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ईमान वालों के आपसी अधिकार

On: फ़रवरी 21, 2026 4:12 अपराह्न
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ईमान वालों के आपसी अधिकार

क़ाला रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लिलमोमिन अलल मोमिन सित्त ख़िसाल यऊदुहू इज़ा मरीज़ व यश्हदुहू इज़ा मात व युजीबुहू इज़ा दआहू व युसल्लिमु अलैहि इज़ा लक़ीतहू व युशम्मितुहू इज़ा अत्सा व यनसहू लहू इज़ा ग़ाबा औ शहिद।

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया है कि मोमिन के मोमिन पर छह हक़ हैं, जब वह बीमार हो तो मिज़ाजपुर्सी करे और जब मर जाए तो जनाज़े पर हाज़िर हो, जब दावत दे तो क़बूल करे, जब उससे मिले तो उसे सलाम करे और जब छींक आए तो जवाब दे और उसकी ख़ैरख़्वाही करे (चाहे) जब वह ग़ायब हो या हाज़िर।

(नसाई शरीफ़ बरिवायत हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु)

इस इरशाद मुबारक में उन बुनियादी उमूर के मुतअल्लिक़ सराहत फ़रमाई गई है जिनका तअल्लुक़ मोमिनीन के आपसी हुक़ूक़ से है और जिनसे दीनी मुआशरा की पहचान है और जो इस्लामी अक़दार के मोअस्सिर पहलुओं के आइना दार हैं, इनमें पहला हक़ जो एक मोमिन का दूसरे मोमिन पर है वह यह कि अगर बीमार हो तो उसकी मिज़ाजपुर्सी करे, इसकी बड़ी फ़ज़ीलत और अज्र-ए-अज़ीम है।

हज़रत अली करमल्लाहु वजहहू से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जब कोई मुसलमान अपने मुसलमान भाई की सुबह के वक़्त अयादत करता है तो शाम तक सत्तर हज़ार फ़रिश्ते उसके लिए रहमत व मग़फ़िरत की दुआ करते हैं और जो शाम के वक़्त अयादत करता है उसके लिए सत्तर हज़ार फ़रिश्ते सुबह तक दुआ-ए-मग़फ़िरत करते हैं और उसके लिए जन्नत में एक बाग़ है।

(तिर्मिज़ी शरीफ़ और अबू दाऊद शरीफ़)

इसी तरह हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जिसने अच्छा वुज़ू किया और महज़ सवाब हासिल करने की ग़रज़ से अपने मुसलमान भाई की अयादत की तो उसे साठ बरस की मसाफ़त के फ़ासले पर दोज़ख़ से दूर कर दिया जाता है।

(अहमद)

हज़रत अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि रसूल करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फ़रमाया कि जब तुम किसी की मिज़ाजपुर्सी को जाओ तो मौत के बारे में उसका रंज व ग़म दूर करो अगरचे इससे उसकी मौत का वक़्त टल नहीं सकता लेकिन उसका दिल ख़ुश हो जाएगा।

(तिर्मिज़ी व इब्न माजा)

हज़रत सईद बिन मुसय्यब रज़ियल्लाहु अन्हु से मन्क़ूल है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि बेहतरीन इबादत यह है कि मिज़ाजपुर्सी के बाद फ़ौरन उठ जाए।

(बैहक़ी)

दूसरा हक़ जनाज़े में हाज़िरी

दूसरा हक़ यह है कि जब कोई मोमिन भाई मर जाए तो जनाज़े पर हाज़िर हो। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जनाज़े के लिए जाने में जल्दी करो इसलिए कि अगर वह नेक आदमी का जनाज़ा है तो उसे ख़ैर की मंज़िल की तरफ़ जल्द पहुँचाना चाहिए और अगर बदकार का जनाज़ा है तो बुरे को अपनी गर्दनों से जल्द उतार देना चाहिए।

(बुख़ारी व मुस्लिम)

हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो शख़्स ईमान का तक़ाज़ा समझ कर और हुसूल-ए-सवाब की नियत से किसी मुसलमान के जनाज़े के साथ साथ चले यहाँ तक कि उसकी नमाज़ पढ़े और उसके दफ़्न से फ़ारिग़ हो तो वह दो क़ीरात सवाब लेकर वापस लौटता है, जिसमें हर क़ीरात उहुद (पहाड़) के बराबर है और जो शख़्स सिर्फ़ जनाज़े की नमाज़ पढ़ कर वापस आ जाए और दफ़्न में शरीक न हो तो वह एक क़ीरात का सवाब लेकर वापस होता है।

(बुख़ारी व मुस्लिम बरिवायत हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु)

तीसरा हक़-ए-मोमिन दावत क़बूल करना

हक़-ए-मोमिन में तीसरा हक़ दावत का क़बूल करना है। और जब मोमिन अपने मोमिन भाई की दावत क़बूल कर ले और उसका मेहमान बन जाए तो दावत देने वाले मेज़बान पर अपने मेहमान का एहतिराम व इकराम ज़रूरी है।

हज़रत अबू अल-अहवस से रिवायत है कि उनके वालिद ने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम से अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह! फ़रमाइए कि अगर मैं किसी शख़्स पर गुज़रूँ तो न वह मेरी मेहमानी करे न मुझे दावत दे, फिर वह बाद में मुझ पर गुज़रे तो मैं उसे मेहमान बनाऊँ या बदला लूँ तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया बल्कि मेहमान बनाओ यानी उससे बे-मुरव्वती न करो उसको हक़ मेहमानी दो।

(तिर्मिज़ी)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जिस शख़्स को खाने की दावत दी जाए और वह (बे वजह शरई) दावत क़बूल न करे तो उसने अल्लाह तआला और उसके रसूल की नाफ़रमानी की और जो बिना दावत के पहुँच जाए तो वह चोर की तरह गया और डाकू बन कर निकला।

(अबू दाऊद)

मोमिन पर मोमिन का चौथा हक़ सलाम है

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि सलाम आपस में मुहब्बत बढ़ाने का सबब है।

(मुस्लिम)

हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने कलाम से पहले सलाम का हुक्म दिया है।

(तिर्मिज़ी)

हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया सलाम में पहल करने वाला ग़ुरूर व तकब्बुर से पाक है।

(बैहक़ी)

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूल करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने फ़रमाया ऐ बेटे! जब तू घर में दाख़िल हो तो घर वालों को सलाम कर क्योंकि तेरा सलाम तेरे और तेरे घर वालों के लिए बरकत का सबब है।

(तिर्मिज़ी)

पाँचवाँ हक़ छींक का जवाब देना है

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया है कि जब किसी को छींक आए तो “अल्हम्दुलिल्लाह” कहे और उसका भाई या साथ वाला “यरहमुकल्लाह” कहे, जब “यरहमुकल्लाह” कह ले तो छींकने वाला उसके जवाब में कहे “यह्दीकुमुल्लाहु व युस्लिह बालकुम।”

(बुख़ारी शरीफ़)

छठा हक़ मोमिन ख़ैरख़्वाही

छठा हक़ मोमिन का मोमिन पर यह है कि उसकी ख़ैरख़्वाही करे चाहे वह मौजूद हो या ग़ैर हाज़िर हो। रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया मुसलमान, मुसलमान का भाई है न तो उस पर ज़ुल्म करे न उसे रुसवा करे और जो अपने भाई की हाजत रवाई में रहेगा अल्लाह उसकी हाजत रवाई करेगा और जो मुसलमान से कोई तकलीफ़ दूर करेगा अल्लाह उससे क़ियामत के दिन की तकलीफ़ दूर करेगा और जो मुसलमान की पर्दा-पोशी करेगा क़ियामत के दिन अल्लाह उसकी पर्दा-पोशी करेगा।

(बुख़ारी व मुस्लिम रिवायत हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा)

माख़ूज़: सहमाही रहबर नूर

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