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हज़रत इमाम बाक़र अलैहिस्सलाम

On: जनवरी 7, 2026 5:44 अपराह्न
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नाम

इमाम बाक़िर का नाम मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन अली बिन अबी तालिब अलैहिस्सलाम है।

कुन्नियत व लक़ब

इमाम बाक़िर की कुन्नियत अबू जाफ़र और लक़ब बाक़िर है।

बाक़िर की वजह तस्मिया

आप को बाक़िर इस वजह से कहते हैं कि आप मुख़्तलिफ़ उलूम में वुसअत-ए-नज़र के मालिक थे और उनकी ख़ूब तशरीह व तसरीह फ़रमाते।

आप की वालिदा

इमाम बाक़िर की वालिदा का नाम फ़ातिमा था जो हज़रत इमाम हसन बिन अली की बेटी थीं। (अलैहिमुस्सलाम)

सन विलादत

इमाम बाक़िर की पैदाइश मदीना मुनव्वरा में माह सफ़र की तीसरी तारीख़ को बरोज़ जुमअतुल मुबारक 57 हिजरी में हुई। हज़रत इमाम हुसैन की शहादत से तीन साल पहले।

रसूलल्लाह का सलाम

इमाम बाक़िर ख़ुद बयान करते हैं कि मैं ने हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु को उस वक़्त आकर सलाम किया, जब उनकी बसारत ख़त्म हो चुकी थी। उन्होंने मेरे सलाम का जवाब दिया और पूछा: “आप कौन हैं?”
मैं ने बताया: “मैं मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन हूँ।”
हज़रत जाबिर ने कहा: ऐ मेरे बेटे मेरे नज़दीक आओ।
मैं क़रीब आया तो उन्होंने मेरे हाथ चूम लिए और पाँव चूमने के लिए भी ख़्वाहिश का इज़हार किया। मैं दूर जा खड़ा हुआ तो उन्होंने फ़रमाया: रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तुम्हें सलाम भेजा है।
मैं ने कहा: रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर भी सलात व सलाम हो और अल्लाह की रहमत व बरकत हो।
फिर मैं ने पूछा: ऐ जाबिर! ये सब कुछ क्यूँकर हुआ है?
हज़रत जाबिर ने कहा: एक दिन मैं रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास था तो आप ने मुझे फ़रमाया: “ऐ जाबिर! शायद तुम्हारी मुलाक़ात मेरे एक फ़रज़ंद से हो जिसे मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन कहते हैं। अल्लाह तआला जल्ल जलालह उसे अनवार व हुक्म अता करेगा। तुम उसे मेरा सलाम इरसाल कर देना।”
एक और रिवायत में हज़रत जाबिर से यूँ मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे फ़रमाया: ऐ जाबिर! हो सकता है तू हुसैन के ऐसे बेटे से मुलाक़ात करने के लिए ज़िंदा रहे जिसका नाम मुहम्मद है और जो इल्म-ए-दीन की ख़ूब इशाअत व तसरीह करेगा। जब तेरी उस से मुलाक़ात हो तो उसे मेरा सलाम कहना।
बाज़ रिवायतों में आता है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत जाबिर से फ़रमाया: तुम्हारी ज़िंदगी उस से मुलाक़ात के बाद चंद रोज़ होगी।
चुनाँचे आप से मुलाक़ात के बाद हज़रत जाबिर का इंतिक़ाल हो गया।

हुशाम बिन अब्दुल मलिक का घर

एक सिका रावी का बयान है कि
हम मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन (इमाम बाक़िर) के हमराह हिशाम बिन अब्दुल मलिक के घर के पास से उस वक़्त गुज़रे जब वह उसकी बुनियाद रख रहा था। आप ने फ़रमाया: अल्लाह की क़सम ये घर ख़राब-दुख़्ता हो जाएगा और लोग इसकी मिट्टी तक को उखाड़ कर ले जाएँगे। ये पत्थर जिन से इसकी बुनियाद रखी गई है खंडरात में तब्दील हो जाएँगे।
रावी कहता है: मुझे आप की इस बात से तअज्जुब हुआ कि हिशाम के घर को कौन ख़राब और तबाह कर सकता है? जब हिशाम ने वफ़ात पाई तो वलीद बिन हिशाम के कहने पर उस घर को मिस्मार कर दिया गया और मिट्टी को इस हद तक खोदा गया कि मकान की बुनियाद के पत्थर नज़र आने लगे। ये सब कुछ मैं ने अपनी आँखों से देखा।
इसी रावी का बयान है कि मैं हज़रत बाक़िर के साथ था कि आप का भाई ज़ैद बिन अली हमारे पास से गुज़रा। आप ने फ़रमाया: अल्लाह की क़सम! ये कूफ़ा में ख़ुरूज करेगा और लोग इसे क़त्ल कर देंगे और इसके सर को गली कूचों में फिराते हुए यहाँ ले आएँगे और नेज़े पर लटका देंगे। हमें आप की इन बातों से तअज्जुब हुआ क्योंकि मदीना में कभी किसी को नेज़े पर नहीं लटकाया गया था, लिहाज़ा जब उनके सर को लाया गया तो उसके साथ सूली भी थी।

