हज़रत सैयद ग़ुलाम बदीउद्दीन मदारी अल-मअरूफ़ शाह मियाँ रहमतुल्लाह अलैह बादशाह-ए-अज़ीम-उश्शान (१६६४-१७१२) इब्न-ए-बहादुर शाह अव्वल के ज़माने के बड़े साहिब-ए-तक़वा व तह़ारत व साहिब-ए-ज़ुह्द व रियाज़त बुज़ुर्ग थे।
ख़ानदान
आप के वालिद-ए-माजिद का नाम हज़रत सैयद शाह अताउल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु है
और आप के दादा का नाम हज़रत मुहम्मद शरीफ़ रहमतुल्लाह अलैह है जिन का शजरा-ए-नसब हुज़ूर मदार पाक सैयद बदीयुद्दीन क़ुत्ब-उल-मदार क़ुद्दिसा सिर्रहू के एक अज़ीम ख़लीफ़ा बुर्हान-उल-हक़ीक़त शैख़-ए-तरीक़त हज़रत क़ाज़ी महमूद किन्तूरी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मिलता है।
बैअत व ख़िलाफ़त
हज़रत सैयद ग़ुलाम बदीयुद्दीन मदारी को सिलसिला-ए-आलिया मदारीया में अपने वालिद-ए-माजिद सैयद शाह अताउल्लाह मदारी क़ुद्दिस-सिर्रहू के बैअत, ख़िलाफ़त और जानशिनी का भी शरफ़ हासिल हुआ।
अख़लाक़ व आदात
आप के मिज़ाज में सख़ावत बदरजा-ए-ग़ायत मौजूद थी, ख़ुसूसन मुसाफ़िरीन की पासदारी यहाँ तक मलहूज़ फ़रमाते थे कि जो कुछ आप के पास होता था, सब उन की मेहमानदारी में सरफ़ कर दिया करते थे। जिस से अक्सर औक़ात यहाँ तक नौबत पहुँचती थी कि आप को और आप के अहल-ए-अयाल को खाना भी नहीं बचता था वैसे ही रह जाते थे।
बहर-ए-ज़ख़्ख़ार में लिखा है कि
शहज़ादा-ए-अज़ीम-उश्शान (१६६४-१७१२) इब्न-ए-बहादुर शाह इब्न-ए-मुहम्मद मुहीउद्दीन औरंगज़ेब आलमगीर बादशाह-ए-दिल्ली के दौर-ए-हुकूमत में आप ने रिज़्क़-ए-हलाल हासिल करने के वास्ते चंद दिन कुतुबख़ाना की ख़िदमत क़ुबूल फ़रमाई थी। आख़िर में इस को भी तर्क फ़रमा कर किन्तूर शरीफ़ में गोशा-ए-तन्हाई इख़्तियार फ़रमाया।
विसाल
वफ़ात आप की चौथी शाबान 1161 हिजरी में हुई।
मज़ार
आप का किन्तूर शरीफ़ में है।
क़तअ-ए-तारीख़-ए-वफ़ात
अहल-ए-इरफ़ान जनाब शाह मियाँ
कर्द रह़लत चो आँ जंबीद ज़मान
हातिफ़ गुफ़्त अज़ सर-ए-अफ़सोस
अज़ जहाँ रफ़्त आह शाह मियाँ
किताब : सीर-उल-मदार सफ़्हा १३८







