आज मिल्लत-ए-इस्लामिया में नए-नए इख़्तिलाफ़ी मसाइल पैदा करके कारोबारी उलमा ने अहले-सुन्नत को सीधे रास्ते से हटा कर अपने मस्लक-ओ-मशरब, तौर-ओ-अत्वार के सिलसिलों का पाबंद करने के लिए नई-नई तावीलों के ख़रमन तामीर कर लिए हैं। ख़ुसूसन हज़रात अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम से मंसूब व मर्बूत अलक़ाब व तक़ारीब का गला घोंटने के लिए ख़ून-आशाम ख़ंजर आस्तीनों में छिपे हैं और जब जहाँ मौक़ा लगा एक-एक हुसैन गले पर फ़तवे का ख़ंजर पियोस्त कर दिया।
मिसाल के तौर पर
हज़रात आइम्मा-ए-अहले-बैत के लिए अलैहिमुस्सलाम का इस्तेमाल हराम है
ताज़िया-दारी हराम है!
अलम, मेहंदी, जुलूस-ए-हुसैनी हराम!
नारा-ए-हैदरी लगाना शीयत!
मौला अली से मुहब्बत करना रफ़्ज़!
जश्न-ए-ईद-ए-मीलादुन्नबी ﷺ में ज़िक्र-ए-शहादत-ए-हुसैन करना नाजायज़!
मौला अली कर्रमल्लाहु वज्हुल करीम सैय्यद नहीं!
इसी तरह से 22 रजब को नज़र-ओ-नियाज़ इमाम जाफ़र सादिक़ पर भी फ़तवा कि यह अहले-तशीअ का शिआर है।
लिहाज़ा सुन्नी मुसलमानों को इससे इज्तिनाब करना चाहिए क्योंकि शीयों ने हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की वफ़ात पर बतौर तबरा व मस्ररत राइज किया है, जबकि हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की शहादत 15 रजब है तो 22 को कूंडे कैसे?
बाज़ का कहना है कि यह 150 साल पुरानी इजाद है।
इस सिलसिले में सबसे पहले तारीख़ी हक़ायक़ व शवाहिद की रौशनी में हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की तारीख़-ए-विसाल पर इख़्तिलाफ़ी नज़रियात क़ारिईन की ख़िदमत में पेश हैं ताकि पहली ग़लतफ़हमी का इज़ाला हो सके।
हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की तारीख़-ए-विसाल एक मुख़्तलिफ़-फ़ीह मसअला है, चुनांचे—
हज़रत अल्लामा सअद बिन इब्राहीम के नज़दीक तारीख़-ए-विसाल 1 रजबुल-मुबारक है।
अल्लामा इब्न इस्हाक़ ने लिखा है कि 8 रजब तारीख़-ए-वफ़ात है, हवाला: अल-बिदाया वन्निहाया — अल्लामा इब्न कसीर।
15 रजबुल-मुबारक तारीख़-ए-विसाल है।
अल्लामा इब्न जौज़ी तल्क़ीह फ़ुहूल अहलिल-असर, अल्लामा इब्न हजर व इब्न अब्दुल-बर ने फ़रमाया कि जब आपकी वफ़ात हुई तो रजब की चार रातें बाक़ी थीं यानी 25/26 रजब को वफ़ात हुई, हवाला: अल-इस्तिआब फ़ी मआरिफ़तिल-असहाब व तहज़ीबुत-तहज़ीब।
अल्लामा तबरी ने तीन अक़वाल नक़्ल किए हैं:
- 1 रजब
- 15 रजब
- वफ़ात के वक़्त रजब की आठ रातें बाक़ी थीं
हवाला: तारीख़ुल-उमम वल-मुलूक — जरीर तबरी।
इस हवाले में अगर महीना 29 का था तो 21 रजब वफ़ात की तारीख़ हुई और अगर 30 का महीना था तो 22 रजब वफ़ात की तारीख़ हुई।
अब जबकि मोअतबर आइम्मा-ए-तवारीख़ व सीर के बयानों से वाज़ेह हो गया कि अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की तारीख़-ए-वफ़ात 22 रजब उलमा-ए-अहले-सुन्नत के नज़दीक मुतयक़्क़िन नहीं है, न जनाब अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की वफ़ात सन 60 से लेकर सन 1440 हिजरी तक यानी तक़रीबन 1380 साल तक कहीं इस 22 रजब को उर्स, नज़र-ओ-नियाज़ या उनकी वफ़ात का धूम-धड़ाका अहले-सुन्नत के यहाँ बिलख़ुसूस नहीं मिला।
फिर 22 रजब को उनकी वफ़ात की ख़ुशी मनाने का इल्ज़ाम हमारे सर क्यों?
हाँ अगर शीयों में यही वजह हो तो हमसे शीयों से क्या मतलब, क्योंकि हमने तो अपने बुज़ुर्गों से यह सुना है कि इस 22 रजब की तारीख़ में हुज़ूर इमाम जाफ़र रज़ियल्लाहु अन्हु को इमामत-ए-कुब्रा व क़ुतबियत-ए-उज़्मा के मंसब पर फ़ाइज़ किया गया। इस अज़ीम नेअमत के हुसूल की ख़ुशी में इमाम पाक शीरनी तक़सीम फ़रमाया करते थे। बाद के ज़मानों में वही कूंडों की नियाज़ की शक्ल में तब्दील हो गया। तरीक़ा-ए-अहले-सुन्नत के मुताबिक़ इस नियाज़ में कोई शरई क़बाहत नहीं है। सुन्नी मुसलमान 22 रजबुल-मुबारक को तरीक़ा-ए-शरईया के मुताबिक़ नज़र-ओ-नियाज़ का एहतिमाम करें।
रहा यह कहना कि 150 साल पुरानी इजाद है, तो मैं गोश-गुज़ार किए देता हूँ कि—
हज़रत शाह अब्दुल-अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की तहक़ीक़ के मुताबिक़ अहले-बैत से वाबस्ता तक़ारीब व अय्याम जैसे 22 रजब के कोंडों की फ़ातिहा क़दीम ज़माने से चली आ रही है, जो हिंदुस्तान की इजादें नहीं हैं।
(तुहफ़ा-ए-इसना अशरिया)
मुफ़्ती-ए-आज़म पाकिस्तान अल्लामा व मौलाना मुफ़्ती मुहम्मद ख़लील ख़ान क़ादरी बरकाती मारहर्वी अलैहिर्रहमा, बानी व शैख़ुल-हदीस एहसानुल-बरकात हैदराबाद फ़रमाते हैं—
माशाअल्लाह इस माह रजब में हज़रत जलाल बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह और बाज़ जगह हज़रत सैय्यदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को ईसाल-ए-सवाब के लिए खीर-पूरी पका कर कोंडे भरे जाते हैं और फ़ातिहा (नज़र-नियाज़) दिलाकर लोगों को खिलाते हैं, यह भी जायज़ है।
(सुन्नी बहिश्ती ज़ेवर — कामिल / 318)
अब इन दलाइल की रौशनी में बात अज़हर मिनश्शम्स हो गई कि 22 रजब को अहले-सुन्नत के मामूलात में नज़र-नियाज़ कोंडे शरीफ़ शामिल हैं, लिहाज़ा इस तक़रीब कोंडे को शरई तरीक़े पर मनाना जायज़ है।
वल्लाहु आलम बिस्सवाब
अमीरुल-क़लम : मौलाना हाफ़िज़ सैयद अज़बर अली जाफ़री मदारी









