा-निगारों ने लिखा है कि इस लाइब्रेरी में तक़रीबन एक लाख किताबें मौजूद थीं और किसी ने किताबों की संख्या हज़ारों में लिखी है।
एक बहुत बड़े रक़बे में इस हवेली का निर्माण किया गया था, जिसमें उनके अहल-ए-ख़ाना बड़े ही ठाठ-बाट और ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी बसर करते थे। हवेली में घोड़ों, दूध देने वाले जानवरों के अलावा एक जोड़ा हाथी और हथनी भी थे। हवेली के उत्तरी हिस्से में एक बहुत बड़ा इमली का पेड़ था। उसी इमली के पेड़ में हाथियों को बाँधा जाता था, इसी कारण इस पेड़ को इतिहास की किताबों में “हथनी इमली” कहा गया है और उसका नाम हथनी इमली का पेड़ रखा गया था।
आज उस स्थान पर केवल शहीदों के मज़ारों की निशानियाँ ही बाक़ी हैं, जो ज़बान-ए-हाल से इतिहास के दर्दनाक हादसों और घटनाओं को बयान करती नज़र आती हैं।
हवेली के दक्षिणी हिस्से में आलीशान मकान और एक ख़ूबसूरत-सी मस्जिद का निर्माण किया गया था। आज भी मस्जिद के कुछ निशान और कुछ क़दीम निर्माण उस दौर की याद दिलाते हैं। मस्जिद का निर्माण आधुनिक हो चुका है और वहाँ पाँचों वक़्त की नमाज़ें अदा की जाती हैं, मगर मकानों के निशान, रिहायशी इमारतों की ज़ेब-ओ-ज़ीनत और पुरानी तामीरात की कोई भी निशानी बाक़ी नहीं रही। वक़्त के साथ-साथ सब कुछ बदल गया।
जिस जगह पर सत्रहवीं सदी ईस्वी के उत्तरार्द्ध तक लोगों की ज़िंदगियाँ नाज़-ओ-नअमत में पल रही थीं, आज वहाँ धूल उड़ती दिखाई देती है। इसे हालात की सितम-ज़रीफ़ी कहें या वक़्त का तक़ाज़ा। कल जहाँ एक विशाल और शान-ओ-शौकत वाली हवेली हुआ करती थी, आज वहाँ केवल मिट्टी के ढेर नज़र आते हैं। ज़माने के साथ दुनिया का मिज़ाज बदल जाना एक दस्तूर है और इंक़िलाबात इस दुनिया की बुनियाद में शामिल हैं। इसी लिए कहा गया है—
हुए नामवर बे-निशाँ कैसे-कैसे
ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे-कैसे
ख़ानक़ाह-ए-आलिया मदार पाक में जमादी-उल-मदार के महीने की छह तारीख़ को हुज़ूर मदार-उल-आलमीन के रौज़े पर “गुल-पोशी” की रस्म का एहتمام किया जाता है। कहा जाता है कि सैयद खाने आलम मियाँ रहमतुल्लाह अलैह ने हवेली की महिलाओं के लिए गुल-पोशी की रस्म देखने हेतु ख़ानक़ाह-ए-आलिया से सटा हुआ एक मकान तामीर करवाया था। हवेली की महिलाएँ उसी मकान से गुल-पोशी की रस्म देखा करती थीं।
यह मकान अपनी क़दीम सूरत में अब तक बाक़ी रहा, मगर अब एक-दो साल पहले ही वह मकान ढह गया। इस मकान में शैख़-ए-तरीक़त सैयद अली कौसर मियाँ रहमतुल्लाह अलैह को मैंने रहते हुए देखा है। जब इतिहास में इस मकान के संबंध में यह पढ़ा कि इसे सैयद खाने आलम मियाँ ने तामीर करवाया था, तो इसकी हक़ीक़त जानने के लिए मैंने अपने बुज़ुर्गों से संपर्क किया, तो एक अजीब वाक़िआ सामने आया।
जनाब सैयद अली अख़्तर रहमतुल्लाह अलैह ने मुझे एक रक़आ दिखाया, जो बहुत ही बोसीदा हालत में था। उसमें फ़ारसी ज़बान में इस मकान के बारे में जो लिखा था, उसका संक्षिप्त सार यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
जनाब अल-हाज सैयद अली सरवर मियाँ के वालिद-ए-मुहतरम, यानी मुंशी सैयद अली अख़्तर रहमतुल्लाह अलैह के दादा मुहतरम एक बेहद ख़ूबसूरत भैंस ख़रीद कर लाए थे। सैयद खाने आलम मियाँ रहमतुल्लाह अलैह ने उस भैंस को देखकर फ़रमाया—
“हज़रत! यह भैंस बेहद ख़ूबसूरत है, इसकी आँखें भी बहुत हसीन हैं।”
तब मुंशी सैयद अली अख़्तर साहब के दादा मुहतरम ने अर्ज़ किया—
“हज़रत! अगर यह भैंस आपको पसंद है तो आप इसे ले लीजिए, मगर जिस मकान में आप बैठे हैं वह मकान मुझे पसंद है, वह मुझे दे दीजिए।”
सैयद खाने आलम मियाँ रहमतुल्लाह अलैह ने यह सौदा मंज़ूर कर लिया और अपने मुलाज़िम को हुक्म दिया कि भैंस को हवेली में पहुँचा दो, और एक रक़आ लिख कर दे दिया कि आज की तारीख़ से इस मकान के आप मालिक व मुख़्तार हैं।
हज़रत सैयद खाने आलम मियाँ रहमतुल्लाह अलैह को हुज़ूर मदार-उल-आलमीन की ख़ानक़ाह-ए-आलिया के अशग़ाल और रसूमात में भी बहुत बड़ा सम्मान प्राप्त था। इसी कारण बिठूर के पेशवा नाना राव पेशवा आपके मित्र थे और आप पेशवा के वकील-ए-दुआ भी थे।
ब्रिटिश सरकार से प्राप्त होने वाली बहुत-सी जायदादें, जो ख़ानक़ाह शरीफ़ को दी गई थीं, आपने अपनी सादात बिरादरी को बराबर का हिस्सेदार बनाते हुए रक़आत लिखे और साथ-साथ ख़ानक़ाह-ए-आलिया की रसूमात में अधिक से अधिक हिस्सेदारी करके ख़ानक़ाह को सजाते-संवारते रहे।
चुनाँचे, इसी सिलसिले में एक प्राचीन ऐतिहासिक दस्तावेज़ से यह ज्ञात हुआ कि आपने अंग्रेज़ी सरकार से माँग करते हुए ख़ानक़ाह-ए-आलिया के नाम तमाम प्राप्त संपत्तियों को पूरी सादात बिरादरी के नाम किए जाने का फ़ैसला किया था।
नीचे प्रस्तुत ऐतिहासिक दस्तावेज़ फ़ारसी भाषा में है, जिसे हम अनुवाद के साथ यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
इन घटनाओं और परिस्थितियों को बयान करने का मेरा उद्देश्य अस्लाफ-परस्ती नहीं, बल्कि वर्तमान युग को आईना दिखाना और दुनिया को इस महान स्वतंत्रता सेनानी की कुर्बानियों से रू-बरू कराना है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ
نقل بمطابق اصل
بگواهی نعمت خان و شاہ غلام پیر و بالعبد محمد نعمت اللہ تحریر تاریخ هفتم ماه مارچ ۱۸۲۸ء مطابق هشتم شہر شعبان ۱۳۴۲ ہجری موافق دهم ماه پھاگن ۱۳۳۴ فصل ما یانکہ شاہ محمد نعمت اللہ عرف ماه مایا شاه نتها اولاد سید خواجہ فنصو ر و خواجہ طیفور و محمد خانعالم اولاد سید خواجہ ارغون ساکنان مکن پورایم چون بخودہا از قبل عملداری سرکار کمپنی انگریز بہادر و نیز در عملداری سرکار در ہر اشیاء مثل زر آمدنی میلہ و سال تمام وغیره قابض و متصرف بودیم حالا باز باقرار صیح با ہر دوسعہ شاہ غلام پیرازروی دینداری خدا و رسول و حضرت شاه مدار صاحب را درمیان داده کل آمدنی بمیان قوم سادات با جازت سید خانعالم برابر گردانیدیم و نوشتہ سیدہم کہ هر اشیا ئیکہ از درگاه و زمینداری شہر و بیرونی و غیره کہ لازمی از درگاه با خودہا نصفا نصف میگرفتہ باشتیم تو بر خلاف قرار عیاں بنام کل برادران قوم سوای راستی و ردستی در میان آرد.
