वह नूर जिसको शह-ए-मशरिक़ैन कहते हैं
उसी को नूर-ए-ख़ुदा नूर-ए-ऐन कहते हैं
बिखर गया तो वही नूर-ए-काइनात बना
सिमट गया तो उसी को हुसैन कहते हैं
नवासए-मुस्तफ़ा, जिगर-गोशा-ए-अली मुरतज़ा, सुकून-ए-दिल-ए-सैयदा फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा, शहज़ादा-ए-कौनैन हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की ज़ात-ए-गरामी हक़ व सिदाक़त, तक़वा व तहारत, जुरअत व हिम्मत, सब्र व इस्तिक़लाल, ईमानी क़ुव्वत व अमल, तस्लीम व रज़ा, इताअत-ए-रब्बानी, अज़्म व इस्तिक़लाल की वह अज़ीम पैकर है जो पूरी इंसानी तारीख़ में एक मुनफ़रिद मुक़ाम रखती है और तारीख़-ए-अज़ अहमियत की हामिल है। इस हक़ीक़त से कोई भी साहिब-ए-फ़िक्र व शऊर इंकार नहीं कर सकता कि किसी भी फ़र्द या क़ौम की तामीर में क़ुव्वत-ए-ईमानी के साथ रूह की पाकीज़गी, क़ल्ब की तहारत, ख़ानदानी वजाहत, हुस्न-ए-तरबियत में किल्दी हैसियत रखती हैं। इन जुम्ला लवाज़िमात के साथ ईमान की जुरअत में जितनी ज़्यादा तपिश और शिद्दत होगी उसी क़दर शख़्सियत को ज़िंदगी और ज़िंदगी को मेराज-ए-कमाल अता होगी, इसके बग़ैर दुनिया में न कोई इम्तियाज़ी हैसियत हासिल कर सकता है और न उसकी कोई क़ाबिल-ए-एतिना पहचान हो सकती है।
इंसान वाजिब-उल-वुजूद का शाहकार-ए-तख़लीक़ है आलम-ए-ईजाद में। इंसान की शराफ़त व बरतरी की वजह यह है कि उसके पास अख़लाक़ व किरदार और क़ुव्वत-ए-ईमानी का वह मलका है जो उसे दूसरी तमाम मख़लूक़ात से यकसर जुदा करता है। ये तमाम खूबियाँ नुक्ता-ए-कमाल को पहुँच जाएँ तो फिर वह इंसानी इज़्ज़त व अज़मत, क़द्र व मंज़िलत और जलालत-ए-शान के सर्बुलंद-ओ-बाला मुक़ाम पर पहुँच जाता है जिसकी हद-ए-उरूज का इदराक बिना तौफ़ीक़-ए-बारी के नामुमकिन है। इस वक़्त ज़िक्र करना मक़सूद है निगाह-ए-नुबुव्वत के उस तराशीदा गौहर-ए-नायाब का जिसकी चमक से इंसानियत का हर शोबा-ए-ज़िंदगी रोशन व ताबनाक है। गुलशन-ए-तहारत के उस शगुफ़्ता फूल का जिसकी ख़ुशबू से मशाम-ए-काइनात मुअत्तर है, जुरअत व शुजाअत के उस जबल-ए-इस्तिक़ामत का ज़ुल्म-ओ-जबर की सुनामी लहरें जिससे टकरा कर पाश-पाश हो गईं, सल्तनत-ए-रूहानियत के ताजदार, नौजवानान-ए-जन्नत के सरदार, गुलशन-ए-फ़ातिमी की फ़स्ल-ए-बहारा, निगारख़ाना-ए-नुबुव्वत के गौहर-ए-आबदार, वक़ार-ए-अज़मत-ए-हैदर-ए-कर्रार, इमाम-ए-अर्श-मक़ाम हुसैन पाक व आली जद्दहुस्सलातु वस्सलाम हैं।
विलादत-ए-बासआदत
मौसम-ए-बहार की एक ख़ुशगवार रात का आख़िरी पहर था। मुस्तफ़ा जान-ए-रहमत ﷺ के साया-ए-रहमत की ठंडी छाँव में मदीने की दर-ओ-दीवार से बाज़गश्त करती तिलावत-ए-क़ुरआन-ए-पाक और नग़मात-ए-क़ुदसी की सदाओं से फ़ज़ा मुअत्तर हो रही थी। हज़रत उम्म-उल-फ़ज़्ल, ज़ौजा-ए-हज़रत अब्बास इब्न अब्दुल मुत्तलिब रज़ियल्लाहु अन्हुम, बारगाह-ए-रिसालत-मआब ﷺ में बारयाब हुईं। चेहरे से परेशानी के आसार नुमायाँ थे। रसूल-ए-पाक ﷺ ने इंतिहाई शफ़क़त के साथ परेशानी की वजह मालूम की तो अर्ज़ किया:
“या रसूलल्लाह ﷺ इन्नी रअैतु हुल्मन मुन्करन हाज़िहिल-लैलह”
आज की शब इंतिहाई परेशान-कुन ख़्वाब देखा है, जिसके तसव्वुर से दिल काँप जाता है। इरशाद हुआ: “मा हुआ?” ख़्वाब बयान करो। अर्ज़ की: या रसूलल्लाह, वह इंतिहाई डरावना ख़्वाब है। आपने फ़रमाया: बयान करो, आख़िर कैसा ख़्वाब और क्या ख़्वाब है? अर्ज़ किया: या रसूलल्लाह ﷺ, मैंने देखा कि आपके जिस्म-ए-अतहर से एक टुकड़ा अलग किया गया और वह टुकड़ा मेरी गोद में आ गया।
यह सुनकर रसूल-ए-पाक ﷺ ने तबस्सुम फ़रमाया और फ़रमाया:
“रअैत ख़ैरन, तलिदु फ़ातिमतहू इंशा-अल्लाहु ग़ुलामन यकूनु फ़ी हिज्रिकि।”
अल्लाह के ग़ैब-दाँ नबी ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: चाची जान, मुबारक हो, आपने बहुत अच्छा ख़्वाब देखा है। इंशा-अल्लाह बहुत जल्द शहज़ादी-ए-कौनैन फ़ातिमा-ए-ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के घर शहज़ादे की विलादत होगी और आप उसे अपनी गोद में उठाएँगी।
रसूल-ए-पाक ﷺ की ज़बान-ए-नुबुव्वत से इस बशारत के कुछ अरसे बाद आग़ोश-ए-फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा में जमाल-ओ-नूर का वह पैकर जलवा-गर हुआ। सितारों की अंजुमनों के साथ शम्स-ओ-क़मर भी हुस्न-ओ-दिलकशी की ख़ैरात लेने झुक गए।
वह रौशनी है अली के घर में फ़लक से जो नूर बह रहा है
मुहब्बतों के कनवल खिले हैं पहाड़ नफ़रत का ढह रहा है
तमाम शब आसमान से लेकर ज़मीं तलक ज़िक्र-ए-शह रहा है
अजब चराग़ाँ है कहकशाँ का, मुल्क-मुल्क से यह कह रहा है
हुसैन मेरा, हुसैन तेरा, हुसैन रब का, हुसैन सब
हिजरत-ए-नबवी का चौथा साल था, शाबान-उल-मुअज़्ज़म की पाँच तारीख़ थी। सैयदा-ए-काइनात फ़ातिमा-ए-ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की पाक आग़ोश में नवासा-ए-रसूल ﷺ इमाम-ए-आली मक़ाम हुसैन पाक रज़ियल्लाहु अन्हु जलवा-गर हुए। काइनात-ए-आलम में सिर्फ़ और सिर्फ़ यही वह पाक घराना है जिसकी पाकीज़गी व तहारत की गवाही क़ुरआन-ए-मुक़द्दस देता है। तारीख़ गवाह है कि जब आपकी विलादत-ए-बासआदत की ख़बर मुख़बिर-ए-सादिक़ ﷺ तक पहुँची तो आप ख़ुशी व मस्सरत से झूम उठे। सैयदा फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा के घर तशरीफ़ फ़रमा हुए, नो-मौलूद को आग़ोश-ए-रहमत में लिया, तकबीर व इक़ामत कही और अपना लुआब-ए-दहन बतौर अव्वलीन ख़ुराक़ मुँह में डाला, और नाम हुसैन तजवीज़ फ़रमाया।
दुनिया जानती है कि आब-ओ-गिल की इस दुनिया में जब कोई नो-मौलूद क़दम रखता है तो उसका कोई ज़ाती तआरुफ़ नहीं होता, बल्कि लोग सवाल करते हैं—उसके वालिद का नाम क्या है, उसके दादा कौन हैं, उसका ख़ानदान क्या है, किस ख़ानदान का चश्म-ओ-चराग़ है, समाज में उस ख़ानदान की ख़िदमात क्या हैं, मिल्लत उस ख़ानदान की किन कारगुज़ारियों से मुतअस्सिर है। ये वे हवाले हैं जो आम तौर पर किसी भी बच्चे के लिए विलादत से ज़िंदगी की आख़िरी साँस तक बतौर तआरुफ़ साथ रहते हैं और उसकी शख़्सियत का हिस्सा बन जाते हैं। यह लाज़वाल शरफ़ व करामत सिर्फ़ हुसैन पाक को हासिल है कि वे सैयद-उल-अंबिया ﷺ के आख़िरी नवासे हैं और उस वालिद-ए-गरामी के फ़रज़ंद-ए-अर्ज़मंद हैं जिनकी पेशानी कभी भी सज्दा-ए-ग़ैर-अल्लाह से आलूदा न हुई, जिनकी हर एक साँस में ख़ुशबू-ए-ज़ुल्फ़-ए-वल्लैल रची-बसी रही, जिन्हें बाब-उल-इल्म का लाफ़ानी ख़िताब हासिल है, जिनकी ज़ात-ए-अक़दस जुरअत व शुजाअत, तक़वा व तहारत का वह सर-चश्मा है जिसमें क़यामत तक सआदतमंद तिश्ना-ए-रूहें सैराब होती रहेंगी। हुसैन पाक उस आग़ोश-ए-इफ़्फ़त व तहारत में जलवा-गर हुए जिसकी इस्मत व पाकीज़गी पर हूरान-ए-ख़ुल्द को भी नाज़ है; जिसकी चादर-ए-तज़हीर का गोशा साया-ए-जन्नत है; ममलकत-ए-इश्क़ की वह शहज़ादी जिसके दर-ओ-दीवार का तवाफ़ जिब्रील-ए-अमीन करते हैं; जिसके तक़द्दुस का यह आलम है—
बग़ैर इजाज़त हुसैन के घर जिब्रील भी आते नहीं
क़द्र वाले जानते हैं क़द्र-ओ-शान-ए-अहले-बैत
इमाम पाक का असल कमाल और इनफ़िरादियत यह है कि इतनी अज़ीम पुश्तैनियों और बुलंद हवाले होने के बावजूद भी उन्होंने अपनी वह इनफ़िरादियत—जिसका कोई नअमुल-बदल नहीं—क़ायम रखी। जो कारनामा नामुमकिन था, हुसैन पाक ने उसे मुमकिन बना दिया। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं का ख़ास्सा और एज़ाज़ है। बड़े बाप का बेटा होना, अज़ीम माँ का फ़रज़ंद होना, जलील-उल-क़द्र ख़ानदान का चश्म-ओ-चराग़ होना, पुरशुकूह घराने का फ़र्द होना यक़ीनन बाइस-ए-सआदत है, मगर ये चीज़ें एक साहिब-ए-ज़रफ़ के लिए इम्तिहान और आज़माइश भी हैं। बड़े बाप की अज़मत की लाज रखना, अज़ीम माँ की तरबियत और आग़ोश-ए-रहमत का हक़ अदा करना, ख़ानदान की क़द्र-ओ-मंज़िलत का पास-ओ-लिहाज़ रखना और घराने की शौकत-ओ-अज़मत का तहफ़्फ़ुज़ करना—जो सिर्फ़ रंग-ए-ख़ुदा से ख़ुलासा होता है—कोई मामूली बात नहीं। हुसैन पाक तारीख़-ए-इंसान की बेहद मुनफ़रिद शख़्सियत हैं जिन्हें सदियाँ गुज़र जाने के बावजूद आज तक पढ़ा, लिखा और समझा जा रहा है। तहक़ीक़ व जुस्तजू के ख़ूगर उन्हें तलाश करना चाहते हैं और उनसे मुहब्बत करने वाले अपनी इंतिहा को छूने के लिए बेकरार हैं।
चुनाँचे पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ की आग़ोश-ए-रहमत—जो इस्लाम की तरबियत-गाह थी—पूरी चाहत और नाज़-बरदारी के साथ नवासों की परवरिश में मसरूफ़ हो गई। इस्लाम और दोनों शहज़ादों का गहवारा एक था जिसमें ये परवान चढ़ते रहे। एक तरफ़ रसूल-ए-पाक ﷺ थे जिनका मक़सद-ए-हयात ही अख़लाक़-ए-इंसानी की तकमील था; दूसरी जानिब शेर-ए-ख़ुदा रज़ियल्लाहु अन्हु थे जो अपने किरदार व अमल से मरज़ी-ए-रब के ख़रीदार बन चुके थे; तीसरी जानिब शहज़ादी-ए-कौनैन सैयदा फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा थीं जिन्हें सफ़-ए-निस्वाँ में पैग़म्बर की रिसालत और मक़सदियत पहुँचाने के लिए क़ुदरत ने चुना था। इसी नूरानी माहौल में हुसैन पाक की परवरिश होती रही।
रसूलुल्लाह ﷺ दोनों नवासों से हद दर्जा मुहब्बत फ़रमाते—कभी सीन-ए-अक़दस पर बिठाना, कभी दोश-ए-मुबारक पर उठाना—और मुसलमानों को ताकीद फ़रमाते कि उनसे मुहब्बत रखो, उनकी मुहब्बत सरफ़राज़ी-ए-कौनैन की अलामत है। मगर छोटे नवासे के साथ आपकी मुहब्बत के अंदाज़ निराले थे। नमाज़ के अंदर हालत-ए-सज्दा में हुसैन पीठ-ए-मुबारक पर आ गए तो आपने सज्दा तवील कर दिया, यहाँ तक कि जब शहज़ादा ख़ुद बख़ुद उतरते तो आप ﷺ अपना सर-ए-मुबारक उठाते। कभी ख़ुत्बा पढ़ते हुए हुसैन मस्जिद में दाख़िल हुए और किसी तरह ज़मीन पर गिर पड़े तो रसूल-ए-पाक ﷺ ने ख़ुत्बा रोक कर शहज़ादे को आग़ोश में उठाया, मिम्बर पर जलवा-गर हुए और इरशाद फ़रमाया: “मुसलमानो! देख लो, यह हुसैन हैं, इन्हें ख़ूब पहचान लो, इनकी फ़ज़ीलत को याद रखो—अल-हुसैन मिन्नी व अना मिन-अल-हुसैन; हुसैन मुझसे हैं और मैं हुसैन से हूँ।”
सैयदना इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने तक़रीबन छह साल छह महीने तक सरवर-ए-कौनैन ﷺ के साया-ए-आतिफ़त में परवरिश पाई। नबी-ए-करीम ﷺ हसनैन-ए-करीमैन से ग़ैर-मामूली शफ़क़त व मुहब्बत फ़रमाते थे और तमाम सहाबा-ए-किराम भी रसालत-मआब ﷺ की इत़्तिबा में हसनैन-ए-करीमैन से ख़ुसूसी शफ़क़त व मुहब्बत का इज़हार करते थे। रसूल-ए-पाक ﷺ के विसाल-ए-पाक के बाद ख़लीफ़त-उर-रसूल हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़, अमीर-उल-मोमिनीन हज़रत उमर फ़ारूक़ और सैयदना उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहु अन्हुम भी हसनैन-ए-करीमैन को निहायत अज़ीज़ और मुक़द्दम रखते थे और उन्हें अपनी औलाद पर तरजीह देते थे।
चुनाँचे एक बार हज़रत अब्दुल्लाह इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने अपने वालिद अमीर-उल-मोमिनीन हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु से हसनैन-ए-करीमैन के लिए ख़ुसूसी एज़ाज़ व इकराम की वजह जानना चाही। आपने अपने साहिबज़ादे से सवाल किया: बताओ, क्या तुम्हारी माँ उनकी माँ की तरह है? अर्ज़ किया: बिल्कुल नहीं। पूछा: क्या तुम्हारे नाना उनके नाना की तरह हैं? अर्ज़ किया: नहीं। पूछा: क्या तुम्हारा ख़ानदान उनके ख़ानदान की तरह है? जवाब मिला: नहीं। हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया: मेरे बेटे, यही वे एज़ाज़ व इकराम हैं जिन्होंने हुसैन पाक को कौनैन की सरफ़राज़ियों का हक़दार बना दिया। रब की जानिब से यह मेरे लिए भी एज़ाज़ से कम नहीं कि उसने उस शख़्स की तकरीम की तौफ़ीक़ बख़्शी जो रसूल-ए-अकरम ﷺ की क़ुर्बत व मुहब्बत की अलामत है।
इमाम-ए-आली मक़ाम हुसैन अलैहिस्सलाम बेहद फ़य्याज़, इंतिहाई मुत्तक़ी, इबादत-गुज़ार और बकसरत नेक अमल करने वाले थे। सख़ावत, मेहमान-नवाज़ी, ग़ुरबा-परवरी, अख़लाक़-ओ-तरबियत, हिल्म-ओ-तवाज़ु‘ और सब्र-ओ-तक़वा आपकी ख़ुसूसियात-ए-हसना थीं। कसरत-ए-नमाज़ और तिलावत-ए-क़ुरआन का ज़ौक़ इस हद तक था कि बड़े-बड़े ज़ाहिदान-ए-बासफ़ा उस पर रश्क करते। अक्सर रोज़े रखते, हज और उमरा की अदायगी का शौक़ इस दर्जे का था कि आपने पापीआदा और बार-काब तक़रीबन पच्चीस हज किए। गोया आपकी तन्हा एक ज़ात में महासन-ओ-मकारिम की एक पूरी दुनिया आबाद थी।
हुसैन पाक ने इल्म व तक़वा के माहौल में आँखें खोलीं और ख़ानदान-ए-नबवी में परवरिश पाई। इसलिए मअदन-ए-फ़ज़्ल व कमाल बन गए। इल्म का बाब आपके घर में खुलता था और तक़वा हुसैन की घुट्टी में मिला था। इसलिए आप फ़ितरी तौर पर अपने दौर में शरीअत व तरीक़त के इमाम थे। तमाम अरबाब-ए-सैर ने इमाम पाक को इन जुम्ला महसिन के साथ फ़ज़्ल व कमाल का एतिराफ़ किया है। हज़रत अली मुरतज़ा बाब-ए-शहर-ए-इल्म रज़ियल्लाहु अन्हु क़ज़ा व इफ़्ता में इंतिहाई बुलंद मक़ाम रखते थे। सैयदना हुसैन पाक ने भी हुसूल-ए-इल्म के बाद मस्नद-ए-तदरीस को ज़ीनत बख़्शी और मनसब-ए-इफ़्ता पर फ़ाइज़ हुए। अकाबिर-ए-मदीना मुश्किल मसाइल में आप ही की तरफ़ रुजूअ फ़रमाते। सब्त-ए-रसूल सैयदना इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु दीनी उलूम के अलावा अरब के मुरव्वजा उलूम में भी दस्तरस रखते थे। आपके तब्हुर-ए-इल्मी, इल्म व हिकमत, फ़साहत व बलाग़त का अंदाज़ा आपके ख़िताबात से किया जा सकता है। अल-ग़रज़ जिगर-गोश्ता-ए-बतूल इमाम-ए-आली मक़ाम फ़ज़ाइल व मनाक़िब और सीरत व किरदार का रोशन व दरख़्शंदा बाब हैं। मुतअद्दिद अहादीस-ए-मुबारका आपकी फ़ज़ीलत व अज़मत पर दलालत करती हैं।
बारगाह-ए-रिसालत में हसनैन-ए-करीमैन की महबूबियत और अज़मत का यह आलम है कि अक्सर रहमत-ए-आलम ﷺ आप दोनों के लिए दुआएँ माँगते और लोगों को आपसे महब्बत रखने की ताकीद फ़रमाते। आपने फ़रमाया: “हसन और हुसैन ये दोनों मेरे बेटे हैं, मेरी बेटी के बेटे हैं। ऐ अल्लाह! मैं इनसे महब्बत रखता हूँ, तू भी इन्हें महबूब बना और जो इनसे महब्बत करे उससे भी तू महब्बत फ़रमा।” सरकार-ए-अबद-क़रार ﷺ ने फ़रमाया: “हसन और हुसैन जन्नती नौजवानों के सरदार हैं।”
ज़ालिक फ़ज़्लुल्लाह यु’तीहि मन यशा’।
रहमत-ए-आलम ﷺ के विसाल के बाद तक़रीबन पच्चीस साल तक शेर-ए-ख़ुदा की ख़ाना-नशीनी उलूम-ए-नबविया की तरवीज व इशाअत और क़ियादती सलाहियतों से अपने शहज़ादों को मसक़्क़ल करने का दौर है। हुसैन पाक इस ज़माने में तरह-तरह के नामुसाअद हालात का जायज़ा लेते रहे और अपने वालिद-ए-गरामी की सीरत को मुलाहिज़ा फ़रमाते रहे। यही वह दौर है जिसमें आपने जवानी की हुदूद में क़दम रखा और भरपूर शबाब की मंज़िलों को तय किया। ३५ हिजरी में जब हुसैन पाक की उम्र तीस साल की थी, आम मुसलमानों के लिए हज़रत अली मुरतज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु को ब-हैसियत ख़लीफ़त-उल-मुस्लिमीन अमीर-उल-मोमिनीन की हयात-ए-तय्यबा के ये आख़िरी पाँच साल थे, जिनमें जमल, सिफ़्फ़ीन और नहरवान की लड़ाइयाँ हुईं। हज़रत इमाम हुसैन अपने बुज़ुर्ग व मर्तबा की नुसरत व हिमायत में शरीक हुए और शुजाअत के जौहर दिखाते रहे।
हिजरत-ए-नबवी का चालीसवाँ साल था, रमज़ान-उल-मुबारक की उन्नीस तारीख़ थी। हज़रत अली कूफ़ा की जामा मस्जिद में मामूल के मुताबिक़ तशरीफ़ लाए। देखा इब्न-ए-मुलजिम अपने नीचे तलवार छुपाकर उलटा सो रहा है। हज़रत अली ने फ़रमाया: “इब्न-ए-मुलजिम उठ जा, नमाज़ का वक़्त निकल रहा है।” वह मलऊन उठा। हज़रत अली ने आख़िरी सज्दा किया। यकायक इब्न-ए-मुलजिम आगे बढ़ा और ऐसा वार किया कि सर-ए-मुबारक पर ज़हर में बुझा हुआ ख़ंजर अपना असर कर गया। हालत-ए-रोज़ा में ऐसा कारी ज़ख़्म लगा कि फिर आप उठ न सके। मस्जिद-ए-कूफ़ा में शोर बरपा हो गया, क़ियामत का मंज़र था। मुहिब्बान-ए-अली नाला-ओ-फ़रियाद करने लगे। हसनैन-ए-करीमैन मस्जिद में तशरीफ़ लाए, अपने वालिद की रेश-ए-मुबारक ख़ून से तर देखी और गिर्या करने लगे। असहाब ने हज़रत अली को अपने कंधों पर डाल कर घर पहुँचाया। घर में कहराम बरपा हो गया, बेटियाँ तड़प उठीं। हुकमा ने इलाज शुरू किया मगर ज़हर अपना काम कर चुका था। तीन दिन तक ज़ख़्म की शिद्दत में तड़पते रहे। २१ रमज़ान-उल-मुबारक की रात हज़रत अली ने फ़रिश्ता-ए-अजल को लब्बैक कहा।
हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत के बाद आपके लख़्त-ए-जिगर हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु अन्हु के दस्त-ए-हक़ पर ख़िलाफ़त की बैअत हुई। उस वक़्त सूरत-ए-हाल यह थी कि सिर्फ़ इराक़ और ख़ुरासान की ख़िलाफ़त इमाम हसन के हिस्से में आई, जबकि शाम, फ़िलस्तीन, यमन, हिजाज़ और मिस्र वग़ैरह हज़रत मुआविया बिन अबी सुफ़यान उमवी के ज़ेर-ए-तसल्लुत थे, जिन्होंने ख़ून-ए-उस्मान ग़नी के मसले पर हज़रत अली की बैअत से इंकार कर दिया था। वह भला अब हज़रत हसन मुजतबा रज़ियल्लाहु अन्हु को ख़लीफ़ा कैसे तस्लीम कर लेते। रबीअ-उल-अव्वल ४१ हिजरी में हालात इस नौबत तक पहुँच गए कि इमाम हसन के साथ चालीस हज़ार (40000) से ज़्यादा मुसल्लह अफ़राद थे और दूसरी तरफ़ हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु के झंडे तले साठ हज़ार (60000) का लश्कर सिर्फ़ एक इशारे का मुन्तज़िर था। हज़रत इमाम हसन ने अपने वालिद-ए-गरामी की पाँच साल की पर-आशोब ख़िलाफ़त में मुसलमानों को अपने भाइयों के हाथों ज़बह होते देखा था, इसलिए आपसी ख़ून-ख़राबे और न ख़त्म होने वाले क़त्ल-ओ-ग़ारत के सिलसिले को हमेशा के लिए ख़त्म करने के लिए ख़ुद को मैदान से हटा लिया और ख़िलाफ़त का ओहदा हज़रत अमीर मुआविया को सुपुर्द कर दिया, हालाँकि इमाम हसन हक़ पर थे और उम्मत के जायज़ ख़लीफ़ा थे।
रजब-उल-मुरज्जब ६० हिजरी में अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु के इंतिक़ाल के बाद जब ख़िलाफ़त का मसला फिर पैदा हुआ तो इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु—जो अपने वालिद की शहादत और भाई की दस्तबरदारी से ख़ुश न थे—ने यज़ीद की ख़िलाफ़त से उसी तरह इंकार कर दिया जिस तरह इससे पहले हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त तस्लीम करने से इंकार किया था। यहीं से इमाम हुसैन का वह किरदार शुरू होता है जिसकी याद यौम-ए-आशूरा की सूरत में आलम-ए-इस्लाम में मनाई जाती है।
हुर्रियत और आज़ादी हर मुअतदिल निज़ाम की बक़ा के लिए एक बुनियादी अस्ल और असासी रुक्न है। आज़ादी पैग़म्बरों के अहदाफ़ में से एक अहम हदफ़ थी—वे आए ताकि बशरियत को आज़ादी दिला सकें और इंसानी समाज को फ़िरऔनी निज़ाम से निजात दिला सकें। आज़ादी ख़ुदा की तरफ़ से बंदों के लिए एक अज़ीम नेअमत है, जबकि ग़ुलामी इंसानियत की सबसे बड़ी ज़िल्लत है। चुनाँचे इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु अपने गर्द-ओ-पेश पर एक ताइराना निगाह डालते हैं और देखते हैं कि बनी-उमय्या के इक़्तिदार में इस्लामी अक़दार को सर-ए-बाज़ार तमाशा बनाकर रूह-ए-इस्लाम की तज़लील की जा रही है। इस्लामी अहकाम व क़वानीन खुले इनहिराफ़ का शिकार हो रहे हैं। जाननिसार-ए-अहले-बैत को हक़ारत-ओ-ज़िल्लत की नज़रों से देखा जा रहा है और आवाज़ बुलंद करने के जुर्म में क़हर-ओ-जबर की सलाख़ों में रहने पर मजबूर किया जा रहा है।
इस्लामी ग़ैरत व हमीयत ने अंगड़ाई ली और हक़ की सरबुलंदी के लिए उठ खड़े हुए, क्योंकि इस्लामी निज़ाम-ए-हुकूमत की बुनियाद जम्हूरी व शूराइयत पर थी। रसूल-ए-पाक ﷺ और ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन के अदवार इसकी बेहतरीन मिसाल थे। यज़ीद का ज़ाती किरदार उन तमाम औसाफ़ से आरी था जो अमीर या ख़लीफ़ा के लिए शरीअत-ए-इस्लामिया ने मुक़र्रर किए हैं। सैर-ओ-शिकार, शराब-ओ-शबाब, रक़्स-ओ-रबाब उसके पसंदीदा मशाग़िल थे। लिहाज़ा किसी फ़ासिक़-ओ-फ़ाजिर को बतौर हुकमरान तस्लीम करना इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु के लिए कैसे मुमकिन हो सकता था। यज़ीद की तख़्त-नशीनी और हुकूमत का आग़ाज़ ज़ुल्म-ओ-सितम और सियासी जब्र-ओ-तशद्दुद से हुआ। उसने अपनी ग़ैर-क़ानूनी और बे-उसूली इक़्तिदार को दवाम देने और मुस्तक़िल बादशाहत क़ायम करने के लिए मुलूकियत और आमिरियत से काम लेते हुए ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन के क़ायम किए हुए न सिर्फ़ तमाम रियासती इदारे तबाह-ओ-बरबाद किए बल्कि मशावरत और जम्हूरियत की धज्जियाँ उड़ा दीं। उसने क़ौमी ख़ज़ाने की लूट-मार और उसे ज़ाती इस्तिमाल में लाने को रिवाज दिया, उरियानी व फ़हाशी, शराब-नौशी, बदकारी और क़मारबाज़ी को आम किया। बैत-उल-माल की रक़म से बड़े-बड़े महल तामीर किए और बंदरों व कुत्तों को पालना शुरू किया। शराब-ओ-कबाब की महफ़िलें सजीं, रिश्वत का बाज़ार गरम हुआ और शाहाना क़ुर्बत की दौड़ शुरू हुई। नाअह्ल और जाहिल लोग अपनी दौलत के बलबूते पर बड़े-बड़े ओहदों पर फ़ाइज़ होने लगे। इस्लामी तालीम-ओ-तरबियत की जगह जहालत, नाख़्वानदगी और बे-राह-रवी आम हो गई। झूठ, दजल, फ़रेब और धोखा-देही समाज का अहम हिस्सा बन गए। बेहूदा और औबाश लड़के उसके इर्द-गिर्द मँडराने लगे—जिसकी निशानदेही मुख़बिर-ए-सादिक़ ﷺ ने अपनी एक हदीस में फ़रमा दी थी। बुख़ारी शरीफ़ में हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु और फ़त्ह-उल-बारी में इमाम इब्न-ए-हजर अस्क़लानी नक़्ल करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“ऐ अल्लाह! मैं ६० हिजरी के आग़ाज़ और बेहूदा औबाश लड़कों की हुकूमत से तेरी पनाह चाहता हूँ।”
(अस्सवािक़-उल-मुहर्रिक़ा)
यज़ीद ने तख़्त-नशीन होने के बाद हाकिम-ए-मदीना की वसातत से इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से बैअत तलब की। वलीद बिन उक़बा ने इमाम हुसैन और अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हुमा को क़ासिद के ज़रिये बुलाया। अगरचे अभी अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की वफ़ात की ख़बर मदीना में आम न हुई थी, तथापि दोनों जलील-उल-क़द्र हस्तियों ने बुलावे का मक़सद अच्छी तरह जान लिया। जब इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से बैअत के लिए कहा गया तो आपने फ़रमाया—“मेरे जैसा आदमी ख़ुफ़िया बैअत नहीं कर सकता, जब बैअत आम होगी उस वक़्त आऊँगा।”
अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर एक दिन की मोहलत लेकर मक्का रवाना हो गए। इधर इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु अजीब उलझन से दोचार थे। यदि वे मदीना में मुक़ीम रहते तो बैअत के बग़ैर कोई चारा न था, और अगर इंकार करते तो मदीना की पाक सरज़मीन मज़लूमों के ख़ून से रंगीन हो जाती। लिहाज़ा 27 रजब को अहल-ओ-अयाल के साथ मक्का रवाना हो गए। मक्का पहुँचकर शिअब-ए-अबू तालिब में क़ियाम किया। मक्का पहुँचते ही अहल-ए-कूफ़ा के ख़तूत का लामतनाही सिलसिला शुरू हो गया। आपने मुस्लिम बिन अकील को हालात का जायज़ा लेने के लिए कूफ़ा रवाना कर दिया। कूफ़ा पहुँचते ही तक़रीबन बारह हज़ार कूफ़ियों ने आपके हाथ पर बैअत कर ली। कूफ़ियों के जज़्बात से मुतअस्सिर होकर मुस्लिम बिन अकील ने इमाम पाक को कूफ़ा आने की दावत दे दी।
अहल-ए-मक्का और अहल-ए-मदीना ने आपको कूफ़ा जाने से रोकने की भरपूर कोशिशें कीं, क्योंकि कूफ़ियों का साबिक़ा ग़द्दाराना रवैय्या उनके सामने था। उमर बिन अब्दुल्लाह, अब्दुल्लाह बिन अब्बास, अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर—सब ने मशवरा दिया कि चूँकि कूफ़ा यज़ीद की हुकूमत के तहत है और वहाँ उसकी फ़ौजें और सामान-ए-हरब-ओ-तर्ब सब मौजूद हैं और वे क़ाबिल-ए-एतिमाद नहीं, इसलिए मुनासिब यही है कि आप मक्का में रहें। हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु ने तजवीज़ पेश की कि आप मक्का में रहकर अपनी ख़िलाफ़त की जद्दोजहद करें, हम सब आपकी मदद करेंगे, लेकिन इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु राज़ी न हुए।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने आपको कूफ़ा के बजाय यमन जाने की तजवीज़ पेश की और कहा कि अगर कूफ़ा का सफ़र ही ज़रूरी है तो पहले कूफ़ियों को लिखें कि वे यज़ीद के हाकिमों को वहाँ से निकालें, फिर आप क़स्द करें। जवाबन आपने फ़रमाया—“ऐ इब्न अब्बास! मैं जानता हूँ कि तुम मेरे ख़ैरख़्वाह हो, लेकिन मैं अज़्म कर चुका हूँ।” इस पर हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने कहा—“अगर आप नहीं मानते तो कम से कम अहल-ओ-अयाल को साथ न ले जाएँ, मुझे डर है कि हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु की तरह आप भी बाल-बच्चों के सामने ज़बह कर दिए जाएँगे।”
लेकिन इन तमाम तरग़ीबात के बावजूद इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु अपने फ़ैसले पर क़ायम रहे और आख़िरकार 3 ज़िल-हिज्जा को मक्का से कूफ़ा के लिए रवाना हो गए। दौरान-ए-सफ़र कई क़िस्म के वाक़िआत और हादसात पेश आए, मगर अज़्म-ए-मुसम्मम को शरीक-ए-सफ़र बनाकर सफ़र जारी रखा। आख़िरकार हुसैन पाक की क़ियादत में अहल-ए-बैत और जाननिसारों का यह मुख़्तसर क़ाफ़िला 2 मुहर्रमुल-हराम 61 हिजरी को मैदान-ए-कर्बला में फ़रो-कश हो गया।
