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हलब का चाँद

On: मार्च 28, 2026 11:09 पूर्वाह्न
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हलब का चाँद, halab ka chand

पाई जहाँ ने आज हैं दो दो मसर्रतें
एक सो हिलाल ईद है एक सो हलब का चाँद

1 शव्वाल 242 हिजरी मुताबिक 31 जनवरी 857 ईस्वी

857 ईस्वी मुताबिक 242 हिजरी का ज़माना था, रमज़ानुल मुबारक की पुरनूर साअतें थीं, रहमतों बरकतों की बरसात तमाम अहल-ए-हलब बल्कि अहल-ए-शाम बल्कि तमाम काइनात आलम को सेराब फरमा रही थी।
हर तरफ लोग अल्लाह की इबादतों में मसरूफ थे। जहाँ हलब की सरज़मीन रमज़ानुल मुबारक के नूर से पुरनूर थी वहीं मुल्क-ए-शाम के इस अज़ीम शहर हलब की फ़ज़ाओं में एक सफेद रंग का परिंदा उड़ता और एक सदा देता।

या अय्युहन्नास इत्तक़ुल्लाह अल्लाह अल्लाह

और यह सदा एक दिन, दो दिन या तीन दिन नहीं बल्कि पूरा महीना, एक रिवायत में है कि चालीस रोज़ तक एक सफेद रंग का परिंदा उड़ता और यही सदा बुलंद करता और ग़ायब हो जाता। लोग बड़े ही तअज्जुब से इस परिंदे को देखते और उसकी सदा को सुनते लेकिन यह सोचते रहे कि आखिर यह माजरा क्या है।

क्योंकि मुल्क-ए-शाम एक ऐसा अज़मत वाला मुल्क है जिसकी फ़ज़ीलत को रहमत-ए-दो जहाँ क़ासिम-ए-नेमत-ए-खुदा, अफ़ज़लुल अंबिया, सरवर-ए-रसूलाँ हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलेहि वसल्लम ने अपनी ज़बान से बयान फरमाई है।
आप इरशाद फरमाते हैं: अल्लाह की ज़मीन में से उसका इंतिख़ाब शाम की सरज़मीन है और शाम में कई बंदगान-ए-खुदा अल्लाह के पसंदीदा लोग हैं और मेरी उम्मत में एक ऐसी जमाअत भी है जो बग़ैर हिसाब व किताब और अज़ाब व इक़ाब के जन्नत में दाखिल होगी।

सैय्यदना ज़ैद बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: शाम के लिए खुशखबरी है, रहमान के फ़रिश्तों ने उस पर अपने पर फैला रखे हैं।

इसके अलावा रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने मुल्क-ए-शाम में अब्दाल की निशानदेही भी फरमाई, जिसको अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली कर्रमल्लाहु वजहहुल करीम ने कुछ यूँ बयान फरमाया कि:

शरीह बिन उबैद ने कहा कि अहल-ए-शाम का ज़िक्र हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु के सामने किया गया और कहा गया कि ऐ अमीरुल मोमिनीन! शाम वालों पर लानत कीजिए।

हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा नहीं, मैंने रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फरमाते हुए सुना है कि अब्दाल शाम में होते हैं और वह चालीस मर्द होते हैं। जब उनमें से कोई शख्स मर जाता है तो अल्लाह उसकी जगह दूसरे शख्स को मुक़र्रर कर देता है। उनके वजूद व बरकत से बारिश होती है, उनकी मदद से दुश्मनों पर ग़लबा होता है और उन्हीं की बरकत से अहल-ए-शाम से सख्त अज़ाब को दफ़ा किया जाता है। (मिश्कात)

