२२ रजब में, कुंडों की नियाज़ की हक़ीक़त कुछ इस तरह है
सबसे पहले तो यह समझना चाहिए कि कुंडों की नियाज़ का मतलब क्या है?
ख़ूब जान लीजिए कि नियाज़ का मतलब ईसाल-ए-सवाब है, यानी २२ रजबुल मुरज्जब की तारीख़ में खीर बनाकर मिट्टी के कुंडों में रखकर हज़रत सैयदना सैयदुस्सादात अबुल आइम्मा इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की बारगाह में फ़ातिहा पढ़कर ईसाल-ए-सवाब करने का नाम कुंडों की नियाज़ है।
सबसे पहले फ़तावा दारुल उलूम देवबंद में उलमा व मुफ़्तियाने देवबंद ने अपने-अपने फ़ेसबुक और गूगल और इंस्टाग्राम और मेसेंजर पर यह शगूफ़ा छोड़ा कि यह नियाज़ २२ रजब में नहीं होना चाहिए। क्योंकि शिया फ़िरक़े के लोग हज़रत मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की २२ रजब में वफ़ात होने पर खुशियाँ मनाने के लिए इसी २२ तारीख़ में खीर पकाकर कुंडों में रखकर नियाज़ करते हैं, लिहाज़ा मुसलमानों को यह नियाज़ नहीं करना चाहिए।
यह उलमाए देवबंद की तरफ़ से लोगों को अहले बैत के मशाग़िल व मामूलात से मुनहरिफ़ करने का एक प्रोग्राम है। उलमाए देवबंद की नासिबीयत मिज़ाजी ढकी-छुपी बात नहीं है। इसी रविश पर अतारी उलमा भी उछल-कूद मचा रहे हैं और हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नाम पर अहले सुन्नत के माबैन मुरव्वज मामूल के ख़िलाफ़ नया नज़रिया पेश कर रहे हैं।
और जो लोग इन अत्तारियों की तरफ़ झुकाव रखते हैं, वे २२ रजब से पहले १५ रजब में हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नाम पर दिखावा करते हैं। उनके लिए इंशा अल्लाह मैं अनक़रीब एक ऐसी लिस्ट पेश करूँगा जिसमें २२ रजब में कुंडे करने वाले उलमाए अहले सुन्नत की एक तवील फ़ेहरिस्त होगी, और अतारियों के साथ खिचड़ी खाने वालों की एक अलग लिस्ट होगी।
पहले मैं ईसाल-ए-सवाब और २२ रजब के कुंडों की नियाज़ पर बेहतरीन फ़तावे हदिया-ए-नाज़रीन कर रहा हूँ।
मुफ़्ती-ए-आज़म और दारुल इफ्ता बरेलवी शरीफ़ का फ़तवा
चुनांचे मौलाना मुफ़्ती अब्दुर्रहीम बस्तवी जो एक तवील मुद्दत तक मसंद-ए-दारुल इफ्ता बरेलवी शरीफ़ पर बहैसियत मुफ़्ती फ़ाएज़ रहे, आप २२ रजब में कुंडों की नियाज़ से मुतअल्लिक़ एक इस्तिफ़ता के जवाब में एक फ़तवा देते हैं, जिसकी नक़्ल मन-ओ-अन हदिया-ए-नाज़रीन है:
“फ़ातिहा की असल ईसाल-ए-सवाब है और ईसाल-ए-सवाब अहले सुन्नत के नज़दीक जाइज़ व मुस्तहसन है और सवाब पहुँचता है। कुतुब-ए-फ़िक़्ह व अक़ायद में तसरीह है कि अपने आमाल चाहे बदनी हों या माली, दूसरों को सवाब पहुँचाने से उन्हें सवाब मिलता है और उसको भी मिलता है और किसी के सवाब में कमी नहीं होती। फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी की मशहूर किताब दुर्रे मुख़्तार में है:
الأصل أن كل من أتى بعبادة ماله أن يجعل ثوابها لغيره وأن ثوابها عنده لفعل نفسه بظاهر الأدلة
अल्लामा शामी रद्दुल मुहतार में फ़रमाते हैं:
ولا بعبادة ما أى سواء كانت صلاة أو صوما أو صدقة أو زكوة أو ذكرا أو طوافا أو حجا أو عمرة أو غير ذلك من زيارة قبور الأنبياء عليهم السلام والشهداء والصالحين وتكفين الموتى وجميع أنواع البر كما في الهندية وقدمنا في التاترخانية من المحيط الأفضل لمن يتصدق نفلا أن ينوي لجميع المؤمنين والمؤمنات لأنها تصل ولا ينقص من أجره شئ
इसी तरह हिदाया, नूरुल ईज़ाह, मराक़ी-उल-फलाह, शरह फ़िक़्ह अकबर, शरह अक़ायद नसफ़िया वग़ैरह कुतुब-ए-मुतबरह में ईसाल-ए-सवाब के जाइज़ होने की तसरीह है। २२ रजब को इमाम जाफ़र सादिक़ रहमतुल्लाह का फ़ातिहा कराना शरअन जाइज़ है और दूसरे बुज़ुर्गों की भी फ़ातिहा दिलाना जाइज़ है, कि असल जाइज़ है और बाइस-ए-नफ़ा व सवाब है।
वल्लाहु तआला आलम बिस्सवाब
क़तबा:
अब्दुर्रहीम बस्तवी
ख़ादिम-ए-रज़वी दारुल इफ्ता बरेलवी शरीफ़
अल-जवाब सहीह
फ़क़ीर मुस्तफ़ा रज़ा क़ादरी ग़फ़िर लहू
इस फ़तवे में मुफ़्ती-ए-आज़म मुस्तफ़ा रज़ा ख़ान बरेलवी की तसदीक़ बड़ी अहमियत रखती है।
मौलाना अख़्तर रज़ा ख़ान बरेलवी ताजुश्शरीअह का फ़तवा
अपने ही बुज़ुर्गों की पैरवी करते हुए सिलसिला-ए-रज़विया के ताजुश्शरीअह मौलाना अख़्तर रज़ा ख़ान बरेलवी अपने फ़तावा ताजुश्शरीअह जिल्द नहम में लिखते हैं:
“अवाम में २२ रजब का फ़ातिहा राइज व मामूल है, जिसमें शरअन कोई मुज़ायक़ा नहीं है, और यहाँ यह बात भी कुछ हरज का बाइस नहीं है कि शिया इस तारीख़ को फ़ातिहा करते हैं, कि अफ़आल-ए-मुबाहा व हसना में मुशाबहत हो जाना कुछ मुज़ायक़ा नहीं रखता
दुर्रे मुख़्तार में है:
فإن التشبه بهم لا يكره في كل شيء بل في المذموم فيما يقصد به التشبه
और अगर कोई बेज़अम-ए-मुशाबहत तारीख़-ए-मज़कूर को करे इख़्तियार है।”
वल्लाहु तआला आलम बिस्सवाब
फ़क़ीर अख़्तर रज़ा ख़ान अज़हरी क़ादरी ग़फ़िर लहू
शब ८ ज़िलक़अदा १४०३ह
अल-जवाब सहीह
क़ाज़ी मुहम्मद अब्दुर्रहीम बस्तवी ग़फ़िर लहू अल-क़वी
अब मर्कज़-ए-बरेलवी के इतने साफ़, वाज़ेह, मुदल्लल फ़तवों के बाद भी अगर बरेलवी रज़वी उलमा २२ रजबुल मुरज्जब में कुंडों की नियाज़ से इनकार करें और पाकिस्तानी अत्तारी टोली के फ़रेब में आ जाएँ तो यह उनके बरेलवी इमामों से और मस्लक-ए-बरेलवियत से भी बग़ावत होगी कि नहीं? अल्लाह हिदायत दे।
२२ रजब की फ़ातिहा से अड़ी हुई मुसीबत टल जाती है
एक और मोअतबर मुफ़्ती अहले सुन्नत, वक़ार-ए-उम्मत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी फ़रमाते हैं:
“रजब शरीफ़ के महीने की २२ तारीख़ को हिंद व पाक में कुंडे होते हैं, यानी कुंडे मंगाए जाते हैं और सवा सेर मैदा, सवा पाव शक्कर और सवा पाव घी की पूरियाँ बनाकर हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की फ़ातिहा करते हैं। फ़ातिहा हर बर्तन में और हर कुंडे पर हो जाएगी। अगर सिर्फ़ ज़्यादा सफ़ाई के लिए नए कुंडे मंगा लें तो कोई हरज नहीं। दूसरी फ़ातिहा के खानों की तरह इसे भी बाहर भेजा जा सकता है, इसलिए कि बाईसवीं रजब को हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की फ़ातिहा करने से बहुत अड़ी हुई मुसीबत टल जाती है।”
(इस्लामी ज़िंदगी, पृष्ठ १३३/७५)
इतनी बड़ी ख़ुशख़बरी दी कि २२ रजब में इमाम जाफ़र सादिक़ की फ़ातिहा देने से बहुत अड़ी हुई मुसीबत टल जाती है। अब पंद्रह रजब में कुंडे करने वाले तो इस अज़ीम नफ़े से महरूम ही रह जाएँगे।
ख़ानदान-ए-आला हज़रत का मामूल
इसी तरह मुहद्दिस-ए-पाकिस्तान अल्लामा सरदार अहमद लायलपुरी, मुफ़्ती दारुल इफ्ता दारुल उलूम मज़हर-ए-इस्लाम बरेलवी शरीफ़ फ़रमाते हैं:
“मर्कज़-ए-अहले सुन्नत बरेलवी शरीफ़ में, यानी ख़ानदान-ए-आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान क़ादरी मुहद्दिस-ए-बरेलवी के साहबज़ादों और ख़ानदान के अफ़राद में २२ रजब के कुंडों की तक़रीब मनाई जाती है।”
(कुंडों की फ़ज़ीलत बजवाब कुंडों की हक़ीक़त, पृष्ठ १०/७)
वाज़ेह हो कि कुंडों की फ़ातिहा कोई बरेलवी इजाद नहीं है, बल्कि यह एक अम्र-ए-मुस्तहसन व मामूलात-ए-अहले सुन्नत वल जमाअत है, जो क़रनों से होता चला आ रहा है।
चुनांचे हर ख़ानक़ाह-ए-अहले सुन्नत, मसलन मंकनपुर शरीफ़ कानपुर, अजमेर शरीफ़, पाकपट्टन शरीफ़, बहराइच शरीफ़, कुछोछा शरीफ़, दिल्ली में ख़ानक़ाह निज़ामुद्दीन औलिया, और ख़ानदान-ए-शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस व औलाद-ए-मुहद्दिस अब्दुल अज़ीज़ देहलवी, और वहाँ की तमाम ख़ानक़ाहों में, और कलेर शरीफ़, मारहरा शरीफ़, मख़दूम बहार शरीफ़ और वहाँ की दूसरी ख़ानक़ाहों में, और हसनपुरा शरीफ़, और ग़ौस-ए-बंगाल अलाउल हक़ के आस्ताने पर, और हर सादात के यहाँ, और पाकिस्तान के तमाम सादात-ए-किराम के यहाँ २२ रजबुल मुरज्जब में ही इमाम आली मक़ाम हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का फ़ातिहा होता है।
अत्तारी जमाअत के उरूज के बाद का फ़ितना
और जब से अतारी जमाअत का उरूज हुआ है और उर्स-ए-हज़रत मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को रिवाज देने की कोशिश की जाने लगी है, और उनके फ़ातिहा की तशहीर की जाने लगी है, उसके बाद ही से १५ रजब में नियाज़-ए-इमाम जाफ़र सादिक़ को पीछे ढकेलने की कोशिश शुरू हो गई है। हालाँकि बुज़ुर्गों ने फ़रमाया है कि २२ रजब में नियाज़ दिलाने से बहुत अड़ी हुई मुसीबत इमाम जाफ़र सादिक़ के सदक़े टल जाती है।
मौलाना ख़लील अहमद ख़ान बरकाती ने भी २२ रजब के कुंडों की फ़ातिहा का ज़िक्र पृष्ठ ३१८ पर किया है।
(सुन्नी बहिश्ती ज़ेवर, कामिल)
२२ रजबुल मुरज्जब में ही नियाज़ करना मामूल-ए-अहले सुन्नत वल जमाअत है
पाकिस्तान के एक और बड़े मौलाना अबुल बरकात सैयद अहमद क़ादरी रज़वी ने अपने फ़तावा में लिखा है कि ग्यारहवीं शरीफ़, उर्स और चहलुम की तरह २२ रजब में इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की नियाज़ के लिए कुंडे भरना मामूलात-ए-अहले सुन्नत में से है।
मुफ़्ती पाकिस्तान जनाब सैयद अहमद क़ादरी रज़वी साहब की इबारत से नाज़रीन ने २२ रजब में नियाज़ करने को ज़रूर समझ लिया होगा कि इसी तारीख़ में यह नियाज़ सदियों से राइज व मामूल में है।
और आख़िर में तुहफ़ा-ए-इस्ना अशरिया की एक इबारत हदिया-ए-नाज़रीन करता हूँ, जो मुतअख़्ख़िरीन में इन सारे मशाहीर उलमा व मशाइख़ की जमाअत में मोअतबर व मक़बूल हैं, और आप ऐसे मुहद्दिस व मुफस्सिर हैं कि जिनकी असनाद से इस दौर के बुज़ुर्गों की कोई भी ख़ानक़ाह महरूम नहीं है।
मेरी मुराद बारहवीं सदी के मुजद्दिद-ए-इस्लाम हज़रत अल्लामा मुहद्दिस अब्दुल अज़ीज़ देहलवी रहमतुल्लाहु तआला अलेह हैं, जिनकी बारगाह-ए-नियाज़ से असनाद-ए-हदीस व तफ़सीर फ़क़ीर मदारी अबुल हमाद मुहम्मद इसराफ़ील हैदरी मदारी को भी चंद वसातित से पहुँची हैं, फ़िल्लाहिल हम्दु अला ज़ालिक।
आप फ़रमाते हैं:
“अहले बैत से मुतअल्लिक़ तक़ारीब व अय्याम, जैसे २२ रजब को कुंडों की नियाज़, ज़माना-ए-क़दीम से होती चली आ रही है।”
(तुहफ़ा-ए-इस्ना अशरिया)
माशा अल्लाह साबित हो गया कि हर सादात घराने में, और हर पीरख़ाने में, और उनके मुरीदीन व ख़ुलफ़ा के यहाँ, और मुहिब्बाने अहले बैत के यहाँ २२ रजबुल मुरज्जब को कुंडे भरे जाते हैं और इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम व रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की नियाज़ होती है।
उन उलमा व मुहद्दिसीन-ए-किराम के नाम
जिनके यहाँ २२ रजब को इमाम की नियाज़ होती है
हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी,
हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी,
और उनके शागिर्द हज़रत सैयद आल-ए-रसूल मारहरवी,
हज़रत पीर सैयद मेहर अली शाह गोलड़ा शरीफ़,
हज़रत पीर सैयद कल्बे अली मंकनपुरी,
हज़रत अल्लामा फ़ज़्ल-ए-हक़ ख़ैराबादी,
हज़रत मुहद्दिस-ए-आज़म हिंद कुछोछा शरीफ़,
आला हज़रत अशरफ़ी मियाँ कुछोछा शरीफ़,
हज़रत सैयद शैख़ुल हिंद ज़ुल्फ़िकार अली क़मर मदारी मंकनपुर शरीफ़,
