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हज़रत बाबा मान शाह दरियाई रहमतुल्लाह अलैह

On: फ़रवरी 22, 2026 4:19 अपराह्न
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Hazrat Baba Man Dariyai (Rahmatullah Alaih)

आज के इस मज़मून में हम आप को सिलसिला मदारीया के एक ऐसे बुज़ुर्ग से वाबस्ता और रू-ब-रू करवाएँगे कि जिन पर बादशाही नाज़ करे, ऐसे वली-ए-अल्लाह कि जिन पर विलायत फ़ख़्र करे, ऐसे इबादत गुज़ार कि जिन पर इबादत रश्क करे, ऐसे करामात वाले कि जिन पर करामात फ़ख़्र करती हुई नज़र आएँ। जिन्हें बाबा मान दरियाई कहा जाता है, जिनका जिस्म मुबारक आप की वफ़ात के बाद फूलों का ढेर बन गया। ज़िंदा शाह मदार के दरियाई दूल्हा भी कहा जाता है, जिन के आस्ताने पर आज भी एक करामाती पत्थर के ग़ुस्ल का दूध पीने से बे-औलादों को औलाद अता होती है। मैं बात कर रहा हूँ शहंशाह बड़ोदरा हज़रत बाबा मान की। हज़रत बाबा मान का आस्ताना-ए-मुबारक गुजरात के ज़िला बड़ोदरा में आप के ही नाम से मंसूब इलाक़े बाबा मान में मरजअ-ए-ख़लाइक़ है।

नाम:
आरिफ़ बिल्लाह, मख़दूम-उल-हिंद, मलंग-ए-आज़म, सैयद अकमल हुसैन उर्फ़ बाबा माना शाह दरियाई

जन्म:
721 हिजरी

आप का शजरा-ए-तरीक़त कुछ इस तरह से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वा आलिही वसल्लम से जा कर मिलता है — हज़रत सैयद अकमल हुसैन उर्फ़ बाबा मान मलंग मदारी، उन के पीर हज़रत सैयद सुधन सरमस्त मदारी، उन के पीर हज़रत सैयद जमालुद्दीन जान मन जन्नती، उन के पीर हज़रत सैयद बदिउद्दीन ज़िंदा शाह मदार रज़ियल्लाहु अन्हु।

हज़रत बाबा मान के आस्ताना-ए-मुबारक पर एक करामाती पत्थर मौजूद है, जिस की निस्बत हज़रत बाबा मान से है। और जब भी कोई अपने बेटे के लिए दुआ माँगते हैं तो बेटे मिलते हैं। आप अपने पीर सुधन शाह सरमस्त की बारगाह में जाते थे तो इसी पत्थर को अपने पैरों से मारते हुए अपने पीर की बारगाह में जाते और वैसे ही वापस आते थे। आप अपने पीर की बारगाह में जाते थे तो अपने पीर सुधन शाह सरमस्त की तरफ़ कभी पीठ नहीं की। आज भी इस करामाती पत्थर की करामात यह है कि जिस औरत को औलाद नहीं होती वह सिर्फ़ इस करामाती पत्थर के ग़ुस्ल का दूध पी ले तो आप की दुआ से उसे औलाद नसीब होती है। यह दूध 8 शाबान यानी बाबा मान के संदल के दिन तक़सीम किया जाता है। यही नहीं, बड़ी से बड़ी क़िस्म की बीमारियों का इलाज भी इसी करामाती पत्थर से हो जाता है।

एक मर्तबा आप बड़ोदह पहुँचे। उस वक़्त वहाँ एक जोगी रहता था जो बड़ोदह के राजा का गुरु था। उस ने राजा से कह रखा था कि मुसलमान फ़ुक़रा को शहर बड़ोदह में न माँगने दिया जाए। इसी वजह से राजा ने फ़ुक़रा को नज़र व नियाज़ पर पाबंदी लगा रखी थी। वह जोगी अपने हाथ में कांवड़ रखता था, जिस से वह पूरे शहर में माँगता था। बाबा मान को जब यह ख़बर मिली तो आप राजा के दरबार में पहुँचे। दरबान ने उन्हें रोकने की कोशिश करनी चाही मगर मदारीयत के जलाली क़दम को रोक न सका। आख़िरकार बाबा मान दनदनाते हुए राजा के सामने पहुँचे। राजा ने आप का चेहरा देखा तो जलाल-ए-मान से उसे जलाल-ए-ख़ुदावंदी नज़र आने लगा। राजा पर ख़ौफ़ तारी हो गया और कहा: “बाबा, मेरे क़रीब आ कर बैठिए और बताइए आख़िर इतने ग़ुस्से में क्यों हैं?”

