हज़रत सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का नाम जाफ़र, कुनियत अबू अब्दुल्लाह और लक़ब सादिक़ है। आप हुज़ूर सैयदना इमाम मुहम्मद बाक़िर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के साहबज़ादे, इमामुस्साजिदीन, मसरदर-ए-सादात हुज़ूर सैयदना इमाम ज़ैनुल आबिदीन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के पोते और शहीद-ए-कर्बला, सैयदुश्शुहदा हुज़ूर सैयदना इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के पड़पोते हैं।
आपकी वालिदा-ए-माजिदा हज़रत उम्मे फ़रवा थीं, जो हज़रत मुहम्मद बिन अबू बक्र की पोती थीं, जिनके वालिद हज़रत क़ासिम बिन मुहम्मद बिन अबू बक्र मदीना के मशहूर सात फ़ुक़हा में शुमार किए जाते थे। हज़रत सैयदना इमाम अली ज़ैनुल आबिदीन आपके दादा हैं। नीज़ आपको ताबेई होने का शरफ़ भी हासिल है। आपने बचपन में हज़रत सहल बिन सअद और दीगर चंद सहाबा से मुलाक़ात फ़रमाई थी। अकाबिरीन-ए-उम्मत, बिलख़ुसूस हज़रत इमाम मालिक और हज़रत इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा के उस्ताद थे। इन हज़रतों ने आपसे अहादीस रिवायत की हैं।
विलादत-ए-बासआदत
17 रबीउल-अव्वल 80 हिजरी, ब-मुताबिक़ 20 अप्रैल 702 ईस्वी को आपकी विलादत मदीना मुनव्वरा में हुई और वफ़ात 25 शव्वाल 148 हिजरी, ब-मुताबिक़ 765 ईस्वी मदीना मुनव्वरा ही में हुई।
आपका नसब-नामा यह है
जाफ़र बिन मुहम्मद बिन अली बिन अबी तालिब कर्रमल्लाहु वज्हुल करीम
आपकी माँ फ़रवा, हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ के पड़पोते क़ासिम बिन मुहम्मद की लड़की थीं।
ननिहाली शजरा यह है
उम्मे फ़रवा बिन्त क़ासिम बिन मुहम्मद बिन अब्दुर्रहमान बिन अबी बक्र
इस तरह इमाम जाफ़र सादिक़ की रगों में सिद्दीकी ख़ून भी शामिल था। बारह बरस आपने अपने जद्द-ए-बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन के ज़ेरे-साया तरबियत पाई। शहादत-ए-हज़रत इमाम हुसैन के बाद से पैंतीस बरस तक हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन का मशग़ला इबादत-ए-इलाही और अपने मज़लूम बाप सैयदुश्शुहदा को रोने के सिवा और कुछ न था। वाक़िआ-ए-कर्बला को अभी सिर्फ़ बाईस बरस गुज़रे थे। इस मुददत में कर्बला का अज़ीम सानिहा अपने तास्सुरात के लिहाज़ से अभी कल ही की बात मालूम होता था। जब हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ ने आँख खोली तो उसी ग़म-ओ-अंदोह की फ़ज़ा में शब-ओ-रोज़ शहादत-ए-हुसैन का तज़किरा और अहले-बैत पाक पर यज़ीदी मज़ालिम के वाक़िआत ने उनके दिल-ओ-दिमाग़ पर वह असर क़ायम किया कि जैसे वह ख़ुद वाक़िआ-ए-कर्बला में मौजूद थे।
95 हिजरी में बारह बरस की उम्र में हज़रत इमाम सज्जाद का साया सर से उठ गया। इसके बाद उन्नीस (19) बरस आपने अपने वालिद हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर के दामन-ए-तरबियत में गुज़ारे। यह वह वक़्त था जब सियासत-ए-बनी उमय्या की बुनियादें हिल चुकी थीं और हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर की तरफ़ फ़ुयूज़-ए-इल्मी हासिल करने के लिए ख़लाइक़ रुजू कर रही थी। उस वक़्त अपने पिदर-ए-बुज़ुर्गवार की मजलिस-ए-दर्स में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ ही एक वह तालिब-ए-इल्म थे जो क़ुदरत की तरफ़ से इल्म के सांचे में ढाल कर पैदा किए गए थे। आप सफ़र और हज़र दोनों में अपने वालिद-ए-बुज़ुर्गवार के साथ रहते थे। चुनाँचे हिशाम बिन अब्दुल-मलिक की तलब पर आप भी हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर के साथ थे।
हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर के बाद इमामत की ज़िम्मेदारियाँ हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ पर आइद हुईं। उस वक़्त दमिश्क़ में हिशाम बिन अब्दुल-मलिक की सल्तनत थी। उसके ज़माना-ए-सल्तनत में मुल्क में सियासी ख़लफ़शार बहुत ज़्यादा हो चुका था। मज़ालिम-ए-बनी उमय्या के इंतिक़ाम का जज़्बा तेज़ हो रहा था और बनी फ़ातिमा से मुतअद्दिद अफ़राद हुकूमत के मुक़ाबले के लिए तैयार हो गए थे। उनमें नुमायाँ हस्ती हज़रत ज़ैद की थी, जो इमाम ज़ैनुल आबिदीन के बुज़ुर्ग-मर्तबा फ़रज़ंद थे। उनकी इबादत, ज़ुह्द-ओ-तक़वा का भी मुल्क-ए-अरब में शहरा था। मुस्तनद और मुसल्लम हाफ़िज़-ए-क़ुरआन थे। बनी उमय्या के मज़ालिम से तंग आकर उन्होंने मैदान-ए-जिहाद में क़दम रखा।
इमाम जाफ़र सादिक़ के लिए यह मौक़ा निहायत नाज़ुक था। मज़ालिम-ए-बनी उमय्या से नफ़रत में ज़ाहिर है कि आप भी हज़रत ज़ैद से मुत्तफ़िक़ थे। फिर हज़रत ज़ैद आपके चचा भी थे, जिनका एहतराम आप पर लाज़िम था। मगर आपकी दूरबीन निगाह देख रही थी कि यह इक़दाम किसी मुफ़ीद नतीजे तक नहीं पहुँच सकता। इस लिए अमली तौर पर उनका साथ देना मुनासिब नहीं, मगर उनकी ज़ात से आपको इंतिहाई हमदर्दी थी। आपने मुनासिब तरीक़े पर उन्हें मस्लहत-बीनी की दावत दी, मगर अहले-इराक़ की एक बड़ी जमाअत के इकरार-ए-इताअत व वफ़ादारी ने जनाब ज़ैद को कामयाबी की तवक़्क़ोअत दिलाईं और आख़िर 120 हिजरी में हिशाम की फ़ौज से तीन रोज़ तक बहादुरी के साथ जंग करने के बाद शहीद हो गए। दुश्मन का जज़्बा-ए-इंतिक़ाम इतने ही पर ख़त्म नहीं हुआ, बल्कि दफ़्न हो जाने के बाद उनकी लाश को क़ब्र से निकाला गया और सर को जुदा करके हिशाम के पास बतौर तोहफ़ा भेजा गया, और लाश को दरवाज़ा-ए-कूफ़ा पर सूली दे दी गई। आपकी लाश कई साल तक इसी तरह लटकती रही। हज़रत ज़ैद के एक साल बाद उनके बेटे हज़रत यह्या बिन ज़ैद भी शहीद हुए। यक़ीनन इन हालात का इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के दिल पर गहरा असर पड़ रहा था। मगर जज़्बात से बुलंद फ़राइज़ की पाबंदी थी कि इसके बावजूद आपने उन फ़राइज़ को, जो इशाअत-ए-उलूम-ए-अहले-बैत और नश्रे-शरीअत के क़ुदरत की जानिब से आपके सुपुर्द थे, बराबर जारी रखा।
बनी उमय्या का आख़िरी दौर हंगामों और सियासी कश-मकशों का मरकज़ बन गया था। इसका नतीजा यह था कि बहुत जल्दी-जल्दी हुकूमतों में तब्दीलियाँ हो रही थीं। इस लिए हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ को बहुत-सी दुनियावी सल्तनतों के दौर से गुज़रना पड़ा। हिशाम बिन अब्दुल-मलिक के बाद वलीद बिन अब्दुल-मलिक, फिर यज़ीद बिन वलीद बिन अब्दुल-मलिक, उसके बाद इब्राहीम बिन वलीद बिन अब्दुल-मलिक, और आख़िर में मरवान हम्मार आया, और उसी पर बनी उमय्या की हुकूमत का ख़ातमा हो गया।
जब सल्तनत की दाख़िली कमज़ोरियाँ क़हर-ओ-ग़लबे की चूलें हिला चुकी हों, तो क़ुदरती बात है कि वे लोग जो इस हुकूमत के मज़ालिम का मुददतों निशाना रह चुके हों, और जिन्हें उनके हुक़ूक़ से महरूम करके सिर्फ़ तशद्दुद की ताक़त से पनपने का मौक़ा न दिया गया हो, क़फ़स की तितलियों को कमज़ोर पा कर फड़फड़ाने की कोशिश करेंगे और हुकूमत के शिकंजे को एक दम तोड़ देना चाहेंगे—सिवाए ऐसे बुलंद अफ़राद के जो जज़्बात की पैरवी से बुलंद हों। आम तौर पर इस तरह की इंतिज़ामी कोशिशों में मस्लहत-अंदेशी का दामन भी हाथ से छूटने का इमकान है, मगर वह इंसानी फ़ितरत का एक कमज़ोर पहलू है, जिससे ख़ास-ख़ास अफ़राद ही मुस्तस्ना हो सकते हैं। बनी हाशिम में आम तौर पर सल्तनत-ए-बनी उमय्या के इस आख़िरी दौर में इसी लिए एक हरकत और ग़ैर-मामूली इज़्तिराब पाया जा रहा था। इस इज़्तिराब से बनी अब्बास ने फ़ायदा उठाया।
उन्होंने आख़िरी दौर-ए-उमवी में पोशीदा तरीक़े से ममालिक-ए-इस्लामिया में एक ऐसी जमाअत बनाई, जिसने क़सम खाई थी कि हम सल्तनत को बनी उमय्या से लेकर बनी हाशिम तक पहुँचाएँगे, जिनका यह वाक़ई हक़ है। हालाँकि हक़ तो उनमें से मख़सूस हस्तियों ही में मुनहसिर था, जो ख़ुदा की तरफ़ से नौअ-ए-इंसानी की रहबरी और सरदारी के हक़दार बनाए गए थे। मगर ये वही जज़्बात से बुलंद इंसान थे, जो मौक़े की सियासी रफ़्तार से हंगामी फ़वाइद हासिल करना अपना नस्बुल-ऐन न रखते थे। सिलसिला-ए-बनी हाशिम में से इन हज़रतों की ख़ामोशी क़ायम रहने के साथ, उस हमदर्दी को जो अवाम में ख़ानदान-ए-बनू हाशिम के साथ पाई जाती थी, बनी अब्बास ने अपने लिए हुसूल-ए-सल्तनत का ज़रिया क़रार दिया। हालाँकि उन्होंने सल्तनत पाने के साथ बनी हाशिम के अस्ल हक़दारों से वैसा ही या उससे ज़्यादा सख़्त सुलूक किया, जो बनी उमय्या उनके साथ कर चुके थे। ये वाक़िआत मुख़्तलिफ़ आइम्मा-ए-अहले-बैत अत्हार के हालात के मुतालअे से आपके सामने आ जाएँगे।
