इस्लामी विधिशास्त्र सामाजिक धार्मिक जीवनी

भारत की स्वतंत्रता में मदारियों की भूमिका

On: फ़रवरी 8, 2026 7:32 अपराह्न
Follow Us:
Role and participation of Madariya saints in Indian independence.

इकहत्तर (71वाँ) जश्न-ए-यौम-ए-आज़ादी के मौक़े पर
18 अगस्त, 2017

उठे जो हाथ कोई इज़्ज़त-ए-वतन की तरफ़
वो हाथ काट दो, कुछ भी न तुम मलाल करो
न छूने पाए वो हिंदुस्तान का दामन
वतन-परस्ती में दुश्मन का ऐसा हाल करो

आज हमारे देश में 71वाँ जश्न-ए-यौम-ए-आज़ादी मनाया जा रहा है।
आज़ादी का लफ़्ज़ जैसे ही ज़ेहन के पर्दे पर आता है, तो दारुलनूर मकनपुर शरीफ़ के उन मज़लूम सैयदज़ादों के ज़ुल्म की ज़ंजीरों में जकड़े हुए जिस्म, तड़पते-बिलखते चेहरे, जलते घर, राख के ढेर में तब्दील हुए छप्पर, रोते-सिसकते यतीम शहज़ादों के गालों पर तमांचों के निशान, नर्म-नाज़ुक जिस्मों पर ताज़ियानों से खिंची खाल पर ख़ून-आलूद बर्तनों का तसव्वुर हाशिये-ए-ख़याल में जन्म लेने लगता है।
मज़लूम कर्बला के वे मासूम बच्चे जिन्हें पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसाया गया।
किसी का सलीब व दार पर इस्तक़बाल किया गया, तो कोई गोलियों से छलनी कर दिया गया, किसी को काले पानी की सज़ा सुनाई गई, तो किसी को नज़र-ए-आतिश किया गया।

कौन-सा वह ज़ुल्म था जो क़ुत्ब-ए-मदार के शहज़ादों पर नहीं ढाया गया।
मकनपुर शरीफ़ में मातम का शोर बरपा था।
जब इंसानी ख़ून से उनकी प्यास न बुझी, जब घर जलाने और बस्ती वीरान करने से उनके नापाक जज़्बात-ए-दिल को तस्कीन न मिली, तो अब वे दरिंदा-सिफ़त लोग ख़ानक़ाह-ए-क़ुत्ब-ए-मदार की जानिब बढ़े। ख़ानक़ाही लाइब्रेरी को नज़र-ए-आतिश कर दिया।
मुक़द्दस मक़ामात की बेहुरमती की। हज़रत ख़्वाजा सैयद अबू मुहम्मद अरग़ूँ जानशीन-ए-अव्वल क़ुद्दिस सिर्रहू द्वारा क़ायम किया गया मदरसा मदार-उल-उलूम खंडहरात में तब्दील कर दिया। बादशाह इब्राहीम शर्क़ी जौनपुरी का नज़र किया हुआ कोह-ए-नूर हीरा रौज़ा-ए-मुक़द्दसा से उतार ले गए और और भी नायाब व क़ीमती अशिया लूट लीं।

यह नफ़रत, तअस्सुब और फ़सादात की आग सिर्फ़ मकनपुर शरीफ़ में ख़ानक़ाह-ए-क़ुत्ब-ए-मदार और शहज़ादगान-ए-मदार ही तक महदूद न थी और न यहीं ठंडी हुई।
बल्कि यह आग फैलते-फैलते पूरे मुल्क में जहाँ-जहाँ मदारिया ख़ानक़ाहें मिलीं, मदारिया चिल्ले मिले, मदारिया तकिए मिले, मदारिया गद्दियाँ मिलीं, मदारिया निशान मिले, मदारिया मशाइख़, मदारिया उलेमा व सादात-ए-मकनपुर मिले, मलंग व फ़क़ीर मिले—सब को जलाकर ख़ाकस्तर कर दिया गया।
अवाम से मदारियों को ढूँढ-ढूँढकर क़त्ल किया गया।

अगर आप पूछें कि सिलसिले और भी थे, ख़ानक़ाहें और भी थीं, मदरस व मक़ातिब और भी थे, उलेमा व मशाइख़ और भी थे—
मगर सिलसिला-ए-मदारिया ही को निशाना बनाकर सफ़्हा-ए-हस्ती से उसका वजूद क्यों मिटाया जा रहा था और अंग्रेज़ सिलसिला-ए-मदारिया का नाम-ओ-निशान क्यों ख़त्म करना चाहते थे?
तो इस सवाल पर मैं इतना कहूँगा कि—

मेरे अज़ीज़!!!
जब इस देश पर ज़ालिम क़ाबिज़ हुए तो अपने मश्क-ए-सितम का निशाना बनाने के लिए बिला-तफ़रीक़ मज़हब-ओ-मिल्लत, इंसान—चुने गए “हिंदुस्तानी इंसान”।
और जब इंसानियत दरिंदगी के नए नुकीले दाँतों से फाड़ी और नोची जाने लगी, जबरन किसानों और दस्तकारों की अशिया अपनी मुक़र्रर की हुई क़ीमतों पर ख़रीदी जाने लगीं, और किसानों व दस्तकारों को किसी दूसरे के हाथ अच्छी क़ीमत पर फ़रोख़्त करने पर कोड़े मारे जाने लगे, ज़िल्लतें दी जाने लगीं—
तो तोपों के दहानों से, गोलियों के निशानों से, मौत के ठिकानों से
मुल्क के बाशिंदों को बचाने और राहत दिलाने के लिए हथेली पर जान लेकर और कफ़न-बर्दोश होकर जो मर्दान-ए-मुजाहिदीन आगे बढ़े थे, वे सिलसिला-ए-मदारिया के वाबस्तगान थे।

तहरीक-ए-आज़ादी की बुनियाद सबसे पहले अगर किसी ने रखी थी,
तो वह आज़ादी के मुजाहिद-ए-अव्वल
हज़रत बाबा मजनूँ शाह मदारिया मलंग थे, जो अंग्रेज़ों से जंग के पहले हीरो थे।

1786 में ज़ख़्मों से चूर होकर मकनपुर शरीफ़ आए तो
यहाँ तीन अंग्रेज़ भाइयों की नील की कोठी थी।
आपको इस सरज़मीन पर उनका वजूद ठंडी आँखों न भाया।
चूँकि सादात-ए-मकनपुर शरीफ़ की सरपरस्ती हासिल थी, इसलिए आपने हज़रत सैयद रूह-उल-आज़म मियाँ जाफ़री मदारिया अलैहिर्रहमा वल-रिज़वान को साथ लेकर उन तीनों अंग्रेज़ भाइयों में से एक “पीटर मैक्सवेल” को क़त्ल कर दिया।
जब यह ख़बर अंग्रेज़ी हुकूमत तक पहुँची तो उसने मकनपुर शरीफ़ पर चढ़ाई कर दी और इस बस्ती को बर्बाद कर दिया।

मुजाहिद-ए-अव्वल हज़रत बाबा मजनूँ शाह मलंग मदारी

हज़रत बाबा मजनूँ शाह मदारिया मलंग 1733 ईस्वी में इस ख़ाकदान-ए-गीती पर रौनक़-अफ़रोज़ हुए।
अहद-ए-शबाब में मंसब-ए-ख़िलाफ़त से सरफ़राज़ होकर सिलसिला-ए-दीवानगान-ए-सुल्तानी की क़ियादत संभाली।
आपके (रश्दी) मोरिस-ए-आला “हज़रत सुल्तान हसन दीवान मदारिया”
को उनके अहद में “शाह शुजाअ” ने तबलीग़ी व इशाअती असफ़ार के लिए कुछ मरआतें दी थीं।
उस ज़माने की एक सनद-ए-मुहर्ररा 1659 ईस्वी राज-शाही के दफ़्तर में मौजूद है, जिसमें शाह शुजाअ ने हज़रत सुल्तान हसन दीवान मदारिया को इख़्तियार दिया था—

दफ़ा अव्वल: –
तुम जब कभी लोगों की हिदायत या सैर-ओ-सियाहत के लिए शहरों, देहात, अज़लाअ और जहाँ कहीं अपनी ख़ुशी के मुताबिक़ जाना चाहो, तुम्हें इख़्तियार है कि जलूस का सारा साज़-ओ-सामान मसलन अलम, झंडे, पहरेरे, बाँस, असा, डंका, माही, मरातिब अपने साथ ले जाओ।

दफ़ा चहारुम: –
जब तुम मुल्क के किसी हिस्से में जाओ तो मालिकान-ए-देह और काश्तकार तुम्हें अशियाए-ख़ुर्दनी मुहैया कराने का बंद-ओ-बस्त करेंगे।

हज़रत बाबा मजनूँ शाह मदारिया मलंग अपने मोरिस-ए-आला हज़रत शाह सुल्तान हसन दीवान मदारिया के नक़्श-ए-क़दम पर चलते हुए माही, मरातिब, डंका और निशान (अलम) के साथ शाहाना करो-फ़र से तबलीग़-ओ-रश्द-ओ-हिदायत के लिए उड़ीसा, बिहार और बंगाल के इलाक़ों में तशरीफ़ ले जाया करते थे।
और अवाम—हिंदू-मुसलमान—सब बिला तफ़रीक़ मज़हब-ओ-मिल्लत उनसे अकीदत रखते थे और उनका एहतराम करते थे।

यही वजह है कि अंग्रेज़ों के जब्र-ओ-इस्तिब्दाद के ख़िलाफ़ बिला किसी ख़ौफ़-ओ-दहशत के उन्होंने
1763 में सबसे पहले आज़ादी की तहरीक की बुनियाद रखी। और रफ़्ता-रफ़्ता इस तहरीक में तरक़्क़ी हुई तो 1766 में मैकनीज़ी को फ़ैसला-कुन शिकस्त दी।
1769 में कमांडर कैथ की फ़ौज को ज़बरदस्त शिकस्त देकर उसका भी सर-क़लम किया।
और 1770 में बाक़ायदा मलंगों और मदारिया फ़क़ीरों के अलावा दीगर बरादरान-ए-वतन की एक जमाअत लेकर बंगाल से बिहार में दाख़िल हुए।
कई महीनों तक वे शुमाली बंगाल के मुख़्तलिफ़ अज़लाअ और ज़िला ढाका में परचम-ए-जिहाद बुलंद करते रहे।
1771 में लेफ़्टिनेंट टेलर की फ़ौज भी शिकस्त खाकर भागी।
1772 में हज़रत बाबा मजनूँ शाह मदारिया मलंग ने नाटोर की रानी भवानी को एक ख़त सौंपा, जिसमें मुल्क की फ़लाह-ओ-बहबूद की तरजुमानी की हलफ़िया बात लिखी थी और इस मक़सद-ए-अज़ीम के लिए
“हर ज़ुल्म गवारा है” का मफ़हूम पेश करके उनसे मदद माँगी थी।

कई अंग्रेज़ कंपनियों ने कई छावनियाँ इन मुसल्लह फ़क़ीरों और सन्यासियों से नबरद-आज़्मा होने के लिए तैयार कीं, लेकिन बाबा उनके लिए छलावा बने हुए थे। अंग्रेज़ अपने मक़सद में कामयाब नहीं हो पा रहे थे और बाबा मजनूँ शाह भी अपनी इस तहरीक से पीछे-बाज़ न आते थे। अपने मुरीदीन व ख़ुलफ़ा की एक जमाअत जैसे—
करम अली शाह मदारिया, मोमिन अली शाह मदारिया, चिराग़ अली शाह मदारिया, ज़ुहूरी शाह मदारिया, मतीउल्लाह शाह मदारिया, फ़रख़ंद शाह मदारिया, ईसा शाह मदारिया, मूसा शाह मदारिया, बुद्धू शाह मदारिया, पीर गुल शाह मदारिया, नक्कू शाह मदारिया, उमूमी शाह, नूर-उल-हमद शाह मदारिया, व ग़ैरहुम—
को लेकर सबसे पहले आज़ादी का बिगुल बजाया और मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों—उड़ीसा, बंगाल, बिहार, असम, अवध, कर्नाटक, आंध्र और पूरे देश—से गुलामी की ज़ंजीरों को काटने के लिए शहर-शहर, गाँव-गाँव में आज़ादी का परचम लहराया।

1776 में फ़िरंगियों को एक और शिकस्त दी, जिसमें लेफ़्टिनेंट रॉबर्टसन भी शदीद तौर पर मज़रूह हुआ।
तारीख़ 29 दिसंबर 1786 में लेफ़्टिनेंट बर्मन की फ़ौज पर हमला किया।
बिलआख़िर इस मर्द-ए-मुजाहिद-ए-वतन को 1787 में गोलियों से छलनी कर दिया गया और मदार का यह शेर ज़ख़्मी हो गया। तो उसे वस्ल-ए-हक़ीक़ी का एहसास-ओ-इरफ़ान हुआ।
उसने मुरीदीन व मुतअल्लिक़ीन को वसीयत की—फ़रमाया कि मुझे मकनपुर शरीफ़ ले चलो और मेरी तदफ़ीन वहीं अमल में लाना।
तीन शबाना-रोज़ के बाद जब आप मकनपुर शरीफ़, आस्ताना-ए-क़ुत्ब-ए-मदार पर हाज़िर हुए तो ज़ख़्मी हालत में भी हज़रत सैयद रूह-उल-आज़म मियाँ को साथ लेकर एक अंग्रेज़ को वासिल-ए-जहन्नम कर दिया।
इसके बाद आपकी रूह क़फ़स-ए-अनसरी से परवाज़ कर गई और आप वासिल-ब-हक़ हो गए।

आपका आस्ताना-ए-आलिया मकनपुर शरीफ़ में मरजअ-ए-ख़लाइक़ है,
जो “मजनूँ शाह की गढ़ी” के नाम से मशहूर है।

मजनूँ शाह ने शुजाअत दिखाई,
अपनी हस्ती वतन पर लुटाई।
याद में उनकी महफ़िल सजाएँ,
जश्न-ए-आज़ादी हम सब मनाएँ।

हवाला:
रूद-ए-कौसर, हिस्ट्री ऑफ़ द फ़्रीडम मूवमेंट ऑफ़ इंडिया

हज़रत अहमदुल्लाह शाह मदारिया मद्रासी

1857 के पहले मुजाहिद-ए-आज़ादी अगर हज़रत अहमदुल्लाह शाह मद्रासी को कहा जाए तो सौ फ़ीसद दुरुस्त होगा। आप 1203 हिजरी में इस दुनिया में तशरीफ़ लाए।

वालिद-ए-मुहतरम मुहम्मद अली शाह ने ख़ानदानी रस्म-ओ-रिवाज के मुताबिक़ परवरिश फ़रमाई।
चूँकि आप ख़ानदानी अमीर व रईस थे, आपके दादा मुहतरम सैयद जलालुद्दीन आदिल, फ़रमां-रवाए-गोलकुंडा सैयद क़ुत्ब अली शाह की यादगार थे।

तालीम व तरबियत के बाद तसव्वुफ़ की तरफ़ तबीयत माइल हुई और दादा मुहतरम सैयद जलालुद्दीन आदिल से टीपू सुल्तान का तख़्त व ताज लुटने का वाक़ेआ सुना तो तबीयत बिल्कुल मुझ्महिल हो गई और सब कुछ छोड़कर सियाहत इख़्तियार कर ली।
टोंक (राजस्थान) पहुँचे, टोंक से आप जयपुर गए। हज़रत सैयदना मिहराब अली शाह क़लंदर मदारिया का चर्च़ा सुना तो इक्तिसाब-ए-फ़ैज़ के लिए आप ग्वालियर पहुँचे।

पीर-ओ-मुर्शिद सैयद मिहराब अली शाह क़लंदर मदारिया की ख़िदमत में पहुँचे और बैअत के लिए अर्ज़ किया।
पीर-ओ-मुर्शिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाया—
“अहमदुल्लाह शाह! इस शर्त पर मुरीद करूँगा कि तुम मुल्क को अंग्रेज़ों से आज़ाद कराने का वादा करो, तो बैअत करूँगा।”

अल्लाहु अकबर! यह है सिलसिला-ए-मदारिया की क़ुर्बानियाँ।
मुरीद अपने अहद में सच्चा, पक्का, सादिक़ था। फ़ौरन शर्त मंज़ूर कर ली और बैअत होने के बाद आज़ादी का बिगुल बजा दिया और 1857 की जंग का आग़ाज़ कर दिया।

पूरे मुल्क में आज़ादी की तहरीक चला कर, आप जब बुंदेलखंड में राजा पोआँई से तआवुन लेने के लिए बुंदेलखंड आए—
अगर राजा पोआँई तआवुन के लिए तैयार हो जाता तो शाह मदारिया साहब को साँस लेने का मौक़ा मिलता, मगर उसने ग़द्दारी की।
अव्वल तो बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ और जब हुआ भी तो अंदर से हवेली का दरवाज़ा बंद करवा कर इतनी गोलियाँ चलवाईं कि आपका जिस्म छलनी हो गया।
राजा बलवान सिंह ने आपका सर उतार लिया, जो साहब कलेक्टर शाहजहाँ के सुपुर्द कर दिया गया।
जिस्म-ए-अक़दस को आग में फेंक दिया गया, जिसके एवज़ ब्रिटानिया सरकार ने 50,000 नक़द रुपया और ख़िलअत-ए-फ़ाख़िरा राजा पोआँई को भेजी।
तारीख़ 5 जून 1858 ईस्वी, 13 ज़ी-क़अदा 1385 हिजरी को यह सानिहा-ए-अज़ीम पेश आया।
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

आपके सर-ए-मुबारक को दरिया पार मोहल्ला जहानाबाद, मस्जिद मुत्तसिल अहमदपुर के पहलू में दफ़्न कर दिया गया। आपके मुरीदीन व ख़ुलफ़ा की कसीर तादाद ने इस तहरीक को जारी रखा। शुमाली हिंद की मरकज़ी सरज़मीन मकनपुर शरीफ़ के सपूतों ने इस तहरीक-ए-आज़ादी का ख़ुश-दिली के साथ ख़ैर-मक़दम किया।

मिसाल के तौर पर—
हज़रत सैयदना रूह-उल-आज़म मदारी,
हज़रत सैयदना ख़ान आलम मदारी,
हज़रत सैयदना रूह-उल-अकबर मदारी।
हज़रत सैयद रूह-उल-आज़म मदारिया जो बड़ी जायदाद के मालिक थे, उनकी जायदाद पर क़ब्ज़ा करके नीलाम कर दिया गया। और उनके अज़ीज़ दोस्त बाँगी मियाँ को उम्र-क़ैद की सज़ा सुना कर जज़ीरा-ए-अंडमान (काला पानी) में क़ैद करा दिया गया। वहीं उनका इंतिक़ाल हो गया।
तहरीक-ए-आज़ादी का एक और मुजाहिद—

ख़ाने आलम मियाँ जाफ़री

आप छत्तीस मौज़आत के मालिक थे। आपकी कई हवेलियाँ थीं।
एक बड़ी हवेली, जिसमें इजलास हुआ करता था, उसी में इमली का एक दरख़्त था, जिसमें उनके हाथी बाँधे जाते थे। इसे “हथनी इमली” कहा जाता था।
अंग्रेज़ी फ़ौज ने हवेली का मुहासरा करके उस इमली के दरख़्त में सैयद ख़ान आलम मियाँ के घर के 26 अफ़राद को बारी-बारी फाँसी पर लटका दिया।
अंग्रेज़ों ने ज़बरदस्त हमला किया तो ख़ान आलम मियाँ ज़ख़्मों से चूर रातों-रात मेवात चले गए, गुरगाँव इलाक़ा अलवर में क़याम फ़रमाया और यहीं आपका इंतिक़ाल हो गया।

हज़रत सैयद रूह-उल-आज़म मियाँ

आप साहिब-ए-करामत बुज़ुर्ग थे।
जामे मस्जिद आलमगीरी में मुराक़बा कर रहे थे। अंग्रेज़ों ने आप पर ज़बरदस्त गोलियाँ चलाईं, लेकिन आप पर एक गोली का भी असर न हुआ।
तब आपके बड़े भाई हज़रत ख़्वाजा सैयद रूह-उल-अमीन ने फ़रमाया—
“क्या आपको शहादत पसंद नहीं?”
तब आपने हाथ से तस्बीह छोड़ दी और शहीद हो गए।

आपके अलावा सादात-ए-मकनपुर शरीफ़ और पूरे सिलसिला-ए-मदारिया ने इस मुल्क को आज़ाद कराने में जो मशक़्क़तें उठाईं—न किसी को याद, न कोई कहने वाला।
न हमारी क़ुर्बानियाँ किसी को याद, न हमारे सुलगते घरों की तस्वीरें सलामत।
न नौजवानों की पीठ की बरतें बाक़ी,
न बच्चों की चूर-चूर हड्डियों का सुर्मा मौजूद,
न बेवाओं के मातम से इंसानियत के ऐवानों में कहराम।
न तारीख़ के औराक़ पर आँसुओं की दास्तान-ए-अलम।

आज हम बे-आबरू हैं तो वतन की ख़ातिर,
जबकि इस्तिक़ामत का यह हाल था कि काले पानी की सजाएँ, फाँसी के तख़्ते, गोलियों के निशाने, तोपों के दहाने उनकी हिम्मतों को पस्त न कर सके।
हिम्मत व हौसला इतना कि तूफ़ान से टकराकर इस मुल्क की तक़दीर का फ़ैसला किया।
न कोई दौलत से ख़रीद सका, न लालच से। हद तो यह थी कि उन आशुफ़्ता-नसीबों पर तरस तक खाने वाला कोई न था।

फिर भी यही पैग़ाम दिया कि—

उठे जो हाथ कोई इज़्ज़त-ए-वतन की तरफ़
वो हाथ काट दो, कुछ भी न तुम मलाल करो
न छूने पाए वो हिंदुस्तान का दामन
वतन-परस्ती में दुश्मन का ऐसा हाल करो

इस मुल्क की ग़ैरत ने जब-जब मदारियों को आवाज़ दी, मदारियों ने यह न सोचा कि कहाँ पुकारा जा रहा है,
बल्कि—

सलीब व दार सही, दश्त व कहसार सही
जहाँ भी तुमने पुकारा है, जानिसार चले
सुनी जो बाँग-ए-जरस तो बक़्त्लगाह-ए-जफ़ा
कफ़न-बदोश असीरान-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार चले

अल्लाह पाक हमारे मुल्क को तरक़्क़ियाँ और बरकतें अता फ़रमाए।
दहशतगर्दों की साज़िशों को नाकाम फ़रमा कर हमारे वतन-ए-अज़ीज़ की तक़दीर में अमन, चैन और सुकून लिख दे। आमीन।

हिंदुस्तान ज़िंदाबाद
जश्न-ए-यौम-ए-आज़ादी पायंदाबाद

अज़ क़लम 📝
सैयद अज़बर अली जाफ़री अल-मदारी
ख़ादिम-ए-आस्ताना-ए-क़ुत्ब-ए-मदार
दारुनूर, मकनपुर शरीफ़

ज़िला कानपुर, यूपी, इंडिया

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment