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अमीरुल मोमिनीन हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम

On: मार्च 5, 2026 3:16 पूर्वाह्न
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हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम संक्षिप्त परिचय
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पंद्रह रमज़ानुल मुबारक की मुबारक तारीख़ पर अमीरुल मोमिनीन हज़रत इमाम हसन की विलादत के मौक़े पर एक संक्षिप्त लेख

कौन समझेगा आप क्या हैं हसन
जान महबूब-ए-किब्रिया हैं हसन
मुस्तफ़ा सूंघते हैं यूँ उनको
खुशबू-ए-क़ल्ब-ए-फ़ातिमा हैं हसन
(साहबज़ादा सय्यद तज़हर अली मिस्बाही मदारी)

जिस तरह बंजर और सूखी ज़मीन को लहलहाता बाग़ बनाने के लिए अल्लाह रब्बुल आलमीन ने आसमान के गहरे शामियानों में बादलों के बड़े-बड़े और छोटे-छोटे टुकड़ों के नर्म कंधों पर बारिश का पानी लादकर ज़रूरतमंद ज़मीन की प्यास बुझाने और हरियाली उगाने का इंतज़ाम फ़रमाया है, ठीक उसी तरह उम्मत की सूखी रूहानी खेतियों पर फ़ैज़ान-ए-रसालत मआब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मूसलाधार बारिश के लिए अहले-बैत के छोटे-बड़े मुक़द्दस बादल पूरी उम्मत की आबियारी के लिए हर वक़्त बरस रहे हैं। इस तरह फ़ैज़ान-ए-मुस्तफ़ा की बारिश से उम्मत के दिलों की ज़मीनें बाग़ और बहार बन रही हैं।

इन मुक़द्दस हस्तियों का साया मायूसी और हसरत के धधकते सूरज से अमन का एलान करता है।
इस पाक जमाअत में एक बरकतों वाली हस्ती उस बहादुर मर्द की है जो शुजाअत और बहादुरी का अज़ीम पैकर होकर सब्र और बर्दाश्त का ताजदार दिखाई देता है।
उम्मत की दस्तार पर फ़ख़्र की कलगी लगाने वाले, आसमान-ए-सदाक़त के बाज़ुओं पर अपनी किरणें बिखेरने वाले, इस्लाम की अदालत-ए-उज़्मा की दीवारों पर अपने हरे-हरे झंडे लहराने वाले, दरिया-ए-सख़ावत की चमकती सतह पर अपनी अज़मत की नाव चलाने वाले और मैदान-ए-शुजाअत के खुले इलाक़ों में अपनी बहादुरी के झंडे गाड़ने वाले।

बर्दबार, सलीमुत्तबीयत, शरीफ़ुन-नफ़्स, मुनकसरुल-मिज़ाज, करीम अहले-बैत, दरिया-ए-तहारत व विलायत के मोती, दरिया-ए-इरफ़ान, सैयदुल इंस वल जान, गुलज़ार-ए-अख़लाक़ के सबसे नफ़ीस फूल, जिगरगोशा-ए-बतूल, रैहानतुर-रसूल, हज़रत अमीरुल मोमिनीन सैयदना इमाम हसन मुजतबा अलैहिस्सलाम हैं।

आप कोई खोई हुई चीज़ नहीं हैं कि जिनकी पहचान कराई जाए, बल्कि यक़ीनन आप ख़ज़ाना-ए-मुस्तफ़ा का एक बेशकीमती मोती और आसमान-ए-इमामत का वह सूरज हैं जिसकी मिसाल दुनिया में नहीं मिलती। यह सारी कायनात — हवाओं के झोंकों से लेकर तूफ़ानी लहरों तक, फूलों की पंखुड़ियों पर ओस से लेकर सैलाबों की ताक़त तक — सब आपके कमाल का इज़हार करती है।

टिमटिमाते सुबह के चिराग़ से लेकर आसमानों में घूमते सूरज तक, घाटियों की नालियों से लेकर समंदर की लहरों तक, बारिश के पानी से लेकर ज़मीन की तंगी और आसमान की वुसअत तक, सितारों की महफ़िल से लेकर सुरैया की बुलंदी तक — यह सब उस फ़र्द-ए-वाहीद की तसर्फ़ व कमाल है जिसे दुनिया और आख़िरत में सरदारी हासिल है।

नाम: हसन
कुनियत: अबू मुहम्मद

अलक़ाब:
ख़ातिम-ए-ख़िलाफ़त-ए-राशिदा, करीम अहले-बैत, अत-तक़ी, अन-नक़ी, अल-जवाद, अज़-ज़की, अस-सैयद, अल-हलीम, अस-सलीम, अल-करीम, मुतवाज़े, शबाब-ए-अहल-ए-जन्नत, सब्त-ए-रसूल, मुजतबा, शबीह-ए-मुस्तफ़ा, रैहानतुन-नबी।

नसब:
हज़रत इमाम हसन मुजतबा बिन अली अल-मुर्तज़ा बिन अबी तालिब बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम।

विलादत:
मंगलवार, 15 रमज़ान 3 हिजरी (फ़रवरी 625 ई.) को मदीना तैय्यबा में पैदा हुए।

जब इंसानियत के मुहसिन, फ़ख़्र-ए-कौनैन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को खुशखबरी दी गई कि सैय्यदा फ़ातिमा के घर एक बच्चे की विलादत हुई है, तो नबी-ए-पाक को जो खुशी हुई उसे बयान करना मुश्किल है। आप तशरीफ़ लाए, नन्हे शहज़ादे को गोद में उठाया, और बच्चे ने सबसे पहले उसी चेहरे को देखा जिसे देखने के लिए जन्नत की हूरें भी तरसती हैं।

आपने दाहिने कान में अज़ान और बाएँ कान में इक़ामत कही और अपने मुबारक लुआब से उनके मुँह को खुशबूदार बना दिया।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते थे:
“अल्लाह की क़सम, किसी औरत ने हसन बिन अली जैसा बेटा पैदा नहीं किया।”

आप बहुत विनम्र, सब्र वाले, अल्लाह पर भरोसा रखने वाले और अत्यंत गरिमामय व्यक्तित्व के मालिक थे। आप हर समय ज़ुह्द और इबादत में मशग़ूल रहते थे।

इल्म-ए-बेकराँ

हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम इल्म-ए-लदुन्नी के मालिक थे। दुनिया में किसी मकतब या मदरसे में तालीम हासिल करने के मोहताज नहीं थे। उनका मदरसा उनके नाना जान की आगोश थी। यही वजह है कि वह बचपन ही में ऐसे इल्मी मसाइल से वाक़िफ़ थे जिनसे दुनिया के आम उलमा अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दौर तक भी महरूम रहते हैं।

आप अलैहिस्सलाम का इल्म व फ़ज़्ल सीधे नुबूवत और रिसालत का फ़ैज़ था, इसलिए आपके इल्म व फ़ज़्ल की कोई इंतिहा न थी।

इब्न सअद (मुतवफ़्फ़ा 230 हिजरी), बलाज़री (मुतवफ़्फ़ा 279 हिजरी) और इब्न असाकिर (मुतवफ़्फ़ा 571 हिजरी) बयान करते हैं कि इमाम हसन बिन अली अलैहिस्सलाम सुबह की नमाज़ मस्जिद-ए-नबवी में अदा करते थे। इसके बाद सूरज निकलने तक इबादत में मशगूल रहते थे। फिर मस्जिद में मौजूद बुज़ुर्ग आपकी ख़िदमत में हाज़िर होकर बहस व गुफ़्तगू करते थे। ज़ुहर की नमाज़ के बाद भी आपका यही मामूल होता था।
(तारीख़-ए-मदीना व दमिश्क / इब्न असाकिर 13/241, अल-तबक़ातुल कुबरा / इब्न सअद 10/297, अंसाबुल अशराफ / बलाज़री 3/21)

इमाम हसन बिन अली अलैहिस्सलाम मस्जिद-ए-नबवी में तशरीफ़ रखते थे और लोग आपके चारों तरफ़ हल्का बनाकर मुख़्तलिफ़ मौज़ूआत पर सवाल करते थे जिनके आप जवाब देते थे।
(अल-फ़ुसूलुल मुहिम्मह / इब्न सब्बाग़ मालिकी 2/702)

चुनाँचे अल्लामा इब्न तल्हा शाफ़ई तफ़्सीर-ए-वहीदी के हवाले से लिखते हैं कि एक शख़्स ने इब्न अब्बास और इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से एक आयत के बारे में “शाहिद व मशहूद” का मतलब पूछा। इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने शाहिद से यौम-ए-जुमुआ और मशहूद से यौम-ए-अरफ़ा बताया और इब्न उमर ने यौम-ए-जुमुआ और यौम-ए-नहर कहा।

फिर वह शख़्स इमाम हसन अलैहिस्सलाम के पास पहुँचा। आपने शाहिद से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और मशहूद से यौम-ए-क़ियामत मुराद लिया और दलील में यह आयत पढ़ी:

“या अय्युहन नबी इन्ना अरसल्नाका शाहिदन व मुबश्शिरन व नज़ीरा”
(ऐ नबी! हमने आपको गवाह, खुशखबरी देने वाला और डर सुनाने वाला बनाकर भेजा है)

