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रोज़ा और जदीद साइंस

On: फ़रवरी 21, 2026 4:14 अपराह्न
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रोज़ा और जदीद साइंस

जापान के अज़ीम माहिर-ए-हयातियात Biologist योशि नो‍री ओसूमी Yoshinori Ohsumi इनको सरतान Cancer से हिफ़ाज़त का माक़ूल तरीक़ा तलाश करने पर Nobel Prize in Physiology or Medicine यानी फ़ेलियात और तिब में यह एज़ाज़ मिला था। उन्होंने अपनी Research यानी तहक़ीक़ में वाज़ेह किया कि अगर इंसान हर साल 20 या 25 दिन लग़ातार 14 से 15 घंटे बिना खाए पिए रहता है तो उसके जिस्म में सरतान के मौक़े ना के बराबर होते हैं।

ग़ौर तलब है कि जब हम रोज़ा की हालत में होते हैं तो हमारे जिस्म में Nutrients यानी ग़िज़ायत की कमी हो जाती है। और इस कमी को पूरा करने के लिए हमारा जिस्म अपने ही कुछ हिस्सों Cells को अपनी ख़ुराक बना लेता है। जो Damage हो जाते हैं। या सड़े गले होते हैं। इस Process यानी तरीक़ा कार को उन्होंने Auto Phagy या Self Eating का नाम दिया है। चूँकि हमारा जिस्म मुतास्सिरा हिस्सों को ख़ुद ब ख़ुद खा जाता है। अगर हम सरतान Cancer से निजात चाहते हैं तो हमें चाहिए कि हम रमज़ान अल मुबारक के रोज़ों का एहतिमाम करें।

मासिवा इसके रोज़े से हासिल होने वाले फ़वायद से मुतास्सिर होकर माहिरीन हयातियात ने रोज़े पर ज़बरदस्त तहक़ीक़ की है। रोज़ा इंसान की ज़ेहनी जिस्मानी और रूहानी सलाहियतों पर किस तरह असर अंदाज़ होता है। मिसाल के तौर पर Improvement of Self Control Will Power & ख़ुद पर क़ाबू पाना और क़ुव्वत-ए-इरादी को मुहकम बनाना। दरअसल रोज़े की हालत में इंसान के Brain दिमाग़ के Function बहुत हद तक Improve हो जाते हैं। अगर दिमाग़ के Neurotransmitter यानी (असबी नाक़िल) में कोई In balance हों तो वह भी अपनी असल हालत में आ जाते हैं। जिससे रोज़ेदार में ख़ुद एतमादी और क़ुव्वत-ए-इरादी में इज़ाफ़ा होता है और वह अपनी वह आदात जिनको आम दिनों में छोड़ने से क़ासिर था रोज़े की हालत में क़ुदरत रखता है।

दूसरा बड़ा क़ायदा

Boasting of Immunity रोज़े की हालत में जब इंसान भूख व प्यास की शिद्दत को झेल रहा होता है और जिस्म में ख़ुराक की बिल्कुल कमी हो जाती है तो उसका जिस्म Energy यानी तवानाई को बड़े एहतियात से इस्तेमाल करता है। जिस्म की यह कोशिश रहती है कि तवानाई को महफ़ूज़ रखे। इसका तरीक़ा यह होता है कि जिस्म में पहले से मौजूद Cells Immun है हम जिस्म का मुदाफ़िआती निज़ाम कहते हैं इन सेल्स को बाज़ एहयाई Recycle करता है। ऐसे Immun Cells जिन्होंने हरकत करना बंद कर दी होती है या मफ़लूज हो जाते हैं। जिस्म उनको ख़त्म कर देता है। फिर आहिस्ता आहिस्ता उनकी जगह पर नए Cells बन जाते हैं। जिसका रोज़ेदार को फ़ायदा यह होता है कि उसके जिस्म को तमामतर बीमारियों से लड़ने की क़ुव्वत बहाल हो जाती है।

तीसरा फ़ायदा

Reduction in Blood Sugar हर कस व नाकस वाक़िफ़ है कि जिस्म में शकर की मिक़दार की ज़ियादती को High Blood Sugar कहते हैं जिसकी वजह से Pancreas यह मिदे के क़रीब एक ग़द्दा होता है लबला सा जो ख़ून में Insulin एक हारमोनी माद्दा होता है जो ख़ून में शकर की मिक़दार को मुतादिल रखता है। लिहाज़ा Pancreas को ख़ून में शकर की ज़ियादती की बिना पर insulin ज़्यादा Release करना पड़ती है। जिसकी वजह से वह Exhaust हो जाता है और रोज़ेदार का जिस्म इस ग्लूकोज़ के ज़खीरे को इस्तेमाल करना शुरू कर देता है जो जिस्म में पहले से मौजूद होता है। जिसकी वजह से दौरान-ए-ख़ून Bloodstream में मौजूद ग्लूकोज़ की मिक़दार में कमी वाक़े होती है और Pancreas को insulin कम release करना पड़ती है, उसे आराम मिल जाता है और उसके काम में भी बेहतरी आ जाती है।

चौथा फ़ायदा

Detoxification and Weight Loss इंसानी जिस्म में बहुत सारे Toxins यानी फ़ासिद माद्दे मौजूद रहते हैं जो ख़ुराक के ज़रिया जिस्म में दाख़िल हो जाते हैं और चर्बी के साथ जमा होते रहते हैं। जो जिस्म के लिए नुक़सान का बाइस बनते हैं। जब इंसान रोज़े की हालत में होता है और जिस्म को ख़ुराक कम मिलती है तो जिस्म energy तवानाई को पूरा करने के लिए Fats को Breakdown कर के Energy हासिल करता है और यह फ़ासिद माद्दे Toxins जिस्म से Release हो जाते हैं। जो रोज़ेदार के जिस्म के लिए सेहत बख़्श होते और जिस्म को मुतवाज़िन रखते हैं।

पाँचवाँ फ़ायदा

Restore test Appreciation and Feeling of happiness रोज़ेदार को ग़िज़ाई लज़्ज़त जितनी इफ़्तार में हासिल होती है आम दिनों में नहीं। मज़ीद तहक़ीक़ से यह भी पता चला कि रोज़ेदार के Taste buds यानी ज़बान पर मौजूद ज़ायक़ा चखने वाले ख़लियों के Functions में कसरत से Improvement देखने को मिला है जिसकी वजह से रोज़ेदार लाजवाब ज़ायक़ा का मज़ा लेता है। और जिस्म में मौजूद हारमोन Endorphin की Release बढ़ जाती है और रोज़ेदार अपने को बेहतर महसूस करता है।

इस्लामी नुक्ता-ए-नज़र

जब इस्लाम ने इस अदीम-उन-नज़ीर इबादत से रोशनास कराया जिसमें बेहद व हिसाब नेकी और भलाई का समंदर मोज़ज़न था तो पूरी इंसानियत को सीराब करता चला गया। क्योंकि जब वह रोज़ा रखता है तो वह अल्लाह की शदीद मुहब्बत की ख़ातिर ऐसा करता है। और अपने रब की ख़ुशनूदी के हुसूल की उम्मीद रखते हुए दीन के लिए ख़ुद को वक़्फ़ कर देने का जज़्बा और इस इबादत की तासीर से लुत्फ़ अंदोज़ होता है। रोज़ेदार अपने ज़मीर को मुतमइन करने के लिए ज़ाहिर व बातिन हर तरह बेवफ़ाई या बदअहदी अपने रब से नहीं करता। रोज़े के मामले में ख़ास तौर पर कोई दुनियावी इक़्तेदार ऐसा नहीं है जो रोज़ेदार के इस रवैये पर रोक लगा सके या उसे रोज़ा रखने पर मजबूर कर सके। वह तो सिर्फ़ अल्लाह की मुहब्बत ग़ालिब आ जाने पर ऐसा करता है और अपने रब की ख़ुशनूदी हासिल करता है।

रोज़ेदार को कुछ चीज़ों की आरज़ी महरूमी से तकलीफ़ पहुँचती है मगर सब्र और बेलौसी उसका दामन नहीं छोड़ती। हालाँकि यह महरूमी आरज़ी होती है मगर उन तमाम ऐसे लोगों पर जो हफ़्तों महीनों ज़िंदगी की बुनियादी ज़रूरतों से महरूम रहते हैं उनकी तकलीफ़ के असरात का एहसास दिला देती है। यह एहसास रोज़ेदार को बनी-नौ से हक़ीक़ी हमदर्दी और ज़रूरतों की ख़बरगीरी में हत्ता-उल-इमकान हस्सास बना देता है। यक़ीनन ऐसा शख़्स अपनी ख़्वाहिशात पर क़ाबू पाकर अपनी तबई तरग़ीबात और तहरीसों से अपने आप को बुलंद रख सकता है।

तिब्बी हिदायात, उसूल-ए-सेहत और इंसानी तजरिबात इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि ख़ाली मिदा जो कसरत-ए-ग़िज़ा से बोझल नहीं होता वह इंसान को एक पाकीज़ा रूह और साफ़ ज़ेहन व फ़िक्र मुहैया कराता है। रोज़ेदार जब अपने मिदे को मामूल के ख़िलाफ़ आराम मुहैया कराता है तो रूह का ज़िक्र ही क्या, वह अपने जिस्म को भी उन तमाम नुक़्सानात से महफ़ूज़ कर लेता है जो बिस्यारख़ोरों को अमराज़ व मुज़िरात पेश आते हैं।

रोज़ा इंसान को हकीमाना बजट साज़ी और आमद व ख़र्च का सेहतमंद मीज़ानिया का सही नज़रिया देता है। खाने की तादाद कम हो जाती है, खाना भी कम मिक़दार में खाया जाता है तो कम मेहनत और कम रकम ख़र्च होती है। इसको खानगी इक़्तिसादियात और बजट साज़ी की एक रूहानी मीक़ात कहा जा सकता है और जो नक़्ल व हरकत और मुख़्तलिफ़ आमाल के लिए एक बेहतरीन ज़रिया साबित होता है। और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का रुख़ बदलने में रोज़ेदार की मदद करता है और इसमें मुताबिक़-पज़ीरी का एक हकीमाना एहसास पैदा होता है ऐसा एहसास जो ज़िंदगी में पेश आने वाले ग़ैर मुतवक़्क़े मसाइब पर क़ाबू पा लेने में मुआविन होता है। जो नक़्ल व हरकत और मुख़्तलिफ़ आमाल के लिए एक बेहतरीन ज़रिया साबित होता है।

रोज़ेदार पूरे मुस्लिम मुआशरे के साथ एक ही वक़्त में, एक ही मक़सद के हुसूल के लिए, एक ही तरीक़े से, एक ही फ़र्ज़ की अदायगी से हमकिनार होते हुए मुआशरती रब्त व ताल्लुक़, इत्तेहाद व उख़ुव्वत, अल्लाह और क़ानून के पेशे नज़र मसावात की हक़ीक़ी रूह से बहरा-वर होता है और अपने मक़ासिद में कामयाब होता है। याद रहे कि रोज़ा अल्लाह तआला का तजवीज़ किया हुआ नुस्ख़ा है। इसमें ख़ुद एतमादी और ज़ब्त-ए-नफ़्स, वक़ार और आज़ादी को बरक़रार रखते हुए फ़त्ह व कामरानी और अम्न व आफ़ियत को हासिल करना इनाम में शामिल है। रोज़ेदार एक ज़िंदा हक़ीक़त की हैसियत से अपने इज़हार में कभी नाकाम नहीं होता। क्यों? इसलिए कि जब वह रोज़ा रखता है तो अपने हर अमल पर पूरा क़ाबू रखता है, अपने जज़्बात से मग़लूब नहीं होता, अपनी ख़्वाहिशात-ए-नफ़्सानी को ज़ब्त व नज़्म का पाबंद बना लेता है, तमामतर तरग़ीबात व तहरीसात से मज़ाहमत करता है। नतीजतन रोज़ेदार ख़ुद एतमादी के हुसूल, अपने वक़ार और दियानत की बाज़याबी और तमामतर बुराइयों से निजात हासिल करने की हालत में होता है और अपने रब से तमानियत-ए-क़ल्ब के साथ अपने ताल्लुक़ दुरुस्त करने में कामयाबी व कामरानी हासिल कर लेता है।

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ

ऐ लोगो! जो ईमान लाए हो, तुम पर रोज़े फ़र्ज़ कर दिए गए जिस तरह तुम से पहले अंबिया के पैरवों पर फ़र्ज़ किए गए थे। रोज़ा उतना ही क़दीम है जितनी कि इंसानी मुआशरे की तारीख़। रोज़े को इस्लाम से पहले भी अल्लाह तआला ने अपने बंदों के ज़िम्मे फ़र्ज़ किया था। जिस तरह उम्मत-ए-मुहम्मद ﷺ पर फ़र्ज़ किया गया है। हम यक़ीन के साथ नहीं कह पा रहे हैं कि अल्लाह तआला ने दूसरी अक़वाम पर रोज़े जिस अंदाज़ में फ़र्ज़ किए थे उसकी शक्ल असलन क्या थी। मैं अपने बेहतरीन इल्म की हद तक कह सकता हूँ कि ग़ैर इस्लामी रोज़ा मादी अशिया के जज़्वी इज्तिनाब से ज़्यादा किसी चीज़ का मुतालिब नहीं करता। दूसरे मज़ाहिब, फ़लसफ़ों, नज़रियात और अक़ाइद में रोज़ेदार कुछ अक़्साम की ग़िज़ाओं, मादी अशिया और मशरूबात से मुज्तनिब रहता है। मगर वह इन अशिया की जगह चाहे मिदे को नाक तक भर सकता है। क्योंकि ग़ैर इस्लामी रोज़ा जज़्वी मक़ासिद पर मुश्तमिल होता है, रूहानी मक़ासिद के लिए होता है या जिस्मानी ज़रूरतों के लिए या फिर ज़ेहनी नशोनुमा के लिए। बेक़ वक़्त तमाम मक़ासिद पेशे नज़र नहीं होते। जबकि मुस्लिम रोज़ेदार मादी नौइयत की तमामतर अशिया से परहेज़ करता है और अपने मिदे को हर मादी शै से ख़ाली रखता है ताकि वह अपनी रूह को अम्न व सलामती और बरकात से माला माल करे, अपने क़ल्ब को मुहब्बत और हमदर्दी से, अपने नफ़्स को तक़वा से और अपने ज़ेहन को हिकमत व अज़्म से उरूज बख़्शे।

माह रमज़ान के अलावा और औक़ात भी हैं जिनमें सुन्नत-ए-नबवी ﷺ के मुताबिक़ रोज़ा रखने की ताकीद की गई है मिसाल के तौर पर हर हफ़्ते के दो शम्बा, रमज़ान से पहले के दो माह के चंद अय्याम यानी रजब और शाबान में, ईद-उल-फ़ित्र के बाद छः रोज़े वग़ैरह। कुछ रोज़े ऐसे हैं जिनको रखने से कुछ लोगों को मना किया गया और किस को इनाम के तौर पर दिया गया।
इनमें एक रोज़े की एक क़िस्म है साउम विसाल जिससे बहुत कम लोग आशना हैं जिसके मुतअल्लिक़ हज़रत अबू हुरैरा बयान फ़रमाते हैं कि हुज़ूर नबी करीम ﷺ ने सहाबा किराम को साउम विसाल से मना फ़रमाया तो कुछ सहाबा ने आप ﷺ से अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह ﷺ आप ख़ुद तो साउम विसाल रखते हैं। आप ﷺ ने फ़रमाया तुम में से कौन मेरी मिस्ल हो सकता है? मैं तो इस हाल में रात बसर करता हूँ कि मेरा रब मुझे खिलाता भी है और पिलाता भी है।

मगर हज़रत सैयद अहमद बदिउद्दीन क़ुत्ब-उल-मदार अल-मअरूफ़ ज़िंदा शाह मदार रज़ि अल्लाहु अन्हु को साउम विसाल की नेमत-ए-उज़्मा की इजाज़त अता फ़रमा कर निस्बत ख़ास का महवर बना दिया। याद रखिए बहुत सी नेमतें मुतवारिस होती हैं जो उसके हक़दार को पहुँचती हैं। हज़रत क़ुत्ब-उल-मदार ने 556 बरस तक इस नेमत-ए-उज़्मा को संभाल कर रखा फिर दुनिया को ख़ैरबाद कहा। इतने लंबे अरसे के लिए अल्लाह तआला ने क़ुत्ब-उल-मदार को गोया कि Hibernate कर दिया जिस तरह अस्हाब-ए-कहफ़ को 300 बरस तक एक ग़ार में सुलाए रखा और उन्हें एक रात या उसका कुछ हिस्सा मालूम हुआ उसी तरह क़ुत्ब-उल-मदार को 556 बरस तक जगाए रखा और एक दिन का एहसास हुआ और आप ने फ़रमाया, “दुनिया एक दिन है जिसमें मैं रोज़ेदार हूँ।”

हज़रत मौलाना सैयद इक़्तिदा हुसैन जाफ़री मदारी

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