हज़रत सैयद पीर जमाअत अली शाह मुहद्दिस बरेलवी,
मौलाना अहमद रज़ा ख़ान साहब,
मुफ़्ती-ए-आज़म मुस्तफ़ा रज़ा ख़ान बरेलवी,
मौलाना अहमद यार ख़ान नईमी,
सदरुश्शरिया अमजद अली आज़मी घोसवी,
मौलाना सैयद अबुल बरकात अहमद क़ादरी रज़वी,
सैयद अहमद सईद काज़मी,
मौलाना सरदार अहमद ख़ान क़ादरी,
सैयद बाबा वली शिकोह मंकनपुरी,
और मौलाना अख़्तर रज़ा ख़ान अज़हरी बरेलवी,
और आख़िर में यह नाचीज़ अबुल हमाद हैदरी मदारी भी लिया जा सकता है।
उन मौलवियों के नाम जो इमाम की नियाज़ की तारीख़ २२ रजब से गुरेज़ करते हैं
उर्स-ए-हज़रत मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के बहाने २२ रजब से गुरेज़ करने वाले उलमाए देवबंद और उलमाए अतारिया के नाम दर्ज़-ए-ज़ैल हैं:
मौलाना इलियास अत्तार क़ादरी — हालाँकि जब ये उर्स-ए-हज़रत मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु नहीं मनाते थे तो ये भी २२ रजबुल मुरज्जब में ही कुंडों की नियाज़ कराते थे, जैसा कि उनकी बाज़ किताबों में लिखा हुआ है। लेकिन जब से अहले बैत की मोहब्बत का ख़ुमार उतरा और उर्स-ए-हज़रत मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु मना कर मुजद्दिद बनने का शौक़ मौजज़न हुआ, आँ जनाब पैदाइश-ए-मौलूद-ए-काबा के दिन बिल्कुल सन्नाटा खींच लेते हैं, लेकिन उर्स-ए-हज़रत मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु मनाते वक़्त झूम-झूम कर नारे लगाते हैं और बड़ी ख़ुशी ज़ाहिर करते हैं। ऐसा लगता है कि यही उनके सबसे ज़्यादा फ़ॉलोअर हैं।
आँ जनाब २२ रजब से सात पैदान नीचे उतर कर इल्म-ए-जफ़र के हिसाब से छक्का मारने लगते हैं।
दूसरा नाम उनके ख़लीफ़ा जनाब इमरान अत्तारी का है, और हाजी हबीब अत्तारी, और उनके हमनवा जनाब मुफ़्ती मुनीबुर्रहमान रज़वी का है। हाल ही में मुख़ालफ़त-ए-अहले बैत के मामले में इनके ख़िलाफ़ बड़ी चह-मीगोइयाँ हुई थीं, बिलआख़िर आपको अपने इस मौक़िफ़ से रुजूअ करना पड़ा था।
और जनाब डॉक्टर आसिफ़ अशरफ़ लाहौरी — ये वही आसिफ़ जलाली जी हैं जिन्होंने सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा को ख़तावार बताया था — और मौलाना मुज़फ़्फ़र हुसैन अख़्तरी साहब, और देवबंदी आलिम औरंगज़ेब फ़ारूक़ी देवबंदी, और इलियास घमन देवबंदी, और मौलाना हनीफ़ जालंधरी वग़ैरह।
इन लोगों ने मज़कूरा-बाला तमाम उलमाए अहले सुन्नत वल जमाअत, मुहद्दिसीन-ए-किराम, सादात-ए-इज़ाम और तमाम मशाइख़-ए-अहले ख़ानक़ाह से मुख़ालफ़त करते हुए इस बाबत एक नया मस्लक बना लिया है और उलमाए देवबंद के नज़रियात को अपना रास्ता बना लिया है।
