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क्या मुसलमान विदेशी हैं?

On: फ़रवरी 8, 2026 6:53 अपराह्न
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तमहीदी कलिमात

अक्सर यह इल्ज़ाम लगाया जाता है कि मुसलमान गैर मुल्की हैं और उनके बाप-दादा अरब की सरज़मीन से हिंदुस्तान आए। अगर सिर्फ़ इस बुनियाद पर कि किसी के बाप-दादा बाहर से आए थे, उनकी औलाद को गैर मुल्की क़रार दिया जाए, तो इस मुल्क में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भी गैर मुल्की ठहरते हैं।

आर्यों की आमद और ऐतिहासिक हक़ीक़त

हिंदुस्तानी तारीख़ और हिंदू मज़हबी किताबों से यह बात वाज़ेह होती है कि आर्य असल में हिंदुस्तानी नहीं थे, बल्कि वह कई मरहलों में ख़ुश्की और समुंदरी रास्तों से हिंदुस्तान की सरज़मीन पर आए, और साम, दाम, दंड, भेद की पॉलिसी अपना कर यहाँ क़ाबिज़ हुए।

सरज़मीन-ए-सिंध और उसकी प्राचीन्ता

तारीख़ के औराक़ से यह मालूम होता है कि इस मुल्क को हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के पोते सिंध (बिन हाम बिन नूह अलैहिस्सलाम) ने आबाद किया, और उन्हीं के नाम पर एक ख़ित्ता आबाद हुआ जिसे सिंध कहा गया, जो आज भी मौजूद है।
तेरह सौ साल पहले जिस इलाक़े को सिंध कहा जाता था, वह निहायत विशाल और बड़ा था।
राजा दाहर के दौर-ए-हुकूमत में सिंध का इलाक़ा पश्चिम में मकरान तक। दच्छिन बहर-ए-अरब और गुजरात तक। पूरब में मौजूदा मालवा के वसत तक। उत्तर में मुल्तान से गुज़रता हुआ दच्छिनी पंजाब तक फैला हुआ था। और अरब मोअर्रिख़ीन इस पूरे ख़ित्ते को सिंध ही कहते थे।

यह ख़ित्ता इस क़दर क़दीम है कि यह कहना मुमकिन नहीं कि यह कब से आबाद है और इसके नाम में क्या तब्दीलियाँ आईं। तारीख़ से सिर्फ़ यही मालूम होता है कि जब आर्य हज़ारों साल पहले इस सरज़मीन पर आए तो उन्होंने सिंध का नाम बदल कर सिंधु रख दिया, क्योंकि वह अपनी ज़बान में दरिया को सिंधु कहते थे।
इब्तिदा में वह इस मुल्क को सिंधु कहते थे, लेकिन रफ़्ता-रफ़्ता उसे फिर सिंध कहने लगे, और यह नाम इतना मक़बूल हुआ कि हज़ारों साल बाद भी सिंध ही चलता रहा।

आर्यों की विजयें और नामों की तब्दीली

कहा जाता है कि आर्यों ने जिन जिन इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किया, उन सब को सिंध ही कहा, यहाँ तक कि वह पंजाब की सरहद भी उबूर कर गए, लेकिन नाम तब्दील नहीं किया।
जब वह गंगा के किनारे पहुँचे तो वहाँ रुक कर इस इलाक़े को आर्यवर्त का नाम दिया, मगर यह नाम हिंदुस्तान से बाहर मक़बूल न हो सका।

लफ़्ज़ “हिंद” और “इंडिया” की रचना

ईरानियों ने अपने लहजे में सिंध को “हिंद” बना दिया, और यूनानियों ने को में बदल कर “हिंद” को “अंद” कहा।
रोमी ज़बान में यह लफ़्ज़ “अंद” से “अंड” और फिर “इंडिया” बन गया, क्योंकि अंग्रेज़ी ज़बान में “” नहीं बल्कि “” (D) है।
(इस तरह नूह अलैहिस्सलाम के पोते सिंध के नाम पर आबाद हुआ मुल्क का नाम तब्दील होकर आज एक महदूद सरहदी इलाक़ा ही सिंध कहलाता है।)

प्राचीन निवासी व जात-पात की व्यवस्था

यहाँ के क़दीम बाशिंदे (प्राचीन निवासी) द्रविड़, नाग और असुर जैसे नामों से भी जाने जाते थे।
उन्हें ग़ुलाम और बेबस बना दिया गया, और जात-पात का निज़ाम (व्यवस्था) क़ायम कर के उन्हीं को शूद्र क़रार दे दिया गया।
इसके सुबूत में सब से क़दीम हिंदू मज़हबी व तारीखी किताबों में
ऋग्वेद (वोल्गा से गंगा)
ऋग्वेदिक आर्य (राहुल सांकृत्यायन)
डिस्कवरी ऑफ इंडिया (जवाहर लाल नेहरू)
तारीख़-ए-फ़रिश्ता (मुहम्मद क़ासिम फ़रिश्ता)
ग़ुलामगिरी (महात्मा फुले)
दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला सीरियल भारत एक खोज
किताब देवासुर संगर्श
और जदीद तहक़ीक़ से आरास्ता मसऊद आलम फ़लाही की किताब जात पात और मुसलमान यह तमाम इस बात के शवाहिद फ़राहम करते हैं।

मुसलमानों के बाप-दादा और सरज़मीन-ए-हिंद

जहाँ तक मुसलमानों के आबा (बाप-दादा) के गैर मुल्की होने की बात की जाती है, तो यह दावा खुद ऐतिहासिक तहक़ीक़ के सामने कमज़ोर पड़ जाता है। क़दीम (प्राचीन) रिवायत और बाज़ मुस्लिम इतिहासकार के मुताबिक, सिंध (जिसे बाद के दौर में हिंद कहा गया) को हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की औलाद में से एक शख्सियत सिंध ने आबाद किया। इसके बाद वह कहाँ गए, या उनकी नस्ल किस सूरत में बाक़ी रही, इस बारे में तारीख़ में क़तई और मुत्तफ़िक़ शवाहिद मौजूद नहीं। अलबत्ता यह बात तय है कि इस ख़ित्ते की आबादी न किसी एक नस्ल तक महदूद रही और न किसी एक मज़हब तक। बल्कि यहाँ एकता और मिलनसारी और मेलजोल इस क़दर घुला मिला था जिसकी मिसाल इन शख्सियात के नामों से वाज़ेह है जैसे:
रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी, एक हिंदू थे लेकिन तख़ल्लुस फ़िराक़,
मज़ीद रस खान, रहीम दास, राम प्रसाद बिस्मिल, कबीर दास, देखने या सुनने में यह नाम या तख़ल्लुस मुसलमानों वाले लगते हैं मगर शख्सियत ऐसी थीं कि कोई किसी भी मज़हब का पैरोकार नहीं था और कोई हिंदू मज़हब का पैरोकार था लेकिन नाम और तख़ल्लुस मुसलमानों जैसे थे।

इसी सिलसिले में मशहूर मोअर्रिख़ मुहम्मद क़ासिम फ़रिश्ता अपनी किताब तारीख़-ए-फ़रिश्ता में नूह अलैहिस्सलाम की औलाद के हवाले से कुछ मुक़ामी हुक्मरानों का ज़िक्र करते हैं, जिन में एक नाम राजा सूरज का भी मिलता है। यह बात वाज़ेह नहीं कि यह नाम इब्तिदा ही से यही था या बाद में किसी मज़हबी या तहज़ीबी तब्दीली के नतीजे में इख़्तियार किया गया, लेकिन यह हक़ीक़त अहम है कि मज़हब बदलने के बावजूद नाम बाक़ी रहने की मिसालें क़दीम ज़माने से मौजूद हैं। यानी मुमकिन है कि किसी दौर में मज़हबी पहचान बदली हो, मगर ख़ानदानी या रवायती नाम चलता रहा हो।
हाँ अलबत्ता इस्लाम में दाख़िला पर अच्छा नाम रखा जाता है मगर एशिया की तारीख़ में यह काम एक तरफ़ा नहीं रहा। जैसे कुछ ख़ानदान इस्लाम में दाख़िल हुए मगर उनके गैर मुस्लिम या मुक़ामी नाम बाक़ी रहे, आज भी गुजरात और राजस्थान पंजाब के इलाक़ों में गैर मुस्लिमों के नाम में भी खान, शाह, नज़र आता है इसी तरह कुछ ख़ानदान ऐसे भी मिलते हैं जिन के अजदाद किसी वक़्त इस्लामी तहज़ीब या समाज से वाबस्ता रहे, मगर बाद के ज़माने में मज़हब बदलने के बावजूद उनके नाम या अलक़ाब मुसलमानों जैसे बाक़ी रहे। इससे यह बात वाज़ेह होती है कि एशिया में नाम हमेशा मज़हब की मुकम्मल तरजुमानी (प्रतिनिधित्व) नहीं करते बल्कि वह अक्सर तहज़ीब, इलाक़े, ख़ानदानी रवायत और समाजी तसल्सुल (निरंतरता) का नतीजा होते हैं।

इसी लिये अगर किसी के नाम में इस्लामी रंग पाया जाए तो यह लाज़िमी नहीं कि वह या उसके बाप-दादा गैर मुल्की हों, और न ही यह ज़रूरी है कि मज़हब बदलते ही नाम भी बदल जाए। तारीख़ हमें बताती है कि यहाँ के लोगों ने सदियों तक नाम, रस्म, ज़बान और तहज़ीब को मज़हब से अलग रख कर भी ज़िंदा रखा। यही वजह है कि आज हमें ऐसे नाम मिलते हैं जो बज़ाहिर “मुसलमानों वाले” महसूस होते हैं, मगर उनके हामिल अफ़राद किसी और मज़हब से ताल्लुक़ रखते हैं, और ऐसे मुसलमान भी मिलते हैं जिन के नाम मुक़ामी या गैर मुस्लिम रवायत से जुड़े हुए हैं।
यह सारी हक़ीक़त इस बात की दलील है कि एशिया की पहचान ख़ालिस नस्ली या मज़हबी नहीं बल्कि मुश्तरका (साझा, संयुक्त) तहज़ीबी और तारीखी है, और मुसलमानों को महज़ नाम या मफ़रूज़ा नसब की बुनियाद पर गैर मुल्की कहना या किसी भी इंसान को मज़हब के नाम पर या उसके मज़हबी नाम पर गैर मुल्की कहना न तारीखी तौर पर दुरुस्त है और न इल्मी तौर पर क़ाबिल-ए-क़बूल।

यह मुमकिन है कि जब आर्यों ने सिंध के इलाक़ों पर हमले किये तो बहुत ख़ून बहा, और मुमकिन है कि वह असल बाशिंदे क़त्ल हो गये हों, या इधर उधर हिजरत कर गये हों, या अपना मज़हब तब्दील कर लिया हो।

इस्लाम से पहले की मस्जिदों का प्रश्न

हिंदुस्तान में कुछ ऐसी मसाजिद के शवाहिद (सुबूत) भी मिलते हैं जिन का रुख मस्जिद-ए-अक़्सा की तरफ था, चर्मन पीर दरगाह जबकि छठी सदी ईस्वी से पहले की मसाजिद का रुख मस्जिद-ए-अक़्सा ही की तरफ होता था। यह मसाजिद कितनी क़दीम हैं, इस बारे में हतमी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।

अरबों की आगमन और इब्तिदाई विजयें

सन 637 ई० में उस्मान बिन अबी अल-आस सक़फ़ी ने एक फ़ौजी क़ाफ़िला हिंदुस्तान की तरफ भेजा।
जब हज़रत उमर को इसकी इत्तिला मिली तो आप को सख़्त नाराज़गी हुई (तारीख़-ए-पाक व हिंद)। अमीर मुआविया के दौर में मुहल्लब बिन अबी सफ़रा लाहौर तक आया (तारीख़-ए-पाक व हिंद)। सन 712 ई० में मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध के राजा दाहर सीन पर हमला किया।

मुस्लिम हुक्मरान और हिंदुस्तान

महमूद ग़ज़नवी ने हमले किये, मगर मंदिरों को तोड़ने के इल्ज़ामात दुरुस्त नहीं, और न ही उन्होंने हिंदुस्तान में हुकूमत क़ायम की।
मुहम्मद ग़ोरी के हमलों से मुस्लिम हुकूमत की बुनियाद पड़ी। बाद में आने वाले हुक्मरानों के फ़ौजी अक्सर वापस अपने मुल्कों लौट गये। जो कुछ रह गये, उन्होंने हिंदुस्तानी औरतों से शादियाँ कीं और यहीं के हो कर रह गये।

मुग़ल दौर और आर्थिक विकास

मुग़ल दौर में भारत चीन के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मआशी (आर्थिक) ताक़त था।
आलमी सनअती (वैश्विक औद्योगिक) पैदावार और जी डी पी में इसका हिस्सा 22 फ़ीसद था, जो पूरे यूरोप से ज़्यादा था।

पश्चिमी इतिहास्कार एंगस मैडिसन के मुताबिक,

सन 1700 ईस्वी में औरंगज़ेब के दौर में भारत दुनिया का सबसे अमीर ख़ित्ता था, और विश्व की जी डी पी में इसका हिस्सा 24 फ़ीसद था। मौजूदा (दिसंबर 2025) आलमी मआशियत (वैश्विक अर्थव्यवस्था) में भारत का हिस्सा तक़रीबन 3 से 4 फ़ीसद के दरमियान है यानी जहाँ कभी भारत दुनिया की सबसे बड़ी मआशी (आर्थिक) ताक़त था, आज वह दरमियानी दर्जे की आलमी मआशियत (“वैश्विक अर्थव्यवस्था) शुमार होता है। यह उन इस्लाम मुख़ालिफ़ इतिहास्कार के मुँह पर तमांचा है जो मुसलमानों को लुटेरे और क़ाबिज़ कहते हैं। लक्स वर्मा जैसे गैर मुस्लिम इतिहास्कार ने मुग़ल सल्तनत को एक औद्योगिक टेक्नोलॉजी पर मब्नी सल्तनत क़रार दिया है।

नतीजा: मुसलमान गैर मुल्की नहीं

पूरे मुस्लिम दौर में लोगों ने इज़्ज़त और भाईचारे की वजह से इस्लाम क़बूल किया, और ऊँची जातों के लोगों ने भी इस्लाम क़बूल किया।

अगर मान भी लिया जाए कि कुछ मुसलमान बाहर से आए थे, तो उनकी तादाद निहायत कम थी।
अकसरियत उन्हीं हिंदुस्तानियों की थी जिन्होंने इस्लाम के अख़लाक़ और भाईचारे को देख कर उसे क़बूल किया।
लिहाज़ा मुसलमानों को गैर मुल्की कहना सरासर ग़लत है।
आज़ाद हिंदुस्तान में जो भी इस मुल्क का शहरी है, वह हिंदुस्तानी है चाहे वह ब्राह्मण हो या शूद्र, मुसलमान हो या सिख, ईसाई हो या कोई और अगर तअस्सुब की बुनियाद पर मुसलमानों को गैर मुल्की कहा जाता है, तो तारीखी बुनियाद पर आर्यों को गैर मुल्की कहना ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है।
जिन के घर शीशे के हों, वह दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते।

इस लेख की तैयारी में अनेक प्रामाणिक लेखों से सहायता ली गई है, और विशेष रूप से राम सरन पवन जी की पुस्तक से।

तहरीर : हाफ़िज़ ग़ुलाम फ़रीद मदारी

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