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मुसलमान वंदे मातरम क्यों नहीं गाते

On: जनवरी 7, 2026 5:32 अपराह्न
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मुसलमान वंदे मातरम क्यों नहीं गाते

वंदे मातरम पर मुसलमानों का एतराज़

मुसलमानों को वंदे मातरम गाने पर एतराज़ है। यह एतराज़ क्यों है और इसके पीछे क्या असबाब हैं, इसको समझने के लिए तारीख़ की वरक़-गरदानी करनी पड़ेगी। वंदे मातरम को बंकिम चंद्र चटर्जी की तख़लीक़ बताया जाता है, जो उनके एक गीत में शामिल है। इस गीत के बारे में अब कहा जाने लगा है कि आज़ादी की चिंगारी रोशन करने में इस गीत का बड़ा हाथ है। यह गीत नावेल के औराक़ में से निकल कर इन्क़िलाबों की चीख़ बन गया, लेकिन यह गीत इब्तिदा से ही मतनाज़े रहा है।
वजह यह है कि गीत में जिस आइडियोलॉजी का इज़हार किया गया है, उसमें फ़िरक़ावारियत मौजूद है और मुसलमानों की दिल-आज़ारी का पहलू नुमायाँ है।

भारतीय राजनीति में वंदे मातरम पर बहस

हिंदुस्तान की सियासत में इस नग़मे पर बहस ने बड़ा फ़रोग़ हासिल किया। इस गीत को बतौर क़ौमी तराना इख़्तियार करने या इसे रद्द करने के बारे में पुरज़ोर दलीलों के साथ बात की जाती रही।
जो लोग इस गीत को पसंद करते हैं, उन्होंने इसको अदबी दर्जा देने की कोशिश की है। गीत आनंद मठ नावेल में शामिल है, जो बंकिम चंद्र चटर्जी की तख़लीक़ है। उनकी मौत के दो साल बाद यह नावेल बहुत मक़बूल हो गया।

कांग्रेस अधिवेशन और वंदे मातरम

नावेल की मक़बूलियत का अंदाज़ा इस तरह लगाया जा सकता है कि 1896 ई॰ में जब इंडियन नेशनल कांग्रेस का इजलास अमृतसर में शुरू हुआ, तो उसमें वंदे मातरम गीत गाया गया। हिंदुओं ने इस गीत को सर आँखों पर रखा और इसे हिंदुस्तान के साथ अकीदत के इज़हार का ज़रिया क़रार दिया।
रवींद्रनाथ टैगोर कांग्रेस के इजलास में इस गीत को पेश करने वालों में सबसे आगे थे। 1896 के बाद यह रवायत क़ायम हो गई कि कांग्रेस के हर इजलास में यह गीत गाया जाने लगा। अपने वक़्त के मशहूर माहिर-ए-मौसीक़ी वी॰ डी॰ पालुस्कर ने इसकी धुन तरतीब दी, जिसने इसे एक ज़बरदस्त नग़्माती आहंग बख़्शा।

1905 और बंगाल विभाजन

1905 सियासी एतबार से नज़रियाती टकराव का साल रहा। लॉर्ड कर्ज़न ने अपनी शातिराना चाल चली और बंगाल को दो हिस्सों में तक़सीम करने का फ़ैसला किया। अंग्रेज़ हुकूमत की तरफ़ से तक़सीम की वजह यह बताई गई कि इंतज़ामी सहूलतें फ़राहम कराने के लिए यह फ़ैसला किया गया है, लेकिन असल में यह हिंदू और मुसलमानों को तक़सीम करने की एक साज़िश थी।
फ़ैसले से नाराज़ हिंदुओं ने वंदे मातरम का नारा लगाकर बंगाल की तक़सीम को क़बूल करने से इंकार कर दिया। सविनय अवज्ञा शुरू हुई। यह वही मौक़ा था जब वंदे मातरम गीत को ज़बरदस्त मक़बूलियत हासिल हुई। सिर्फ़ दो अल्फ़ाज़ “वंदे मातरम” कहते हुए सैकड़ों लोगों ने अपनी जानें दे दीं और यह गीत हिंदुस्तान की जंग-ए-आज़ादी का बिगुल बन गया। इसके बरअक्स मुसलमान इस गीत से कभी मुत्तफ़िक़ नहीं हुए।

आनंद मठ और मुस्लिम विरोधी दृष्टिकोण

हिंदुओं ने इस गीत को इस क़दर शोहरत दी कि बाज़ लोग इसे क़ौमी तराना कहने लगे, लेकिन मुसलमानों को वंदे मातरम में मौजूद फ़िरक़ावारियत से इख़्तिलाफ़ है। आनंद मठ नावेल में नावेल-निगार ने मुग़लिया दौर-ए-हुकूमत को पेश किया है, जहाँ हिंदुओं के साथ नाइंसाफ़ी ही नाइंसाफ़ी है और वे ज़ुल्म की चक्की में पिस रहे हैं।
नावेल का मर्कज़ी किरदार भवानी ओदा मुग़ल हुक्मरानों के ख़िलाफ़ एक फ़ौज बना रहा है और नौजवानों को भर्ती कर रहा है।

वंदे मातरम और धार्मिक टकराव

भवानी ओदा नावेल के एक दूसरे किरदार महेंद्र से रुझू करता है और उससे फ़ौज में शामिल होने के लिए कहता है और उसे वंदे मातरम गाकर सुनाता है। महेंद्र जब गीत के मआनी दरयाफ़्त करता है तो भवानी ओदा जवाब में कहता है:
“हमारा मज़हब रुख़्सत हो चुका है, हमारी क़ौमियत ख़त्म हो चुकी है, हमारा वक़ार हमसे छीन लिया गया है। क्या इन मिलिच्छ मुसलमानों के यहाँ रहते हुए हिंदू इज़्ज़त व आबरू के साथ इस मुल्क में रह सकते हैं?”
महेंद्र राय से मुत्तफ़िक़ नहीं होता, तब भवानी ओदा उसे आनंद मठ में ले जाता है जहाँ एक साधु उसे काली और दुर्गा की मूरतें दिखलाता है और साधु महेंद्र से कहता है कि वह वंदे मातरम कहे।

अंग्रेज़ परस्ती और मुस्लिम विरोध

सत्यानंद नावेल का एक और किरदार है जो माफ़ौक़-उल-फ़ितरत हिंदू अकीदों की बातें करता है। यह कहता है:
“हमने मुस्लिम सल्तनत को तबाह कर दिया है। तुम अब भारत माता की तक़दीर बनाओ। अब अंग्रेज़ों की हुकूमत क़ायम हो चुकी है, अब अपनी जंग बंद कर दो।”
इसके बाद राज़ और गहरा हो जाता है। दुश्मन कौन है? जवाब है: अब दुश्मन कोई नहीं है। अंग्रेज़ जो दोस्त हैं, अब हुक्मरान हैं और कोई भी उनको जंग में शिकस्त नहीं दे सकता।
यह नावेल अंग्रेज़ों के दौर-ए-हुकूमत में लिखा गया था और अंग्रेज़ों से मोहब्बत और मुसलमानों से नफ़रत का बर्मला इज़हार नावेल में जगह-जगह मौजूद है।

मुस्लिम लीग का विरोध

ऐसे नावेल के किसी गीत को हब्बुल-वतन की अलामत के तौर पर कैसे क़बूल किया जा सकता है? नावेल की पूरी फ़िज़ा में मुस्लिम दुश्मनी छाई हुई है। गीत पर मुसलमानों का एतराज़ आज कोई नया नहीं है।
1908 ई॰ में जब ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के इजलास में इस गीत पर एतराज़ात किए गए तो गीत के हिमायतियों ने शिद्दत-पसंदी का मुज़ाहरा किया। अमृतसर में मुस्लिम लीग के इजलास में सैयद अहमद अली ने अपनी तक़रीर के दौरान कहा कि बंकिम चंद्र चटर्जी का नावेल आनंद मठ असल में हिंदुस्तान के मुस्लिम हुक्मरानों की सूरत-मस्ख़ करने की एक कोशिश है और नावेल के गीत वंदे मातरम में तो मुसलमानों के मज़हबी अकीदे के बिल्कुल ख़िलाफ़ बात कही गई है। मुसलमान वतन-दोस्त हैं लेकिन वतन की परस्तिश नहीं कर सकते।

1923 का कांग्रेस अधिवेशन और मौलाना मोहम्मद अली

इस गीत के ख़िलाफ़ एक मज़बूत और क़ाबिले-ज़िक्र एहतिजाज 1923 ई॰ में हुआ, जब काकीनाडा, आंध्र प्रदेश में कांग्रेस का इजलास हो रहा था और वी॰ डी॰ पालुस्कर इस गीत को संगीत देने के लिए खड़े हुए। मौलाना मोहम्मद अली, जो उस वक़्त कांग्रेस इजलास के सदर थे, ने वी॰ डी॰ पालुस्कर को रोकते हुए कहा:
“गाना बजाना हमारे मज़हब में जाइज़ नहीं है।”
चुनाँचे पूरा गीत बिना किसी गाजे-बाजे की सादगी से पढ़ दिया गया।

1937 समिति और सीमित पद्य

1937 ई॰ में यह तजवीज़ भी पेश की गई कि वंदे मातरम में मुनासिब तरमीम करके इसे सब के लिए क़ाबिले-क़बूल बना दिया जाए। चुनाँचे 26 अक्तूबर 1937 ई॰ को कलकत्ता में जब कांग्रेस वर्किंग कमेटी का इजलास हुआ तो एक कमेटी तशकील दी गई, जिसमें तय पाया कि रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और पंडित जवाहरलाल नेहरू को शामिल रखते हुए गीत का तजज़िया किया जाए।
कमेटी ने नतीजा अख़्ज़ किया कि वंदे मातरम गीत में क़ाबिले-एतराज़ बातें मौजूद हैं जो मुसलमानों के नज़रियात के ख़िलाफ़ हैं। तय किया गया कि गीत के पहले दो बंद ही इज्तिमाअत में गाए जाएँ और दुर्गा, काली वग़ैरह से मुताल्लिक़ बंदों का चलन छोड़ दिया जाए।

राष्ट्रीय गान का चयन: जन गण मन

हिंदुस्तान आज़ाद हुआ। क़ौमी तराना मुंतख़ब करने का वक़्त आ गया। वंदे मातरम पर एतराज़ात थे। “जन गण मन” में किसी देवी-देवता की पूजा का ज़िक्र नहीं था, इसलिए इसे ज़्यादा पसंद किया गया और फ़ैसला किया गया कि “जन गण मन” को ही हिंदुस्तान का क़ौमी तराना बनाया जाए। यह सब के लिए पसंदीदा गीत था।

संविधान सभा और अंतिम निर्णय

25 अगस्त 1948 ई॰ को संविधान सभा का इजलास मुनअक़िद हुआ और पंडित नेहरू ने इस इजलास में क़ौमी तराने की अहमियत पर रोशनी डाली और फ़ौरी तौर पर क़ौमी तराने के इंतिख़ाब को वक़्त की अहम ज़रूरत क़रार दिया।
उन्होंने कहा कि मैंने गवर्नरों से क़ौमी तराने के बारे में राय मालूम कर ली है और सब ने “जन गण मन” को ही क़ौमी तराना बनाने की राय दी है। चुनाँचे वंदे मातरम क़ानून-साज़ असेंबली में क़ौमी तराना नहीं बन सका और “जन गण मन” को ही क़ौमी तराना मान लिया गया।

एकेश्वरवाद (तौहीद) की आस्था और वंदे मातरम

मुसलमानों के अकीदा-ए-तौहीद से वंदे मातरम मुतसादिम है, इसलिए मुसलमानों ने इस गीत की तख़लीक़ के दिन से ही आज तक कभी भी इसे गाने पर रज़ामंदी ज़ाहिर नहीं की है।
यह मज़मून एक मअरूफ़ अंग्रेज़ी रोज़नामा “पायनियर” में भी शाये हो चुका है।

Sorce
स्रोत : त्रैमासिक रहबर नूर
सैयद इक्तिदा हुसैन जाफ़री मदारी, मकनपुर

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