बर्रे अज़ीम पाक-व-हिन्द में जिन मुबारक हस्तियों ने नेकी की दावत आम की उन में से एक आसमान-ए-विलायत के रौशन मिनार सिलसला-ए-आलिया चिश्तिया के अज़ीम पेशवा हज़रत बाबा फ़रीदुद्दीन मसऊद गंजे शकर फ़ारूक़ी हनफ़ी चिश्ती रहमतुल्लाहि तआला अ़लैह की ज़ात-ए-गरामी भी है
विलादत
आप रहमतुल्लाहि तआला अ़लैह की विलादत-ए-बासआदत 569 हिज्री या 571 हिज्री मुताबिक़ सन् 1175 ईसवी. में मदीनतुल औलिया मुल्तान के क़स्बा “ख़त्वाल” में हुई।
माता-पिता
आप रहमतुल्लाहि तआला अ़लैह के वालिद-ए-माजिद हज़रत शेख़ जमालुद्दीन सुलैमान रहमतुल्लाहि तआला अ़लैह ज़बरदस्त आलिम-ए-दीन, और वालिदा माजिदा हज़रत बी बी क़ुरसम ख़ातून रहमतुल्लाहि तआला अ़लैहा नेक परहेज़गार ख़ातून थीं।
वालिद-ए-गरामी के विसाल के बाद आप रहमतुल्लाहि तआला अ़लैह की तर्बियत आपकी वालिदा माजिदा ने फ़रमाई। बचपन से ही आप नमाज़ को क़ायम रखने वाले, इबादत व रियाज़त करने वाले और तक़्वा व परहेज़गारी को इख़्तियार किए हुए थे।
(सीरुल औलिया मुतरजिम, सफ़ा 159)
(अनवारुल फ़रीद, सफ़ा 42, 48)
(हयाते गंज शकर, सफ़ा 253, 258)
शिक्षा (तालीम व तरबियत)
सरकार बाबा फ़रीद रहमतुल्लाहि अ़लैह हिफ़ज़े क़ुरआन और इब्तिदाई तालीम हासिल करने के बाद मदीनतुल औलिया मुल्तान तशरीफ़ ले गये, और क़ुरआन व हदीस, फ़िक़्ह व कलाम और दूसरे उलूम-ए-मुरव्विजा पर उबूर हासिल किया ॥
(ख़ज़ीनतुल औलिया, जिल्द 2, सफ़ा 110)
(चिश्ती ख़ानकाहें और सरबराहान-ए-बर्र-ए-सग़ीर, सफ़ा 50)
(महबूब-ए-इलाही, सफ़ा 53)
चमत्कार (करामत)
01. – गन्जे शकर नाम कयों हुआ
बाबा फरीद माँ चाहती थी कि बाबा फरीद नमाज़ पढ़ें, तो बाबा फरीद ने कहा कि नमाज़ पढ़ने से क्या मिलेगा। माँ ने कहा कि अगर तुम नमाज़ पढ़ोगे तो अल्लाह तुम्हें शक्कर (चीनी) देगा। शक्कर के लालच में बाबा फरीद नमाज़ पढ़ने लगे। माँ उनके सिरहाने शक्कर रख देती थीं। धीरे-धीरे उनका मन ईश्वर में लगने लगा और वे “शकरगंज” या “गन्जे शकर” कहलाए।
बचपन की इस आदत से जब आपको इबादत में सुकून मिलने लगा तो आपने खुद फरमाया:
फरीदा सकर खंडु निवात गुड़ु माखिओ मांझा दुधु ॥
सभे वसतू मिठीआं रब न पुजनि तुधु ॥
(ऐ फ़रीद कह कि शकर,खांड,मिस्री,गुड़,शहद और भैंस का घी भरा दूध, ये सब चीज़ें शीरीं हैं मगर ऐ ख़ुदा जो मिठास तेरी मोहब्बत में है वो इनमें नहीं)
02. – कुएँ में तपस्या का वाकया
एक बार उन्होंने ईश्वर प्राप्ति के लिए कुएँ में उल्टा लटककर तपस्या करने का निश्चय किया।
वे अपने पैरों को पेड़ की शाखा से बाँधकर कुएँ के अंदर घंटों लटके रहते, ध्यान करते और थोड़ा भोजन करते।
बारह साल तक तपस्या करने के बाद भी जब ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई, तो वे कौवों से बोले कि “अगर शरीर में मांस बचा है तो खा लो, पर आँखें छोड़ दो, शायद एक दिन अल्लाह के दर्शन हो सकें” और रोने लगे।
इसके बारे में बाबा अपनी दोनों में फरमाते हैं:
कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खाइयो माँस।
दोई नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।।
अर्थ: हे काग (कौवा) तन के हर जगह का माँस खाना पर आँखों का नहीं, क्योंकि मरने के बाद भी आँखों में पिया (प्रभु) मिलन की आस रहेगी ही रहेगी।
03. – चलते पेड़ का वाकया
एक बार वे कहीं जा रहे थे और एक दरख्त (पेड़) उनके पीछे-पीछे चलने लगा।
उन्होंने कई बार पेड़ को रुकने को कहा, लेकिन वह नहीं रुका।
तीसरी बार गुस्से में आकर उन्होंने कहा, “ऐ बे-अदब, रुक जा!” और पेड़ की शाखाएँ झुक गईं, लेकिन जड़ें वहीं रहीं, और पेड़ वैसे ही झुक कर उनके पीछे चलता रहा।
बैअत व इरादत
यह बात सब ही जानते हैं कि सरकार बाबा फ़रीद को हज़रत क़ुत्बुद्दीन बख़्तियार काकी रहमतुल्लाहि तआला अ़लैह से इजाज़त व ख़िलाफ़त हासिल थी
लेकिन सरकार बाबा फ़रीद को इस नस्बत के साथ-साथ नस्बत मदारुल-आलमीन की मुनासिबत से फ़ैज़ाने मदारुल-आलमीन रज़ियल्लाहु अन्हु भी हासिल था, जो कि सरकार मदार पाक के ख़लीफ़ा सरकार सैय्यद मुहम्मद जमालुद्दीन से होता हुआ सरकार सैय्यद ताज बरहना इदमोरी रहमतुल्लाहि अ़लैह से आपको हासिल हुआ,
जो कि कुछ इस तरह है:
निस्बते मदार
हज़रत ख़्वाजा फ़रीदुद्दीन मसऊद गंजे शकर रहमतुल्लाहि अ़लैह, आपके पीर ओ मुर्शिद हज़रत सैय्यद ताज बरहना अदमोरी रहमतुल्लाहि अ़लैह, आपके पीर ओ मुर्शिद हज़रत सैय्यद बंदगी सादिक़ रहमतुल्लाहि अ़लैह, आपके पीर ओ मुर्शिद हज़रत सैय्यद शाह सधन सरमस्त रहमतुल्लाहि अ़लैह, और उनके पीर ओ मुर्शिद हज़ूर सैय्यदना मुहम्मद जमालुद्दीन जानमन जन्नती बग़दादी मदारी, और उनके पीर ओ मुर्शिद क़िब्ला व काबा हज़ूर सैय्यदना बदीउद्दीन अहमद ज़िंदा शाह क़ुत्बुल मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु हैं।
यह नस्बत मदारिया एक दूसरे तरीक़े से भी आपको हासिल है
जिसके मुतअल्लिक़ मुफस्सिर-ए-आज़म पाकिस्तान मुफ़्ती मोहम्मद फ़ैज़ अहमद ओवैसी रज़वी मुहद्दिस बहावलपुर नूरल्लाहु मरक़दहू लिखते हैं:
कि सला्सिल-ए-रूहानिया में से एक सिलसिला सिलसिला-ए-ओवैसिया को भी यह शरफ़ हासिल है कि चंद वासतों से यह सिलसिला सरकार करीम रहमतुललिल आलमीन सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम तक पहुंचता है, और इसी नस्बत से हज़ूर शैख़ुल इस्लाम सैय्यदना ख़्वाजा बाबा फ़रीदुद्दीन गंजे शकर क़ुद्दिस सिर्रहु (पाक पत्तन शरीफ़) को भी सिलसिला मदारिया की इजाज़त व ख़िलाफ़त हासिल थी।
(मलिकुल आरिफ़ीन, सफ़ा 125)
यहाँ पर एक और नुक्ता पेश करता चलूँ
जैसा कि अभी बताया गया कि बाबा फ़रीदुद्दीन मसऊद गंजे शकर रहमतुल्लाहि अ़लैह को सरकार मदार का फ़ैज़ान उनके ख़लीफ़ा सरकार जमालुद्दीन जानमन जन्नती से होता हुआ पहुँचता है। और सरकार जमालुद्दीन जानेमन जन्नती का सिलसिला “दीवानगान” कहलाता है, जो हज़ूर सैय्यदना सैय्यद जमालुद्दीन जानमन जन्नती रज़ियल्लाहु अन्हु से ही शुरू भी हुआ है, और यह गिरोह हज़ूर सैय्यदना सैय्यद बदीउद्दीन अहमद ज़िंदा शाह क़ुत्बुल मदार रज़ियल्लाहु अन्हु के चार मशहूर गिरोहों में से एक गिरोह है, और जो इस गिरोह से होते हैं वह ख़ुद को “दीवान” के नाम से मौसूम करते हैं।
बस इसी तरह सरकार बाबा फ़रीदुद्दीन गंज शकर रज़ियल्लाहु अन्हु के सज्जादगान आज तक
ख़ुद को “दीवान” के नाम से मौसूम करते आ रहे हैं। और इससे पता चलता है कि ये मुकद्दस शख़्सियात सरकार जमालुद्दीन जानमन जन्नती के सिलसिले से वाबस्ता थीं और वे अपने नाम से पहले “दीवान” लगा कर इस बात का इज़हार करते थे, उन नामों को यहाँ लिखा जा रहा है :
दीवान ख़्वाजा बदरुद्दीन सुलैमान रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान ख़्वाजा अला उद्दीन मौज दरिया रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान ख़्वाजा मुअज्जुद्दीन रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान ख़्वाजा मुहम्मद फ़ज़ील रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान ख़्वाजा मुनव्वर शाह रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान ख़्वाजा नूरुद्दीन रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान ख़्वाजा बहाउद्दीन बारौन रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान शेख़ यूनुस रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान पीर अहमद शाह रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान ख़्वाजा पीर अता रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान ख़्वाजा शेख़ मुहम्मद रहमतुल्लाहि अ़लैह
दीवान शेख़ इब्राहीम फ़रीद सानी रहमतुल्लाहि अ़लैह
(रसूमात-ए-फ़रीदी, सफ़ा 29)
इन पाकबाज़ औलिया-ए-किराम का “दीवान” लिखना अपने आप में एक बड़ी दलील है कि ये बुज़ुर्ग हस्तियां सिलसिला-ए-आलिया मदारिया की नस्बतों को किस क़दर फ़ख़्र के साथ अपने सर और माथे से लगाए हुए थीं।
उर्स की रस्मों में मदारे पाक की फातिहा
जनाब मोहम्मद बशीर अहमद चिश्ती लिखते हैं कि : “सरकार बाबा फ़रीद गंज शकर रहमतुल्लाहि अ़लैह का उर्स 25 ज़िल हिज्जा से शुरू होता है” जबकि उर्स की ख़ास तारीख़ पाँच और छह मुहर्रम हैं। उर्स की तमाम रसूमात को चार हिस्सों में तक़सीम किया गया है:
1 — ख़त्म शरीफ़
2 — समाअ
3 — बहिश्ती दरवाज़ा का खुलना
4 — ग़ुस्ल
इनमें से तीसरी रस्म यानी बहिश्ती दरवाज़े का खुलना बहुत ख़ास है।
मोहम्मद बशीर अहमद चिश्ती लिखते हैं कि :
5 मुहर्रम को उर्स की बहार पूरे जोबन पर होती है, और लाख-सवा लाख के क़रीब ख़ल्क़-ए-ख़ुदा की तादाद पाकपत्तन शरीफ़ में दरगाह बाबा फ़रीद पर जमा हो जाती है। इस बड़ी तादाद में सिर्फ़ आम अवाम नहीं बल्कि दरगाह निज़ामिया साबरिया के बड़े-बड़े सज्जादा नशीन और दरगाह ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के ख़द्दाम भी शामिल होते हैं, और तब तक नहीं जाते जब तक बहिश्ती दरवाज़े से गुज़र नहीं जाते।