बाबा मान ने फ़रमाया: “ऐ राजा, तू ने आख़िर अपने शहर में मुस्लिम फ़ुक़रा के लिए ख़ैरात का दरवाज़ा क्यों बंद किया हुआ है?”
फिर राजा ने अदब के साथ कहा: “मेरे गुरु ने मुस्लिम फ़ुक़रा को दौलत व नज़र देने से मना किया हुआ है।”
बाबा मान ने फ़रमाया: “अपने गुरु को बुला।”

राजा ने उस जोगी को बुलाया। जोगी अपनी कश्कोल अपने साथ लाया और बग़ल में रख लिया। जब बाबा मान ने उस से पूछा: “ऐ जोगी, तू राजा को ख़ैरात करने से क्यों रोकता है?” तो वह कहने लगा: “हमारे मज़हब में मुसलमानों को धरम देना जायज़ नहीं।”
तो आप ने फ़रमाया: “तेरे पास क्या है?”
उस ने कहा: “कांवड़ है।”
आप ने फ़रमाया: “अगर यह तेरी कांवड़ है तो इस से कहो कि शहर में ख़ैरात माँग कर लाए।”

तो वह जोगी बोला: “क्या कांवड़ ख़ुद कहीं जा सकती है?”
बाबा मान कहने लगे: “अगर यह तेरी है तो तेरे हुक्म से जाने से क्या इनकार कर देगी?”
जोगी मुस्कुरा आया और कहा: “अगर ऐसा है तो आप ही इसे मँगवाने के लिए भेज दीजिए।”

आप मुस्कुराए और कांवड़ से फ़रमाया: “हुक्म-ए-ख़ुदा से और दुआ-ए-फ़क़ीरी से ढाई घर माँग लाए और तौहीद बोले।”
यह कहते ही कश्कोल हिलने लगी और राजा और जोगी के क़रीब से गुज़री। पूरा दरबार एक हैरत व इस्तिआजाब के आलम में डूब गया। कश्कोल जोगी के पास से गुज़रती हुई बाबा मान के पास आई और ख़ूब हिलने लगी और तौहीद “अल्लाह अल्लाह” कहने लगी। फिर उसका रुख़ शहर की तरफ़ हो गया। शहर में जिस दरवाज़े पर वह कश्कोल पहुँचती, लोग उस में ख़ैरात करते, यहाँ तक कि औरतें अपने ज़ेवरात भी उस में ख़ैरात कर देतीं। थोड़ी देर में वह कांवड़ शहर से माँग कर वापस आ गई।

यह देख कर राजा हाथ बाँध कर खड़ा हुआ और सारे दरबारी भी खड़े हो गए। राजा ने कहा: “बाबा, हम शर्मिंदा हैं, मेरी ख़ता माफ़ हो, मेरे लिए जो हुक्म हो मैं मानने को तैयार हूँ।”
हज़रत बाबा मान ने फ़रमाया: “ऐ राजा, हम फ़क़ीरों को दुनिया की चाह नहीं होती, बस एक बात यह है कि मेरे इस्लामी फ़ुक़रा पर लगी पाबंदी को हटाया जाए और इस शहर बड़ोदह का नाम मेरे नाम से मंसूब किया जाए।”

पस राजा ने यह ऐलान किया कि सिर्फ़ बड़ोदह कह कर इस शहर को न पुकारा जाए, बल्कि जब भी कहा जाए तो “बाबा मान का बड़ोदह” कहा जाए। साथ ही साथ मुस्लिम फ़ुक़रा पर लगी पाबंदी को भी राजा ने ख़त्म कर दिया।

आप को बाबा मान कहने की मुझे यह वजह समझ में आती है कि जो राजा और जोगी किसी फ़क़ीर को न मानते थे, आप की करामात से वह मानने पर मजबूर हो गए।
दूसरी बात यह भी कही जा सकती है कि खोई हुई फ़ुक़रा की इज़्ज़त यानी मान व सम्मान उन्होंने दिलाया, इसी लिए उन्हें “मान” कहा जाता होगा। इसी लिए लोग आप को बाबा मान के नाम से पुकारते हैं।

हज़रत बाबा मान को दरियाई दूल्हा के लक़ब से भी याद किया जाता है। कहा जाता है कि आप के एक मुरीद, जो सौदागर थे, एक बार दरिया में सफ़र कर रहे थे। दौरान-ए-सफ़र उनकी कश्ती में छेद हो गया, जिस के बाद पानी कश्ती में भरने लगा। मुरीद ने अपने पीर को याद किया: “या बाबा मान, मेरी मदद फ़रमाइए।” आप उस वक़्त बड़ोदह में मौजूद थे। कंधे पर एक कपड़ा था। आपने उसी कपड़े को ज़मीन में लगा दिया, जिस से उस सौदागर की कश्ती का छेद बंद हो गया और उस सौदागर की कश्ती पार लग गई।
इसी तरह बहुत से दरिया में फँसे लोगों ने आप को याद किया और आप ने उनकी रहनुमाई फ़रमाई, इसी लिए आप को दरियाई दूल्हा के लक़ब से पुकारा जाता है।

आप की यह भी करामात है कि आप को न ग़ुस्ल दिया गया, न कफ़न दिया गया और न ही आप के जनाज़े की नमाज़ हुई, सीधे उठ कर फूलों का ढेर बन गए। इसी लिए आप को लोग ज़िंदा शामदार के ज़िंदा वली के नाम से भी जानते और पहचानते हैं।

हज़रत बाबा मान का आस्ताना-ए-मुबारक शहर बड़ोदह के बाबा मान इलाक़े में मौजूद है।
आप की वफ़ात 1012 हिजरी में हुई।
आप ने तक़रीबन 300 साल की उम्र पाई।
आप का उर्स मुबारक 8 शाबान को मनाया जाता है।

लेखक: ग़ुलाम फ़रीद हैदरी मदारी.

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