दूसरे ही दिन उमर बिन सअद ने छह हज़ार सिपाहियों के साथ आपको अपने मुहासरे में ले लिया। उमर बिन सअद चूँकि एक रिवायत के मुताबिक़ इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से लड़ने का ख़्वाहिशमंद न था, इसलिए क़र्रा बिन सुफ़यान को आपके पास भेजा। क़र्रा बिन सुफ़यान से इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा—“अगर तुम्हें मेरा आना पसंद नहीं है तो मैं मक्का वापस जाने को तैयार हूँ।” लेकिन इब्न ज़ियाद ने इस तजवीज़ को क़बूल करने से इंकार कर दिया और उमर बिन सअद को हुक्म दे दिया कि अगर इमाम हुसैन बैअत न करें तो उनका पानी बंद कर दिया जाए। बाद में इब्न ज़ियाद ने राय बदलते हुए उमर बिन सअद को डाँटकर हुक्म दिया कि इमाम हुसैन और उनके साथी ख़ुद को हवाले कर दें तो बेहतर है, वरना जंग की राह लो।
शिम्र लईन ख़त लेकर उमर बिन सअद के पास पहुँचा। इस लालची भेड़िए ने इक़्तिदार को क़ायम रखने की ख़ातिर नवासा-ए-रसूल ﷺ के ख़िलाफ़ तलवार उठाना गवारा कर लिया। सुल्ह की आख़िरी बातचीत नाकाम होने के बाद नवासा-ए-रसूल इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने रुफ़क़ा से फ़रमाया—“जो जाना चाहते हैं, उन्हें मेरी जानिब से इजाज़त है।” इसके बाद कुछ जाननिसार और अज़ीज़ बाक़ी रह गए जिन्होंने आख़िरी साँस तक साथ देने का अहद किया, जिनकी तादाद सिर्फ़ बहत्तर (72) थी।
इमाम पाक ने इस मुख़्तसर फ़ौज को मुरत्तब किया। मयमना पर ज़ुबैर बिन क़ैस को, मयसरा पर हबीब बिन मज़ाहिर को मुक़र्रर किया और हज़रत अब्बास को आलम मरहमत फ़रमाया। जंग से पहले अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त के हुज़ूर दुआ की और शहादत के लिए साबित-क़दमी की ग़ैबी मदद तलब की। फिर इतमाम-ए-हुज्जत के लिए दुश्मनों की सफ़ों की तरफ़ मुतवज्जेह होकर फ़रमाया—“ऐ लोगो! जल्दी न करो, पहले मेरी बात सुन लो…।”
जब आप इस तक़रीर के इस हिस्से पर पहुँचे तो ख़ेमों से अहल-ए-बैत की मुस्तूरात की चीख़ें बुलंद हुईं। आपने थोड़ी देर के लिए रुककर अपने भाई हज़रत अब्बास को उन्हें चुप कराने भेजा। फिर फ़रमाया—“लोगो! मेरे हसब-ओ-नसब पर ग़ौर करो… क्या मैं तुम्हारे नबी का नवासा नहीं हूँ…?” लेकिन कूफ़ियों और उनके सरदारों पर इस दिलपज़ीर ख़िताब का कोई असर न हुआ। हाँ, हुर बिन यज़ीद तमिमी की रूह तड़प उठी और उसने जन्नत को चुन लिया। इसके बाद जंग का आग़ाज़ हुआ।
अहल-ए-बैत अतहार का पलड़ा भारी रहा। इब्न सअद ने आम हमला करा दिया। फिदाइयान-ए-अहल-ए-बैत एक-एक करके जाम-ए-शहादत नौश करते गए। हज़रत अली अकबर, क़ासिम, अबू बक्र वग़ैरह मैदान में उतरते गए।
तारीख़-नवीसों ने सच कहा है—मआरका-ए-कर्बला महज़ एक वाक़िआ नहीं, बल्कि हुर्रियत, जुरअत, शुजाअत, ईसार और सब्र का मुकम्मल फ़लसफ़ा है। इसमें बच्चों तक की क़ुर्बानी शामिल है। सैयदा बीबी सकीना सलामुल्लाह अलैहा, हज़रत क़ासिम, अली असग़र—सब ने इस्लाम को लाज़वाल बना दिया। आख़िरकार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तनहा रह गए। शिम्र के उकसाने पर ज़रआ बिन शरीक और सिनान बिन अनस ने वार किए। शिम्र ज़िल-जौशन ने पीछे से सर काट दिया।
आसमान था ज़लज़ले में और तलातुम में ज़मीन
उसके आगे क्या हुआ मुझसे कहा जाता नहीं
इसके बाद ज़ालिमों ने जिस्म-ए-मुबारक को घोड़ों से रौंद डाला। सूरज ने मुँह फेर लिया और कर्बला अँधेरों में डूब गई।
बेचैन रूह सैयद-ए-लौलाक हो गई
तीग़ों से मुस्तफ़ा की क़बा चाक हो गई
मौलाना सईद अख़्तर साहब क़िबला मकनपुरी