बनू अब्बास में सबसे पहले हज़रत मुहम्मद बिन अली बिन अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने बनी उमय्या के ख़िलाफ़ तहरीक शुरू की और ईरान में मुबल्लिग़ीन भेजे, ताकि वे मुख़फ़ी तरीक़े पर लोगों से बनी हाशिम की वफ़ादारी का अहद-ओ-पैमान हासिल करें। हज़रत मुहम्मद बिन अली के बाद उनके बेटे इब्राहीम क़ायम-मक़ाम हुए। जनाब ज़ैद और उनके साहबज़ादे जनाब यह्या के दर्दनाक वाक़िआत-ए-शहादत से बनी उमय्या के ख़िलाफ़ ग़म-ओ-ग़ुस्से में इज़ाफ़ा हो गया। इससे भी बनी अब्बास ने फ़ायदा उठाया और अबू सलमा ख़ल्लाल के ज़रिये से इराक़ में भी अपने तास्सुरात क़ायम करने का मौक़ा हासिल किया। रफ़्ता-रफ़्ता इस जमाअत के हलक़ा-ए-असर में इज़ाफ़ा होता गया और अबू मुस्लिम ख़ुरासानी की मदद से इराक़-ए-अजम का पूरा इलाक़ा क़ब्ज़े में आ गया, और बनी उमय्या की तरफ़ से हाकिम को वहाँ से फ़रार इख़्तियार करना पड़ा। 129 हिजरी से इराक़ और ख़ुरासान वग़ैरह में सलातीन-ए-बनी उमय्या के नाम ख़ुतबे से ख़ारिज करके इब्राहीम बिन मुहम्मद का नाम दाख़िल कर दिया गया।
अभी तक सल्तनत-ए-बनी उमय्या यह समझती थी कि यह हुकूमत से एक मुक़ामी मुख़ालफ़त है, जो ईरान में महदूद है, मगर अब जासूसों ने इत्तिला दी कि इसका तअल्लुक़ इब्राहीम इब्न मुहम्मद बिन अब्बास के साथ है, जो मक़ाम जाबलक़ा में रहते हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि जनाब इब्राहीम को क़ैद कर दिया गया और क़ैदख़ाने ही में उनको क़त्ल करा दिया गया। उनके पस-मांदगान और उनसे वाबस्ता दीगर अफ़राद बनी अब्बास के साथ भाग कर इराक़ में अबू सलमा के पास चले गए। अबू मुस्लिम ख़ुरासानी को जो इन हालात की इत्तिला हुई, तो एक फ़ौज को इराक़ की तरफ़ रवाना किया, जिसने हुकूमती ताक़त को शिकस्त देकर इराक़ को आज़ाद करा लिया।
अबू सलमा ख़िलाल जो वज़ीर-ए-आल-ए-मुहम्मद के नाम से मशहूर थे, बनी फ़ातिमा के साथ अकीदत रखते थे। उन्होंने चंद ख़ुतूत औलाद-ए-रसूल में से चंद बुज़ुर्गों के नाम लिखे और उनको क़बूल-ए-ख़िलाफ़त की दावत दी। इनमें से एक ख़त हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ के नाम भी था। सियासत की दुनिया में ऐसे मौक़े अपने इक्तिदार को क़ायम करने के लिए ग़नीमत समझे जाते हैं, मगर आप इंसानी ख़ुददारी व इस्तिग़ना का मिसाली मुजस्समा थे। आपने अपने फ़राइज़-ए-मंसबी के लिहाज़ से इस मौक़े को ठुकरा दिया और बजाय जवाब देने के हिकारत-आमेज़ तरीक़े पर इस ख़त को आग की नज़र कर दिया।
इधर कूफ़ा में अबू मुस्लिम ख़ुरासानी के पैरोकार और बनी अब्बास के हवाख़्वाहों ने अबू अब्दुल्लाह सफ़्फ़ाह के हाथ पर 14 रबीउस्सानी 132 हिजरी को बैअत कर ली और उसको उम्मत-ए-इस्लामिया का ख़लीफ़ा और फ़रमांरवाए सल्तनत-ए-इस्लामिया तस्लीम कर लिया। इराक़ में इक्तिदार क़ायम करने के बाद उन्होंने दमिश्क़ पर चढ़ाई कर दी। मरवान हम्मार ने भी बड़े लश्कर के साथ मुक़ाबला किया, मगर बहुत जल्द उसकी फ़ौज को शिकस्त हुई। मरवान ने राह-ए-फ़रार इख़्तियार की और आख़िर में अफ़्रीक़ा की सरज़मीन पर पहुँच कर क़त्ल हुआ। इसके बाद सफ़्फ़ाह ने बनी उमय्या का क़त्ल-ए-आम कराया। सलातीन-ए-बनी उमय्या की क़ब्रें खुदवाइं और उनकी लाशों के साथ इबरतनाक सुलूक करवाए। इस तरह क़ुदरत का इंतिक़ाम जो इन ज़ालिमों से लिया जाना ज़रूरी था, बनी अब्बास के हाथों दुनिया की निगाह के सामने आया। 136 हिजरी में अबू अब्दुल्लाह सफ़्फ़ाह, बनी अब्बास के पहले ख़लीफ़ा का इंतिक़ाल हो गया, जिसके बाद उसका भाई अबू जाफ़र मंसूर तख़्त-ए-ख़िलाफ़त पर बैठा, जो मंसूर के नाम से मशहूर है।
