जीवनी मशाइख-ए-मदारिया सामाजिक धार्मिक इस्लामी विधिशास्त्र

हज़रत इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम

On: मार्च 5, 2026 2:17 पूर्वाह्न
Follow Us:
* हज़रत इमाम हसन मुज्तबा * इमाम हसन अलैहिस्सलाम की सीरत * हज़रत इमाम हसन की जिंदगी * इमाम हसन के फ़ज़ाइल * इमाम हसन की सख़ावत * अहले बैत की सीरत * इमाम हसन और इमाम हुसैन * रसूल के नवासे इमाम हसन * इस्लामी महान व्यक्तित्व * इमाम हसन की इबादत * रमज़ान और इमाम हसन
  • हज़रत इमाम हसन मुज्तबा
  • इमाम हसन अलैहिस्सलाम की सीरत
  • हज़रत इमाम हसन की जिंदगी
  • इमाम हसन के फ़ज़ाइल
  • इमाम हसन की सख़ावत
  • अहले बैत की सीरत
  • इमाम हसन और इमाम हुसैन
  • रसूल के नवासे इमाम हसन

आप 15 रमज़ान 3 हिजरी की रात को मदीना मुनव्वरा में पैदा हुए। विलादत मुबारक से पहले हज़रत उम्मे फ़ज़्ल ने ख़्वाब में देखा कि सैयदना आला हज़रत प्यारे नबी मक्की मदनी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के जिस्म मुबारक का एक टुकड़ा मेरे घर में आ पहुँचा है। ख़्वाब प्यारे नबी से बयान किया तो आपने फ़रमाया कि इसकी ताबीर यह है कि मेरी लख़्ते जिगर फ़ातिमा के बतन से अनक़रीब एक बच्चा पैदा होगा जिसकी परवरिश तुम करोगी।

विलादत मुबारक के बाद इस्मे गरामी हमज़ा तजवीज़ हो रहा था लेकिन प्यारे नबी ने हुक्मे ख़ुदा से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के वज़ीर हज़रत हारून के फ़रज़ंदों के अस्मा शबर व शबीर पर आपका नाम हसन और बाद में आपके छोटे भाई का नाम हुसैन रखा। बिहारुल अनवार में है कि सैयदना इमाम हसन की पैदाइश के बाद जिब्रील अमीन ने सरवरे कायनात की ख़िदमत में एक सफ़ेद रेशमी रूमाल पेश किया जिस पर हसन लिखा हुआ था।

जब सैयदना इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम की विलादत हुई और आप प्यारे नबी की ख़िदमते पाक में लाए गए तो प्यारे नबी बेहद खुश हुए और उनके दहन मुबारक में अपनी ज़बान अक़्दस दी। बिहारुल अनवार में है कि प्यारे आका ने हज़रत इमाम हसन को आग़ोशे रहमत में लेकर प्यार किया और दाहिने कान में अज़ान और बाएँ कान में इक़ामत फ़रमाने के बाद अपनी ज़बान पाक उनके मुँह में दी। इमाम हसन उसे चूसने लगे। इसके बाद आपने दुआ फ़रमाई कि या अल्लाह इस बच्चे को और इसकी औलाद को अपनी पनाह में रखना।

आपकी विलादत के सातवें दिन प्यारे नबी ने ख़ुद अपने दस्ते मुबारक से आपका अक़ीक़ा फ़रमाया और बालों को मुंडवा कर उसके हम वज़न चाँदी सदक़ा फ़रमाई।

एक दिन प्यारे नबी अलैहिस्सलातु वस्सलाम सैयदना इमाम हसन अलैहिस्सलाम को कंधे पर बिठाए हुए फ़रमा रहे थे:
“ख़ुदाया मैं इसे दोस्त रखता हूँ, तू भी इससे मोहब्बत फ़रमा।”

एक मरतबा प्यारे नबी अलैहिस्सलातु वस्सलाम नमाज़ पढ़ा रहे थे कि अचानक सैयदना इमाम हसन अलैहिस्सलाम आ गए और वह दौड़कर पुश्ते रसूल पर सवार हो गए। यह देखकर रसूले करीम ने बेहद नरमी के साथ सर उठाया। नमाज़ के बाद आपसे इसका ज़िक्र किया गया तो आपने फ़रमाया:

“इब्नी हाज़ा सय्यिद”
यह मेरा बेटा सय्यिद है और देखो यह अनक़रीब दो बड़े गिरोहों में सुलह कराएगा।

एक मरतबा प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि वसल्लम नमाज़े ईशा पढ़ाने के लिए तशरीफ़ लाए। आपकी आग़ोश में इमाम हसन थे। प्यारे नबी नमाज़ में मशग़ूल हो गए। जब सज्दे में गए तो इतना लंबा सज्दा किया कि सहाबा किराम समझने लगे कि शायद आप पर वही नाज़िल होने लगी है। नमाज़ के बाद आपसे इसका ज़िक्र किया गया तो आपने फ़रमाया कि मेरा फ़रज़ंद हसन मेरी पुश्त पर आ गया था। मैं यह न चाहता था कि उसे उस वक़्त तक पुश्त से उतारूँ जब तक वह ख़ुद न उतर जाए, इसलिए मैंने सज्दा लंबा कर दिया।

सैयदना इमाम ज़ैनुल आबिदीन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फ़रमाते हैं कि सैयदना इमाम हसन अलैहिस्सलाम बहुत बड़े आबिद, बेमिसाल ज़ाहिद और अफ़ज़ल तरीन आलिम थे। आपने जब भी हज फ़रमाया पैदल फ़रमाया, कभी कभी पाबरेहना हज के लिए तशरीफ़ ले जाते थे।

आप अक्सर मौत, अज़ाबे क़ब्र और पुलसिरात को याद करके रोया करते थे। जब आप वुज़ू करते थे तो आपके चेहरे का रंग ज़र्द हो जाता था और जब नमाज़ के लिए खड़े होते थे तो काँपने लगते थे।

आपका मामूल था कि जब मस्जिद के दरवाज़े पर पहुँचते तो अल्लाह से अरज़ करते:
ऐ मेरे पालने वाले! तेरा गुनहगार बंदा तेरी बारगाह में आया है। ऐ रहमान व रहीम! अपनी अच्छाइयों के सदक़े में मुझ जैसे बुराई करने वाले बंदे को माफ़ कर दे।

आप जब नमाज़े फ़ज्र से फ़ारिग होते थे तो उस वक़्त तक ख़ामोश बैठे रहते थे जब तक सूरज तुलू न हो जाए।

हज़रत इमाम शाफ़ई रज़ियल्लाहु अन्हु लिखते हैं कि सैयदना इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम अक्सर अपना सारा माल राहे ख़ुदा में तक़सीम फ़रमा दिया करते थे।

एक शख़्स ने हज़रत इमाम हसन से कुछ माँगा। बस हाथ फैलाना ही था कि आपने पचास हज़ार दिरहम और पाँच सौ अशरफ़ियाँ दे दीं और फ़रमाया कि मजदूर लाकर इसे उठवा ले जाओ। इसके बाद आपने मजदूर की मजदूरी में अपना जब्बा शरीफ़ भी अता फ़रमा दिया।

एक मरतबा आपने एक साइल को ख़ुदा से दुआ करते हुए देखा:
ख़ुदाया मुझे दस हज़ार दिरहम अता फ़रमा।
आप घर पहुँचे और वही रकम उस साइल को भिजवा दी।

आपसे किसी ने पूछा कि आप ख़ुद फ़ाक़ा करते हैं लेकिन साइल को खाली हाथ वापस नहीं करते?
आपने फ़रमाया:

मैं ख़ुदा से माँगने वाला हूँ। वह मुझे अता फ़रमाता है और मैं लोगों को दे देता हूँ। मुझे डर है कि अगर मैं लोगों को देना बंद कर दूँ तो वह मुझे भी महरूम न कर दे।

हज़रत इमाम शाफ़ई का बयान है कि किसी ने सैयदना इमाम हसन से अर्ज़ किया कि हज़रत अबू ज़र ग़िफ़ारी फ़रमाया करते थे कि मुझे दौलत से ज़्यादा फ़क़्री और सेहत से ज़्यादा बीमारी पसंद है।

आपने फ़रमाया:
ख़ुदा अबू ज़र पर रहम करे, उनका कहना दुरुस्त है। लेकिन मैं यह कहता हूँ कि जो शख़्स ख़ुदा की क़ज़ा व क़दर पर तवक्कुल करे, वह हमेशा उसी चीज़ को पसंद करेगा जिसे ख़ुदा उसके लिए पसंद करे।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment