यकम शव्वालुल मुकर्रम (बरोज़ ईद)
विलादत क़ुत्बे मदार के पुर मस्रत मौक़ा पर ख़ुसूसी पेशकश
तजल्ली ए मेहरे विलायत का दिन है
मदारे जहाँ की विलादत का दिन है
दिल हर मोहिब्बे विलायत है शादाँ
मुनाफ़िक़ को यह दिन क़यामत का दिन है
किसी का भी दामन रहेगा न खाली
अदीब आज का दिन सख़ावत का दिन है
दुनिया का हसीन तरीन ख़त्ता ए अर्ज़ी (शाहकारे कुदरत) पहाड़ों की बुलंद चोटियों से सजा उछलती कूदती नदियों के पुरकैफ़ नज़ारों के मनाज़िर से हसीन तर आबशारों के दिलकश और दिलफ़रेब नज़ारों से मुअज़्ज़न और ज़मीन के नशीब व फ़राज़ बर्रे आज़म बरसग़ीर यूरोप व एशिया अरब व अज़म में आबाद तक़रीबन दो सौ ममालिक लाखों लाख क़रियात व क़स्बात में घने और बुलंद क़ामत दरख़्तों के साये में आबाद जन्नत निशाँ एक छोटा सा क़स्बा चुनार बड़ा दिलकश, हसीन व ख़ूबसूरत जैसे सन्ना-ए-आलम ने तमाम तर रानाइयाँ इसी के मुक़द्दर में सब्त फरमा दी हों चुनार के दामन में तारों की बारात माँग में कहकशाँ का सिंदूर घनेरे दरख़्तों के साये ज़ुल्फे वल्लैल का सदक़ा फूलों की शबाहत व रंगत! अल्लाह अल्लाह
बागे मदीना की भीनी भीनी महक ने ख़ारों पर इत्तरबेज़ी का काम किया मज़हरे अर्ज़े तैय्यबा पर हर तरफ़ रौनक़ व ख़ूबसूरती है वैसे भी सुबह ईद की आमद आमद का डंका अहले ईमान की बस्तियों में बज रहा था जिसकी धमक से कुफ्र व इल्हाद के बुलंद व बाला क़िलों की फ़सीलें दरें खा गईं अक्से मदीना से ताबिनदा, मुनव्वर, दरख़्शाँ, क़स्बा चुनार में आज इतनी रौनक़ थी कि मज़हरे शबे विलादते मुस्तफ़ा बना हुआ था माहे रमज़ानुल मुबारक की अलविदा अलविदा थी मतला-ए-अफ़लाक व अनवार पर ईदे सईद के चाँद की नमूद ने अहले ईमान को अपनी ज़ियारत कराके चेहरों पर आसार ताज़गी आँखों को नूर दिलों को सुरूर बख़्शा ख़ासाने ख़ुदा की जमाअतों में इतना तुरब, इतनी शादमानी, इतनी मस्रतें थीं जिससे बज़्मे विलायत में नैरंगियाँ झलक रही थीं
हसबे मामूल इमामुल अस्फ़िया, ख़ासे किब्रिया, सैयदुत ताइफ़ा, सुकूने अहले तक़ा, तर्रे ताजे सालिहीन, क़ुत्बुल अक़ताब हज़रत सैयदना सैयद अली हलबी दिलबंदे ज़हरा हसनी हुसैनी जाफ़री ने नमाज़े इशा अदा फ़रमाई और हसबे मामूल मुसल्ले पर मामूलात में मशग़ूल हो गए मुराक़बा करते करते आँख लग जाती है आँखों के नसीबे पर कौनेन के नसीबे तसद्दुक होने लगते हैं सैयदे आलम व आलमियान नाज़िशे अंबिया व मुरसलीन फ़खरे इब्राहीम व आदम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम चार यार के साथ तशरीफ़ लाते हैं और फ़रमाते हैं कि ऐ अली अपनी क़िस्मत पर नाज़ कर आज मैं तुम्हें एक सईद बेटे की बशारत सुनाता हूँ जो अज़ली वली होगा और मेरा फ़रज़ंदे मअनवी होगा उसका नाम मेरे नाम पर अहमद रखना सैयदे कौनेन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तो बशारते उज़्मा और मुज़्दा-ए-जानफ़ज़ा सुना कर चले गए उधर हज़रत क़ाज़ी किदवतुद्दीन अली अल हलबी बेदार हो जाते हैं
विलादत बासआदत
सरकार क़ाज़ी सैयद किदवतुद्दीन अली हलबी देखते क्या हैं जैसे सितारे अंजुमन दर अंजुमन उतर कर बोसे ले रहे हों और कुछ वापस हो रहे हों पूरी रात यह सिलसिला जारी रहा नमाज़े तहज्जुद अदा फ़रमाई निदाए ग़ैबी आई ऐ अली हलबी अपने नसीबे की अर्ज़मंदी पर नाज़ कर तीन बार यह आवाज़ आई फिर मोअज़्ज़िन ने अल्लाहु अकबर की सदाओं से फ़ुज्जार की दीवारों पर शिकाफ़ डाल दिए
उधर मोअज़्ज़िन ने तकबीर के कलिमात अदा किए इधर एक ऐसी ज़ात आई जिसने क़ुलूब की कुर्सियों पर क़ब्ज़ा किया ऐसी ज़ात आई जो रौनक़े बज़्मे जहाँ बनी ऐसी ज़ात आई जो रौनक़े बज़्मे अहले वफ़ा बनी ऐसा अजीबुल अहवाल आया कि दूर से देखने वाले क्या क़रीब से देखने वाले अंगुश्त बदंदाँ रह जाते कि यह है कौन जिसे आरिफ़ीने हक़ भी न समझ पाए
यानी मुक़तदाए औलिया, ख़ासे कब्रिया, पेशवाए अस्फ़िया, शाहबाज़े आसमाने विलायत व करामात, शहसवारे मैदान सख़ावत व क़नाअत, हादी ए शरीअत, साक़ी ए जामे तरीक़त, मुअल्लिमे राज़े हक़ीक़त, वाक़िफ़े अस्रारे हक़ीक़त, ग़व्वासे बहरे मआरिफ़त, मौरिदे फ़ुयूज़े इलाही, पैकरे अख़लाके मुस्तफ़ा, वारिसे औसाफ़े मुर्तज़ा, क़िदवतुल कामिलीन, उम्दतुल आरिफ़ीन, रहबरे दीन, क़िब्ला ए अहले यक़ीन, सुल्तानुल आरिफ़ीन, सैयदुस सालिकीन, इमामुल औलिया, शहनशाहे विलायत, क़ुत्बे वहदत, हामिले मक़ाम समदियत, वासिले मक़ामे महबूबियत, शम्सुल अफ़लाक, क़ुत्बुल अक़ताब, क़ुत्बुल इरशाद, मरजअुल औताद, क़ुत्बुल मदर, ज़िंदान सौफ़, ज़िंदा शाह मदार, ज़िंदा मदार, शाहे वाला, शाहे कौनेन, हज़रत सैयद बदीउद्दीन शैख़ अहमद मदारुल आलमीन रज़ियल्लाहु अन्हु ने क़दमे नाज़ जब आग़ोशे मादर में पसारे तो दुनिया के तमाम ऐश व तुर्ब उनके दर पर खड़े ख़ैरात माँगने लगे
मादरी नसब नाम
सैयदा फातिमा सानिया उर्फ फातिमा तबरेज़ी दुख़्तर सैयद अब्दुल्लाह इब्न सैयद ज़ाहिद इब्ने सैयद अबू मुहम्मद इब्ने सैयद अबू सालेह इब्ने सैयद अबू यूसुफ इब्ने सैयद अबुल क़ासिम इब्ने सैयद अब्दुल्लाह महज़ इब्ने हज़रत सैयद हसन मुसन्ना इब्ने इमामुल आलमीन हज़रत सैयद इमाम हसन अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली करमल्लाहु वजहहुल करीम रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन।
पैदाइश के वक्त करामात का ज़ुहूर
आप जब शिकमे मादर से इस जहाँ में जल्वा बार हुए तो रुए अनवर की ताबानी से वह मकान जगमगा उठा
हज़रत इदरीस हलबी जो एक साहिबे कश्फ़ व करामत बुज़ुर्ग हैं रिवायत फरमाते हैं कि हज़रत क़ुत्बे मदार रज़ियल्लाहु अन्हु, जब इस आलमे गेती को अपने क़ुदूम मैमुनाते लुज़ूम से मुशर्रफ फरमाया तो रूहे पाक हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम जुमला असहाबे किराम व अइम्मा ए अतहार के साथ अली हलबी के घर में जल्वा अफ़रोज़ हुए और सैयद अली हलबी और फातिमा सानिया को सईद बेटे की विलादत की मुबारकबाद दी और हातिफ़े ग़ैबी से निदा हुई -हाज़ा वलियुल्लाह हाज़ा वलियुल्लाह-
का मुज़्दा सुनाया बारगाह लायज़ाल ने अपने लौहे दिल पर इन मुबश्शिरात को नक़्श कर लिया और आप सईदे अज़ली क़रार दिए गए।
तालीम व तरबियत
जब सरकार मदार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की उम्र शरीफ चार साल चार महीना और चार दिन की हुई तो सल्फ़े सालिहीन की सुन्नत के मुताबिक वालिदे गिरामी ने आपको बिस्मिल्लाह ख्वानी के लिए क़ुत्बे रब्बानी शैख़े वक्त हज़रत हुज़ैफ़ा मरअशी (शामी मुतवफ़्फ़ी 276 हिजरी) की ख़िदमत में पेश किया। उस्तादे मुहतरम ने फरमाया पढ़ो अलिफ़ मगर सरकारे मदार ने अलिफ़ पढ़ने के बजाय अलिफ़ की तशरीह बयान करना शुरू कर दी और मुतवातिर एक हफ्ता तक अलिफ़ की तशरीह फरमाते रहे तो आपके उस्तादे मुहतरम बेइख़्तियार पुकार उठे –हाज़ा वलियुल्लाह हाज़ा वलियुल्लाह हाज़ा वलियुल्लाह– जब आपकी उम्र शरीफ 14 साल की हुई तो इब्तिदाई तालीम से लेकर जुमला उलूमे दीनिया उलूमे अक्लिया व नक्लिया हासिल कर लिए हाफ़िज़े कुरान मजीद होने के साथ साथ आप तमामी आसमानी किताब ख़ुसूसन तौरात ज़बूर इंजील के भी हाफ़िज़ व आलिम थे-(तज़किरतुल कराम तारीख़ ख़ुलफ़ाए अरब व इस्लाम)
हज़रत मख़दूम अशरफ़ जहाँगीर सिमनानी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि बअज़ उलूम नवादिर मिस्लन हीमिया, सीमिया, कीमिया और रीमिया में कामिल दस्तरस रखते थे-(लताइफ़ अशरफ़ी फ़ारसी, पृ 354, मतबूआ नस्रतुल मताबे दिल्ली)
बैअत व ख़िलाफ़त
ज़ाहिरी उलूम से फ़राग़त के बाद जज़्बा शौक़ ने ज़ियारते हरमैन शरीफ़ैन के लिए क़दम बढ़ाया। वालिदैन करीमैन से इजाज़त तलब की और आज़िमे मक्का मुकर्रमा और मदीना मुनव्वरा हो गए। जब वतन से बाहर निकले तो मंशाए कुदरत ने हरीमे दिल से सदा दी कि ऐ बदीउद्दीन! सहने बैतुल मुक़द्दस में तुम्हारी मुरादों का कलीद लिए हुए सरगिरोहे औलिया हज़रत बायज़ीद बुस्तामी सरापा इंतज़ार हैं आप ने अज़्म के रहवार को बैतुल मुक़द्दस की तरफ मोड़ दिया
पीछे मुड़ कर देखा तो कोई नहीं दिखा चलते चलते ठहर गए आवाज़ बराबर आ रही थी पहले बैतुल मुक़द्दस जाओ बायज़ीद बुस्तामी तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं सिम्ते मक्का से सिम्ते बैतुल मुक़द्दस रुख मोड़ लिया क़ल्ब की अजीब कैफ़ियत थी पहले से ज़्यादा अब नाज़ुक तर था अब नाज़ुकी उनके दिल की न पूछे एक तलातुम ख़ेज़ तूफ़ान था जो थमने का नाम नहीं लेता एक कारवाने शौक़ है जो पड़ाव नहीं चाहता एक इंतज़ार था जो और बढ़ गया लेकिन शीरीं और बाक़ार पर रौब आवाज़ ने नाचर कर दिया अब बजाए मक्का के बैतुल मुक़द्दस की तरफ रुख करना ही पड़ा जैसे तैसे रास्ता तय किया और यह राहे तैय्यबा मस्जिदे अक्सा के सहन में पहुँचा आवाज़ आई आओ मेरे लाडले मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ आने वाले के क़दम क्या पड़े उसकी आमद का मुन्तज़िर मस्नदे इंतज़ार के नशीन की हैरत व इस्तिअजाब के सारे बंद टूट जाते हैं एक नज़र आने वाले को देखता है दूसरी नज़र सहने बैतुल मुक़द्दस पर डालता फिर फरमान जारी करने में देर नहीं लगाई कि ऐ बदीउद्दीन तुम्हारे आने से पहले मैं यहाँ नूर का एक स्तंभ देखा करता आज तुम्हें देखा तो मालूम हुआ कि वह नूर का स्तंभ तुम ही हो आओ तुम मेरी मुराद हो क़ुत्बे मदर आगे बढ़े बायज़ीद पाक बुस्तामी ने आगे बढ़ कर सीने से लगा लिया और इरफ़ाने इलाही के सारे हिज़ाबात मुनकशिफ़ होते चले गए









