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मुसलमान का सिलसिला

On: जनवरी 7, 2026 5:36 अपराह्न
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musalman ka silsila

सीधी बात यह है कि मुसलमान का सिलसिला है “ला इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” जिसकी ज़बान पर कलिमा-ए-तैय्यबा के मुक़द्दस अल्फ़ाज़ जारी हैं और ज़रूरियात-ए-दीन में से किसी का इंकार नहीं करता उसका सिलसिला दुरुस्त है। अल्लाह व रसूल पर ईमान लाने और तौहीद व रिसालत की गवाही देने के बाद उम्र भर का काफ़िर व मुशरिक भी मोमिन व मुसलमान और निजात का मुस्तहिक़ हो जाता है।

मुसलमानों! “ला इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” दीन की बुनियाद की पहली ईंट और सारे नबियों का सबसे अहम और अव्वल सबक़ है। दीन की तमाम बातों में इसका दर्जा सबसे ऊँचा है। सरकार-ए-दो-जहाँ का इरशाद-ए-गिरामी है: “अफ़ज़लुज़्‌ज़िक्र ला इलाहा इल्लल्लाह” (इब्न माजा, नसाई) यानी तमाम ज़िक्रों में अफ़ज़ल व आला “ला इलाहा इल्लल्लाह” है।

यही कलिमा इस्लाम का दरवाज़ा और दीन व ईमान की जड़ और बुनियाद है। जो शख़्स इक़रार-ए-कलिमा-ए-तैय्यबा न करे और इसको समझ कर न पढ़े उसका सिलसिला बिला-शुबह मुनक़ता है। पैग़म्बर-ए-ख़ुदा नबी करीम अलैहिस्सलातु वत्तसलीम से उसका कुछ वास्ता नहीं। वह बद-दीन, नारी व जहन्नमी है।

यह बात याद रखने की है कि मुसलमान का सिलसिला बग़ैर कुफ़्र व इरतिदाद के सोख़्त नहीं होता और न ख़त्म होता है। क़ुरआन-ए-पाक की बहुत-सी आयतों और हदीस शरीफ़ से साबित है कि काफ़िर व मुशरिक और मुनाफ़िक़ बे-सिलसिला हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि सिलसिला दुरुस्त नहीं काफ़िरों का और सिलसिला दुरुस्त नहीं मुशरिकों का और सिलसिला सोख़्त व मुनक़ता हो गया मुनाफ़िक़ों और मुर्तद्दों का।
क़ुरआन-ए-पाक ने फ़रमाया: “اِنَّ الْمُنٰفِقِیْنَ فِی الدَّرْكِ الْاَسْفَلِ مِنَ النَّارِۚ” यानी बिला-शुबह मुनाफ़िक़ीन दोज़ख़ के नीचे दर्जे में होंगे।

मुसलमानों पर सलाम-ए-इलाही
क़ुरआन पाक में है : “وَاِذَا جَآءَكَ الَّذِیْنَ یُؤْمِنُوْنَ بِاٰیٰتِنَا فَقُلْ سَلٰمٌ عَلَیْكُمْ كَتَبَ رَبُّكُمْ عَلٰى نَفْسِهِ الرَّحْمَةَۙ” यानी पैग़म्बर-ए-इस्लाम जब आपके पास वे लोग आएँ जो हमारी आयतों पर ईमान लाए हैं तो आप फ़रमाएँ तुम पर सलामती हो और बशारत दें कि तुम्हारे रब ने अपने ऊपर रहमत को लाज़िम कर लिया है। यह आम मुसलमानों के लिए फ़रमाया गया है। जो ख़ास बन्दे हैं उनकी शान निराली है। “لَهُمُ الْبُشْرٰى فِی الْحَیٰوةِ الدُّنْیَا وَ فِی الْاٰخِرَةِؕ” यानी उनके लिए दुनिया व आख़िरत में बशारत व ख़ुशख़बरी है।

औलिया-ए-अल्लाह की अज़मत व शान की तमाम आयात तो इस में पेश नहीं कर सकता, इसलिए कि इस छोटी-सी किताब में इसकी गुंजाइश नहीं। इसके लिए एक मुस्तक़िल किताब चाहिए। हाँ आगे चलकर कुछ आयतों की तिलावत का शर्फ़ हासिल करूँगा, आप उनको समझकर ईमान ताज़ा करें। यहाँ सिलसिले की कड़ी याद रहे। क़ुरआन व हदीस की रौशनी में ख़ूब समझ लें और याद रखें कि दुनिया का कोई मुसलमान बे-सिलसिला था और न अब है न आइन्दा होगा। जो शख़्स किसी मुसलमान को बे-सिलसिला कहे वह झूठा है, दीन और उसूल-ए-दीन से बे-ख़बर है। ऐसी बेहूदा और बे-सरो-पा बातों से तौबा करे।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है : “كُنْتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ.” यानी तुम बेहतरीन उम्मत हो जो लोगों के लिए पैदा किए गए हो, अच्छे काम करने का हुक्म देते हो और बुराइयों से रोकते हो।

अल्लाह तआला बेहतरीन उम्मत फ़रमाए और तुम सोख़्त-पोख़्त लिए घूमो, ख़ुद गुमराह और दूसरों को गुमराह करो। अल्लाह व रसूल की किसी बात में शक व शुबह और बे-एतिमादी और किसी क़िस्म का तअम्मुल या तज़बज़ुब यह सरासर कुफ़्र व इंकार, जह्ल व तुग़यान है। इंसानियत और ईमान के बिल्कुल मनाफ़ी है और खुली बर्बरियत और बिल्कुल शैतानियत है, जिसका नतीजा दुनिया में बरबादी और रूसवाई और आख़िरत में सख़्त सज़ायाबी है। अल्लाह पाक और उसके रसूल-ए-मुकर्रम के हर हुक्म और फ़रमान की तस्दीक़ हो, यही ईमान और बुनियाद-ए-इस्लाम है। मुख़्तसर यह है कि सिलसिले की मज़बूती इक़रार-ए-कलिमा-ए-तैय्यबा है। यही जमहूर उलमा का मज़हब है।

अल्लाह पाक ने फ़रमाया : “قُل لِّلَّذِينَ كَفَرُوا إِن يَنتَهُوا يُغْفَرْ لَهُم مَّا قَدْ سَلَفَ” पैग़म्बर-ए-इस्लाम काफ़िरों से फ़रमा दीजिए, अगर वे कुफ़्र से बाज़ आ जाएँ तो उनके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।

ख़ाना-ए-बे-सिलसिला
काफ़िर हमेशा के लिए दोज़ख़ में रहेंगे, इसलिए कि उनका सिलसिला नहीं है। कभी भी अज़ाब से उनकी निजात न होगी और न उनके अज़ाब में कभी कमी होगी। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : “لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ” न उनका अज़ाब हल्का होगा और न उनको मोहलत मिलेगी।

ख़ाना-ए-बा-सिलसिला
मोमिनों का सवाब दाइमी है। ये हमेशा जन्नत में रहेंगे और कभी जन्नत से न निकलेंगे। क़ुरआन पाक ने फ़रमाया : “إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي جَنَّاتٍ وَنَهَرٍ.” गुनहगार मुसलमान अपने गुनाहों के मुताबिक़ अज़ाब भुगतेगा। उसको अज़ाब देकर दोज़ख़ से निकाल लिया जाएगा। उसके ईमान की बरकत से उसको काफ़िरों की तरह सियाह-रू न किया जाएगा और न उसके तौक़ व ज़ंजीर डालेंगे। दोज़ख़ का दाइमी अज़ाब काफ़िरों के लिए मख़सूस है। जिसके दिल में ज़र्रा बराबर भी ईमान होगा वह दोज़ख़ में हमेशा न रहेगा। उसका अंजाम रहमत पर होगा और उसका मक़ाम जन्नत होगा।

नबी करीम ﷺ के इरशाद-ए-गिरामी से यह बात बिल्कुल रौशन है कि ज़र्रा बराबर ईमान वाला बख़्श दिया जाएगा। जन्नत में दाख़िल होगा। अगर सिलसिला नहीं है तो गुनहगार की निजात कैसी, जन्नत में जाना कैसा, शफ़ाअत-ए-सरकार-ए-रिसालत किसके लिए? जो बे-सिलसिला हो उसके लिए नहीं, बल्कि जिसका सिलसिला हो उसके लिए है। सरकार-ए-मदीना रुश्दो हिदायत के आख़िरी ताजदार हैं। क़यामत तक आपका सिलसिला, आप ही का ज़माना, आप ही का कलिमा, आप ही की दी हुई किताब क़ुरआन काफ़ी है।

है उन्हीं का ये ज़माना, है उन्हीं की ये ख़ुदाई
जो पड़े कोई मुसीबत तो उन्हीं की दे दहाई

मदनी ताजदार अहमद मुख़्तार नबी मुहतरम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : لو كان موسى حياً ما وسعه الا اتباعي. यानी अगर मूसा अलैहिस्सलाम मौजूद होते तो मेरी इताअत के सिवा कोई चारा न होता।

ईसा अलैहिस्सलाम साहिब-ए-किताब पैग़म्बर, जिन पर इंजील मुक़द्दस नाज़िल फ़रमाई गई, जब आख़िरी वक़्त में तशरीफ़ लाएँगे तो “ला इलाहा इल्लल्लाहु ईसा रसूलुल्लाह” नहीं पढ़ाएँगे, बल्कि यही फ़रमाएँगे कि “ऐ मुझ पर ईमान लाने वाले ईसाइयो! मैं नबी-ए-आख़िरुज़्ज़माँ सैयदना मुहम्मद रसूलुल्लाह ﷺ की तस्दीक़ करता हूँ। लो सुनो! मैं कहता हूँ ला इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदुर रसूलुल्लाह। याद रखिए जिसका कलिमा पढ़ा जाए उसी का सिलसिला है।”

अल्हम्दुलिल्लाह, हम अपने नबी पर ईमान रखते हैं। ताज़ीम व तकरीम, सलात व तस्लीम बजा लाते हैं। बिला-शुब्ह हम सब का सिलसिला है और अब्दुल-आबाद तक है।

या इलाही, हश्र तक छूटे न दामन-ए-रसूल

हम गुनहगारों का सिलसिला जब अपने पैग़म्बर से क़ायम है तो कहीं आशिक़ान-ए-इलाही और दीवानगान-ए-हक़, कुश्तगान-ए-ख़ंजर-ए-तस्लीम, सय्यदान-ए-अरब का सिलसिला सोख़्त होता है? अल्लाह का आशिक़, अल्लाह का चाहने वाला, अल्लाह का परस्तार, अल्लाह का फ़रमांबरदार कहीं नामुराद होता है? तालिब-ए-मौला अपने मालिक को पा गया, ख़ुदा मिल गया, ख़ुदा तक पहुँच गया, उसका सिलसिला अतम व बस हो गया। क़ुर्ब-ए-ख़ुदा मिला, दुनिया से बे-नियाज़ हो गया, शान-ए-समदिय्यत का मज़हर बन गया, बन्दे से बन्दा नवाज़ हो गया और ख़्वाजा से ग़रीब नवाज़ बन गया। अगर किसी बात पर क़सम खा ले तो ख़ुदा वैसा ही कर दे। वली हो गया, ख़ुदा का दोस्त व मुक़र्रब हो गया। जो अल्लाह वालों का हो गया, उससे ख़ुदा राज़ी। अल्लाह वालों पर ख़ुदा का इनाम है, जिसका शाहिद क़ुरआन है। क़ुरआन पढ़िए18 और समझिए। “أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِم مِّنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ ۚ وَحَسُنَ أُولَٰئِكَ رَفِيقًا” अल्लाह तआला ने नबियों पर इनाम फ़रमाया और सच्चों और शहीदों और नेक लोगों पर। उन सब की रिफ़ाक़त अच्छी है, उनसे लगाव अच्छा है, उनसे अकीदत अच्छी, उनकी सोहबत मुफ़ीद व बेहतर, उनकी निगाह व करम कायापलट।

निगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरें
जो हो अज़्म-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें

उनकी मोहब्बत और सरकार ज़िंदा शाह मदार रज़ियल्लाहु अन्हु के सिलसिला पाक में दाख़िला दोनों जहाँ की कामयाबी और सआदत है। क़ुरआन पाक में एलान फ़रमाया : “اَلْاَخِلَّآءُ یَوْمَىٕذٍۭ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ اِلَّا الْمُتَّقِیْنَ.” यानी जिस दिन एक दोस्त दूसरे दोस्त का दुश्मन होगा, उस दिन अल्लाह वाले फ़रामोश न किए जाएँगे। दुनिया में दस्तगीरी करना अल्लाह वालों की शान है। अल्लाह का वली ईमानदार और ईमान-बख़्श होता है। उनकी नज़रे कीमियाई असर होती है। उनकी एक नॼर में इंसान कुछ से कुछ हो जाता है।

अज़-क़लम : सैयदुल उलमा हज़रत मौलाना सैयद ग़ुलाम सिब्तैन अलैहिर्रहमा, मकनपुर शरीफ़
माख़ज़ : किताब सैयदुल अक्ताब सफ़्हा 31 से 37

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