इस जमाअत का यह खयाल है कि २२ रजब में हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की तारीख़-ए-विसाल है, और हुज़ूर सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ १५ रजब में पैदा हुए, लिहाज़ा अहले तशय्यु हज़रत मुआविया बिन सुफ़ियान रज़ियल्लाहु अन्हु की मौत पर खुशियाँ मनाने के लिए खीर-पूरी बाँटते हैं — अल-इयाज़ु बिल्लाह।
लिहाज़ा अहले तशय्यु की मुख़ालफ़त में १५ रजब को ही खीर-पूरी पर नियाज़ दिलानी चाहिए, और इसी दिन हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की पैदाइश भी है, इसलिए और अच्छा होगा।
इस खयाल का जवाब
इसके जवाब में मैं कहूँगा कि अव्वलन शुरू से ही मशाहीर व अकाबिर अहले सुन्नत वल जमाअत, तमाम सादात-ए-किराम व मशाइख़-ए-अहले ख़ानक़ाह और उनके ख़ुलफ़ा की रविश २२ रजब में ही इमाम जाफ़र सादिक़ की नियाज़ दिलाने की रही है। इन उलमाए अहले सुन्नत वल जमाअत से अलग हटकर और मामूलात-ए-अहले सुन्नत को छोड़कर देवबंद और वहाबियत के साथ जा मिलना अहले सुन्नत से गुमराही की अलामत है, जो किसी तरह रवा नहीं कही जा सकती। गोया ये लोग यह कहना चाहते हैं कि उनके असलाफ़ अब तक ग़लत करते चले आए — अगर ऐसा है तो फिर उन्हें डूब मरना चाहिए और अहले सुन्नत से निकलकर एक नई जमाअत बनाने की घोषणा कर देनी चाहिए।
अगर ये कहते हैं कि ये लोग शिया लोगों की मुशाबहत से बचने के लिए ही ऐसा करते हैं, तो क्या इस फ़लसफ़े से उनके पीर और पीराने-पीर और उनके असातिज़ा और सलफ़-ए-सालेहीन और सादात-ए-किराम वाक़िफ़ नहीं थे?या लिल-अजब! क्या वे लोग आयत-ए-करीमा “इन्नस्सफ़ा वल-मरवता मिन शआइरिल्लाह” की शान-ए-नुज़ूल भी नहीं पढ़े थे?
और साहिब-ए-दुर्रे मुख़्तार ने तो वाज़ेह फ़रमा दिया कि
“फ़इन्नत्-तशब्बुह बहिम ला युक्रह फ़ी कुल्लि शै’इन, बल फ़िल-मज़मूम फ़ीमा युक़सदु बिहित्-तशब्बुह” यानी इस मामले में अहले तशय्यु से तशाबुह भी अगर हो रहा हो, तो भी कोई हरज की बात नहीं है।
और जैसा कि फ़तावा ताजुश्शरीअह में मौलाना अख़्तर रज़ा ख़ान अज़हरी ने भी कहा कि
“यह बात भी कुछ हरज का बाइस नहीं है कि शिया इस तारीख़ को फ़ातिहा करते हैं।”
अब तो मौलाना अख़्तर रज़ा ख़ान अज़हरी ने २२ रजब में कुंडों की नियाज़ के मुख़ालिफ़ीन के सारे दाँव-पेच की खाट खड़ी कर दी और सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया।
फ़क़ीर मदारी अबुल हमाद मुहम्मद इसराफ़ील हैदरी मदारी को उम्मीद-ए-क़वी है कि रज़वी और अख़्तरी (ब-मानी अज़हरी) उलमा व आइम्मा हज़रात अपने-अपने गाँवों और मुहल्लों में २२ रजब को ही इमाम की नियाज़ दिलाएँगे, और वे मौलवी जो इमाम जाफ़र सादिक़ की तारीख़ के ख़िलाफ़ गाँव-गाँव में ग़दर काट रहे हैं, उनका ख़म्सा भी दुरुस्त हो गया होगा, और अब वे भी २२ रजब को ही मौला इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के कुंडों की नियाज़ दिलाएँगे।
वरना अपने पीरों से बग़ावत करके दायरा-ए-मुरीदीन से ही बाहर हो जाएँगे। और जिन्होंने बग़ावत कर ली है, उनके लिए तौबा का दरवाज़ा खुला हुआ है।
२२ रजबुल मुरज्जब में सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की नियाज़ की हक़ीक़त
मशाइख़ व सादात-ए-किराम बयान करते चले आए हैं कि सन १२२ हिजरी, रजब की २२ तारीख़ की रात, यानी २१ का दिन गुज़रकर २२ की रात, ब-वक़्त-ए-नमाज़-ए-तहज्जुद, अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु अन्हु को मक़ाम-ए-अनह, मक़ाम-ए-क़ुत्बियत-ए-कुबरा, विलायत-ए-ख़ास्सा-ए-नबविया और विरासत-ए-अलविया से सरफ़राज़ फ़रमाया।
२२ रजब को इस अज़ीमुश्शान नेमत-ए-कुबरा और मक़ाम-ए-क़ुत्बियत-ए-उज़्मा हासिल होने के बाद सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने सुबह के वक़्त अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की जानिब शुक्र अदा करने के लिए नियाज़ बनवाई, जो दूध और चावल मिलाकर बनाई गई, जिसे लोग “खीर” कहते हैं।
सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ख़ानदान-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम के चश्म-ओ-चराग़ हैं। आपके घर में टूटी चटाई और मिट्टी के बर्तन ही थे, उसी पर आप शाकिर व साबिर थे।
आपने मिट्टी के प्याले में नियाज़ रखकर अपने दोस्त व अहबाब को बुलाया और फ़रमाया कि आज रात अल्लाह पाक ने मुझे मक़ाम-ए-क़ुत्बियत-ए-कुबरा और ग़ौसियत-ए-उज़्मा अता फ़रमाकर उसका शुक्र अदा करने का मौक़ा इनायत फ़रमाया है। यह नियाज़ आप लोगों को बतौर-ए-तबर्रुक पेश है।
आपके बड़े साहबज़ादे सैयदना इमाम मूसा काज़िम रज़ियल्लाहु अन्हु और आपके दीगर मुसाहिबीन ने दरियाफ़्त किया कि इस नियाज़ में हमारे लिए क्या है? तो आपने फ़रमाया कि रब्ब-ए-काबा की क़सम! अल्लाह तआला ने जो नेमत-ए-उज़्मा मुझे अता फ़रमाई है, उसका मैं शुक्र अदा करता हूँ। इसी तरह इसी तारीख़ में जो भी शुक्र अदा करेगा और हमारे वसीले से जो दुआ माँगेगा, तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उसकी मुराद ज़रूर पूरी फ़रमाएगा और दुआ ज़रूर क़बूल होगी, क्योंकि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अपने शुक्रगुज़ार बंदों को मायूस नहीं फ़रमाता।
कहते हैं कि सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के पर-पोते सैयदना इमाम हसन अस्करी रज़ियल्लाहु अन्हु से कुछ दुश्मनान-ए-अहले बैत ने सवाल किया कि जब हमारे घरों में पीतल, ताँबे के बेहतरीन बर्तन मौजूद हैं तो मिट्टी के कुंडों की क्या ज़रूरत है?