“ज़ालिका यौमुम मज़मूअुल्लहुन नास व ज़ालिका यौमुम मशहूद”
(क़ियामत वह दिन होगा जिसमें तमाम लोग एक जगह जमा किए जाएंगे और वही यौम-ए-मशहूद है)

जब उस शख़्स ने तीनों के जवाब सुने तो कहा:
“फ़कान क़ौलुल हसन अहसन”
यानी इमाम हसन अलैहिस्सलाम का जवाब सबसे बेहतर है।
(मतालिबुस्सऊल पेज 235)

मक़ाम-ए-मुजतबा दोश-ए-मुस्तफ़ा

हज़रत बराअ बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा कि आप हज़रत हसन रज़ियल्लाहु अन्हु को अपने कंधे पर बैठाए हुए थे और यह दुआ कर रहे थे:

“ऐ अल्लाह! मैं इससे मोहब्बत करता हूँ, तू भी इससे मोहब्बत फ़रमा।”
(सहीह बुख़ारी)

ख़िलाफ़त और सुलह

हज़रत अली कर्रमल्लाहु वजहहुल करीम की शहादत के बाद रमज़ान 40 हिजरी में मुसलमानों ने हज़रत इमाम हसन के हाथ पर बैअत की। जब यह खबर शाम के हाकिम हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु तक पहुँची तो उन्होंने लश्कर तैयार किया और इराक की ओर रवाना हुए।

जब इमाम हसन मुजतबा को यह खबर मिली कि शाम से एक लश्कर आ रहा है तो आप भी एक फौज लेकर रवाना हुए और मदाइन के क़रीब ठहर गए।

लोगों को लगा कि आप जंग नहीं करना चाहते। जब आपसे पूछा गया तो आपने फ़रमाया:
“मुझे मुसलमानों का इत्तिहाद, उनकी खुशहाली, उनकी जान-माल की हिफ़ाज़त और आपस की सुलह बहुत पसंद है।”

आपकी इन बातों से फौज में इख़्तिलाफ़ पैदा हो गया, लेकिन आप बेहद वक़ार और बर्दाश्त वाले शख़्स थे। आपने अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु से सुलह कर ली और ख़िलाफ़त से दस्तबरदार हो गए, जिससे हज़ारों मुसलमानों की जान बच गई।

इस तरह आप अपने नाना जान रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इस हदीस के सच्चे मिस्दाक़ बने:
“मेरा यह बेटा सरदार है, अल्लाह इसके ज़रिये मुसलमानों के दो बड़े गिरोहों में सुलह करा देगा।”
(सहीह बुख़ारी)

अख़लाक़ और सब्र

आपकी बर्दाश्त इतनी ज़्यादा थी कि ख़ारिजी लोग सामने गालियाँ देते थे लेकिन आप जवाब नहीं देते थे, बल्कि कभी-कभी उन्हें खाना भी खिला देते थे। ताक़त होने के बावजूद बदला न लेना हज़रत अली की विरासत थी।

आप अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फ़ज़ाइल व कमालात के वारिस थे। ताक़त के बावजूद सब्र और रज़ा का पैकर थे —
सुलह में रहमत और मोहब्बत का नमूना, और जंग में बहादुर सिपाही।

करामत

हज़रत नूरुद्दीन अब्दुर्रहमान जामी रहमतुल्लाह अलैह बयान करते हैं कि एक सफ़र में इमाम हसन मुजतबा एक ऐसे बाग़ से गुज़रे जिसके सारे खजूर के दरख़्त सूख चुके थे।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर भी साथ थे। उन्होंने कहा:
“काश इस सूखे दरख़्त पर ताज़ा खजूर होतीं।”

इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने दुआ की। कुछ ही लम्हों में वह सूखा दरख़्त हरा-भरा हो गया और उसमें ताज़ा खजूर लग गईं।

शहादत

आपकी शहादत की तारीख़ के बारे में अलग-अलग क़ौल मिलते हैं, मगर मशहूर क़ौल के मुताबिक 28 सफ़र 49 हिजरी है।

आपको ज़हर दिया गया था। तीसरी बार इतना सख़्त ज़हर दिया गया कि आपकी अंतड़ियाँ कटकर गिरने लगीं।

आपकी नमाज़-ए-जनाज़ा हज़रत सईद बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु ने पढ़ाई जो उस वक़्त मदीना के गवर्नर थे।
आपको जन्नतुल बक़ी में दफ़न किया गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन

अल्लाह तआला आपके मुबारक दरबार से जारी होने वाले फ़ैज़ व बरकत के ज़रिये हमारे दिलों को रोशन फ़रमाए और हमें दीदार-ए-मुस्तफ़ा के क़ाबिल बनाए।
आमीन।

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