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शबे मेराज

On: फ़रवरी 8, 2026 6:34 अपराह्न
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27 Rajab

प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का जिस्म व रूह के साथ आसमानी सफ़र

फ़र्श से सूए अर्श इर्तिक़ा मुअजिज़ा
फिर ज़मीं की तरफ़ लौटना मुअजिज़ा

तारीख़े मेराज

नुबुव्वत का ग्यारहवाँ साल, रजबुल मुरज्जब की वह हसीन व नूरानी 27वीं शब मुबारका। सारी दुनिया सो रही है, मगर हज़रत उम्मे हानी रज़ियल्लाहु तआला अन्हा का घर आज बुक़्अए नूर बना हुआ है क्योंकि इसमें आज आक़ाए दोजहाँ रहमत-ए-आलम नूर-ए-मुजस्सम आला हज़रत इमामुल अंबिया वल मुरसलीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आराम फ़रमा रहे हैं। हज़रत उम्मे हानी का घर जो कि काबा मुक़द्दसा से चंद क़दम के फ़ासले पर है (और अब यह मक़ाम मस्जिदे हराम में शामिल कर लिया गया है और जिस जगह हज़रत उम्मे हानी का मकान था उस जगह एक मख़सूस क़िस्म का “पिलर” बना हुआ है जो कि तुर्कों ने बनवाया था और वहाँ एक तख़्ती भी लगाई थी ताकि लोगों को मालूम रहे कि यह वह मक़ाम है जहाँ से प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मेराज शरीफ़ के लिये तशरीफ़ ले गए थे लेकिन सऊदियों ने इस तख़्ती को वहाँ से हटा दिया ताकि लोग मक़ामे मुबारका की ज़ियारत से मुस्तफ़ीद न हो सकें)। निस्फ़े शब गुज़र चुकी है, प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मह्वे इस्तिराहत हैं, हज़रत उम्मे हानी भी सो चुकी हैं, लेकिन आसमानों पर धूम मची है, हर तरफ़ एक ही शोर है कि आज महबूब की अपने महिब से मुलाक़ात की रात है। आसमान से सुल्तानुल मलाइका हज़रत जिब्रील अमीन अलैहिस्सलाम फ़रिश्तों की बारात लेकर बारगाहे सरवरे क़ौनेन में हाज़िर हो चुके हैं, साथ में जन्नती लिबास भी है और बुराक़ भी। हाज़िर होकर देखा कि प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आराम फ़रमा रहे हैं और बज़ाहिर नींद को नवाज़ रहे हैं, हज़रत जिब्रील अमीन ने निहायत अदब व एहतराम के साथ महबूबे रब्बे ज़ुलजलाल को बेदार किया। प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बेदार हुए मगर फिर मह्वे आराम हो गए। सुभान अल्लाह।

जो महबूब सारी सारी रात जागकर अपनी गुनहगार उम्मत के लिये आँसू बहाता हो, जो इबादत व रियाज़त में इस क़दर जागता हो कि ख़ुद रब्बे क़दीर यह फ़रमाए कि: ऐ काली कमली में से झुरमुट मारने वाले! इबादत फ़रमाई आप रात को मगर थोड़ी। आधा उसका या कम कर दीजिए उससे थोड़ा सा। (बसीरतुल ईमान सफ़्हा १४५६) मगर आज वह महबूब पाक पूरी फ़ैयाज़ी के साथ मह्वे इस्तिराहत है।
हज़रत जिब्रील अमीन सोच में हैं कि एक तरफ़ तो रब्बुल आलमीन का हुक्म कि महबूब को लाओ और दूसरी तरफ़ रहमतुल्लिल आलमीन के आराम का तक़ाज़ा है कि न जगाया जाए। ؂

सूए मेराज की शब हबीबे ख़ुदा
उनके सोने में पोशीदा यह राज़ था
आज मेराजे जिब्रील हो जाएगी
जब वह चूमेंगे शाहे हुदा के क़दम

इसी आलम में जिब्रील अमीन ने प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के क़दमे मुबारक पर अपने लब रख दिये और रहमते आलम की रहमत को प्यार आ गया, आँखें खोलीं। जिब्रील अमीन ने फ़ौरन पैग़ामे इलाही सुनाया और काबए मुक़द्दसा में रौनक़ अफ़रोज़ होने की इल्तिजा की। दोनों आलम का सरदार काबए मुक़द्दसा में जल्वागर हुआ और हज़रत जिब्रील व हज़रत मीकाईल ने शक़्क़े सद्र की ख़िदमत अंजाम दी और क़ल्बे मुबारका को सीनेए अतहर से निकाल कर आबे ज़मज़म से ग़ुस्ल देकर फिर सीनेए अतहर में रख दिया और सीनेए मुबारका को हमवार कर दिया। यह शक़्क़े सद्र भी अजीब अंदाज़ का था—न आले की ज़रूरत, न ख़ून का बहना।

कुछ बे अक़्ल जिन्हें बुग़्ज़े रसूल का महलिक मर्ज़ है, वह इस पर बड़ा एतराज़ करते थे कि सीना चाक हो मगर ख़ून न निकले ऐसा कैसे हो सकता है, और सीने से दिल निकाल कर बाहर रख दिया जाए और मौत न हो ऐसा तो नामुमकिन है। लेकिन आज की साइंस ही ने इस फ़लसफ़े की धज्जियाँ उड़ा दी हैं और अब ऐसे ऑपरेशन होते हैं कि जिनमें एक क़तरा ख़ून भी नहीं बहता, वहीं अब किसी भी शख़्स का दिल निकाल कर मशीनों के ज़रिये उसको ज़िंदा रखा जाता है और उसका इलाज़ करके दोबारा दिल उसके मक़ाम पर रख दिया जाता है। क़ल्बे मुबारक को आबे ज़मज़म से ग़ुस्ल दिया गया। यह ग़ुस्ल मुबारक क़ल्बे मुबारका को और ज़्यादा क़वी करने के लिये दिया गया था, न कि पाक करने के लिये। जिस तरह एक वुज़ू से दो तो क्या दो सौ रकअतें भी पढ़ी जा सकती हैं मगर हर नमाज़ के लिये ताज़ा वुज़ू करना अफ़ज़ल है। लिहाज़ा कोई नासमझ यह न समझे कि क़ल्बे मुबारका को पाक किया गया बल्कि ताज़ा ग़ुस्ल मुबारक इस लिये दिया गया ताकि जल्वए रब्बुल आलमीन जल मज्दहू के लिये प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का क़ल्बे अतहर और ज़्यादा क़वी व मज़बूत हो जाए।

अब जिब्रील अमीन बुराक़ लाए। बुराक़ की रफ़्तार का क्या कहना कि जहाँ तक नज़र जाए वहाँ उसका क़दम पड़े, इस तेज़ रफ़्तारी ही ने दुनिया को हवाई जहाज़ का सबक़ अता फ़रमाया है। ؂

एक पल में मुन्तहाई, अर्शे बरीं और लामकाँ
उस बुराक़ शाह की रफ़्तार कितनी तेज़ है

प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपनी पुश्त पर सवार होता देखकर बुराक़ भी को वज्द आ गया और मस्ती में झूमने लगा। हज़रत जिब्रील ने बुराक़ को आगाह किया कि जानता है तेरी पुश्त पर कौन रौनक़ अफ़रोज़ हो रहा है, लिहाज़ा बा-अदब हो! प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नाम पाक सुनते ही बुराक़ सर झुकाए अदब से बैठ गया। प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सवार हुए। आका आगे आगे हैं, फ़रिश्ते हैं कि जुलूस की शक्ल में पीछे पीछे चल रहे हैं, हर तरफ़ सलवात व सलाम के ग़लग़ले हैं। ज़मीन नख़्लिस्तान पर गुज़र हुआ, दो रकअत नमाज़ अदा फ़रमाई। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की जाए विलादत पर पहुँचे, यहाँ भी प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दो रकअत नमाज़ अदा फ़रमाई। और फिर प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बैतुल मुक़द्दस पहुँचे, बैतुल मुक़द्दस में ही बुराक़ बाँधा गया (इस मक़ाम को अब बाबे मुहम्मद कहते हैं)।

हज़रत आदम से लेकर हज़रत ईसा अला नबिय्यिना व अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम तक तमाम हज़रात अंबिया किराम अपने इमाम के इस्तिक़बाल के लिये मौजूद हैं। अंबिया किराम ने इमामत की दरख़्वास्त की, आक़ाए दोजहाँ ने इल्तिजा को क़ुबूलियत से नवाज़ा और तमाम अंबिया किराम ने प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की इक़्तिदा में नमाज़ अदा फ़रमाई। ؂

अक़्सा की बज़्म आज भी शाहिद है दोस्तों
सब उसके मुक़्तदी हैं, वह सबका इमाम है

अब सोचने की बात यह है कि यह कोई ईद की नमाज़ तो थी नहीं कि सारे अंबिया वह पढ़ने इकट्ठा हुए थे बल्कि इस महफ़िल का मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शान पाक तमाम अंबिया किराम को दिखाना था और तमाम अंबिया से इमामुल अंबिया के ख़ुत्बे पढ़वाना था। प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मस्जिदे अक़्सा से बाहर तशरीफ़ लाए। जिब्रील अमीन ने बारगाहे रिसालत में सागर पेश किये, प्यारे नबी ने दूध पसंद फ़रमाया। फिर महबूबे आज़म का यह नूरानी जुलूस आसमानों से होता हुआ और आप तमाम हालात व मामलात को मुलाहिज़ा फ़रमाते हुए आगे बढ़ रहे हैं। इसी दौरान आपको बैतुल मामूर दिखाया गया, यह मलाइका का क़िबला है और काबा शरीफ़ के बिल्कुल मुक़ाबिल है, रोज़ाना सत्तर हज़ार नए फ़रिश्ते उसका तवाफ़ करते हैं।
और आख़िर वह मक़ाम आ गया जिसको सिदरतुल मुन्तहाई कहा जाता है। सुल्तानुल मलाइका भी इस मक़ाम पर पहुँचकर ठहर गए और अर्ज़ की: आका! बस यह मेरे उरूज की इन्तिहा है, मैं इससे आगे जाने की ताक़त नहीं रखता और अगर मैंने इससे आगे क़दम रख दिया तो मैं ग़ज़बे इलाही का शिकार हो जाऊँगा। ؂

यह औज व उरूज आपका मेराज में आका
जिब्रील के बेबस सभी शहपर नज़र आए

हज़रत जिब्रील ने उन अक़्ल के यतीम लोगों को सबक़ दे दिया जो यह कहते हैं कि “हज़ूर तो जिब्रील के मुहताज थे, जब जिब्रील पैग़ाम लाते तो हज़ूर सहाबा को बताते।” लेकिन आज जिब्रील की इस बेबसी ने ऐलान कर दिया कि सुल्तानुल मलाइका तो ख़ुद सुल्तानुल अंबिया का मुहताज है। ؂

ताइर सिदरा, सिदरा पे कहने लगे
आगे जाऊँ तो पर मेरे जल जाएँगे
बाल भर भी न सिदरा से आगे बढ़े
ताइर सिदरतुल मुन्तहाई के क़दम

अब यहाँ से दोनों आलम के मालिक व मुख़्तार अकेले आगे बढ़ रहे हैं। सत्तर हज़ार हिजाब नूरी हैं और हर हिजाब के दरमियाँ पाँच सौ बरस की राह है। रहमतुल इलाही की इआनत से आक़ाए दोजहाँ ने बेख़ौफ़ व ख़तर यह हिजाबात तय फ़रमाए। हज़रत रब्बुल इज़्ज़त से नदा आई: अद्नु या ख़ैरल बरिय्या, अद्नु या मुहम्मद, अद्नु या अहमद (ऐ बेहतरीन कायनात आइए, ऐ मुहम्मद क़रीब आइए, ऐ अहमद क़रीब आइए)। ؂

है ज़ेर-ए-क़दम रिफ़अत-ए-अर्शे आज़म
मेरे मुस्तफ़ा यह मक़ाम आपका है

प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि रब्बे कायनात ने अपने क़ुर्ब से मुझे नवाज़ा और वह क़ुर्बे अतम हासिल हुआ जिसको “दना फ़तदल्ला फ़काना क़ाबा क़ौसैन अव अद्ना” में बयान फ़रमाया गया है।

कितना बाला, कितना बाला, कितना बाला कर दिया
ज़ेर-ए-पाए नाज़ उनके अर्शे आला कर दिया

प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बारगाहे रब्बुल इज़्ज़त में अर्ज़ किया: मौला! तूने बहुत सी उम्मतों पर अज़ाब नाज़िल फ़रमाया—किसी पर पत्थरों का, तो किसी को ज़मीन में धँसाकर, किसी की सूरतें मस्ख़ करके—लेकिन मैं अपनी उम्मत के लिये रहम चाहता हूँ।
रब्बे क़दीर ने फ़रमाया: ऐ महबूब! मैं आपकी उम्मत पर रहमत नाज़िल फ़रमाऊँगा, उनकी बदियों को नेकियों से बदल दूँगा, और जो कोई मुझसे कुछ तलब करेगा मैं अता फ़रमाऊँगा और आख़िरत में उसका शफ़ीअ आपको बनाऊँगा।

हज़ूर-ए-हक़ भी न भूले नबी ग़ुलामों को
इनायतों के लुटे हैं गहर शबे मेराज

महिब व महबूब के दरमियान क्या राज़ व नियाज़ की बातें हुईं, यह वही जानें। बस हम तो सिर्फ़ इतना ही कह सकते हैं कि नवाज़िशात के दरिया बहा दिये गए और वह नेमतें अता फ़रमाई गईं जो एहाते बयान से क़तअन बाहर हैं। हाँ, इतना अंदाज़ा ज़रूर लगाया जा सकता है कि जब प्यारे महबूब की उम्मत के लिये नमाज़ जैसा अज़ीमुश्शान तोहफ़ा अता किया गया है तो ख़ुद महबूब को क्या-क्या अता किया गया होगा।

प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मेराज शरीफ़ से वापस दौलतसराए अक़दस में जल्वागर हुए।
यूँ तो मेराज शरीफ़ में सत्ताईस साल लगे मगर जितने वक़्त महबूब पाक मेराज शरीफ़ में रहे, सारी कायनात साकित हो गई और सारा ज़माना ठहर गया और वह सत्ताईस साल आन-ए-वाहिद में गुज़र गए। ؂

मेराज में बरसों का सफ़र पल में किया तय
अल्लाह ग़नी अज़मत-ए-परवाज़े मुहम्मद

मेराज शरीफ़ से वापसी पर आपने मेराज शरीफ़ का वाक़िआ बयान फ़रमाया। कुफ़्फ़ार ने इनकार किया और कुछ मुशरिकीन सैय्यिदना अमीरुल मोमिनीन ख़लीफ़ा-ए-बिलाफ़स्ल अफ़ज़लुल बशर बादल अंबिया हज़ूर अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के पास गए और कहा कि ऐ अबू बक्र! कुछ तुम्हें अपने यार का भी पता है? वह फ़रमा रहे हैं कि एक रात के कुछ हिस्से में वह बैतुल मुक़द्दस तशरीफ़ ले गए। हज़ूर सिद्दीक़े अकबर ने इरशाद फ़रमाया कि मेरे आका जो कुछ फ़रमा रहे हैं वह बेशक सही है और अगर वह इससे भी आगे इरशाद फ़रमाते तो मैं उसकी तस्दीक़ करता। इसी दिन से आपका लक़ब सिद्दीक़ मशहूर हुआ। इसके बाद हज़ूर सिद्दीक़े अकबर बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया कि आप इन कुफ़्फ़ार की तसल्ली के लिये बैतुल मुक़द्दस की अलामात इरशाद फ़रमा दें। चुनाँचे प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बैतुल क़ुद्स की निशानियाँ बयान फ़रमाईं और जिनकी क़िस्मत का सितारा चमका वह ईमान की दौलत से मुशर्रफ़ हुए।

प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं कि कुछ अलामात का जवाब मुझे हाज़िर न हुआ तो मैं फ़िक्रमंद हुआ, उसी वक़्त बैतुल मुक़द्दस को मेरी नज़रों के सामने कर दिया गया और मैंने तमाम निशानियाँ बयान कर दीं।
इससे तीन बातें तो साफ़ तौर पर मालूम हो जाती हैं कि
(१) वाक़िआ-ए-मेराज शरीफ़ बयान करना सुन्नत-ए-रसूल पाक है।
(२) वाक़िआ-ए-मेराज शरीफ़ को मोहब्बत से सुनना और उस पर ईमान रखना—यह सुन्नत-ए-सहाबा है।
(३) वाक़िआ-ए-मेराज शरीफ़ का किसी भी अंदाज़ से इनकार करना या उसको सिर्फ़ रूहानी बताकर उसकी अज़मतों से खिलवाड़ करना—कुफ़्फ़ार का तरीक़ा है।

और अक़्ल भी इसकी गवाही देती है। क्योंकि अगर रसूल पाक ख़्वाब बयान फ़रमाते तो कुफ़्फ़ार कभी उसका इनकार नहीं करते, क्योंकि ख़्वाब में तो आदमी कुछ भी देख सकता है और वह सारे काम कर सकता है जो उसकी ताक़त से बाहर हों। लेकिन कुफ़्फ़ार ने मेराज शरीफ़ की मुख़ालफ़त ही इस लिये की क्योंकि रसूल पाक ने जिस्मानी मेराज शरीफ़ का ऐलान फ़रमाया था। ؂

यह इंतिख़ाब क़दीरी मेरा अक़ीदा है
था जिस्म व रूह का नूरी सफ़र शबे मेराज

वाक़िआ-ए-मेराज शरीफ़ के बयान में निहायत इख़्तिसार से काम लिया गया है, वरना इसकी अज़मतों, बरकतों और अस्रार व रमूज़ बयान करना इंसानी ताक़त के बस से बाहर की बात है।

मेराज में इश्क़ व उल्फ़त के अस्रार का आलम क्या होगा
जब होगी मयस्सर ख़लवत-ए-हक़ सरकार का आलम क्या होगा

रब्बे क़दीर हम सब को मेराज शरीफ़ की बरकतों, नेमतों, सआदतों से माला-माल फ़रमाए और शबे मेराज शरीफ़ रब्बे क़दीर जल मज्दहू ने अपने प्यारे महबूब आला हज़रत इमामुल अंबिया वल मुरसलीन अलैहिस्सलातु वस्सलाम तस्लीम से उनकी उम्मत के लिये जो बशारतें इरशाद फ़रमाईं हैं, उनका मुस्तहिक़ बनने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
आमीन। बजाह सैय्यिदना सैय्यिदुल मुरसलीन अलैहिस्सलातु वत्तस्लीम

तालिबे दुआ
सैय्यिद मुहम्मद इंतिसाब हुसैन क़दीरी अशरफ़ी मदारी
मुहतमिम मरकज़े अहले सुन्नत जामिआ क़दीरिया
सज्जादा-नशीन आस्तानाए क़दीरिया
हज़ूर मुजद्दिद मुरादाबादी, मुरादाबाद शरीफ़

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