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अतीत की यादें और मेला मकनपुर शरीफ़

On: फ़रवरी 8, 2026 6:34 अपराह्न
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makanpur Basnt Mela

पुराना मकनपुर

दरियाए ईसन के किनारे सन्नाए आलम की तख़लीक़ का एक हसीन शाहकार, बालू के टीलों के ऊपर कहीं नीचे बसा, ताड़ों के बाग़ात से सजा, किनारों किनारों पर शफ़्फ़ाफ़ रेत का चाँदी-नुमा मंज़र, फूलों और क्यारियों से महके महके बड़े बड़े आँगन, पीली मिट्टी से लसे सहन व चबूतरे, पंडोल से पोती हुई दीवारों पर क़लई से बने फूल पौधे, कहीं कहीं खजूर की शाख़ें, जैसे दीवाली की दिलनियाँ सजी हुई—यह हसीन मंज़र किसी शफ़्फ़ाफ़ मरमरीन महलों से कम नहीं होता था, कहीं कहीं छपरों पर लौकी की बेलें चढ़ी रहती थीं।

गुलाबाज़, गुल दोपरिया, गेंदा, गुलफ़रंग, गुलदाउदी वग़ैरह अच्छे अच्छे पौधों और फूलों से सजी क्यारियाँ घर घर का मंज़र हसीन था।

मुझे याद आता है वह दौर जब मकनपुर शरीफ़ में कच्चे रास्ते थे, छोटा मोटा काम करने के लिए बैलगाड़ियाँ होती थीं। बस्ती के लोग नदी के पार खड़ी बस में बड़ी फ़रहत और शौक़ व जज़्बे के साथ बैठ कर शहर कानपुर जाया करते थे।

सड़क के किनारे नदी के पार लगी हुई बस सुबह के ख़ुशगवार मौसम में अपना मक़सूस हॉर्न बजाती तो बस्ती के घरों में पता चल जाता था कि बस लग गई है। वक़्त गुज़रने से पहले किसी को शहर जाने के लिए और किसी को अपने घर बैठे मेहमान को रवाना करने के लिए ऐसन के पार नाव से जाना पड़ता था।

चूँकि ऐसन नदी पर पुल तामीर नहीं हुआ था, दरगाह ज़िंदा शाह मदार में माघ का मेला बमौक़ा बसंत पंचमी शुरू होने से पहले गुलाबी गुलाबी सर्दी में ऐसन नदी पर हमेशा कच्चा पुल बनाया जाता था।
पुल की तामीर मुकम्मल होने पर इफ़्तिताह के लिए एक तारीख़ मुक़र्रर की जाती, फिर एक ट्रक मंगाया जाता। उस ट्रक पर थोड़ा सा सामान रखा जाता, नौजवान लड़के बच्चे बैठ जाते, फिर उस ट्रक को कच्चे पुल से गुज़ारा जाता। जब ट्रक नदी के इस पार से उस पार बज़रिया पुल पार हो जाता तो फिर वह ट्रक सीधा दरगाह शरीफ़ आता, बताशे या दीगर शीरनी पर फ़ातिहा करा कर तक़सीम कराई जाती थी। उस दिन को बड़ी मसर्रत का दिन—यानी ईद के दिन से कम न समझा जाता था।

इसको “ठेला पास होने का दिन” कहा जाता था। लोग एक दूसरे से फ़रत-ए-मसर्रत से कहते थे कि ठेला पास हो गया। फिर धीरे धीरे ट्रक गुज़रने लगते, मेला आने लगता।
इसी पुल से मेले की तैयारियाँ होने लगती थीं।

पतली पतली खंजरा ईंटों का रास्ता, कैप्टस के काँटोंदार दरख़्तों से घिरा सजा। कहीं कहीं धतूरे के पेड़ों पर फूल अच्छे लगते, कहीं कहीं हरियाली, कहीं कहीं ख़ुश्की; और खे, काँस और कसोंदी रास्ते की ख़ूबसूरती में इज़ाफ़ा करते।

क़स्बे के आस पास बीघों सरसों के पीले पीले फूलों से सजे खेतों और पतावर की पतली पतली झुकती पत्तियों पर पिंडरी परिंदों का चहचहाना, झूमना, खेलना। कभी यक्का घोड़ा सड़क पर दौड़ता हुआ आता, कोई ख़ूबसूरत ख़ूबसूरत सजे हुए ऊँटों से, कोई बैलगाड़ी से सामान लाद कर मेले तक लाता।

मेला आराज़ी में सैकड़ों कुएँ थे। मेले से पहले कुएँ साफ़ किए जाते। बरसात की कटी हुई ज़मीन के खंदुए भरे जाते, कहीं गढ़ों में मिट्टी डाली जाती, साफ़-सफ़ाई शुरू हो जाती। घसियारे एक महीना पहले आ जाते, घास छील छील कर ढेर लगाते, भूसे का टाल लगता और बहिश्ती आने लगते, जिससे पानी सब के पास मक़ाम तक पहुँचने लगता।

बहुत बड़ा मेला पूरे मुल्क में अपनी नौ’इयत का वाहिद मेला था, जिसमें मवेशियों के अलावा तिजारती माल व असबाब में कोई भी चीज़ बाक़ी नहीं थी जो इस मेले में न मिलती हो।
सूई से लेकर हाथी तक इस मेले में मिलता था।

ख़ूबी यह थी कि हर एक चीज़ का बाज़ार अलग अलग लगता था—जैसे कि हाथी का बाज़ार अलग, ऊँट का बाज़ार अलग, भैंस का बाज़ार अलग, बैल का बाज़ार अलग, घोड़े का बाज़ार अलग, बकरी का बाज़ार अलग, गधे का बाज़ार अलग; और इनमें भी बच्चों का बाज़ार अलग, जवानों का अलग, बूढ़ों का अलग; आला नस्ल के जानवरों का अलग; काले अलग, गोरे अलग; दरमियानी जानवरों का अलग; पस्त अलग, ख़स्ता अलग।

इसी तरह से हर चीज़ की लाइन अलग, मार्केट अलग—लकड़ी मंडी (टाल) अलग, घुँघरू लाइन अलग, हरिस अलग, बक्स लाइन अलग, दरी लाइन अलग, कपड़ा मंडी अलग, चूड़ी लाइन अलग, बसाती ख़ाना अलग, हलवा सोहन अलग, खाने के होटल अलग, कराकरी अलग, कंघी की मार्केट अलग, चटला बाज़ार अलग, सदर लाइन अलग, शीरनी मार्केट अलग, जूता चप्पल की मार्केट अलग, सुरमा की लाइन अलग, दाँतों की अलग, सिल-बट्टा अलग, गुदड़ी अलग, खिलौने की मार्केट अलग।

बच्चों के तफ़रीह-ए-तब’ (मनोरंजन) के लिए खेल तमाशे, झूले, सर्कस, मौत का कुआँ वग़ैरह—ये सब अलग ग्राउंड में लगते। झोंपड़ी और मढ़ियों में आने वाले ज़ायरीन, ताजिर रहते; पूरे मेले में हर तरह का लुत्फ़ मिलता—कहीं चूल्हे बिकते, कहीं गर्दन में लटकी पान-बीड़ी की दुकान, कहीं चाय गरम, कहीं जानवरों के लिए पत्ती बिकती, कहीं नालबंद की सदाओं से महज़ूज़ होते।

बुढ़िया के बाल और गर्दन में लटके बाय-स्कोप वाले सिनेमा की घंटियाँ बजते ही बच्चे दौड़ पड़ते। ज़िंदा शाह मदार की दरगाह शरीफ़ का क़ुरब-ओ-जवार लोबान की भीनी भीनी महक से महका रहता और फ़ज़ा दम-ए-मदार की सदाओं से गूँजती रहती।

अक़ीदतमंद अपने सरों पर चादरें रख कर दरगाह शरीफ़ में तवाफ़ करते; कोई मुर्ग़ा चढ़ाता, कोई मन्नतें पूरी करता, कहीं मुंडन होता। सब से बड़ी बात यह होती कि जो काम पंचायतों में नहीं हो पाता, वह काम मदारन के खेत में हो जाता था। सारी सारी साल लड़ते, झगड़ते, बोल-चाल बंद, मेल-मिलाप बंद, दुश्मनी, तनाव—आपस में एक दूसरे से दूरी; लेकिन मदारन के खेत में आ के खाई क़सम के बाद सब ख़त्म हो जाता। यह भी मेले की अहम ख़ूबियों में से एक ख़ूबी थी।

बसंत पंचमी के पुर-बहार मौसम, ख़ुशगवार माहौल में बाबरकत अय्याम होते।
इतना बड़ा मेला होता कि घूमना मुश्किल पड़ जाता; घूमते घूमते आदमी थक जाता, मगर दो चार पाँच दिन में मेला नहीं देख पाता।

ऊँट बाज़ार में ऊँट वाले पूरी पूरी रात थाली बजा बजा कर मदार की दहाई गाते; ऊँटों के बलबलाने, बड़बड़ाने की आवाज़ सारी आबादी सुनती। सुबह सुबह से बाँसुरी बेचने वाले अपनी लय पर बच्चों को बिदार करते और बच्चे आँखें मल मल कर बाँसुरी वालों के पास पहुँच जाते। पूरे मेले में बड़ी बड़ी जगहों पर खेल तमाशा दिखाने वाले अपनी डगडगिया बजा कर बच्चों को इकट्ठा करते, बड़ों को बुलाते और अपना खेल तमाशा कर के तब दिखाते।
ग़रज़ यह कि बड़ा सुहाना मंज़र और ख़ुशगवार मौसम हुआ करता था।

ममेरा नीम का ठंडा, सुरमा वाले का लाउडी स्पीकर तो सब को याद है।
ज़िला इंतज़ामिया की जानिब से पुलिस का माक़ूल इंतज़ाम होता—52 ज़िलों की पुलिस मेले में आती; जगह जगह पर चौकी बनती, थाने बनते; घुड़सवार पुलिस अफ़सर घोड़ों पर बैठ कर मेले में गश्त करते; कच्चे रास्तों पर पानी छिड़कने का इंतज़ाम मेला कमेटी तहसील मकनपुर से किया जाता।

मेला कमेटी की जानिब से मेले की ख़ुसूसी तक़रीबात में से—ऑल इंडिया मुशायरा, कवि सम्मेलन, जलसा, ऑर्केस्ट्रा और दीग़ों का लंगर, चादर शरीफ़ वग़ैरह—मौजूदा एस.डी.एम. साहब की सदरात में होता। मेले का इफ़्तिताह सरकार क़ुत्ब-उल-मदार के आस्ताने पर चादरपोशी से किया जाता। जिस दिन चादर चढ़ती थी, मकनपुर शरीफ़ के सादात, मशाइख़, उलेमा, बुज़ुर्ग, मेला कमेटी के मेंबरान, मुअज़्ज़ज़ीन, हिंदू-मुस्लिम भाई—सब शिरकत करते।

यह इफ़्तिताही जुलूस चादर ज़िला मजिस्ट्रेट की सदरात में तहसील मेला से ख़ानक़ाह शरीफ़ तक आता; दरगाह शरीफ़ में बारगाह-ए-मदार-उल-आलमीन में चादर पेश की जाती और अफ़सरान के सरों पर ख़ानक़ाह की तरफ़ से पगड़ी बाँधी जाती।

फिर बाक़ायदा मेला शुरू हो जाता। मेले का ख़ास दिन बसंत पंचमी का है। उस दिन सरकार क़ुत्ब-उल-मदार के आस्ताने पर जलसा-ए-क़ुल होता। क़ुल की ख़ूबी यह थी कि पूरे मेले में एक साथ ताली बजती—अल्लाह जाने यह शुरू कहाँ से होती और कहाँ पर ख़त्म होती—एक दम ताली बजती और ताली बजने के साथ क़ुल का ऐलान हो जाता।

मेला तो अब भी होता है—कल भी लखी मेला था, आज भी।
हिंदू-मुस्लिम एकता से पहचाना जाने वाला लखी मेला है; पब्लिक कम नहीं हुई बल्कि मजमा बढ़ा।
अलबत्ता तरक़्क़ी-याफ़्ता ज़माने में नई नई इजादात ने मेलों पर अपना असर डाला। मवेशियों का काम ख़त्म हुआ, उनकी जगह पर गाड़ियाँ चलने लगीं; इसलिए अब मवेशी का मेला तक़रीबन ख़त्म है। दीगर ज़रूरत की चीज़ें हर जगह मिलने लगीं, गली गली बाज़ार लगने लगे, ऑनलाइन वाले दरवाज़े दरवाज़े माल पहुँचा देते हैं। इसी वजह से मेले की कारोबाऱी साख़्त मुतास्सिर हुई और इसका बुरा असर पड़ा। एक मेला ही क्या—सारे जहान का आलम यह है कि सब बदल गया; वक़्त बदल गया, रास्ते बदल गए, लोग बदल गए, रुत बदल गई, मोहब्बतें बदल गईं; तांगे, बैलगाड़ियाँ तक़रीबन ख़त्म; यहाँ तक कि सवारियाँ बदल गईं; साइकिलें ठिकाने लग गईं; मेलों के मक़सूस खेल तमाशे बदल गए; दरख़्त कट गए; चिड़ियाँ उड़ गईं; मुंडेर पर कौए बैठना छोड़ गए; चहचहाहट थम गई; पैदल चलने वाले रास्तों पर घास हो गई; और फिर हर बस्ती, हर शहर, हर क़रियह के बाज़ लोग आपस में बेगाने होते गए; नस्लें बदलने लगीं; एक दूसरे की परवाह, फ़िक्र, एहसास ख़त्म होता गया—और यूँ एक हसीन व प्यार भरे ज़माने का इख़्तिताम होता गया।

और एक दूसरे का प्यार व मोहब्बत—और सब से बढ़ कर एहसास—तक ख़त्म हो गया।
अपने, पराए हो गए; पराए, अपने हो गए।

कल बरसात होती तो लोग एक दूसरे की ख़ैरियत की दुआएँ माँगते। रात भर पानी बरसने के बाद सुबह सुबह बुज़ुर्ग लोग घर घर जाते—किसी का छपर गिर गया, किसी का कमरा बैठ गया, किसी की दीवार गिर गई—पुरसिश-ए-अहवाल करते; कहीं किसी को चोट तो नहीं आई, किसी का कोई नुक़सान तो नहीं हुआ। गिरी हुई छतों के नीचे दबे हुए माल-ओ-असबाब को भी उठवाते और कहीं महफ़ूज़ जगह पर पहुँचाने की ज़िम्मेदारी का फ़र्ज़ भी अंजाम देते थे।

बच्चे बारिश में गुदलाए हुए पानी में ख़ुशी ख़ुशी दौड़ते भागते, नहाते फिरते।
फूटें, कचरियाँ, आम की गुठलियाँ, जामुन—भरी बरसात का सहारा होती थीं। फ़ाक़ा-मस्ती के वो दिन कितने हसीन थे कि ख़ुद-पसंदी, आबला-फ़रेब दुनिया न थी; हसद, तकब्बुर, झूठ, फ़िरऔनियत का गुज़र भी नहीं था। मगर अब यह सब कहने-सुनने को रह गया।
जाने कहाँ गए वो दिन।

अज़-क़लम: सैयद अज़बर अली जाफ़री मदारी, मकनपुर शरीफ़

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