नक़ल ब-मुताबिक़
बगवाही नेमत ख़ान व शाह ग़ुलाम पीर व बालअब्द मुहम्मद नेमतुल्लाह, तहरीर तारीख़ से मार्च 1838 ईस्वी, मुताबिक़ 18 शाबानुल-मुअज़्ज़म 1242 हिजरी, मुवाफ़िक़ 10 माह फागुन 1234 हिजरी फ़सली।
हम लोग यानी शाह मुहम्मद नेमतुल्लाह उर्फ़ शाह नत्था, औलाद सैयद ख़्वाजा फ़नसूर, व ख़्वाजा सैयद तैयफ़ूर, व सैयद मुहम्मद खाने आलम, औलाद सैयद ख़्वाजा अरग़ून रज़ी अल्लाहु अन्हु, मकनपुर के रहने वाले हैं।
ब-ज़ात-ए-ख़ुद अमलदारी सरकार कंपनी अंग्रेज़ बहादुर, नीज़ अमलदारी सरकारी हर चीज़ में, मिसाल के तौर पर मेलों और पूरे साल की आमदनी वग़ैरह पर क़ाबिज़ व मुतसर्रिफ़ हुए।
अब जबकि सही इकरारनामा हर दो हज़रात के रू-ब-रू, मअ शाह ग़ुलाम पीर, ब-रूए दीनदारी, ख़ुदा व रसूल व हज़रत शाह मदार साहब को दरमियान में रख कर, कुल आमदनी क़ौम सादात के दरमियान ब-इजाज़त सैयद खाने आलम बराबर कर दी और लिख कर दे दी।
हर चीज़ जो कि दरगाह और शहर की ज़मीन और बाहर की ज़मीन वग़ैरह जो कि दरगाह के साथ मुलहक़ हैं, बराबर-बराबर हम लेते हैं।
इस क़रारदाद के बाद कुल बरादर बराबर रास्ती और दुरुस्ती दरमियान में रखें।
1857 ईस्वी हिंदुस्तान की पहली जंग-ए-आज़ादी का यह अज़ीम मुजाहिद तारीख़ के औराक़ में ऐसा किरदार और कारगुज़ारी दर्ज कर गया है, जिसे सुबह-ए-क़यामत तक भुलाया नहीं जा सकता।
मकनपुर शरीफ़ वैसे भी वली-ए-कामिल, शहंशाह-ए-औलिया-ए-किबार, सैयद बदीउद्दीन क़ुत्ब-ए-मदार रज़ी अल्लाहु अन्हु की वह पाकीज़ा सरज़मीन है जहाँ बड़े-बड़े शहंशाहों ने हाज़िरी देकर और दामन फैलाकर वह सब कुछ हासिल कर लिया जो और कहीं न मिल सका।
अकाबिरीन औलिया-ए-अल्लाह ने क़ुत्ब-ए-मदार के सिलसिले से निस्बत हासिल करने को अपनी क़िस्मत की मेराज क़रार दिया है।
रूहानियत की ऐसी जल्वागरी यहाँ है कि जिसे देखकर अल्लाह की ख़ास रहमतों और नेमतों का वुरूद क़ल्ब पर होता चला जाता है।
दूसरी तरफ़ इस मुल्क की आज़ादी में मकनपुर शरीफ़ के सादात किराम ने जो नुमायाँ किरदार अदा किया, वह भी तारीख़ की पेशानी पर जल्वागर है।
मकनपुर शरीफ़ में तीन अंग्रेज़ भाई रहते थे। ब्रिटिश सरकार में उन्होंने यहाँ अपनी कोठी क़ायम कर रखी थी।
“मैक्सवेल ब्रदर्स (MAXWEL BROTHERS)” के नाम से इनको जाना जाता था।
ये तीनों भाई यहाँ नील की खेती करते थे। दरगाह शरीफ़ के उत्तर में उनकी कोठी थी। कोठी के खंडहर अब ख़त्म होते जा रहे हैं, मगर चूने से बनी दीवारों के कुछ निशान और खंडहर अभी भी बाक़ी हैं।
अब वहाँ पूरा एक मोहल्ला आबाद है, मगर यह मोहल्ला उस कोठी की मुनासबत से कोठी मोहल्ला कहलाता है।
1857 ईस्वी ग़दर का ज़माना—अंग्रेज़ सरकार के ज़ुल्म व तशद्दुद के ख़िलाफ़ पूरे मुल्क में मुज़ाहरे शुरू हो गए।
दरअसल ब्रिटिश सरकार ने हिंदू और मुसलमान दोनों मज़हबों के लोगों पर अजीब क़िस्म का क़ानून नाफ़िज़ कर दिया था।
हिंदुस्तान के जो लोग ब्रिटिश फ़ौजों में सिपाही के ओहदों पर मुलाज़िम थे, उन्हें बंदूक चलाने के लिए जो कारतूस दिए जाते थे, उन्हें मुँह से खींचना पड़ता था।
उन कारतूसों में गाय और ख़ंज़ीर की चर्बी लगी होती थी। गाय को हिंदू मज़हब के लोग अपनी माँ का दर्जा देते हैं और मुसलमानों के लिए ख़ंज़ीर नजिसुल-ऐन है, जिसके छूने से भी नापाक हो जाते हैं।
इसी वजह से अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ पूरे मुल्क में बग़ावतें उठ खड़ी हुईं।
जब बग़ावत की यह आग मकनपुर शरीफ़ पहुँची, तो यहाँ रहने वाले अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भी लोगों ने अपने जज़्बात का इज़हार किया।
इसी सिलसिले में हज़रत सैयद रूह-उल-आज़म मियाँ रहमतुल्लाह अलैह और शाह नत्था मियाँ ने पीटर मैक्सवेल (PETER MAXWEL) को गोली से उड़ा दिया।
यह वही वक़्त था जब शहीद सैयद खाने आलम मियाँ रहमतुल्लाह अलैह और उनके अज़ीज़ दोस्त बिठूर के पेशवा नाना साहब के दरमियान ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ ख़त-ओ-किताबत का सिलसिला जारी था।
वैसे तो पेशवा मराठों के राजाओं के यहाँ वज़ीर की हैसियत रखते थे, मगर बाद में पेशवा बाज़ीराव को मराठा हुकूमत में सल्तनत करने का मौक़ा मिला था।
1740 ईस्वी से 1761 ईस्वी तक पूरे 21 वर्ष उन्होंने हुकूमत की।
इन्हीं पेशवाओं की फ़ेहरिस्त में बाज़ीराव द्वितीय ने 1827 ईस्वी में अपने गोद लिए हुए बेटे को पेशवा का ख़िताब देकर बिठूर भेज दिया था।
लॉर्ड डलहौज़ी ने पेशवा नाना राव को मिलने वाली आठ लाख रुपये की पेंशन मंसूख़ कर दी थी, जिसके बाद नाना साहब अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने लगे थे।
हालाँकि उन्होंने मुल्क के रहनुमा अज़ीमुल्लाह ख़ान के ज़रिये इस नाइंसाफ़ी की फ़रियाद इंग्लैंड तक पहुँचाई थी, मगर अज़ीमुल्लाह ख़ान की आवाज़ को दबा दिया गया।
पेशवा नाना राव बिठूर से हर हफ़्ते मकनपुर शरीफ़ आते और मदार पाक की ख़ानक़ाह में हाज़िरी देकर दुआएँ करते थे।
पेशवा नाना राव के वकील-ए-दुआ और दोस्त सैयद खाने आलम मियाँ थे, जो मकनपुर शरीफ़ में पेशवा नाना राव की पूरी ज़ियाफ़त का इंतज़ाम भी करते थे।
1857 ईस्वी में पूरे देश में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ बग़ावतें चल रही थीं। मकनपुर शरीफ़ में शहीद सैयद रूह-उल-आज़म मियाँ रहमतुल्लाह अलैह ने पीटर मैक्सवेल को गोली से उड़ा दिया था। इन तमाम हालात से मुतअस्सिर होकर सैयद खाने आलम मियाँ ने गोरी सरकार के ख़िलाफ़ एक ख़त अपने दोस्त पेशवा नाना राव को रवाना किया।
मगर मुल्क से ग़द्दारी करने वालों की कमी न थी और तमीज़ुद्दीन, झब्बू ग़ुलाम, छीदा और आज़म—इन चार लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत के हाकिमों के कानों में सरगोशियाँ करते हुए वह ख़त गोरी सरकार के हवाले कर दिया। फिर क्या था—ब्रिटिश हुकूमत की तोपों के मुँह इस छोटी-सी आबादी की तरफ़ घूम गए और अंग्रेज़ हुक्मरानों ने ज़ुल्म व तशद्दुद के ऐसे पहाड़ तोड़े कि बहुत अरसे तक यह आबादी आर्थिक और मआशी बदहाली का शिकार रही।