एक दूसरी हदीस में हज़रत इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ख़ियार-ए-उम्मत (उम्मत के नेक तरीन लोग) की तादाद 500 है और अब्दाल चालीस की तादाद में रहते हैं। न पाँच सौ की तादाद कम होती है और न चालीस की।
जब कोई अब्दाल मर जाता है तो अल्लाह तआला पाँच सौ ख़ियार-ए-उम्मत में से किसी एक को मुक़र्रर कर देता है।
यह सुनकर सहाबा ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! उनके आमाल के बारे में बता दीजिए।
आनहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:
वह उस शख्स को माफ़ कर देते हैं जो उन पर ज़ुल्म करता है, उस शख्स के साथ भी नेकी करते हैं जो उनके साथ बुरा सुलूक करता है और अल्लाह तआला उन्हें जो कुछ भी देता है उसके ज़रिये वह फ़ुक़रा व मसाकीन की खबरगीरी करते हैं।
लिहाज़ा अहल-ए-शाम उस परिंदे की सदा को सुनते और आपस में बात करते कि यह माजरा क्या है।

आख़िरकार सन 1 जनवरी 857 ईस्वी मुताबिक 1 शव्वालुल मुकर्रम 242 हिजरी का दिन आया यानी ईदुल फ़ित्र का चाँद नुमूदार हुआ तो हलब के क़ाज़ी शहर, औलाद-ए-रसूल, फ़ख्र-ए-विलायत सरकार सैय्यदना क़ाज़ी सैय्यद क़ुदवतुद्दीन अली हलबी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के दौलत कदे में एक ऐसा चाँद नुमूदार हुआ, एक ऐसा फ़र्ज़ंद-ए-अरजमंद पैदा हुआ जो पैदा होते ही अपने रब की रुबूबियत की गवाही देता हुआ पैदा हुआ, अपने नबी की रिसालत का इक़रार करता हुआ पैदा हुआ।
जब वह पैदा हुआ तो उसने कलिमा-ए-शहादत को पढ़ा और अल्लाह की बारगाह में सज्दा अदा किया।

जिसके पैदा होते ही हज़रत अली हलबी का घर नूर से रोशन हो गया।
नूर की मख़लूक काशाना-ए-अली हलबी में आकर इस नवमौलूद की विलादत की मुबारकबाद पेश करती।
यहाँ तक खुद सरदारुल अंबिया हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलेहि वसल्लम अपने अस्हाब के साथ क़ाज़ी क़ुदवतुद्दीन अली हलबी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के दौलत कदे पर तशरीफ लाए और इस नवमौलूद की विलादत की मुबारकबाद पेश की और इरशाद फरमाया:

ऐ अली हलबी! तुम्हारा यह फ़र्ज़ंद सईद अज़ली वली है और यह औलिया में अज़ीम मरातिब पर फ़ाइज़ होगा। लिहाज़ा इस फ़र्ज़ंद का नाम अहमद बदीउद्दीन रखना। यह एक आलम को नूर-ए-हिदायत से मामूर फरमाएगा और कुफ्र व शिर्क के अंधेरों को मिटाकर ईमान व इस्लाम के नूर से मुनव्वर फरमाएगा।

चुनाँचे हज़रत अली हलबी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने इस नवमौलूद का नाम हुक्म-ए-नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर अहमद रखा और लक़ब बदीउद्दीन। और आप दुनिया-ए-आलम में कुतुबुल मदार, ज़िंदा शाह मदार, ज़िंदान सूफ़, मदार जहाँ, मदार दो जहाँ व मदारुल आलमीन के लक़ब से मशहूर हुए।

अल्लाह पाक हम सब को फ़ैज़ान-ए-कुतुबुल मदार से मुस्तफ़ीज़ फरमाए और आपकी विलादत के इस हसीन मौके पर हम सब पर आपका फ़ैज़ान आम फरमाए। आमीन।

मैं तमाम आलम-ए-इस्लाम को शहंशाह-ए-विलायत, कुतुबुल वहदत, कुतुबुल अक़्ताब, फ़र्दुल अफ़राद, कुतुबुल इरशाद, हामिल-ए-मक़ाम-ए-समदियत, वासिल-ए-मक़ाम-ए-महबूबियत हुज़ूर सरकार सरकाराँ सैय्यदना सैय्यद अहमद बदीउद्दीन कुतुबुल मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की विलादत की मुबारकबाद पेश करता हूँ।

फ़क़त
क़ाज़ी सैय्यद मुहम्मद तौसीक मुनसिफ जाफ़री मदारी
सदर क़ाज़ी शहर मकनपुर शरीफ़

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