नमाज़ की जगह

फ़ैज़ बिन मतर कहते हैं:
मैं हज़रत इमाम अबू जाफ़र बाक़िर के हाँ हाज़िर हुआ तो मैं ने चाहा कि मैं नमाज़-ए-इशा अदा करने के लिए जगह के बारे में सवाल करूँ। मैं ने अभी सवाल भी न किया था कि आप ने हदीस बयान कर दी कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक ऐसी कुशादा ज़मीन पर जहाँ घास कसरत से हो नमाज़ अदा कर लिया करते थे।

जिन्नात का फ़तवा तलब करना

एक और रावी का बयान है कि मैं ने हज़रत बाक़िर से मुलाक़ात की इजाज़त तलब की। लोगों ने मुझे कहा: अज्लत से काम न लो, क्योंकि उनके पास तुम्हारे भाई बंदो बैठे हैं। अभी वह बाहर न आए थे कि बारह अफ़राद तंग क़बाओं में मल्बूस और हाथ पाँव में दस्ताने और मोज़े पहने हुए बाहर आए। उन्होंने अस्सलामु अलैकुम कहा और चले गए। उसके बाद मैं हज़रत बाक़िर के पास हाज़िर हुआ। मैं ने पूछा: ये कौन थे जो अभी अभी आप के पास से गए हैं?
आप ने फ़रमाया: ये तुम्हारे भाई जिन हैं।
मैं ने पूछा: क्या आप उन्हें देख लेते हैं?
आप ने फ़रमाया: हाँ! जिस तरह तुम हलाल व हराम के मुतअल्लिक़ इस्तिफ़्ता करते हो उसी तरह वह भी आकर पूछते हैं।

भीड़िये की इल्तिजा

एक और रावी ने कहा है कि
हम हज़रत मुहम्मद बिन अली के साथ मक्का मुअज्ज़मा और मदीना मुनव्वरा की दरमियानी वादी में सफ़र कर रहे थे। उस वक़्त आप एक ख़च्चर पर सवार थे मैं एक गधे पर सवार था अचानक मैं ने देखा कि कोई शख़्स पहाड़ी से उतर कर उनके नज़दीक आया, वह आप के ख़च्चर की निगहबानी करता रहा और एक भीड़िया अपने हाथों को ख़च्चर की ज़ीन के आगे रख कर बहुत देर तक उनसे गुफ़्तगू करता रहा और वह सुनते रहे आख़िर आप ने उस भीड़िये से कहा अब चले जाओ जिस तरह तुम चाहते थे मैं ने कर दिया है भीड़िया चला गया, आप ने मुझ से कहा तुझे पता है ये क्या कहता था मैं ने कहा अल्लाह उसका रसूल और रसूल का बेटा ज़्यादा जानने वाले हैं, आप ने फ़रमाया वह कह रहा था मेरी जुफ़्त इस वक़्त दर्द-ए-ज़ह में मुबतला है दुआ कीजिए कि अल्लाह तआला उसे ख़लासी दे और मेरी नस्ल से किसी को भी आप के इरादत केशों पर मुसल्लत न करे चुनाँचे मैं ने दुआ की

आने वाले मेहमान की ख़बर

बुज़ुर्गान-ए-सलफ़ में से एक का बयान है कि
मक्का में मुझ पर मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन (इमाम बाक़िर) का शौक़-ए-दीद ग़ालिब आ गया तो मैं बालख़ुसूस उनके लिए मदीना गया। जिस रात मैं मदीना मुनव्वरा पहुँचा सख़्त बारिश हुई, जिस के बाइस सर्दी बढ़ गई। निस्फ़ शब गुज़र चुकी थी तो मैं आप के घर पहुँचा। मैं अभी इस फ़िक्र में था कि आप का दरवाज़ा उसी वक़्त खटखटाऊँ या सब्र से काम लूँ कि सुबह को वह ख़ुद ही बाहर तशरीफ़ ले आएँ, अचानक आप की आवाज़ सुनाई दी। आप ने कहा: ऐ लौंडी! फ़लाँ शख़्स के लिए दरवाज़ा खोलो क्योंकि आज रात इसे सख़्त सर्दी लगी है। लौंडी आई, दरवाज़ा खोला और मैं अंदर चला गया।

दिल की बात जान लेना

एक दूसरे शख़्स का बयान है कि
मैं इमाम बाक़िर के दौलत-कदा पर गया तो आप ने मेरे सिवा हर एक को मिलने की इजाज़त दे दी। मैं बहुत ग़मगीन व अंदोह-गीन घर वापस आया। मुझे उस रात नींद भी न आई। मुझे बहुत तशवीश हुई। मैं ने अपने आप से कहा: वापस मक्का मुक़र्रमा चला जाऊँ। अगर मर्जिया लोगों के साथ जाऊँ तो वह यूँ कहते हैं। अगर क़दरिया की जमाअत के साथ जाऊँ तो वह यूँ कहेंगे। अगर हरूरिया के साथ जाऊँ तो वह यूँ कहते हैं। अगर यज़ीदिया के साथ जाऊँ तो वह इस तरह कहते हैं और उन में से हर एक की बातें तख़रीब व फ़साद से ख़ाली नहीं। मैं इस ज़ेहनी कशमकश में था कि सुबह की नमाज़ की अज़ान हो गई। अचानक किसी के दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ सुनाई दी। मैं ने कहा: कौन है?
आने वाला बोला: मैं मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन (इमाम बाक़िर) का क़ासिद हूँ।
मैं बाहर आया तो उस ने कहा: आप को याद फ़रमा रहे हैं।
मैं कपड़े पहन कर वहाँ गया और जब आप से मिला तो आप ने कहा: ऐ फ़लाँ! तुम न मर्जिया के साथ लौटो, न क़दरिया के साथ, न यज़ीदिया के साथ, न हरूरिया के साथ बल्कि तुम हमारी तरफ़ लौटो।

इमाम बाक़िर की ज़िहानत

एक शख़्स का बयान है कि मैं मदीने में था कि अचानक दूर से तारीकी ज़ाहिर हुई। यह तारीकी कभी गहरी हो जाती और कभी ग़ायब हो जाती। ज्यों ही मेरे क़रीब आई तो मैं ने देखा कि एक सात आठ साल का बच्चा मुझे अस्सलामु अलैकुम कह रहा है। मैं ने जवाब दिया। बाद अज़ाँ मैं ने उस से पूछा: आप कहाँ से आए हैं?
उस ने जवाब दिया: मैं अल्लाह की तरफ़ से आया हूँ।
मैं ने पूछा: तुम्हारा ज़ाद-ए-राह क्या है?
उस ने कहा: मेरा ज़ाद-ए-राह तक़्वा है।
मैं ने पूछा: तू कौन है?
उस ने कहा: मैं एक अरबी इंसान हूँ।
मैं ने पूछा: तुम्हारा किस ख़ानदान से तअल्लुक़ है?
उस ने कहा: मैं क़ुरैशी हूँ।
मैं ने पूछा: आप का ख़ास कर किसी क़बीले से तअल्लुक़ है?
उस ने कहा: मैं हाशमी हूँ।
मैं ने पूछा: आप किस के बेटे हैं?
उस ने कहा: मैं अलवी हूँ।
उस के बाद उस ने अशआर पढ़ना शुरू कर दिए।
दरख़्तों के झुंड का बात मानना
एक रावी का बयान है कि
मैं ने हज़रत बाक़िर से पूछा: अल्लाह जल्ल जलालह पर बंदे का क्या हक़ है?
आप ने अपना चेहरा मुझ से फेर लिया।
मैं ने तीन बार अपना सवाल दोहराया।
तीसरी दफ़ा आप ने फ़रमाया: अल्लाह पर बंदे का हक़ यह है कि वह उस खजूरों के झुंड को कहे कि उधर आओ तो वह आ जाए।
आप ने ज्यों ही उस झुंड को इशारा किया तो मैं ने देखा कि वह हरकत में आ गया ताकि आप की तरफ़ आ जाए लेकिन आप ने इशारा किया कि वह अपनी जगह पर क़ायम रहे क्योंकि आप ने उसे इस तरह आने के लिए नहीं कहा था।

नज़र-ए-विलायत

एक बुज़ुर्ग रिवायत करते हैं कि
मैं हज़रत बाक़िर के हाँ गया और दरवाज़ा खटखटाया। एक कनीज़ बाहर आई, वह जवानी में क़दम रख रही थी, मुझे बहुत अच्छी लगी। मैं ने उस के पिस्तानों को छूते हुए कहा: अपने आक़ा से कहो फ़लाँ शख़्स दरवाज़े पर हाज़िर है।
अंदर से आवाज़ आई: अंदर आ जाओ! हम तुम्हारे इंतज़ार में हैं।
मैं अंदर गया तो अर्ज़ किया: हुज़ूर! मेरा बद-नियती का कोई इरादा न था।
आप ने फ़रमाया: तुम सच कहते हो लेकिन यह कभी तसव्वुर न करना कि यह दर-ओ-दीवार हमारी आँखों के सामने वैसे ही बहैसियत हिजाब होते हैं जैसे तुम्हारी आँखों के सामने। अगर ऐसा हो तो तुम्हारे और हमारे दरमियान फ़र्क़ क्या रहा? अब कभी ऐसी हरकत न करना।

सफ़ेद बालों का सियाह होना

एक रावी का बयान है कि
दो औरतें बनाम जबाबा और अहलिया हज़रत बाक़िर से मिलने आईं। आप ने फ़रमाया: तुम हमारे पास देर से क्यों आई हो? जबाबा बोली: मेरे बाल सफ़ेद हो गए हैं, मैं उन्हें ठीक करने में मशग़ूल रहती हूँ। हज़रत बाक़िर ने फ़रमाया: मुझे दिखाओ। उस ने दिखाए तो आप ने अपना दस्त-ए-मुक़द्दस उन पर फेरा जिस से वह सियाह हो गए। फिर फ़रमाया: इसे आईना दिखाओ। उस ने आईना देखा तो उस के बाल सियाह हो चुके थे।

दवानक़ी की हुकूमत

एक रावी कहता है कि
मैं हज़रत बाक़िर के साथ मस्जिद-ए-नबवी में बैठा था। उन दिनों हज़रत ज़ैनुल आबिदीन रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु का विसाल हो चुका था। अचानक दाऊद बिन सुलैमान और मंसूर दवानक़ी आ गए। दाऊद हज़रत बाक़िर की ख़िदमत में हाज़िर हुआ लेकिन दवानक़ी किसी और जगह बैठा रहा। हज़रत बाक़िर ने पूछा: दवानक़ी मेरे पास क्यों नहीं आया? दाऊद ने मअज़रत पेश की। आप ने फ़रमाया: कुछ दिनों बाद दवानक़ी हाकिम होगा और मशरिक़ व मग़रिब उस की मिल्क होंगे। उस की उम्र भी बहुत तवील होगी और इतने ख़ज़ाने जमा करेगा कि उस से पहले किसी ने भी जमा न किए होंगे। दाऊद उठे और सारा क़िस्सा दवानक़ी को सुनाया। दवानक़ी हाज़िर-ए-ख़िदमत हुआ और कहा: आप के हाँ आने पर बज़ आपके इजलाल व इकराम के कोई चीज़ मानेअ न थी। फिर पूछा: दाऊद क्या कहता है?
फ़रमाया: सच कहता है और ऐसा ही होगा।
फिर पूछा: आया हमारी सल्तनत आप की सल्तनत से पहले होगी?
हाँ।
उस ने फिर पूछा: हमारी सल्तनत ज़्यादा देर चलेगी या बनू उमय्या की?
आप ने फ़रमाया: तुम्हारी सल्तनत ज़्यादा देर रहेगी लेकिन बच्चों के हाथों में रहेगी जिस से खेलते रहेंगे जैसे गेंद से खेलते हैं। बस यही है जो मैं ने अपने वालिद-ए-मुहतरम से सुना है।
चुनाँचे जब दवाफ़िक़ी वाली मिल्क बना तो उसे हज़रत बाक़िर की हाथों पर सख़्त तअज्जुब हुआ (क्यूँकि वह हुरूफ़ बहुरूफ़ सच्ची निकलीं)।

ताक़त-ए-विलायत

हज़रत अबू बसीर जो आँखों की रोशनी से महरूम हो गए थे, कहते हैं कि
एक रोज़ मैं ने हज़रत बाक़िर से कहा: क्या आप मुहाफ़िज़-ए-दीन-ए-पैग़म्बर हैं?
आप ने फ़रमाया: हाँ।
मैं ने कहा: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तो तमाम अंबिया अलैहिमुस्सलाम के वारिस हैं।
आप ने फ़रमाया: हाँ।
मैं ने कहा: क्या आप को भी वह उलूम मीरास में मिले हैं?
आप ने फ़रमाया: हाँ।
मैं ने कहा: आप को यह ताक़त है कि मर्दों को ज़िंदा कर दें, मादरज़ाद अंधों को बीना कर दें?
आप ने फ़रमाया: हाँ! मैं अल्लाह के हुक्म से बता सकता हूँ।
फिर फ़रमाया: मेरे सामने आ कर बैठ जाओ।
मैं बैठ गया। आप ने अपना दस्त-ए-मुबारक मेरे चेहरे पर फेरा, मेरी आँखें रोशन हो गईं। चुनाँचे मैं ने कोह व बियाबान और ज़मीन व आसमान की वुसअतों को अपनी आँखों से देखा। फिर आप ने दुबारा अपना हाथ मेरे चेहरे पर फेरा तो मैं अपनी पहली हालत पर आ गया।
आप ने फ़रमाया: इन दोनों हालतों में से किस हालत को पसंद करते हो, यह कि तुम्हारी आँखें दुरुस्त हो जाएँ और तुम्हारा हिसाब अल्लाह के सुपुर्द हो, या तुम्हारी आँखें ऐसी ही रहें और तुम बग़ैर हिसाब के जन्नतुल फ़िरदौस में जाओ?
मैं ने कहा: मैं उस चीज़ को पसंद करता हूँ कि मैं नाबीना ही रहूँ और बग़ैर हिसाब के जन्नत में जाऊँ।

फ़रिश्ता का हाज़िर-ए-ख़िदमत रहना

एक रावी कहते हैं कि हम तक़रीबन पचास अफ़राद हज़रत इमाम बाक़िर की ख़िदमत में हाज़िर थे कि अचानक एक और शख़्स भी हाज़िर हुआ जिस का कारोबार चमड़ा फ़रोशी था। उस ने हज़रत बाक़िर से मुख़ातिब हो कर कहा: कूफ़ा में एक शख़्स यह गुमान रखता है कि आप के पास एक फ़रिश्ता है जो काफ़िर व मोमिन और दोस्त व दुश्मन में तमीज़ कर के आप को इत्तिला देता है?
हज़रत बाक़िर ने फ़रमाया: तुम क्या काम करते हो?
उस ने कहा: मैं कभी कभी खाल भी बेच लेता हूँ।
आप ने फ़रमाया: यह ग़लत है, तुम तो खजूरें बेचते हो।
उस शख़्स ने कहा: आप को यह कैसे मालूम हुआ?
आप ने फ़रमाया: मुझे फ़रिश्ता-ए-रब्बानी इत्तिला देता है कि फलाँ तुम्हारा दोस्त है या दुश्मन। और सुनो! तुम फलाँ बीमारी के सिवा किसी और बीमारी से नहीं मरोगे।
रावी कहता है कि जब मैं कूफ़ा वापस गया और उस शख़्स के बारे में पूछा तो लोगों ने बताया कि वह उसी बीमारी से मरा जिस का ज़िक्र हज़रत बाक़िर ने फ़रमाया था।

नसरानी का करामत देख कर मुसलमान होना

एक रावी बयान करता है कि एक दिन हज़रत बाक़िर घोड़े पर सवार कहीं जा रहे थे और मैं भी उन के साथ था। थोड़ी दूर जा कर दो आदमियों से मुलाक़ात हुई। हज़रत बाक़िर ने फ़रमाया: यह दोनों चोर हैं, इन्हें पकड़ लो और मज़बूती से बाँध दो।
ग़ुलामों ने उन्हें बाँध दिया।
फिर आप ने फ़रमाया: उस पहाड़ पर जाओ, वहाँ एक ग़ार है, उस में जो कुछ मिले ले आओ।
वह गए और दो संदूक़ सामान के ले आए।
आप ने फ़रमाया: इन के मालिकों में से एक यहाँ मौजूद है और दूसरा मौजूद नहीं।
मदीना पहुँचने पर दोनों संदूक़ उन के मालिकों के हवाले कर दिए गए और चोरों के हाथ काट दिए गए।
उन में से एक चोर ने कहा: अल्लाह का शुक्र है मेरा हाथ फ़रज़ंद-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मौजूदगी में काटा गया और उन्हीं के दस्त-ए-हक़ परस्त पर मेरी तौबा क़बूल हुई।
आप ने फ़रमाया: तौबा का अहद करो, तुम एक साल के बाद दुनिया से चले जाओगे।
चुनाँचे वह एक साल बाद फ़ौत हो गया।
बाद में एक नसरानी आया, जब उस ने यह तमाम वाक़िआत देखे तो कहा: बेशक अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नहीं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं।
यह कह कर वह मुसलमान हो गया।

फ़ज़ीलत-ए-बाक़िर

जनाब अबू बसीर रिवायत करते हैं कि
हज़रत बाक़िर ने फ़रमाया: मुझे एक ऐसे शख़्स का हाल मालूम है जो अगर दरिया के किनारे खड़ा हो जाए तो दरिया के तमाम जानवरों, उन की माँओं, बच्चियों और ख़ालाओं के नाम जान लेता है।

मुनाजात-ए-नुबुव्वत

एक रावी कहता है कि
हम एक गिरोह की शक्ल में हज़रत बाक़िर रज़ी अल्लाहु तआला अन्हु के आस्ताने पर हाज़िर हुए तो हमें एक शख़्स की ख़ुश-इल्हानी से कुछ सिरियानी ज़बान में पढ़ने की आवाज़ सुनाई दी। हमारे दिल में ख़याल पैदा हुआ कि कोई अहल-ए-किताब कुछ पढ़ रहा है। हम अंदर गए तो आप के सिवा कोई शख़्स मौजूद न था।
हम ने अर्ज़ किया: हमें अभी अभी एक शख़्स सिरियानी में कुछ पढ़ता हुआ सुनाई दिया था, वह कहाँ है?
आप ने फ़रमाया: मुझे फलाँ नबी की मुनाजात याद हैं, जब मैं उसे पढ़ता हूँ तो वह मुझे रुला देती है।

इमाम बाक़िर की बहू

एक दिन इब्न-ए-अक़ाशा हज़रत बाक़िर की ख़िदमत में हाज़िर हुए। उस वक़्त आप के फ़रज़ंद-ए-अरजुमंद हज़रत इमाम जाफ़र भी आप के पास खड़े थे।
इब्न-ए-अक़ाशा ने कहा: अब तो माशा अल्लाह जाफ़र जवान हो गए हैं, उन की शादी होनी चाहिए, आप उन की शादी क्यों नहीं करते?
उस वक़्त हज़रत बाक़िर के पास सर-ब-मोहर सोने की एक थैली थी।
आप ने फ़रमाया: यह थैली ले जाओ और एक लौंडी ख़रीद लाओ।
हम बर्दा फ़रोश के पास गए तो उस ने कहा: मेरे पास जो थी वह बेच चुका हूँ, हाँ अलबत्ता एक दो लौंडियाँ हैं जो एक दूसरी से बढ़ चढ़ कर हैं।
उन्हें बाहर लाओ ताकि देख लें।
दोनों बाहर आईं तो एक को हम ने पसंद कर लिया।
मैं ने कहा: इस की क्या क़ीमत लेगा?
उस ने कहा: सत्तर हज़ार दीनार।
हम ने कहा: कुछ तो कम कीजिए।
कहने लगा: एक कौड़ी कम न होगी।
आख़िर हम ने कहा: हम उस लौंडी को उस थैली में जो भी है, उस के एवज़ ख़रीदना चाहते हैं, हम नहीं जानते उस में कितने दीनार हैं।
बर्दा फ़रोश बोला: अगर सत्तर हज़ार दीनार से एक कौड़ी भी कम हुई तो मैं हरगिज़ फ़रोख़्त नहीं करूँगा।
चुनाँचे थैली खोली गई और सोना बे-कम-ओ-कास्त सत्तर हज़ार दीनार निकला।
लौंडी ख़रीद कर हज़रत बाक़िर की ख़िदमत में पेश की गई।
हज़रत जाफ़र भी उस वक़्त मौजूद थे।
आप ने अल्हम्दुलिल्लाह फ़रमाया।
फिर लौंडी से पूछा: तुम्हारा नाम क्या है?
उस ने कहा: मेरा नाम हमीदा है।
आप ने फ़रमाया: दुनिया में हमीदा और आख़िरत में महमूदा।
फिर आप ने पूछा: तुम कुँवारी हो या ग़ैर-बाक़िरा?
उस ने कहा: मैं कुँवारी हूँ।
आप ने फ़रमाया: यह कैसे हो सकता है?
उस ने कहा: जब भी कोई बर्दा फ़रोश मेरे क़रीब बुरे इरादे से आता तो एक सफ़ेद-सर और सफ़ेद-रीश बुज़ुर्ग आ कर उस के मुँह पर तमाँचा मारते और उसे मुझ से दूर कर देते।
यह सुन कर हज़रत बाक़िर ने लौंडी हज़रत जाफ़र के हवाले कर दी, जिन से बेहतरीन ख़लाइक़ हज़रत मूसा बिन जाफ़र पैदा हुए।

मदीना पर हमला की ख़बर

एक दिन इमाम बाक़िर मदीना में चंद आदमियों के साथ बैठे थे कि आप ने सर नीचे झुका लिया, फिर उठा कर फ़रमाया: तुम्हारी हालत यह होगी कि एक वक़्त कोई शख़्स चार हज़ार अफ़राद के साथ मदीना में दाख़िल होगा और तीन दिन क़त्ल-ए-आम करेगा। यह वाक़िआ आइन्दा साल होगा।
“मैं जो कुछ कहता हूँ सच कहता हूँ इसे यक़ीन-ए-मुहकम से मानो।”
अहल-ए-मदीना ने इस बात को क़बूल न किया, मगर बनू हाशिम जानते थे कि आप सच फ़रमाते हैं। चुनाँचे आइन्दा साल आप बनू हाशिम के साथ मदीना से बाहर चले गए और नाफ़े अल-अरज़क़ ने वही कुछ किया जो आप ने फ़रमाया था।
इस वाक़िआ के बाद अहल-ए-मदीना ने कहा अब हज़रत बाक़िर जो भी फ़रमाएँगे हम उस से सर-मो-तजावुज़ नहीं करेंगे क्योंकि यह अहल-ए-बैत-ए-नुबुव्वत से हैं और जो भी कहते हैं हक़ व सदाक़त पर मबनी होता है।

बेटे को वसीयत और करामत

एक रावी बयान करता है कि
इमाम जाफ़र सादिक़ ने फ़रमाया: मेरे वालिद इमाम बाक़िर ने मुझे वसीयत की कि मेरी वफ़ात के बाद मेरी तग़सील व तदफ़ीन ख़ुद करना क्योंकि इमाम के लिए यही सुन्नत है।

वफ़ात की ख़बर

हज़रत इमाम जाफ़र से रिवायत है कि एक दिन मेरे वालिद ने फ़रमाया: मेरी उम्र सिर्फ़ पाँच साल रह गई है।
जब उन्होंने वफ़ात पाई तो हम ने माह व साल शुमार किए वही मुद्दत निकली जितनी आप ने बताई थी।

विसाल

इमाम बाक़िर ने 114 हिजरी में 57 साल की उम्र में वफ़ात पाई।

क़ब्र-ए-मुबारक

इमाम बाक़िर की क़ब्र जन्नतुल बक़ीअ में अपने वालिद-ए-मुहतरम इमाम ज़ैनुल आबिदीन के पहलू में है।


माख़ूज़

आइम्मा अहल-ए-बैत रोशन सितारे
शैख़ मुहम्मद इब्राहीम ताइफ़ी फ़ारूक़ी
तरजुमा मुफ़्ती मुहम्मद वसीम अकरम अल-क़ादरी
सफ़्हा 411 – 424

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