माबक़द में यह लिखा जा चुका है कि बनी अब्बास ने उन हमदर्दियों का जो अवाम को बनी फ़ातिमा से थीं, नाजायज़ फ़ायदा उठाया था और उन्होंने दुनिया को यह धोखा दिया था कि हम अहले-बैत-ए-रसूल ﷺ की हिफ़ाज़त के लिए खड़े हुए हैं। चुनांचे उन्होंने मुहब्बत व रज़ा-ए-आल-ए-मुहम्मद ही के नाम पर लोगों को अपनी नुसरत व हिमायत पर आमादा किया था और इसको अपना नारा-ए-जंग क़रार दिया था। इसलिए उन्हें बरसर-ए-इक्तिदार आने के बाद और बनी उमय्या को तबाह करने के बाद सबसे बड़ा अंदेशा यह था कि कहीं हमारा यह फ़रेब दुनिया पर खुल न जाए और यह तहरीक न पैदा हो जाए कि ख़िलाफ़त-ए-इस्लामिया बनी अब्बास की बजाय बनी फ़ातिमा के सुपुर्द होना चाहिए, जो वाक़िअतन आल-ए-रसूल हैं। अबू सलमा ख़िलाल बनी फ़ातिमा के सच्चे मुहिब्बीन व हमदर्दों में से थे, इसलिए यह ख़तरा था कि वह इस तहरीक की हिमायत न करें। लिहाज़ा सबसे पहले अबू सलमा को रास्ते से हटाया गया। वह बावजूद उन एहसानात के जो बनी अब्बास से कर चुके थे, सफ़्फ़ाह ही के ज़माने में तशद्दुद बने और क़त्ल कर दिए गए।
ईरान में अबू मुस्लिम ख़ुरासानी का असर था। मंसूर ने निहायत मकारी और ग़द्दारी के साथ उसकी ज़िंदगी का भी ख़ात्मा कर दिया। अब उसे अपनी मनमानी कार्रवाइयों में किसी बाअसर और साहिब-ए-इक्तिदार शख़्सियत की मज़ाहमत का अंदेशा न था, लिहाज़ा उसके ज़ुल्म व इस्तिब्दाद का रुख़ सादात-ए-बनी फ़ातिमा की तरफ़ मुड़ गया।
मशहूर इस्लामी मोअर्रिख़ अल्लामा शिबली नोमानी सीरत-उन-नुमान में लिखते हैं:
“सिर्फ़ बदगुमानी पर मंसूर ने सादात-ए-अलवियीन की बेख़-कनी शुरू कर दी। जो लोग उनमें मुमताज़ थे, उनके साथ बेरहमियाँ की गईं। मुहम्मद इब्न इब्राहीम, जो हुस्न व जमाल में यगाना-ए-रोज़गार थे और इसी वजह से दीबाज कहलाते थे, ज़िंदा दीवारों में चुनवा दिए गए। इन बेरहमियों की एक दास्तान है, जिसके बयान करने को बड़ा सख़्त दिल चाहिए।”
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के दिल पर इन हालात का बहुत असर होता था। चुनांचे जब सादात-ए-बनी हुसैन को तौक़ व ज़ंजीर में क़ैद करके मदीना से ले जाया जा रहा था, तो आप एक मकान की आड़ में खड़े हुए उनकी हालत को देखकर रो रहे थे और फ़रमा रहे थे कि अफ़सोस, मक्का व मदीना भी दारुल-अमन न रहा। फिर आपने औलाद-ए-अंसार की हालत पर अफ़सोस किया कि अंसार ने आका ﷺ को उस अहद व पैमान पर मदीना तशरीफ़ लाने की दावत दी थी कि हम आप और आपकी औलाद की इसी तरह हिफ़ाज़त करेंगे जिस तरह हम अपने अहल व अयाल और जान व माल की हिफ़ाज़त करते हैं, मगर आज अंसार की औलाद बाक़ी है और कोई इन सादात की इमदाद नहीं करने वाला। यह फ़रमा कर आप बैत-उश-शरफ़ की तरफ़ वापस हुए और बीस दिन तक सख़्त बीमार रहे।
इन क़ैदियों में हज़रत सैयदना इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के साहबज़ादे हज़रत अब्दुल्लाह महज़ भी थे, जिन्होंने किबर-सिन्नी के आलम में अरसे तक क़ैद व बंद की सउबतें बर्दाश्त कीं। उनके बेटे हज़रत मुहम्मद नफ़्स-ए-ज़किया ने हुकूमत का मुक़ाबला किया और 145 हिजरी में दुश्मन के हाथ से मदीना मुनव्वरा के क़रीब शहीद हुए। जवान बेटे का सर बूढ़े बाप के पास क़ैदख़ाने में भेजा गया। यह सदमा ऐसा था जिससे हज़रत अब्दुल्लाह महज़ वफ़ात फ़रमा गए। इसके बाद हज़रत अब्दुल्लाह के दूसरे साहबज़ादे हज़रत इब्राहीम भी मंसूर की फ़ौज के मुक़ाबले में जंग करके कूफ़ा में शहीद हुए। इसी तरह हज़रत अब्बास बिन हज़रत इमाम हसन, हज़रत उमर बिन हसन मुसन्ना, हज़रत अली व हज़रत अब्दुल्लाह फ़र्ज़ंदान-ए-नफ़्स-ए-ज़किया, हज़रत मूसा और हज़रत यह्या बरादरान-ए-नफ़्स-ए-ज़किया वग़ैरह भी बेदर्दी और बेरहमी से क़त्ल किए गए। बहुत सारे सादात-ए-किराम इमारतों में ज़िंदा चुनवा दिए गए।
इन तमाम नागवार हालात के बावजूद, जिनका तज़किरा इंतिहाई इख़्तिसार के साथ ऊपर लिखा गया है, हज़रत सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ख़ामोशी के साथ उलूम-ए-दीन-ए-मुस्तफ़वी की इशाअत में मशग़ूल रहे। और इसका नतीजा यह था कि वे लोग भी जो बहैसियत-ए-इमामत-ए-हक़्क़ा आपकी मआरिफ़त न रखते थे या उसे तस्लीम करना नहीं चाहते थे, वे लोग भी आपकी इल्मी अज़मत को मानते हुए आपके हलक़ात-ए-दर्स में दाख़िल होने को फ़ख़्र समझते थे।
मंसूर को आपकी जलालत-ए-इल्मी बर्दाश्त नहीं थी। उसने हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ की इल्मी अज़मत का असर अवाम के दिल से कम करने के लिए एक तदबीर यह की कि आपके मुक़ाबले में ऐसे अशख़ास को बहैसियत फ़क़ीह और आलिम खड़ा कर दिया, जो आपके शागिर्दों के सामने भी ज़बान खोलने की क़ुदरत न रखते थे। और फिर वह ख़ुद इसका इकरार रखते थे कि हमें जो कुछ मिला, वह हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ की ख़ैरात है। मंसूर जब इस तरह आपकी मक़बूलियत कम न कर सका, तो हुक्म जारी कर दिया कि जो भी इमाम जाफ़र सादिक़ की मुहब्बत और आपकी रिफ़अत-ए-इल्मी का दम भरे, उसे गिरफ़्तार कर लिया जाए।
ख़ुद हज़रत सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को तक़रीबन पाँच मर्तबा मदीना तैय्यिबा से दरबार-ए-शाही में तलब किया गया, जो आप के लिए सख़्त रूहानी तकलीफ़ का बाइस था। यह अलग बात है कि कभी भी आप के ख़िलाफ़ कोई ऐसा बहाना उसे न मिल सका कि उसके सबब आप को क़ैद या क़त्ल किए जाने का हुक्म दे सके। अलबत्ता यह ज़रूर हुआ कि इस सिलसिले में इराक़ के अंदर एक मुद्दत के क़याम से उलूम-ए-शरीअत की इशाअत का हलक़ा वसीअ हुआ और इसको महसूस करके मंसूर ने फिर आप को मदीना भेजवा दिया। इसके बाद भी आप ईज़ारसानी से महफ़ूज़ नहीं रहे। यहाँ तक कि एक मर्तबा आप के घर में आग लगा दी गई। क़ुदरत-ए-ख़ुदा थी कि वह आग जल्द फ़ुरू हो गई, आप के मुतअल्लिक़ीन और अहल-ए-ख़ाना को कोई सदमा नहीं पहुँचा। आप इस हिफ़ाज़त-ए-इलाहिया की एक कड़ी थे, जिसे रब्ब-ए-करीम ने नौअ-ए-इंसानी के लिए नमूना-ए-कामिल बना कर पैदा ही किया था।
उनके अख़लाक़ व औसाफ़ ज़िंदगी के हर शोबा में मयारी हैसियत रखते थे। वह ख़ास औसाफ़ जिनके मुतअल्लिक़ मोअर्रिख़ीन ने मख़सूस तौर पर वाक़िआत नक़्ल किए हैं, वह हैं: मेहमान-नवाज़ी, ख़ैर-ओ-ख़ैरात, मुख़्फ़ी तरीक़े से ग़ुरबा की ख़बरगीरी, अज़ीज़ों के साथ हुस्न-ए-सुलूक, अफ़्व-ए-जुराइम, सब्र व तहम्मुल वग़ैरह।
एक मर्तबा एक हाजी मदीना में वारिद हुआ और मस्जिद-ए-रसूल में सो गया। आँख खुली तो उसे शुबहा हुआ कि उसकी एक हज़ार की थैली मौजूद नहीं। उसने इधर-उधर देखा, किसी को न पाया। एक गोशा-ए-मस्जिद में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम नमाज़ पढ़ रहे थे। वह आप को बिल्कुल न पहचानता था। आप के पास आकर कहने लगा कि मेरी थैली तुम ने ली है। आप ने फ़रमाया, उसमें क्या था? उसने कहा एक हज़ार दीनार। आप ने फ़रमाया मेरे साथ मेरे मकान तक आओ। वह आप के साथ आप के घर गया। आप बैत-उश-शरफ़ पर तशरीफ़ लाकर एक हज़ार दीनार उसके हवाले कर दिए। वह जब मस्जिद में वापस आया और अपना सामान उठाने लगा तो उसके दीनारों की थैली सामान में नज़र आई। यह देखकर वह बहुत शर्मिंदा हुआ और दौड़ता हुआ हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ की ख़िदमत में आया और मुआफ़ी ख़्वाही करते हुए वह हज़ार दीनार वापस करना चाहे, मगर आप ने फ़रमाया: हम जो कुछ दे देते हैं वह फिर वापस नहीं लेते।
यह हालात सभी की आँखों के देखे हुए हैं कि जब यह अंदेशा पैदा होता है कि क़हत या ख़ुश्क-साली होने वाली है, अनाज मुश्किल से मिलेगा, तो जिससे जितना मुमकिन होता है वह अनाज ख़रीद कर रख लेता है। मगर हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ के किरदार की हयात-ए-तैय्यिबा का एक वाक़िआ यह है कि एक मर्तबा आप ने अपने वकील मोअतिब से इरशाद फ़रमाया कि ग़ल्ला रोज़-ब-रोज़ मदीना में गिराँ होता जा रहा है। हमारे यहाँ किस क़दर ग़ल्ला होगा? मोअतिब ने कहा कि हमें इस गिरानी और क़हत-साली की तकलीफ़ का कोई अंदेशा नहीं है, हमारे पास ग़ल्ला का इतना ज़खीरा है कि जो बहुत अरसा तक काफ़ी होगा। आप ने फ़रमाया: तमाम ग़ल्ला फ़रोख़्त कर डालो। इसके बाद जो हाल सब का हो, वह हमारा भी हो। जब ग़ल्ला फ़रोख़्त कर दिया गया तो फ़रमाया: अब ख़ालिस गेंहूँ की रोटी न पकाया करो, बल्कि आधे गेंहूँ और आधे जौ की रोटी पकाओ। जहाँ तक मुमकिन हो हमें ग़रीबों का साथ देना चाहिए।
आप का मामूल था कि आप मालदारों से ज़्यादा ग़रीबों की इज़्ज़त करते थे। मज़दूरों की बड़ी क़दर फ़रमाते थे। ख़ुद भी तिजारत फ़रमाते थे और अक्सर अपने बाग़ों में बह-नफ़्स-ए-नफ़ीस मेहनत भी करते थे। एक मर्तबा आप बेलचा हाथ में लिए हुए बाग़ में काम कर रहे थे और पसीने से तमाम जिस्म तर हो गया था। किसी ने कहा: हुज़ूर यह बेलचा मुझे इनायत फ़रमाइए कि मैं यह ख़िदमत अंजाम दूँ। आप ने फ़रमाया: तलब-ए-मआश में धूप और गर्मी की तकलीफ़ सहना ऐब की बात नहीं।
ग़ुलामों और कनीज़ों पर वही मेहरबानी फ़रमाते रहते थे जो उस घराने की इम्तियाज़ी सिफ़त थी। इसका एक हैरत-अंगेज़ नमूना मुलाहिज़ा करें जिसे हज़रत सुफ़यान स़ौरी ने बयान किया है। आप फ़रमाते हैं कि मैं एक मर्तबा हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ख़िदमत में हाज़िर हुआ। देखा कि चेहरा-ए-मुबारक का रंग मुतग़य्यिर है। मैंने सबब पूछा। आप ने फ़रमाया: मैंने मना किया था कि कोई मकान के कोठे पर न चढ़े। उस वक़्त जो घर में गया तो देखा कि एक कनीज़ जो एक बच्चे की परवरिश पर मुतअय्यन थी, उसे गोद में लिए ज़ीना से ऊपर जा रही थी। मुझे देखा तो ऐसा ख़ौफ़ तारी हुआ कि बदहवासी में बच्चा उसके हाथ से छूट गया और सदमे से जान-ब-हक़ हो गया। मुझे बच्चे के मरने का इतना सदमा नहीं हुआ, जितना इसका रंज हुआ कि उस कनीज़ पर इतना रौब व हरास क्यों तारी हुआ। फिर आप ने उस कनीज़ को पुकार कर फ़रमाया: डरो नहीं, मैंने तुम्हें राह-ए-ख़ुदा में आज़ाद कर दिया। इसके बाद आप बच्चे की तजह़ीज़ व तक़फ़ीन की तरफ़ मुतवज्जेह हो गए।
आप इस ख़ानदान-ए-इल्म व फ़ज़्ल व अमल के चश्म-ओ-चराग़ हैं, जिसके अदना औनी ख़ादिम मस्नद-ए-इल्म के वारिस हुए। आप के वालिद हुज़ूर सैयदना इमाम मुहम्मद बाक़िर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु इस पाया के आलिम थे कि इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा नुमान बिन साबित रज़ियल्लाहु तआला अन्हु जैसे अकाबिर-ए-उम्मत उनके शागिर्द थे। सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को इल्म गोया विरासत में मिला था। फ़ज़्ल व कमाल के लिहाज़ से आप अपने वक़्त के इमाम थे। हाफ़िज़ इमाम ज़हबी आप को “इमाम और अहद-उस-सादत-अल-आलाम” लिखते हैं। अहले-बैत किराम में भी इल्म में कोई आप का हमसर न था। इब्न हिब्बान का बयान है कि फ़िक़्ही इल्म और फ़ज़्ल में आप यगाना थे। इमाम नववी लिखते हैं कि आप की इमामत, जलालत और सियादत पर सब का इत्तिफ़ाक़ है।
हदीस आप के जद्द-ए-अमजद अलैहिस्सलातु वत्तस्लीम के अक़वाल हैं, इसलिए आप से ज़्यादा इसका कौन मुस्तहिक़ था। चुनांचे आप मशहूर हुफ़्फ़ाज़-ए-हदीस में थे। अल्लामा इब्न सअद लिखते हैं: कान कसीरुल-हदीस। हाफ़िज़ ज़हबी आप को सादात और आलाम-ए-हुफ़्फ़ाज़ में लिखते हैं। हदीस में अपने वालिद बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम बाक़िर, मुहम्मद बिन मुनक़दर, उबैदुल्लाह बिन अबी राफ़ेअ, अता, उरवा, क़ासिम बिन मुहम्मद, नाफ़ेअ और ज़ुहरी वग़ैरह से फ़ैज़ पाया था। हज़रत शोअबा, सुफ़यान, इब्न जुरैह, अबू आसिम, इमाम मालिक, इमाम अबू हनीफ़ा वग़ैरह आइम्मा आप के तलामज़ा में थे। हदीस-ए-रसूलुल्लाह ﷺ का इतना एहतराम था कि हमेशा तहारत की हालत में हदीस बयान करते थे।
तमाम आलम-ए-इस्लामी में आप की इल्मी जलालत का शहरा था। दूर-दूर से लोग तहसील-ए-इल्म के लिए आप की ख़िदमत में हाज़िर होते थे। आप के शागिर्दों की तादाद चार हज़ार तक पहुँच गई थी। उनमें फ़ुक़हा थे, मुफ़स्सिरीन थे, मुतकल्लिमीन थे और मुनाज़िरीन भी थे। आप के दरबार में मुख़ालिफ़ीन व मुनकिर-ए-मज़हब-ए-इस्लाम हाज़िर होते, सवालात पेश करते, उनके जवाबात पाते। कभी-कभी आप के तलामज़ा से मुनाज़रे भी होते थे, जिन पर आप नक़्द व तब्सिरा भी फ़रमाते थे और तलामज़ा को उनकी बहस के कमज़ोर पहलू बतला कर इस्लाम की वकालत के सुनहरे दाँव-पेच सिखाते थे ताकि आइन्दा वह इन बातों का ख़याल रखें। कभी आप ख़ुद भी मुख़ालिफ़ीन-ए-मज़हब और बिलख़ुसूस दहरीयों से मुनाज़रा फ़रमाते थे। उलूम-ए-फ़िक़्ह व कलाम वग़ैरह के अलावा उलूम-ए-अरबिया जैसे रियाज़ी और कीमिया वग़ैरह की भी बाज़ शागिर्दों को तालीम देते थे।
चुनांचे आप के शागिर्दों में से जाबिर बिन हय्यान तर्सूसी साइंस और रियाज़ी के मशहूर इमाम-ए-फ़न हैं, जिन्होंने चार सौ रिसाले हज़रत सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के अफ़ादात को हासिल करके तस्नीफ़ किए हैं। आप के तलामज़ा में कई हज़रात बड़े फ़क़ीह थे, जिन्होंने किताबें तस्नीफ़ कीं, जिनकी तादाद सैंकड़ों तक पहुँचती है।
आप फ़रमाते थे कि उलमा अंबिया के अमीन हैं, जब तक वह सलातीन की आस्ताना-बोसी न करें। आप के अक़वाल व कलिमात-ए-तय्यिबात तहज़ीब-ए-अख़लाक़, इल्म व हिकमत और पंद व मौइज़त का दफ़्तर हैं। हज़रत सुफ़यान स़ौरी से आप ने एक मर्तबा फ़रमाया:
“सुफ़यान! जब ख़ुदा तुम को कोई नेअमत अता करे और तुम उसे हमेशा बाक़ी रखना चाहो तो ज़्यादा से ज़्यादा शुक्र अदा करो, क्योंकि ख़ुदाए तआला ने अपनी किताब में फ़रमाया है कि अगर तुम शुक्र अदा करोगे तो मैं तुम को ज़्यादा दूँगा। जब रिज़्क़ मिलने में ताख़ीर हो रही हो तो इस्तिग़फ़ार ज़्यादा करो। अल्लाह अज़्ज़ो जल्ल अपनी किताब में फ़रमाता है: अपने रब से मग़फ़िरत चाहो, वह बड़ा मग़फ़िरत करने वाला है। तुम पर आसमान से मूसलाधार बारिश बरसाएगा और दुनिया में माल और औलाद से तुम्हारी मदद करेगा और आख़िरत में तुम्हारे लिए जन्नत और नहरें बनाएगा। जब तुम्हारे पास सुल्तान-ए-वक़्त या और किसी का कोई हुक्म पहुँचे तो ला हौल वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीय्यिल अज़ीम ज़्यादा पढ़ो, वह कुशादगी की कुंजी है। जो शख़्स अपनी क़िस्मत के हिस्से पर क़नाअत करता है वह मुस्तग़नी रहता है और जो दूसरे के माल की तरफ़ नज़र उठाता है वह मोहताज मरता है। जो शख़्स ख़ुदा की तक़सीम पर राज़ी नहीं होता वह ख़ुदा को उसके फ़ैसले पर मुत्तहिम करता है। जो शख़्स दूसरे की पर्दा-दारी करता है ख़ुदा उसके घर के ख़ुफ़िया हालात की पर्दा-दारी करता है। जो बग़ावत के लिए तलवार खींचता है, वह उसी से क़त्ल किया जाता है। जो अपने भाई के लिए गड्ढा खोदता है, वह ख़ुद उसमें गिरता है। जो बेवक़ूफ़ों के पास बैठता है वह हक़ीर हो जाता है। जो उलमा से मेल-जोल रखता है वह मुअज़्ज़ज़ हो जाता है। जो बुरे मक़ामात पर जाता है वह बदनाम हो जाता है। हमेशा हक़ बात कहो, ख़्वाह तुम्हारे मुवाफ़िक़ हो या मुख़ालिफ़। आदमी की अस्ल उसकी अक़्ल है, उसका हसब उसका दीन है, उसका करम उसका तक़वा है। तमाम इंसान आदम की निस्बत में बराबर हैं। सलामती बहुत नादिर चीज़ है, यहाँ तक कि उसकी तलाश करने की जगह भी मुख़्फ़ी है। अगर वह कहीं मिल सकती है तो मुमकिन है गोशा-ए-गुमनामी में मिले। अगर तुम उसको गोशा-ए-गुमनामी में तलाश करो और न मिले तो मुमकिन है तनहा-नशीनी में मिले। गोशा-ए-तन्हाई गोशा-ए-गुमनामी से मुख़्तलिफ़ है। अगर गोशा-ए-तन्हाई में भी तलाश से न मिले तो सलफ़-ए-सालिहीन के अक़वाल में मिलेगी।
आप फ़रमाते थे: जब तुम से कोई गुनाह सरज़द हो तो उसकी मग़फ़िरत चाहो। इंसान की तख़लीक़ के पहले से उसकी गर्दन में ख़ताओं का तौक़ पड़ा है। गुनाहों पर इसरार हलाकत है।
आप फ़रमाते थे कि ख़ुदा ने दुनिया की तरफ़ वह़ी की है कि जो शख़्स मेरी ख़िदमत करता है तो उसकी ख़िदमत कर और जो तेरी ख़िदमत करता है उसे धुत्कार दे।
आप फ़रमाते थे कि बिना तीन बातों के अमल-ए-सालेह मुकम्मल नहीं होता: जब तुम उसे करो तो अपने नज़दीक उसे छोटा समझो, उसको छुपाओ और उसमें जल्दी करो। जब तुम उसे छोटा समझोगे तब उसकी अज़मत बढ़ेगी, जब तुम उसे छुपाओगे उस वक़्त उसकी तकमील होगी और जब तुम उसमें जल्दी करोगे तो ख़ुशगवारी महसूस करोगे।
आप फ़रमाते थे कि जब तुम्हारे भाई की जानिब से तुम्हारे लिए कोई नापसंदीदा बात ज़ाहिर हो तो उसके जावाज़ के लिए एक से सत्तर तक तावीलें तलाश करो। अगर फिर भी न मिले तो समझो कि उसका सबब और उसकी कोई तावील ज़रूर होगी जिसका तुम को इल्म नहीं। अगर तुम किसी मुसलमान से कोई कलिमा सुनो तो उसको बेहतर से बेहतर मआनी पर महमूल करो। जब वह महमूल न हो सके तो अपने नफ़्स को मलामत करो।
आप फ़रमाते थे: चार चीज़ों में शरीफ़ को आर न करना चाहिए—अपने बाप की ताज़ीम में, अपनी जगह से उठने में, मेहमान की ख़िदमत करने में, और ख़ुद अपनी सवारी की देखभाल करने में, ख़्वाह घर में सौ ग़ुलाम क्यों न हों, और अपने उस्ताद की ख़िदमत करने में।
आप की ज़ात फ़ज़ाइल-ए-अख़लाक़ का ज़िंदा पैकर थी। आप का एक नज़र देख लेना आप की ख़ानदानी अज़मत की शहादत के लिए काफ़ी था। अम्र बिन अल-मुक़द्दाम का बयान है कि जब मैं जाफ़र बिन मुहम्मद को देखता था तो नज़र पड़ते ही मालूम हो जाता था कि वह नबियों के ख़ानदान से हैं।
इबादत आप के शब-ओ-रोज़ का मशग़ला थी। आप का कोई दिन और कोई वक़्त इबादत से ख़ाली न होता था। इमाम मालिक का बयान है कि मैं एक ज़माना तक आप की ख़िदमत में आता-जाता रहा। आप को अक्सर नमाज़ पढ़ते पाया, रोज़ा रखे हुए पाया, क़ुरआन की तिलावत करते हुए पाया।
इन्फ़ाक़ फ़ी सबीलिल्लाह और फ़ैयाज़ी व सरचश्मी अहले-बैत किराम का इम्तियाज़ी और मुश्तरक वस्फ़ रहा है। सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ की ज़ात इस वस्फ़ का मुकम्मल तरीन नमूना थी। हियाज बिन बस्ताम रिवायत करते हैं कि इमाम जाफ़र सादिक़ बसा औक़ात घर का कुल खाना दूसरों को खिला देते थे और ख़ुद उनके अहल-ओ-अयाल के लिए कुछ न बाक़ी रहता था।
आप ब-ज़ाहिर अहल-ए-दुनिया के लिबास में रहते थे लेकिन अंदर लिबास-ए-फ़क़्र मुख़्फ़ी होता था। हज़रत सुफ़यान स़ौरी का बयान है कि मैं एक मर्तबा हज़रत इमाम जाफ़र बिन मुहम्मद के पास गया। उस वक़्त उनके जिस्म पर ख़ज़ का जब्बा और दुख़ानी ख़ज़ की चादर थी। मैंने कहा: यह आप के बुज़ुर्गों का लिबास नहीं है। फ़रमाया: वह लोग अफ़लास और तंगी-हाली के ज़माने में थे और इस ज़माने में दौलत बह रही है। यह कह कर उन्होंने ऊपर का कपड़ा उठा कर दिखाया तो ख़ज़ के जब्बे के नीचे पशमीना का जब्बा था और फ़रमाया: स़ौरी! यह हमने ख़ुदा के लिए पहना है और वह तुम लोगों के लिए। जो ख़ुदा के लिए पहना था उसको पोशीदा रखा है और जो तुम लोगों के लिए था उसको ऊपर रखा है।
मज़हबी इख़्तिलाफ़ सख़्त नापसंद करते थे। फ़रमाते थे: तुम लोग ख़ुसूमत फ़िद्दीन से बचो, इसलिए कि वह क़ल्ब को मशग़ूल कर देती है और निफ़ाक़ पैदा करती है।
निहायत जरी, निडर और बे-ख़ौफ़ थे। बड़े-बड़े जब्बारों के सामने उनकी बेबाकी क़ायम रहती थी।
एक मर्तबा मंसूर अब्बासी के ऊपर एक मक्खी आकर बैठी। वह बार-बार हँकाता था और मक्खी बार-बार आकर बैठती थी। मंसूर उसको हँकाते-हँकाते आज़िज़ आ गया, मगर वह न हटी। इतने में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ पहुँच गए। मंसूर ने उनसे कहा: अबू अब्दुल्लाह! मक्खी किस लिए पैदा की गई है? फ़रमाया: जबाबिरा को ज़लील करने के लिए।
ऐसी मस्रूफ़ ज़िंदगी रखने वाले इंसान को जाह-ओ-सल्तनत हासिल करने की फ़िकरों से क्या मतलब? मगर आप की इल्मी मरजिअत और कमालात की शोहरत सल्तनत-ए-वक़्त के लिए एक मुस्तक़िल ख़तरा महसूस होती थी। जबकि यह मालूम था कि असली ख़िलाफ़त के हक़दार यही हैं। जब हुकूमत की तमाम कोशिशों के बावजूद कोई बहाना उसे आप के ख़िलाफ़ किसी खुले हुए इक़दाम और ख़ूनरेज़ी का न मिल सका तो आख़िर ख़ामोश हथकंडा ज़हर का इख़्तियार किया गया और ज़हर-आलूद अंगूर हाकिम-ए-मदीना के ज़रिये से आप की ख़िदमत में पेश किए गए, जिनके खाते ही ज़हर का असर जिस्म में सरायत कर गया और १५ शवाल १४८हिजरी में ५६ साल की उम्र में शहादत पाई।
आप के फ़र्ज़ंद-ए-अकबर और जानशीन हुज़ूर सैयदना इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने तजह़ीज़ व तक़फ़ीन की और नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाई और जन्नतुल-बक़ीअ के उस अहाते में दफ़्न किया गया जहाँ इससे पहले हज़रत सैयदना इमाम हसन, हज़रत सैयदना इमाम ज़ैनुल आबिदीन और हज़रत सैयदना इमाम मुहम्मद बाक़िर दफ़्न हो चुके थे।
आप अहले-सुन्नत वल-जमाअत के पेशवा, बिलख़ुसूस तरीक़ा-ए-आलिया नक़्शबंदिया के सालार-ए-तरीक़त हैं। आप की तारीख़-ए-विलादत व वफ़ात से मुतअल्लिक़ मुख़्तलिफ़ तारीख़ी रिवायतें हैं। एक रिवायत के मुताबिक़ आप की विलादत ८ रमज़ानुल मुबारक ८० हिजरी को मदीना तैय्यिबा में हुई और १५ रजबुल मुरज्जब १४५ हिजरी को मदीना तैय्यिबा ही में इंतिक़ाल फ़रमाया।
हवालेजात: तहज़ीबुत-तहज़ीब, सफ़वतुस्सफ़वा, तज़्किरतुल-हुफ़्फ़ाज़, तहज़ीबुल-अस्मा व ग़ैरहुम।
मौलाना मुफ़्ती मुहम्मद हबीबुर्रहमान अलवी मंज़री अल-मदारी
क़ौमी तरजुमान ऑल इंडिया उलमा व मशाइख़ बोर्ड
9628407397