इन चारों ग़द्दारों को अंग्रेज़ सरकार की ओर से इनाम के तौर पर कुछ रक़बे ज़मीन दिए गए थे, जिन्हें बाद में नीलाम कर दिया गया।
अंग्रेज़ हुक्मरानों ने बड़ी बे-रहमी से शहीद सैयद रूह-उल-आज़म मियाँ और शाह नत्था मियाँ को तोप से उड़ा दिया। शहीद सैयद खाने आलम मियाँ की पूरी हवेली को मिसमार कर दिया गया। वहाँ मौजूद लाइब्रेरी में आग लगा दी गई, जिससे सारी किताबें जलकर राख हो गईं। सबसे बड़ा ज़ुल्म यह किया गया कि सैयद खाने आलम के ख़ानदान के लोगों में से 30 अफ़राद को भी इमली के पेड़ में फाँसी पर लटका दिया गया।
आज उन तीस लोगों की क़ब्रें अपनी बे-गुनाही और मुल्क पर जान क़ुर्बान कर देने की दास्तान को ज़बान-ए-हाल से बयान करती नज़र आती हैं। सैयद रूह-उल-आज़म मियाँ का मज़ार शरीफ़ दरगाह के उत्तरी फाटक पर और शाह नत्था मियाँ का मज़ार दरगाह के दक्षिणी फाटक पर मौजूद है।
सैयद खाने आलम मियाँ की हवेली और तमाम जायदाद लूट ली गई और उनके अहल-ए-ख़ाना को बड़ी बे-रहमी से हवेली से निकाल दिया गया। इस तरह हवेली पर ब्रिटिश हुकूमत का क़ब्ज़ा हो गया।
तारीख़ी दस्तावेज़ों में मिलता है कि अंग्रेज़ सरकार ने शहीद सैयद खाने आलम मियाँ की हवेली को नीलाम कर दिया था। सैयद खाने आलम मियाँ ने अपने कुछ मुजाहिदीन-ए-आज़ादी यानी हमनवा साथियों के साथ अंग्रेज़ी ज़ुल्म व बर्बरियत के ख़िलाफ़ एहतेजाज किया, जिसकी वजह से आपके जिस्म पर शदीद ज़ख़्म आए।
तारीख़ में लिखा है कि पहली जंग-ए-आज़ादी नाकाम होने के बाद पेशवा नाना राव बिठूर से कहाँ चले गए—इसका कुछ पता न चल सका। बाद में उनके इंतिक़ाल की ख़बर मिली कि केवल 35 बरस की उम्र में, यानी 24 दिसंबर 1859 ईस्वी को किसी नामालूम जगह पर उनका इंतिक़ाल हो गया।
इसी दौरान सैयद खाने आलम मियाँ शदीद ज़ख़्मी हालत में अपने हल्क़ा-ए-इरादत में अलवर के मुक़ाम पर पहुँचे। वहीं से उन्होंने अपने ख़ून से लिखा हुआ एक ख़त मकनपुर शरीफ़ के लिए रवाना किया था।
ख़ून से लिखे गए उस ख़त में जो अलमनाक हादसात बयान किए गए थे, उन्हें पढ़कर रूह तक काँप उठती है। अरसे तक हमारे बुज़ुर्गों के पास वह ख़त महफ़ूज़ रहा और अपने बुज़ुर्गों से उन वाक़िआत और हादसात की तारीख़ भी हमने खूब सुनी थी। मगर अफ़सोस, वक़्त गुज़रने के साथ-साथ हम उन तारीख़ी दस्तावेज़ों की ज़ियारत से महरूम रह गए।
यह अलग बात है कि पहली जंग-ए-आज़ादी 1857 ईस्वी के शहीदों को भुला दिया गया। इस जंग की नाकामी के साथ ही मुल्क के लोगों ने उन एहसानों को फ़रामोश कर दिया, जिन एहसानों के सदक़े ठीक 90 साल बाद, यानी 1947 ईस्वी में अंग्रेज़ों को यह मुल्क छोड़कर जाना पड़ा और हिंदुस्तान ग़ैर-मुल्की इस्तिब्दाद के शिकंजे से आज़ाद हो गया।
मगर जब-जब मुल्क की आज़ादी की तारीख़ लिखी जाएगी, यह दुनिया सैयद खाने आलम मियाँ और अहल-ए-मकनपुर शरीफ़ की क़ुर्बानियों को याद करती रहेगी। हम इन शहीदान-ए-वतन को अपनी वफ़ादारियों का ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं।
लेखक :
मौलाना सैयद मुक़्तदा हुसैन जाफ़री











