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बाबा ताजुद्दीन औलिया रज़ियल्लाहु अन्ह

On: जनवरी 7, 2026 5:45 अपराह्न
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पैदाइश – 27 जनवरी 1861 / 5 रजब 1279 हिजरी, कामटी (नागपुर)
वालिद – वालिदा – सैयद बदरुद्दीन रह., मरियम बी साहिबा
नसब – सैयद, नजीबुत्तरफैन
बैअत – ज़ाहिरी बैअत: हज़रत अब्दुल्लाह शाह नोशाही मदारी।
रूहानी बैअत: हज़रत दाउद मक्की चिश्ती साबरी।
निस्बतें: कादिरी, चिश्ती, साबरी, मदारी।
विसाल – 17 अगस्त 1935 / 26 मुहर्रम 1344 हिजरी,
ताजआबाद में विसाल व मदफ़न।

शहनशाह-ए-हफ्ते अकलीम सैयदना बाबा ताजुद्दीन औलिया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु

विलादत

हज़रात! हज़रत सैयदना बाबा ताजुद्दीन की पैदाइश 27 जनवरी 1861 मुताबिक 5 रजब 1279 हिजरी, बरोज़ सोमवार नागपुर के करीब कामटी में हुई जो नागपुर से पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर आबाद है। उन दिनों कामटी में अंग्रेज़ी फ़ौज की छावनी हुआ करती थी। आपके वालिद माजिद जिनका नाम सैयद बदरुद्दीन अलैहिर्रहमा था, फ़ौज में सुबेदार थे।

नसब

सरकार बाबा ताजुल औलिया का सिलसिला-ए-नसब सैयदना इमाम हसन असकरी से मिलता है। आप नजीबुत्तरफैन सैयद हैं। वालिद की जानिब से आपका शजरा-ए-नसब इमाम आलीमक़ाम मौला इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से मिलता है और रिवायत के मुताबिक़ 33 वास्तों से आपका नसब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मिलता है। आप एक (1) साल के थे कि वालिद साहब का इंतक़ाल हो गया।
आपकी वालिदा का नाम मरियम बी साहिबा था जो ज़्यादा दिन ज़िंदा न रह पाईं। जब बाबा ताजुल औलिया की उमर 9 साल हुई तो आपकी शफ़ीक़ वालिदा का भी साया उठ गया। यानी बचपन में ही आप यतीम हो गए और आपकी परवरिश आपकी नानी साहिबा ने की।

तालीम

आपकी इब्तिदाई तालीम कामटी के मदरसे में हुई। 15 साल की उमर तक आपने उर्दू, अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी की तालीम हासिल की। तलब-ए-इल्मी के ज़माने में ही कामटी के मशहूर सूफी बुज़ुर्ग हज़रत अब्दुल्लाह शाह नौशाही मदारी तशरीफ़ लाए। उस वक़्त बाबा ताजुल औलिया अपने उसताद से सबक ले रहे थे। उन्होंने पढ़ाने वाले से मुख़ातिब होकर फ़रमाया: “तू इन्हें क्या पढ़ाता है, ये तो खुदा की जानिब से पढ़े हुए हैं।”
फिर हज़रत अब्दुल्लाह शाह बाबा ने सरकार ताजुल औलिया की तरफ़ बढ़कर अपनी झोली से एक खजूर निकाली और चबा कर आधा हिस्सा बाबा साहब को दे दिया। बाबा ने बेझिझक खा लिया। फिर फ़रमाया: “कम खाओ, कम बोलो, और कुरआन करीम की तिलावत ऐसे करो जैसे रसूलुल्लाह ﷺ करते थे।”

इसके बाद से आपकी हालत बदल गई। आपकी आँखों से अश्क जारी रहे, यह कैफ़ियत तीन दिन-रात तक रही। खेलना-कूदना छोड़ दिया, ख़िल्वत पसंद हो गए, ज्यादातर वक़्त पढ़ने, सोचने और ज़िक्र में गुज़रने लगे।
अरबी-फ़ारसी के अर्बाब-ए-सुख़न व सूफ़िया का कलाम आपका मशग़ला हुआ करता था। रूमी और हाफ़िज़ शीराज़ी के अशआर अक्सर ज़बान पर रहते थे। आप हिंदू-मुसलमान में फ़र्क नहीं करते थे। सब आपके नज़दीक बराबर थे, हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी, दलित, सबको बराबरी की नज़र से देखते थे। हक़ीक़त में आप अपने वक़्त के अम्न के सच्चे रहनुमा थे।

बैअत व इरादत

हज़रात! यूं तो सरकार ताजुल औलिया ने हज़रत ख्वाजा दाउद मक्की चिश्ती साबरी रह. की दरगाह पर मुजाहिदा करके रूहानी बैअत हासिल की, लेकिन जैसा कि आप पढ़ चुके, ताजुल औलिया पर हज़रत अब्दुल्लाह शाह नोशाही का भी ख़ास करम था।
किताब अज़कार-ए-ताजुल औलिया के मुताबिक उनके गद्दीनशीन हज़रत मिस्कीन साहिब बयान करते हैं कि बाबा ताजुद्दीन और उनके पीर भाई हज़रत अब्दुल्लाह शाह नौशाही की बारगाह में हाज़िर हुए। उन्होंने बादाम का शरबत पेश किया, थोड़ा पिया और बाक़ी बाबा ताजुल औलिया को अता कर दिया।
किताब के पेज 151 में लिखा है कि इन हज़रात ने हज़रत अब्दुल्लाह शाह नोशाही के हाथ पर बैअत की थी। हज़रत ज़हूरी बी अम्मां साहिबा ने भी यही बैअत की।

इसके अलावा हाफ़िज़ मलिक मुहम्मद बनारसी लिखते हैं कि बाबा ताजुद्दीन ने हज़रत अब्दुल्लाह शाह से बैअत की थी, लेकिन बाद में साहिब-ए-मुजाहिदा होकर सागर शरीफ में हज़रत दाउद मक्की चिश्ती साबरी से रूहानी बैअत हासिल की। अर्थात: ज़ाहिरी पीर: हज़रत अब्दुल्लाह शाह नोशाही
और रूहानी पीर: हज़रत दाउद मक्की चिश्ती साबरी हैं॥ हज़रत अब्दुल्लाह शाह नोशाही का सिलसिला 16 वास्तों के बाद हज़रत ज़िंदा शाह मदारी रह. तक पहुँचता है:

हुज़ूर सय्यद बदीउद्दीन ज़िंदा शाह मदार रजि.
हज़रत क़ाज़ी मुतह्हर कल्ला शेर रजि.
हज़रत क़ाज़ी हमीदुद्दीन रजि.
हज़रत सैयद शाह राजे रजि.
हज़रत सैयद अब्दुल ग़फूर उर्फ बाबा क़पूर रजि.
हज़रत सैयद शाह इमाम नूरज़ रजि.
हज़रत मीरान सुल्तान शाह भड़ंग रजि.
हज़रत बाबा हाजी लाघरमस्त रजि.
हज़रत चैतन अबदाल रजि.
हज़रत सुल्तान शाह चाँद नायब नूरोज़ रजि.
हज़रत क़ुव्वत अली शाह रजि.
हज़रत अहमद शाह उर्फ गामी शाह रजि.
हज़रत इलाही बख्श शाह उर्फ हस्ते शाह रजि.
हज़रत तीग अली शाह रजि.
हज़रत गेँदे शाह रजि.
हज़रत हीरे शाह रजि.
हज़रत शाह वली मुहम्मद उर्फ अब्दुल्लाह शाह नोशाही मदारी कादिरी, कामटी रजि.
इससे साबित होता है कि सरकार ताजुल औलिया को कादिरी, चिश्ती, साबरी, के साथ मदारी सिलसिले की निस्बतें भी हासिल थीं।

अख़्लाक व आदात

आप अख़्लाक व मुहब्बत के ऐसा समंदर थे कि जो एक बार मिला, आपका ही होकर रह गया। आपके दीवानों में आम लोग ही नहीं बल्कि महात्मा गांधी, जस्टिस हिदायतुल्लाह (पूर्व कार्यवाहक राष्ट्रपति भारत), मुहम्मद अली, शौकत अली, भारत के पहले क्रिकेट कप्तान और अनगिनत बड़ी हस्तियाँ शामिल थीं।

पागलखाना

आपकी करामातों का शोर बहुत फैल गया था। लोग हर वक़्त आपके पीछे रहते, जिससे आप की रियाज़त में खलल पड़ता। आपने फ़रमाया: “हम पागलखाना जाएंगे” और 1892 में आप अपनी मर्ज़ी से पागलखाने चले गए। 16 साल वहां रहे।

करामात

कोठरी में बंद होने के बावजूद बाहर टहलते दिखना, दो जगह एक साथ दिखाई देना, मरे हुए कुत्ते को लात मारकर ज़िंदा कर देना आदि।

विसाल

17 अगस्त 1935 / 26 मुहर्रम 1344 हिजरी ताजाबाद में विसाल हुआ। बाबा साहब ने मुट्ठी भर मिट्टी हाथ में लेकर कहा: “मिट्टी अच्छी है” और यहीं अपनी क़ब्र की जगह पसंद फरमाई। दुआएँ दीं, सब पर नज़र-ए-करम डाली और रुह-ए-पाक परवाज़ कर गई।

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