(रसूमात-ए-फ़रीदी, सफ़ा 41)
जो नुक्ता मैं समझाना चाहता हूँ वह यह है—
कि मग़रिब से ज़रा पहले दीवान साहब यानी सज्जादा नशीन अपने हाथ से बहिश्ती दरवाज़ा खोलते हैं। पहले दीवान साहब और उनके मुताल्लिक़ीन, पीरान-ए-एज़ाम और उनके मुतवस्सिलीन गुज़रते हैं, उसके बाद आम लोगों को इजाज़त होती है। दरवाज़ा खुलने के बाद दीवान साहब खुद रौज़ा मुबारक में दाख़िल होते हैं और उनके साथ उनके ख़्वानदान, क़राबतदार और औलाद-ए-फ़रीदिया दाख़िल होते हैं। फिर साबरिया-निज़ामिया सिलसिलों के बुज़ुर्ग और सज्जादा नशीन अपने-अपने गिरोहों के साथ दाख़िल होते जाते हैं।
दीवान साहब अंदर दाख़िल होते हैं तो दोनों मज़ारों पर मिट्टी के प्यालों में शरबत भरा हुआ होता है और इस शरबत पर हज़रत सरकार सैय्यदना बदीउद्दीन अहमद ज़िंदा शाह मदारुल-आलमीन रज़ियल्लाहु अन्हु का ख़त्म शरीफ़ पढ़ा जाता है।
मदारे पाक के ख़त्म शरीफ़ के पढ़े हुए शरबत को दीवान साहब और उनके साथी पीते हुए “नूरी दरवाज़ा” से बाहर आते हैं।
(रसूमात-ए-फ़रीदी, सफ़ा 46)
बाबा फरीद की ताजपोशी में मदारे पाक
मोहम्मद बशीर अहमद चिश्ती लिखते हैं कि—
“एक मर्तबा जब ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ चिश्ती अजमेरी की मौजूदगी में हज़रत ख़्वाजा क़ुत्बुद्दीन बख़्तियार काकी ने बाबा फ़रीदुद्दीन को दस्तार बाँधी, तो उस महफ़िल में हज़ूर सरकार सैय्यदना बदीउद्दीन अहमद ज़िंदा शाह मदार भी मौजूद थे। जब दस्तारबंदी हो चुकी तो हज़रत शाह मदार ने फ़रमाया: “फ़रीद फ़र्द बाबा! हमें भी याद रखना।”
चुनांचे उसी याद को ताज़ा रखने के लिए बहिश्ती दरवाज़ा की इब्तिदा के वक़्त मिट्टी की छोटी-छोटी प्यालियों में शरबत भरकर हज़रत शाह मदार के नाम का फ़ातेहा दिलाया जाता है।
(रसूमात-ए-फ़रीदी, सफ़ा 52)
इन तमाम बातों से सिर्फ़ यह साबित नहीं होता कि सरकार बाबा फ़रीदुद्दीन गंज शकर रज़ियल्लाहु अन्हु को फ़ैज़ान-ए-मदारिया हासिल है बल्कि यह भी ज़ाहिर होता है कि बाबा फ़रीदुद्दीन मसऊद गंज शकर रज़ियल्लाहु अन्हु के उर्स मुबारक की रसूमात भी बग़ैर ज़िक्र-ए-मदारुल-आलमीन के मुकम्मल नहीं होतीं।
तबलीग़
आप रज़ियल्लाहु अन्हु की नेकी की दावत से हजारों ग़ैर मुस्लिम दौलत-ए-इस्लाम से सरफ़राज़ हुए, गुमराह राह-ए-रास्त पर आये, और सैंकड़ों ने विलायत के दर्ज़े तय किये।
विसाल
आप रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का विसाल 5 मुहर्रम 664 हिज्री मुताबिक़ 17 अक्टूबर 1265 ई को हुआ। आप रहमतुल्लाहि तआला अ़लैह का मजार-ए-पुर-अनवार पंजाब (पाकिस्तान) के शहर पाकपत्तन शरीफ़ में
ज़ियारतगाह-ए-ख़ास ओ आम है।
तहरीर कर्दा:
गुलाम फरीद हैदरी मदारी
(चीफ एडिटर – मदारी मीडिया)








Masha allah bahut achha kaam ho raha ha