इस पर सैयदना इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया कि हमारे नाना जान मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की सुन्नत है मिट्टी के बर्तन में खाना। आज मुसलमानों ने हमारे नाना जान की सुन्नतों को छोड़ दिया है। हमने इस नियाज़ को मिट्टी के प्यालों में इसलिए ज़रूरी क़रार दिया है ताकि कम से कम साल में एक मरतबा ही मिट्टी के कुंडों में नियाज़ खाकर सुन्नत-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम अदा हो जाए।
वल्लाहु आलम बिस्सवाब।
मआख़िज़ (हवाले)
मिन्हाजुस्सालिहीन — मुसन्निफ़ मुहियुद्दीन अबू बक्र अल-बग़दादी
कश्फ़ुल असरार — अब्दुल्लाह बिन अली इस्फ़हानी
मअदन-ए-असरार अहले बैत — मुहम्मद बिन इस्माईल मुत्तक़ी मक्की
मख़ज़न-ए-अनवार-ए-विलायत — बुरहानुद्दीन अस्क़लानी
बाज़ मुहिब्बीन ने ये हवाले मुस्तख़रिज़ करके मेरे पास भेजे हैं, जो अभी मेरे नज़दीक महल्ल-ए-तहक़ीक़ हैं।
ग्यारहवीं शरीफ़ (११ रबीउल आख़िर) और कुंडों की नियाज़ फ़ातिहा २२ रजब को ही करें
ख़याल रहे कि २२ रजब न तो हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की विसाल की तारीख़ है और न ही पैदाइश की तारीख़।
बल्कि जिस तरह ११ रबीउल आख़िर न तो हज़रत ग़ौस-ए-आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की पैदाइश का दिन है और न ही विसाल की तारीख़ है। क़ादरी हज़रात ईद-ए-ग़ौसिया मनाते हैं, जलूस, लंगर और अफ़ज़ल खाने पर फ़ातिहा-ख़्वानी करते हैं और बहुत सी चीज़ों का एहतेमाम करते हैं, तो शह शरीफ़ का फ़ातिहा देते हैं — ये सारे काम धूमधाम से होते हैं।
इसी तरह २२ रजबुल मुरज्जब है।
यह तो सारे सलासिल-ए-औलिया के लिए जश्न का दिन होना चाहिए, इसलिए कि तमामी अहले सुन्नत वल जमाअत के मुसलमानों की निस्बत इन्हीं के दामन से बँधी है। इस दिन भी जलूस-ए-जाफ़रिया निकलना चाहिए, बल्कि सारे आइम्मा-ए-अहले बैत की पैदाइश व विसाल की तारीख़ों में बड़े एहतेमाम से लंगर व तआम का इंतेज़ाम करना चाहिए, ताकि दुनिया को यह पैग़ाम जाए कि सारे आइम्मा-ए-अहले बैत अहले सुन्नत वल जमाअत के इमाम हैं — सिर्फ़ शिया लोगों की जागीर ये इमाम नहीं हैं।
ये तारीख़ें तो हम सब के लिए हुसूल-ए-नेमत के दिन हैं, ख़ुसूसन इमाम जाफ़र सादिक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के हुसूल-ए-नेमत के दिन हम सब अहले सुन्नत के लिए ईद से कम नहीं हैं। इसी लिए हम इस दिन ख़ास पकवान पर इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की नियाज़ देकर इज़हार-ए-मसर्रत करते हैं, और ख़्वैश-ओ-अक़ारिब और अपने मुहल्लों के मुसलमानों के घरों में इमाम की नियाज़ पहुँचाते हैं। उनकी सीरत व सवानिह बयान करते हैं।
तमामी अहले सुन्नत वल जमाअत को चाहिए कि सारे आइम्मा-ए-अहले बैत की मुक़र्ररा तारीख़ों में उनके आ‘रास धूमधाम और जोश-ओ-ख़रोश से मनाया करें, ताकि मोहब्बत-ए-अहले बैत को फ़रोग़ मिले और ज़ात-ए-रिसालत से रिश्ता मुस्तहकम हो।
दुआ और ख़ातिमा
अहले बैत से मोहब्बत करने वालों के लिए यह तुहफ़ा बारगाह-ए-आइम्मा-ए-अहले बैत और बारगाह-ए-ख़ुदा व रसूल अलैहिस्सलाम में क़ुबूल हो!
फ़क़्त वस्सलाम
चूँकि सख़्त बीमारी की हालत में ख़ुद ही पूरे मज़मून की किताबत की है, अगर ग़लतियाँ मिलें तो नाज़रीन माफ़ कर दें और मुझे मुत्तलिअ फ़रमाएँ, और मुझ फ़क़ीर इलल-रब्बिल करीम के लिए दुआ-ए-शिफ़ा करें।
कतबा
अबुल हम्माद मुहम्मद इसराफ़ील हैदरी मदारी
दारुन नूर आस्ताना आलिया ज़िंदा शाह मदार क़ुद्दिसा सिर्रहुल अज़ीज़
मंकनपुर शरीफ़, कानपुर नगर
📞 9793347086







